आखिर कहाँ जाता है परमाणु बिजली घरों का कचरा

Author:पंकज चतुर्वेदी
भारत में हर साल भारी मात्रा में निकलने वाले ऐसे कचरे को हिमालय पर्वत, गंगा-सिन्धु के कछार या रेगिस्तान में तो डाला नहीं जा सकता, क्योंकि कहीं भूकम्प की आशंका है तो कहीं बाढ़ का खतरा। कहीं भूजल स्तर काफी ऊँचा है तो कहीं घनी आबादी। यह पुख्ता खबर है कि परमाणु उर्जा आयोग के वैज्ञानिकों को बुन्देलखण्ड, कर्नाटक व आन्ध्र प्रदेश का कुछ पथरीला इलाका इस कचरे को दफनाने के लिये सर्वाधिक मुफीद लगा और अभी तक कई बार यहाँ गहराई में स्टील के ड्रम दबाए जा चुके हैं। भारत में बिजली की माँग बढ़ रही है, हालांकि अभी हम कुल 4780 मेगावाट बिली ही परमाणु से उपजा रहे हैं जो कि हमारे कुल बिजली उत्पादन का महज तीन फीसदी ही है। लेकिन अनुमान है कि हमारे परमाणु ऊर्जा घर सन् 2020 तक 14600 मेगावाट बिजली बनाने लगेंगे और सन् 2050 तक हमारे कुल उत्पादन का एक-चौथाई अणु-शक्ति से आएगा।

विकास के लिए एक महत्वपूर्ण घटक है बिजली और उसकी माँग व उत्पादन बढ़ना स्वाभाविक ही हैं। लेकिन जो सवाल सारी दुनिया के विकसित देशों के सामने है, उस पर भारत को भी सोचना होगा- परमाणु घरों से निकले कचरे का निबटान कहाँ व कैसे हो।

सनद रहे परमाणु विकिरण सालों-दशकों तक सतत् चलता है और एक सीमा से अधिक विकिरण मानव शरीर व पर्यावरण को कैसे नुकसान पहुँचाता है उसकी नजीर जापान का हिरोशिमा व नागासाकी है। वैसे तो इस संवेदनशील मसले पर 14 मार्च 2012 को एक गैरतारांकित प्रश्न के जवाब में प्रधानमन्त्री कार्यालय ने लोकसभा में जवाब देकर बताया था कि परमाणु कचरे का निबटना कैसे होता है।

लेकिन कहाँ होता है व कब होता है, जैसे सवाल बेहद संवेदनशील बता कर अनुत्तरित ही रहते हैं। यह बात कई सालों पहले भी सुगबुगाई थी कि ऐसे कचरे को जमीन के भीतर गाड़ने के लिए उपेक्षित, वीरान और पथरीले इलाकों को चुना गया है और उसमें बुन्देलखण्ड का भी नाम था।

सरकार का लोकसभा में दिया गया जवाब बताता है कि परमाणु बिजली घर से निकले कचरे को पहले अतिसंवेदनशील, कम संवेदनशील तथा निष्क्रिय में छाँटा जाता है फिर खतरनाक कचरे को सीमेंट, पाॅलीमर, काँच जैसे पदार्थों में मिला कर ठोस में बदलने को रखा जाता है। इनके ठोस में बदलने तक कचरा बिजली घरों में ही सुरक्षित रखा जाता है।

इसे दोहरी परत वाले सुरक्षित स्टेनलेस स्टील के पात्रों में रखा जाता है। जब यह कचरा पूरी तरह ठोस में बदल जाता है और उसके रेडियो एक्टिव गुण क्षीण हो जाते हैं तो उसे जमीन की गहराई में दफ़नाने की तैयारी की जाती है। सनद रहे पश्चिमी देश ऐसे कचरे को अभी तक समुद्र में बहुत गहरे में दबाते रहे हैं।

अणु उर्जा को विद्धुत उर्जा में बदलने के लिए यूरेनियम नामक रेडियोएक्टिव को बतौर ईंधन प्रयोग में लाया जाता है। न्यूट्रान की बम वर्षा पर रेडियोएक्टिव तत्व में भयंकर विखण्डन होता है। इस धमाके पर 10 डिग्री सेल्सियस की गर्मी और लाखों वायुमण्डलीय दवाब उत्पन्न होता है। सो मन्दक के रूप में साधारण जल, भारी जल, ग्रेफाईट और बैरेलियम ऑक्साइड का प्रयोग होता है। शीतलक के रूप में हीलियम गैस संयन्त्र में प्रभावित की जाती है।

विखण्डन प्रक्रिया को नियन्त्रित करने के लिए कैडमियम या बोरोन स्टील की छड़ें उसमें लगाई जाती हैं। बिजली पैदा करने लायक उर्जा मिलने के बाद यूरेनियम, प्यूटोनियम में बदल जाता है। जिसका उपयोग परमाणु बम बनाने में होता है। इसके नाभिकीय विखण्डन पर उर्जा के साथ-साथ क्रिप्टान, जिनान, सीजियम, स्ट्रांशियम आदि तत्व बनते जाते हैं। एक बार विखण्डन शुरू होने पर यह प्रक्रिया लगभग अनन्त काल तक चलती रहती है। इस तरह यहाँ से निकला कचरा बहेद विध्वंसकारी होता है। इसका निबटान सारी दुनिया के लिये समस्या है।

