आबोहवा में घुलता जहर

Author:दुष्यंत शर्मा
Source:नई दुनिया, 04 दिसम्बर 2011

हवा से राहत, पानी में आफत


दिल्ली विश्व में सबसे अधिक आबादी वाला आठवां शहर है। दिल्ली का पर्यावरण आबादी के इस बोझ से कराह रहा है। दूसरे इस आबादी के लिए शहर के संसाधन कम पड़ते जा रहे हैं। खास तौर से पानी के मामले में यह बात सिद्ध है। जल प्रदूषण के अलावा सॉलिड वेस्ट ट्रीटमेंट की कमी की वजह से यमुना नदी को भारी नुकसान पहुंचा है। यमुना नदी में गिरने वाले 17 नालों ने नदी को बर्बाद करके रख दिया है।

दिल्ली की हवा में जहर घट रहा है। वायु प्रदूषण की वजह से भीड़ भरे चौराहों-लाल बत्ती पर खड़े होते हुए जहां पहले आंखें जलने लगती थीं अब उससे राहत है। सरकार का दावा है कि अब दिल्ली के 22 प्रतिशत भू-भाग पर हरियाली है। अगर सरकार के इस दावे पर यकीन कर भी लिया जाए तब भी लक्ष्य से 11 प्रतिशत पीछे ही हैं। वायु प्रदूषण भले ही कम हुआ हो लेकिन जल प्रदूषण के मामले में हालात बहुत बुरे हैं। सफाई के नाम पर दो चरणों में अरबों रुपए खर्च करने के बाद भी यमुना नदी का चुल्लू भर पानी साफ नहीं हो पाया है। आम तौर पर माना जाता है कि शहर में वायु प्रदूषण की मुख्य वजह वाहन हैं लेकिन अब तो कम से कम यह सही नहीं है।

शहर के पर्यावरण को हानि पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका सड़कों और किनारे की धूल मिट्टी (50 प्रतिशत) है। इसके बाद औद्योगिक प्रदूषण (23 प्रतिशत) और फिर बारी आती है वाहनों (7 प्रतिशत) की। वायु प्रदूषण के स्तर में कमी की दो प्रमुख वजहें हैं। एक तो सार्वजनिक परिवहन का सीएनजी से संचालन अनिवार्य कर दिया गया है और दूसरे मेट्रो रेल के आ जाने के बाद से वायु प्रदूषण कम हुआ है। इसीलिए शहरी प्राधिकरण का यह दावा सही जान पड़ता है कि वायु प्रदूषण में भारी कमी आ चुकी है। मिसाल के तौर पर 2014 के एशियाई खेलों के आयोजन के लिए लगने वाली बोली में आयोजन समिति ने यह दावा किया था कि मेट्रो रेल के आ जाने और सार्वजनिक परिवहन के लिए सीएनजी अनिवार्य कर दिए जाने के बाद से वायु प्रदूषण का स्तर बहुत घट गया है।

यमुना नदी के पानी को साफ करने के सभी उपाय बेकार साबित हो चुके हैं दिल्ली मेंयमुना नदी के पानी को साफ करने के सभी उपाय बेकार साबित हो चुके हैं दिल्ली मेंलेकिन पर्यावरण के जानकारों का मानना है कि भले ही सरकारी निकाय प्रदूषण के स्तर में कमी की बातें करते हैं लेकिन एशियाई खेलों के आयोजन की जिम्मेदारी इसीलिए नहीं मिल सकी क्योंकि यहां का पर्यावरण अभी इस लायक नहीं है। जहां तक पेड़-पौधों की बात है तो नियम यह है कि अगर एक पेड़ काटा जाएगा तो उसकी जगह 10 लगाए जाएंगे लेकिन असल में कितने पेड़ लगाए जाते हैं और उनमें से कितने जीवित रह पाते हैं इसका प्रामाणिक आंकड़ा मिल पाना मुश्किल है। वैसे, दिल्ली मेट्रो के तीसरे चरण (108 किमी.) के लिए 11 हजार 500 पेड़ों की बलि दी जाएगी।

दिल्ली विश्व में सबसे अधिक आबादी वाला आठवां शहर है। दिल्ली का पर्यावरण आबादी के इस बोझ से कराह रहा है। दूसरे इस आबादी के लिए शहर के संसाधन कम पड़ते जा रहे हैं। खास तौर से पानी के मामले में यह बात सिद्ध है। जल प्रदूषण के अलावा सॉलिड वेस्ट ट्रीटमेंट की कमी की वजह से यमुना नदी को भारी नुकसान पहुंचा है। यमुना नदी में गिरने वाले 17 नालों ने नदी को बर्बाद करके रख दिया है। पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह के मुताबिक यमुना नदी नाले में तब्दील हो चुकी है। यह शहर के पर्यावरण की दृष्टि से बहुत बुरा है। नदी को बचाने से ही यहां के पर्यावरण में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।