आपदा प्रबन्धन : प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण

Author:आर के जैन, वी तिरुपुगल
Source:योजना, जनवरी 2017

भविष्य में क्षमता निर्माण की कोशिशें मुख्य तौर पर माँग आधारित समुदाय और सन्दर्भ की जरूरतों के हिसाब से होनी चाहिए। जोखिम कम करने का टिकाऊ लक्ष्य हासिल करने के लिये ज्यादा से ज्यादा भागीदारी और सशक्तीकरण की कोशिशें होनी चाहिए, जैसा कि सेंदई फ्रेमवर्क में जोर दिया गया है। महिलाओं की क्षमताओं के विकास पर जोर होना चाहिए और हमारा मकसद कमजोर आबादी की क्षमता को विकसित कर सामाजिक समावेशन का होना चाहिए। बहरहाल, उचित और सही वक्त पर क्षमता निर्माण हमें संकट से जल्द उबरने वाला भारत बनाने में मदद करेगा

क्षमता की परिभाषा कुछ इस तरह से तय की गई है- लोगों, संगठनों, सांगठनिक इकाइयों या अन्य सिस्टम का लगातार और असरदार तरीके से काम करना। इसे ऐसी प्रक्रिया के तौर भी परिभाषित किया जाता है, जिसके जरिए व्यक्ति, संगठन और सामाजिक संस्थान आने वाले वक्त में अपने विकास का मकसद हासिल करने के लिये क्षमता हासिल करते हैं, उसे मजबूत बनाते हैं और बरकरार रखते हैं। अगर आसान शब्दों में कहा जाए, तो कहा जा सकता है कि क्षमता योजना बनाने और इसे हासिल करने का माध्यम है और क्षमता का विकास इन साधनों के तरीकों के बारे में बयाँ करता है। क्षमता के विकास के दायरे में संस्थानों, तंत्रों और सभी सम्बन्धित पक्षों की क्षमताओं को सभी स्तर पर मजबूत बनाना शामिल हैं। आपदा के असर को कम करने के लिये काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल स्ट्रैटेजी फॉर डिजास्टर रिडक्शन (यूएनआईएसडीआर) ने आपदा से निपटने के लिये क्षमता के विकास को कुछ इस तरह पारिभाषित किया है:

“एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल के दायरे में आने वाली वह प्रक्रिया जिसके जरिए व्यक्ति, संस्थान और समाज आने वाले वक्त में सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिये अपनी क्षमता विकसित करते हैं, जिसमें ज्ञान, कौशल, सिस्टम और संस्थानों के सुधार के जरिए क्षमता में बढ़ोत्तरी भी शामिल हैं। (संयुक्त राष्ट्र 2009)”

क्षमता निर्माण आपदा जोखिम को कम करने से जुड़े निवेश का अहम हिस्सा है। आपदा जोखिम प्रबन्धन के क्षेत्र में सेंदई फ्रेमवर्क पहचान किए गए जोखिम के सम्बन्ध में अलग-अलग स्तरों पर संस्थानों की तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक क्षमताओं को बढ़ाने पर जोर देता है। इस फ्रेमवर्क में जोखिम कम करने के उपायों को लागू करने के लिये क्षमता को मजबूत बनाने की बात है। क्षमता विकास से आम तौर पर ऐसी प्रक्रिया का जिक्र होता है, जो अन्दर से चलती है और इसकी शुरुआत मौजूदा क्षमता से जुड़ी सम्पत्तियों से होती है। (यूएनडीपी एनडी)

सेंदई फ्रेमवर्क के तहत आपदा प्रबन्धन में महिलाओं की क्षमता के विकास और असरदार भागीदारी पर जोर दिया गया है। सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिये भी जोखिम कम करने सम्बन्धी क्षमता का निर्माण जरूरी है।

क्षमता निर्माण के प्रकार और इसका स्तर


क्षमता विकास का तीन स्तर होता है: निजी, संस्थागत और माहौल को अनुकूल बनाया जाना। माहौल को अनुकूल बनाए जाने के स्तर पर क्षमताओं का मामला नीतियों, कानून, संस्थागत इन्तजाम, नेतृत्व, राजनीतिक प्रक्रिया, सामाजिक नियमों आदि से जुड़ा है। संगठन या संस्था के स्तर पर क्षमता आन्तरिक नीतियों, सिस्टम या रणनीति, इन्तजाम, प्रक्रियाएँ और ढाँचे से सम्बन्धित होती है, जिससे किसी संस्था को लक्ष्य हासिल करने की दिशा में काम करने में मदद मिलती है। निजी स्तर का मामला कौशल और ज्ञान से जुड़ा है, जिसे लोगों में निहित किया जाता है, जिनमें निजी लोग, समुदाय, ग्रुप और टीमें शामिल होती हैं। (सीडीएआरआई एनडी)

