23-24 जून को उत्तराखण्ड विकास संवाद

Author:अरुण तिवारी
हिमालयी राज्यों के नागरिक संगठन, लम्बे अरसे से हिमालयी प्रदेशों के विकास की अलग नीति माँग कर रहे हैं। मैं समझता हूँ कि नीति आयोग की यह नीति, जाने-अनजाने इसके दरवाजे खोल रही है। खुले दरवाज़े का लाभ लेने के लिये जरूरी है कि प्रदेश सरकारें अपने प्रदेश की सामर्थ्य, संवेदना और जरूरत का आकलन कर टिकाऊ विकास का खाका तैयार करने में जुट जाएँ। इस दृष्टि से उत्तराखण्ड जैसे संवेदनशाली राज्य के टिकाऊ विकास का खाका बेहद सावधानी, समझ, संवेदना, समग्रता और दूरदृष्टि की माँग करता है। नीति आयोग ने इस नीति पर काम करना शुरू कर दिया है कि राज्य, केन्द्र की ओर ताकने की बजाय, अपने संसाधनों के विकास पर ज्यादा-से-ज्यादा ध्यान कैसे दें? इसके लिये नीति आयोग के दलों ने राज्यों के दौरे भी शुरू कर दिये हैं। इस नीति से किन राज्यों को लाभ होगा और कौन-कौन से राज्य घाटे में रहेंगे? इस नीति से पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील राज्यों में विकास और पर्यावास के बीच सन्तुलन साधना कितना सम्भव होगा; यह भी एक प्रश्न है।

इस नीति में राज्य से आने वाली केन्द्रीय कर राशि के आधार पर केन्द्रीय बजट में राज्य की हिस्सेदारी का विचार भी सुनाई दे रहा है। इससे आप आशंकित हो सकते हैं कि इससे कमजोर आर्थिकी वाले राज्यों में स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के अतिदोहन की विवशता बढ़ जाएगी; जिसके दुष्प्रभाव व्यापक होंगे।

ये सभी प्रश्न और आशंकाएँ अपनी जगह सही हो सकती हैं। किन्तु इस नीति के कारण, मैं स्वावलम्बन और स्वनिर्णय का एक अवसर खुलता हुआ देख रहा हूँ। यदि मैं इस नीति को ठीक से समझ सका हूँ तो इस नीति के कारण, प्रत्येक प्रदेश को अपने भूगोल, अपने मानव संसाधन और अपनी जरूरत के मुताबिक अपने प्रादेशिक विकास का मॉडल खुद तय करने का अवसर ज्यादा खुले तौर पर मिल जाएगा।

हिमालयी राज्यों के नागरिक संगठन, लम्बे अरसे से हिमालयी प्रदेशों के विकास की अलग नीति माँग कर रहे हैं। मैं समझता हूँ कि नीति आयोग की यह नीति, जाने-अनजाने इसके दरवाजे खोल रही है। खुले दरवाज़े का लाभ लेने के लिये जरूरी है कि प्रदेश सरकारें अपने प्रदेश की सामर्थ्य, संवेदना और जरूरत का आकलन कर टिकाऊ विकास का खाका तैयार करने में जुट जाएँ। इस दृष्टि से उत्तराखण्ड जैसे संवेदनशाली राज्य के टिकाऊ विकास का खाका बेहद सावधानी, समझ, संवेदना, समग्रता और दूरदृष्टि की माँग करता है। इस माँग की पूर्ति के लिये ऑक्सफेम इण्डिया ने साझा संवाद आयोजित करना तय किया है।

एक साझी पहल


‘उत्तराखण्ड के स्थायी विकास हेतु साझी पहल’ - इस शीर्षक के तहत् आयोजित यह संवाद 23-24 जून, 2015 को डायनेस्टी रिज़ोर्ट, कुरुपताल, नैनीताल, उत्तराखण्ड में होगा। आप इस संवाद को 13 फरवरी, 2014 और 23 दिसम्बर, 2014 में हुए पूर्व संवादों की कड़ी में अगले कदम के रूप में देख सकते हैं।

चिन्ता, उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होने के आकलन से शुरू होती है। उत्तराखण्ड के पास न तो अपनी कोई प्रदेश स्तरीय अधिकारिक जलनीति है, न पुनर्वास नीति और न ही आपदा प्रबन्धन तथा टिकाऊ विकास का कोई आधिकारिक खाका। प्राप्त आमन्त्रण पत्र में उल्लिखित ऐसे कुछ संकेत स्पष्ट करते हैं कि उत्तराखण्ड शासन को चाहिए कि वह उत्तराखण्ड के निवासियों, संगठनों और विशेषज्ञों के साथ बैठकर जानने की कोशिश करे कि वे कैसा विकास चाहते हैं? विधानसभा, जनता की राज्य स्तरीय प्रतिनिधि सभा होती है। किन्तु न विधानसभा ने यह कोशिश की और न ही शासन ने।

साझे मंच की जरूरत


ऐसा लगता है कि इस स्थिति को देखते हुए ही ऑक्सफेम इण्डिया के निर्णायकों ने तय किया है कि एक ऐसा फोरम विकसित किया जाए, जो न सिर्फ टिकाऊ विकास की जनदृष्टि को सामने लाए, बल्कि आपसी सहमति विकसित करने का भी काम करे। इस फोरम के दो अन्य मकसद, उत्तराखण्ड की नीतियों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने व विकास में सहभागिता के लिये नागरिक संगठनों को तैयार व एकजुट करना भी है।

फोरम में विश्वविद्यालयों, संस्थानों, विशेषज्ञों, नागरिक संगठनों, कार्यकर्ताओं, मीडिया, सेवानिवृत अधिकारियों तथा विकास के लाभार्थी पक्षों की सहभागिता पूर्व संवादों में सहमति है। सम्भवतः इसी दृष्टि से मुझे भी आमन्त्रण प्राप्त हुआ है। उम्मीद है कि प्रकृति की ओर से लगातार मिलते सन्देशों के बीच, उम्मीदों का साझा हासिल होगा। सातत्य, सक्रियता, आपसी साझे और जवाबदेही के निजी संकल्प से ही यह सम्भव होता है। काश! यह हो।

कार्यक्रम की समय सारणी संलग्न है।
अधिक जानकारी के लिये सम्पर्क:
श्री श्रीश त्रिपाठी
कार्यक्रम अधिकारी (आर्थिक न्याय)
ऑक्सफेम इण्डिया, लखनऊ
फोन 0522-4172000

कार्यक्रम पूरा डिटेल देखने के लिये अटैचमेंट डाउनलोड करें।

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