आखिर बाढ़ की स्थिति क्यों जानना जरूरी है

Author:राम भरोस मीणा

आखिर बाढ़ की स्थिति क्यों जानना जरूरी है ,फोटो-Indiawaterportal flicker

वर्षा ऋतु प्रारम्भ के होते ही यह सामान्य सी बात हो गई कि अमुक जगहों पर बाढ़ के हालात बन गए, बाढ़ आ गई, लोग डूब रहे हैं, इमारतें धराशायी हो गईं हैं, जन जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। बाढ़ वैसे वर्षा के समय ही नहीं यह कभी भी घटित होने वालीं घटना है, सर्दी, गर्मी, वर्षा चाहें जो समय हों। तेज़ मूसलाधार वर्षा जो 100 mm से अधिक  एक साथ, एक समय,एक स्थान पर होती है उससे बाढ़ के हालात बनने की संभावनाओं से नकारा नहीं जा सकता है । लेकिन पानी से उपजी यह आपदा अधिकतम उन स्थानों पर देखने को मिलती रही है जहां औसतम वर्षा 650 mm से 1000 mm के मध्य होती है।  जिसमे  असम, उत्तराखण्ड, गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना जैसे राज्य प्रमुख है जहाँ हर वर्ष बाढ़ के हालात बने रहते  है।   


आखिर ऐसा क्यों हों रहा है, जहां बाढ़ नहीं आने चाहिए वहां भी हालात गम्भीर बने हुए है  यह जानना-समझना बहुत जरूरी है । बाढ़ बहते पानी के रास्ते में अवरोध पैदा करने या एका एक बादल फटने जैसी स्थिति होने से उत्पन्न होते हैं जैसे श्रीगंगानगर में इस सप्ताह एक साथ 312 mm वर्ष हुईं, जिससे बाढ़ के हालात बने, प्रशासन नाकामयाब रहा, सेना बुलाई गई  तब जाकर लोगों को रहात प्राप्त हुईं।  यहां औसत वर्षा  205mm होती हैं लेकिन बादलों के जोशीले स्वभाव ने हालात गम्भीर बना दिया है ।

ऐसे में हम दोष बादलों पर नहीं ठहरा सकते है उन्हें बरसना था, तो वह बरस गए ।  बादलों के बरसने के बाद धरती पर जो हालात बने उन्हें  हमें समझना होगा साथ ही समाज एवं सरकार के साथ इसके निदान के लिए कोई  ठोस कदम उठाना होगा। हमें नीतियों को कठोरता के साथ लागू करना होगा क्योंकि बाढ़ से अरबों खरबों की आर्थिकहानि होती ही है साथ ही जन-जीवन भी प्रभावित होता है।  

कुछ ऐसा  ही एक उदाहरण तीस साल पहले जयपुर में आई बाढ़ का है जिसने पूरे शहर को आर्थिक चोट तो पहुंचाई साथ कई परिवारों को बेघर कर दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि  बेघर  हुए वे लोग आज तक नहीं सम्भल पाएं हैं।

साल 2014 में 196mm वर्षा होने पर श्री गंगानगर में सेना को बुलाया गया था वहीं  चुनावड् , मकराना, उर्मिला सागर में हुईं भारी वर्षा ने प्रशासन के दावों की पोल खोल कर रख दी। सीकर में भी यही हालात बने रहते हैं, वर्षा के बाद एका एक पूरा  शहर जलमग्न हो जाता है। 

आज बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिकरण, पर्यावरणीय प्रदूषण, पानी के बहाव क्षेत्रों में बढ़ते अतिक्रमण, नदियों में हुएं अवरोधों, से राजस्थान जैसे कम वर्षा वालें क्षेत्रों में बाढ़ के हालात बन रहे है प्रदेश का हर शहर  इससे प्राभवित हो रहा है। आज कहें तो गंगा जैसी महानदी भी अतिक्रमण की चपेटे से नहीं बच सकी है और धीरे-२ नालों में तब्दील होने की  और बढ़  रही है।   

राजस्थान में प्रत्येक नदी अतिक्रमण की चपेट में आने के साथ दम तोड रही है  अलवर जिले में जयसमंद बांध के पानी के आवक क्षेत्र में  बड़े अतिक्रमण से नदी के अवशेष खत्म होने के साथ पानी की आवक रूक गई है  जिससे साफ़ होता है की यदि यहां  बादल फटा तो निचले क्षेत्रों में बाढ़ के हालात उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

आए दिन पैदा होने वालीं इस समस्या से निजात पाने के लिए हमारी सरकारों को ठोस कदम उठाने होगें जैसे :- 

  • शहरो में विकास के मॉडल को भौगोलिक स्थिति अनुसार तैयार करना होगा 
  • शहरों से निकलने वाले पानी के लिए पर्याप्त चौड़ाई में नालों का निर्माण कराना होगा।  
  • प्रशासन को एक शहर में पैदा हुईं आपदाओं से सीख लेकर दूसरे शहरो पर पार्यप्त इंतजाम कराने होंगे।  
  • शहरों के विकास से पूर्व पानी के बहाव क्षेत्रों को चिन्हित कर उन्हें सुरक्षित किया जाए।  
  • नदियों को अतिक्रमण से मुक्ति दिलाई जाए।   
  • बड़े बांधों के भराव क्षमता को मध्य नजर रखते हुए मौसम विभाग से प्राप्त सूचनाओं मद्देनज़र समय पर अतिरिक्त पानी को निकालना उचित समझा जाए,
  • वर्षा के मीठे पानी को अंडर ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ाने के लिए पर्याप्त ट्यूबवेल पूर्व में खोदे जाए जिससे पानी को संग्रह किया जा सके।  इससे बाढ़ जैसे हालातो से बचने के साथ अणडंर ग्राउंड वाटर लेवल भी बढ़ेगा जो भविष्य में पेयजल की आपूर्ति करने में सहायक होगा।

लेखक जाने माने पर्यावरण कार्यकर्ता व समाज विज्ञानी है