जोखिम कम करने के लिये न सिर्फ मानव संसाधन विकसित करने पर जोर है, बल्कि जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्थागत क्षमता तैयार करने को लेकर भी फोकस है। लिहाजा क्षमता निर्माण सिर्फ सरकार या देश की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। सेंदई फ्रेमवर्क के मुताबिक, हमें इसमें समाज के तमाम वर्गों की भागीदारी की जरूरत है। संक्षेप में कहें, तो सरकारी संस्थानों, समुदाय, पेशेवरों, विशेषज्ञों, निजी क्षेत्र, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और बाकी गैर-सरकारी इकाइयों के क्षमता निर्माण की जरूरत है।

आपदा जोखिम न्यूनीकरण यानि (डीआरआर) और क्षमता विकास के लिये सम्बन्धित पक्षों से जुड़ना जरूरी है, खासतौर पर समुदायों से। मौजूदा क्षमता, जरूरतों और खालीपन को समझने के लिये यह जुड़ाव बेहद जरूरी है। मोटे तौर पर क्षमता के लिये औपचारिक और अनौपचारिक दोनों स्तर पर आकलन की जरूरत होती है और ऊपर जिक्र किए गए कई स्तर जरूरी हैं। लिहाजा, क्षमता निर्माण से जुड़े कार्यक्रम को जरूरतों के आकलन के आधार पर तैयार किए जाने चाहिए। अलग-अलग सम्बन्धित पक्षों के आपदा प्रबन्धन में भूमिका के आधार पर उनकी खामियों को पहचान कर प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित किए जाने चाहिए। क्लास रूम प्रशिक्षण के अलावा, काम के दौरान प्रशिक्षण, नेटवर्किंग, आदान-प्रदान कार्यक्रम, अकादमिक कोर्स, बाकी संस्थानों से जुड़ाव, मॉक ड्रिल जैसे अभियानों का इस्तेमाल जरूरत के आधार पर किया जा सकता है।

क्षमता निर्माण के लिये राष्ट्रीय नीति और योजना


देश की आपदा प्रबन्धन से जुड़ी राष्ट्रीय नीति में आपदा जोखिम न्यूनीकरण (डीआरआर) के लिये सभी सम्बन्धित पक्षों के क्षमता विकास पर जोर दिया गया है। इस बाबत राष्ट्रीय नीति में कहा गया है कि क्षमता विकास में उचित संस्थागत ढाँचे को पेश करने, प्रबन्धन सिस्टम और आपदाओं से निपटने और इसकी रोकथाम के लिये संसाधनों के आवंटन से जुड़ी चुनौतियों पर काम करना चाहिए। इसी सिद्धान्त के आधार पर राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन योजना (एनडीएमपी) तीन मुख्य कैटेगरी के तहत क्षमता निर्माण की थीम की पहचान करती है: ये जोखिम कम करने के लिये रोकथाम, असरदार तैयारी और राहत व रिकवरी और बेहतर पुनर्निर्माण। इस योजना में क्षमता निर्माण के लिये जोखिम आधारित जरूरतों की भी पहचान की गई है, यानि वैसे सम्बन्धित पक्ष जिनकी क्षमता निर्माण की जरूरत है और इसके लिये कौन एजेंसी जिम्मेदार है। (विस्तार से जानने के लिये राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन योजना 2016 का सन्दर्भ देखें)

