आपदा प्राकृतिक, मौत हमने बुलाई

Author:लक्ष्मी प्रसाद पंत
Source:दैनिक भास्कर (ईपेपर), 09 जुलाई 2013
यदि नदी के प्राकृतिक मार्गों में निर्माण होगा तो प्रकृति इसी तरह अतिक्रमण हटाएगी

हिमालय के दो बड़े पहलू हैं। मौसम और मानसून। हमारे सियासतदान इन पहलुओं के लिए कितने चिंतित हैं, इसकी बानगी देखिए। मौसम विभाग के आधुनिकीकरण के लिए 2007-08 में 55 अत्याधुनिक डॉप्लर रडार लगाए जाने थे। इसमें से 12 हिमालयी राज्यों में व तीन उत्तराखंड में लगने थे। यह प्रस्ताव योजना आयोग, भूविज्ञान संस्थान और भारतीय मौसम विभाग की दफ्तरशाही के बीच में कहीं फंसा हुआ है। आपदाएं जीवन का हिस्सा होती हैं। इन्हें रोका नहीं जा सकता। भूस्खलन, अतिवृष्टि, बादल फटने जैसी त्रासदियां प्रकृति की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन हम विज्ञान, संसाधन, राजनीति और रणनीति के कुशल प्रबंधन में पिटे हुए हैं। पहले हम विनाश के कारण पैदा करते हैं और जब आपदा सिर पर आ जाती है तो तात्कालिक उपायों में जुट जाते हैं। उत्तराखंड में भी यही हुआ। यहां हमने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की जो महीन दीवार थी, वो तोड़ डाली। विकास की नई शब्दावली में नदी का मतलब जलविद्युत परियोजनाएं और पहाड़ का मतलब पर्यटक। जब सोच इतनी संकीर्ण है तो दृष्टिकोण बड़ा या व्यापक कैसे हो सकता है।

उत्तराखंड में मंदाकिनी नदी ने जो तबाही मचाई उसके कारण यूं समझिए। इस नदी की दो धाराएं (फ्लड वे) हैं। कई वर्षों से मंदाकिनी केवल पूर्वी धारा में ही बह रही थी। सरकार और लोगों को लगा कि यह नदी अब इसी धारा में बहती रहेगी लेकिन 16 जून को जब एक घंटे में करीब 300 मिमी. बारिश हुई तो मंदाकिनी अपने पुराने पथ यानी पश्चिमी धारा में बह निकली। उसके रास्ते में आए सभी निर्माण भी बह गए या ढह गए। असल में ये सब अतिक्रमण थे। वर्षों से खामोश बैठी सरकारें जो नहीं कर पाईं या असल में करना ही नहीं चाहती थीं, वो प्रकृति ने 12 घंटे में कर दिया। यदि हम नदी के प्राकृतिक मार्गों में निर्माण करेंगे तो प्रकृति इसी तरह अतिक्रमण तो हटाएगी ही।

हिमालय की अनदेखी की सबसे बड़ी वजह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। 27 मार्च 1992 को योजना आयोग ने विशेषज्ञों का दल गठित किया था। डॉ. जेएस कासिम इसके अध्यक्ष थे। इस दल ने निष्कर्ष निकाला था कि अति संवदेनशील होने के कारण यहां हिमालय विकास प्राधिकरण बनना चाहिए। प्राधिकरण का खाका भी तैयार कर लिया गया था। प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष बनने थे और हिमालय का एक अलग मंत्रालय बनाने की सिफारिश थी। इसमें कैबिनेट स्तर के तीन मंत्री होने थे। मैदानी राज्यों से अलग संरक्षण मिलने पर ही हिमालय सुरक्षित रहेगा। योजना बने 22 वर्ष गुजर चुके हैं, लेकिन इस प्राधिकरण का प्रस्ताव अटका पड़ा है।

हिमालयी राज्यों का प्रशासन भी यहां के सियासतदानों की तरह पंगु है। केदारनाथ या दूसरी ऐसी तबाहियों के लिए पूर्वानुमान या अलर्ट भी जारी हुए हैं। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया 1995 से उत्तराखंड के चार धामों सहित अन्य पहाड़ों के बिगड़ते भूगोल को लेकर चेतावनी जारी कर चुका है। केदारनाथ में मची तबाही की सूचना 2004 में ही वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान ने दे दी थी। रिपोर्ट बताती है कि केदारनाथ मंदिर के 7 किमी पीछे स्थित चौराबाड़ी ग्लेशियर और झील (गांधी सरोवर) में हलचल बढ़ रही है। अगर समय रहते झील का रखरखाव न किया गया और ग्लेशियर की लगातार निगरानी न हुई तो ग्लेशियर और झील बम की तरह फटकर केदारनाथ क्षेत्र को तबाह कर देंगे। किसी ने यह चेतावनी नहीं सुनी। नतीजा आज सबके सामने है।