भारत में हर साल भारी मात्रा में निकलने वाले ऐसे कचरे को हिमालय पर्वत, गंगा-सिन्धु के कछार या रेगिस्तान में तो डाला नहीं जा सकता, क्योंकि कहीं भूकम्प की आशंका है तो कहीं बाढ़ का खतरा। कहीं भूजल स्तर काफी ऊँचा है तो कहीं घनी आबादी। यह पुख्ता खबर है कि परमाणु उर्जा आयोग के वैज्ञानिकों को बुन्देलखण्ड, कर्नाटक व आन्ध्र प्रदेश का कुछ पथरीला इलाका इस कचरे को दफनाने के लिये सर्वाधिक मुफीद लगा और अभी तक कई बार यहाँ गहराई में स्टील के ड्रम दबाए जा चुके हैं।

परमाणु कचरे को बुन्देलखण्ड में दबाने का सबसे बड़ा कारण यहाँ का विशिष्ट ग्रेनाईट संरचना है। यहाँ 50 फीट गहराई तक ही मिट्टी है और उसके बाद 250 फीट गहराई तक अभेदतेलीया (ग्रेनाईट) पत्थर है। भूगर्भ वैज्ञानिक अविनाश खरे बताते हैं कि बुन्देलखण्ड ग्रेनाइट का निर्माण कोई 250 करोड़ साल पहले तरल मैग्मा से हुआ था। तबसे विभिन्न मौसमों के प्रभाव ने इस पत्थर को अन्य किसी प्रभाव का रोधी बना दिया है। यहाँ गहराई में बगैर किसी टूट या दरार के चट्टाने हैं और इसीलिए इसे कचरा दबाने का सुरक्षित स्थान मना गया।

अणु कचरे से निकलने वाली किरणें ना तो दिखती हैं और ना ही इसका कोई स्वाद या गन्ध होता है। लेकिन ये किरणें मनुष्य के शरीर के प्रोटीन, इंजाइम, अनुवांशिक अवयवों में बदलाव ला देती हैं। यदि एक बार रेडियोएक्टिव तत्व मात्रा से अधिक शरीर में प्रवेश कर जाए तो उसके दुष्प्रभाव से बचना सम्भव नहीं है।

विभिन्न अणु बिजलीघरों के करीबी गाँव-बस्तियों के बाशिन्दों में शरीर में गाँठ बनना, गर्भपात, कैंसर, अविकसित बच्चे पैदा होना जैसे हादसे आम हैं क्योंकि जैव कोशिकाओं पर रेडियोएक्टिव असर पड़ते ही उनका विकृत होना शुरू हो जाता है। खून के प्रतिरोधी तत्व भी विकिरण के चलते कमजोर हो जाते हैं। इससे एलर्जी, दिल की बीमारी, डायबीटिज जैसे रोग होते हैं पानी में विकिरण रिसाव होने की दशा में नाईट्रेट की मात्रा बढ़ जाती है। यह जानलेवा होता है।

ऐसे कचरे को बुन्देलखण्ड में दफ़नाने से पहले वैज्ञानिकों ने यहाँ बाढ़, भूचाल, युद्ध और जनता की भूजल पर निर्भरता जैसे मसलों पर शायद गम्भीरता से विचार ही नहीं किया। इस इलाके में पाँच साल में दो बार कम वर्षा व एक बार अति वर्षा के कारण बाढ़ आना मौसम चक्र बन चुका है। श्री अविनाश खरे बताते हैं कि बुन्देलखण्ड का जल-स्तर शून्य से सौ फीट तक हैं।

बुन्देलखण्ड ग्रेनाईट में बेसीन, सब बेसीन और माईक्रो बेसीन, यहाँ के नदियों, नाला के बहाव के आधार पर बँटे हुए हैं। लेकिन ये किसी ना किसी तरीके से आपस में जुड़े हुए हैं। यानि पानी के माध्यम से यदि रेडियोएक्टिव रिसाव हो गया तो उसे रोक पाना सम्भव नहीं होगा। नदियों के प्रभाव से पैदा टैटोनिक फोर्स के कारण चट्टानों में ज्वाइंट प्लेन, लीनियामेंट टूटफूट होती रहती है, जिससे विकिरण फैलने की सम्भावना बनी रहती है।

बुन्देलखण्ड के ललितपुर व छतरपुर जिले में यूरेनियम अयस्क भारी मात्रा में पाया गया है। वहीं छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना के भूगर्भ में आयोडीन का आधिक्य है। दोनों तत्व अणु विकिरण के अच्छे वाहक हैं गौरतलब है कि यह इलाका भयंकर गर्मी वाला है जहाँ 47 डिग्री तापमान कई-कई दिनों तक होता है। ऐसे में रेडियोएक्टिव विकिरण यदि फूटा तो बहुत तेजी से फैलेगा। अब तो यहाँ केन-बेतवा नदी जोड़ने की योजना भी शुरू जो यहाँ के भू-संरचना को प्रभावित करेगी।

हालांकि परमाणु उर्जा विभाग विकिरण को खतरनाक नहीं मानता है। विभाग के एक परिपत्र के मुताबिक विकिरण सदैव पर्यावरण का हिस्सा रहा है। अन्तरिक्ष किरणें, मिट्टी, ईंट, कंक्रीट के घरों आदि में 15 से 100 मिलीरिम सालाना का विकिरण उत्सर्जित होता है। पर परमाणु भट्टी से निकलने वाले कचरे का विकिरण इससे कई-कई हजार गुणा होता है।

भले ही वैज्ञानिक खतरनाक कचरे के निबटान के लिए बुन्देलखण्ड के भूविज्ञान को माकूल मानते हों, लेकिन असलियत यह है कि यहाँ की जनता की अल्प जागरुकता और उनके जन प्रतिनिधियों का जन सरोकार से विमुख होना ही मूल कारण है कि सरकार वहाँ इस तरह के खतरनाक प्रयोगों को सबसे कम प्रतिरोध वाला इलाका मानती रही है।

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