भारत में क्षमता निर्माण के लिये संस्थागत इन्तजाम


आपदा प्रबन्धन की मुख्य जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर होती है। स्थानीय निकायों का इसमें अहम रोल होता है। केन्द्र सरकार की भूमिका सहायक और पूरक जैसी है। देशभर में आपदा प्रबन्धन का सिस्टम अलग-अलग है। तकरीबन सभी राज्यों ने आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण बनाए हैं। आपदा के बाद राहत और बचाव का काम मुख्य तौर पर राहत कमिश्नर के पास है। जहाँ कई राज्यों ने राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल बनाया है, वहीं इनमें से कुछ अब भी आग और आपातकालीन सेवाओं पर निर्भर हैं। फिर भी अलग-अलग राज्यों में आग और इमरजेंसी रिस्पॉन्स सेवाओं की व्यवस्था में भिन्नता है। जहाँ ज्यादातर राज्यों ने राज्य सरकार के तहत आग से जुड़ी सेवाओं को केन्द्रीकृत कर दिया है, वहीं कुछ राज्यों में यह काम नगर निकाय प्रशासन के जिम्मे है। ढाँचागत और संस्थागत व्यवस्था के लिहाज से क्षमता निर्माण की व्यवस्था राज्यों में अलग-अलग है। गुजरात और ओडिशा जैसे कुछ राज्यों ने पूर्णकालिक प्रशिक्षण संस्थान खोला है या खोलने की प्रक्रिया में हैं, जबकि बाकी इसके लिये अपने प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थानों पर निर्भर हैं।

राज्य सरकारों को मदद मुहैया कराने के लिये भारत सरकार ने कुछ संस्थानों की स्थापना की है, जो क्षमता निर्माण के लिये कई तरह की गतिविधियों को अंजाम देते हैं। आपदा प्रबन्धन के लिये पूरी तरह से समन्वय की जिम्मेदारी केन्द्रीय गृह मन्त्रालय की होती है। सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) और राष्ट्रीय संकट प्रबन्धन समिति (एनसीएमसी) उन अहम समितियों में शामिल हैं, जो आपदा प्रबन्धन को लेकर उच्चस्तरीय फैसले लेती हैं।

राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण (एनडीएमए) की स्थापना 2005 में की गई थी और यह भारत में आपदा प्रबन्धन के लिये नोडल एजेन्सी के तौर पर काम करती है। इसके चेयरपर्सन प्रधानमंत्री होते हैं। प्राधिकरण आपदा प्रबन्धन से जुड़ी नीतियाँ, योजनाएँ और दिशा-निर्देश तय करता है, ताकि आपदा की हालत में सही समय पर असरदार तरीके से राहत और बचाव का काम हो सके। एनडीएमए क्षमता निर्माण के दो अहम पहलुओं पर काम कर रहा है। इसके तहत अनुकूल माहौल बनाने और संस्थागत क्षमता तैयार करने पर काम चल रहा है। माहौल को और अनुकूल बनाने के लिये एनडीएमए ने जोखिम को ध्यान में रखते हुए कई खास दिशा-निर्देश और रिपोर्ट तैयार की हैं। एनडीएमपी ने जोखिम को ध्यान में रखते हुए क्षमता निर्माण से जुड़े कई उपायों की पहचान कर इस पर काम करने का सुझाव दिया है।

इसके अलावा, एनडीएमए संस्थानों और समुदायों के क्षमता निर्माण से जुड़े कई और उपायों पर काम कर रहा है। राज्यों की राहत कार्य क्षमता को बेहतर बनाने के लिये एनडीएमए जिला, राज्य और क्षेत्रीय स्तर पर मॉक ड्रिल और ऐसे अभियानों पर काम करता है। राष्ट्रीय चक्रवात जोखिम राहत परियोजना का मकसद न सिर्फ सरकारों, बल्कि समुदायों खास तौर पर महिलाओं को भी इस बाबत सशक्त बनाना है। सामुदायिक क्षमता निर्माण के मामले में यह एक तरह से देश का सबसे बड़ा अभियान है। एक और अहम पहल राष्ट्रीय स्कूल सुरक्षा कार्यक्रम है, जिसके तहत आपदा से बेहतर तैयारी के लिये छात्रों और शिक्षकों के क्षमता निर्माण की बात है। एनडीएमए बाकी मन्त्रालयों को भी उनकी आपदा प्रबन्धन योजनाओं की तैयारी में मार्गदर्शन कर रहा है।