अब जरा मानवनिर्मित आपदाओं पर भी गौर करें। उत्तराखंड में 2006-07 में आपदा प्रबंधन केंद्र बन गया था। हालत यह है कि आपदा के दिन तक मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले इस केंद्र ने कोई काम नहीं किया। इसकी आखिरी बैठक भी 2007 में ही हुई थी। हैरानी की बात इतनी ही नहीं है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो), मौसम विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन केंद्र के बीच भी कोई सामंजस्य नहीं है। मौसम विभाग के पास डॉप्लर रडार नहीं था। फिर भी उसने खराब मौसम की फौरी सूचना 14 जून को जारी कर दी थी। इसरो को चाहिए था कि सेटेलाइट के जरिए तस्वीर और स्पष्ट करता। इसरो के पास तस्वीरें भी थीं, लेकिन प्रोटोकॉल जैसी गैरजरूरी सरकारी औपचारिकता के कारण उसने इन्हें जारी नहीं किया। बाद में 23 जून को इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने आपदा से पहले की तस्वीरें जारी कीं जो आने वाली तबाही का मंजर बता रही थीं।

हिमालय के दो बड़े पहलू हैं। मौसम और मानसून। हमारे सियासतदान इन पहलुओं के लिए कितने चिंतित हैं, इसकी बानगी देखिए। मौसम विभाग के आधुनिकीकरण के लिए 2007-08 में 55 अत्याधुनिक डॉप्लर रडार लगाए जाने थे। इसमें से 12 हिमालयी राज्यों में व तीन उत्तराखंड में लगने थे। यह प्रस्ताव योजना आयोग, भूविज्ञान संस्थान और भारतीय मौसम विभाग की दफ्तरशाही के बीच में कहीं फंसा हुआ है। डॉप्लर रडार इसलिए जरूरी था क्योंकि इस अत्याधुनिक रडार से बादल फटने, बादलों की दिशा, भूस्खलन, बारिश की तीव्रता, बर्फबारी या ओलावृष्टि की सटीक और स्पेसिफिक जानकारी मिलती है। रडार 36 घंटे पहले चेतावनी जारी करता है। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों में मौसम विज्ञान मुख्यधारा में है। अमेरिका का नेशनल वेदर सर्विस ऑर्गेनाइजेशन 24 घंटे मौसम की जानकारी एसएमएस और ईमेल के जरिए भेजता रहता है। रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों की तरह वहां मौसम के लिए भी बजट जारी होता है। 7 लाख आबादी वाले अलास्का में 7 डॉप्लर रडार लगे हुए हैं। हमारे यहां हर साल आने वाली आपदा से बचने के उपाय तो छोड़िए, बारिश के पुराने रिकॉर्ड भी सुरक्षित नहीं हैं।

अव्वल तो हिमालय क्षेत्र में आने वाले राज्य कभी इतनी मजबूत स्थिति में नहीं रहे कि वे केंद्र पर किसी बात का दबाव बना सकें। दूसरा इन राज्यों ने कभी इस ओर ध्यान भी नहीं दिया। यहां का सियासी नेतृत्व या तो अन्य स्थानीय मुद्दों से जूझता रहा, या कांग्रेस-भाजपा आलाकमान के इशारों पर ही नाचता रहा। हिमालय जितना बड़ा मुद्दा इन पार्टियों के छोटे मैनिफेस्टो में समा ही नहीं पाया। यह स्थिति तब है जब 11 हिमालयी राज्यों के 40 सांसद केंद्र में प्रभावी भूमिका रखते हैं। पार्टीलाइन से हटकर अगर 11 राज्यों के मुख्यमंत्री हिमालय के नाम पर एकजुट हो जाएं तो क्या नहीं कर सकते थे। हिमालय के अतिसंवेदनशील मुद्दों के लिए आखिर क्यों हमारा सियासी नेतृत्व संवेदनशील नहीं होता?