जहाँ एनडीएमए का मुख्य फोकस संस्थानों के क्षमता निर्माण पर है, वहीं राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान (एनआईडीएम) राष्ट्रीय स्तर की सूचनाओं का आधार विकसित करने, शोध, दस्तावेजीकरण के साथ-साथ प्रशिक्षण पर भी काम करता है। संस्थान बाकी संस्थानों के साथ मिलकर प्रशिक्षकों, आपदा प्रबन्धन अधिकारियों और बाकी सम्बन्धित पक्षों के लिये प्रशिक्षण आयोजित करवाता है। एनआईडीएम आपदा प्रबन्धन के क्षेत्र में ‘उत्कृष्ट केन्द्र’ बनने के लिये हर मुमकिन कोशिश करता है। यह आपदा प्रबन्धन के लिये राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम को विकसित करने और इसका अमल सुनिश्चित करने में अहम रोल अदा करता है। राष्ट्रीय स्तर पर राहत और बचाव का काम करने वाला आपदा प्रबन्धन राहत दल (एनडीआरएफ) भी ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जुड़ा है। एनडीआरएफ न सिर्फ राज्य आपदा बचाव दलों को लगातार इस तरह का प्रशिक्षण मुहैया कराता है, बल्कि समुदायों को भी यह सेवा प्रदान करता है। ऊपर बताई गई एजेंसियों के अलावा लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी, भारतीय पुलिस अकादमी और राष्ट्रीय स्तर के अन्य बेहतरीन संस्थान भी आपदा प्रबन्धन के विभिन्न पहलुओं के बारे में प्रशिक्षण देते हैं।

जैसा कि ऊपर बताया गया है, कई संस्थान राज्य स्तर पर प्रशिक्षण दे रहे हैं और क्षमता निर्माण कर रहे हैं। राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण, सभी प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थानों के आपदा प्रबन्धन सेल, ग्रामीण विकास के राज्य स्तरीय संस्थान और स्थानीय स्वशासन से जुड़े संस्थान भी आपदा प्रबन्धन से जुड़ा प्रशिक्षण मुहैया कराते हैं। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों का जोर जिला, नगर निकाय और पंचायत जैसे निचले प्रशासनिक स्तरों पर क्षमता निर्माण पर है।

आगे की राह


आपदा प्रबन्धन उतना ही पुराना जितना मानव खुद। मानव का इतिहास ऐसे लोगों का इतिहास है, जो आपदाओं से निपटने में सफल या नाकाम रहे। सिर्फ साल 2015 में कुल 346 आपदाओं में 22,773 लोग मारे गए और 9.86 करोड़ लोग इससे प्रभावित हुए। इससे कुल नुकसान 66.5 अरब डॉलर (सीईआरडी) रहा। हालाँकि, आपदा में मरने वालों की तादाद में कमी आ रही है, लेकिन आर्थिक नुकसान बढ़ता जा रहा है। इसकी कई वजहें हैं। मसलन तेजी से हो रहे शहरीकरण, जोखिम वाले इलाके में बस्तियों का बसना, टेक्नोलॉजी पर आधारित जिन्दगी, पर्यावरण में हो रहे बदलाव का असर और लगातार बढ़ रही आबादी (कूप्पला 2015)। लिहाजा, मौजूदा वक्त में आपदा प्रबन्धन के सभी पहलुओं के क्षमता निर्माण की जरूरत है। खास तौर पर लम्बी अवधि में जोखिम घटाने के लिये यह और जरूरी है।

राहत हमेशा स्थानीय होती है। आपदा रोकथाम और राहत से जुड़े प्रशासन के सभी पहलुओं, मसलन जमीन के इस्तेमाल की प्लानिंग, शहरी विकास, निर्माण की सुरक्षा सुनिश्चित करना और बिल्डिंग कोड का अमल, स्थानीय स्वशासन वाली सरकारों यानि नगर निकाय संस्थानों के पास है। संकट की हालत में सरकारी संस्थानों में ऐसी ही संस्थाएँ सबसे पहले राहत काम में जुटती हैं। लिहाजा, यह जरूरी है कि मानव संसाधन, उपकरण और प्रशिक्षण के लिहाज से उनकी क्षमता का निर्माण किया जाए। नगर निकाय संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिये भी क्षमता का विकास जरूरी है। पंचायत और शहरी निकाय संस्थानों के चुने गए प्रतिनिधियों और अधिकारियों को अलग-अलग तरह के संकट से निपटने, आपदा तैयारियों में योगदान, उपलब्ध चेतावनियों के सही इस्तेमाल, खोजबीन, बचाव, राहत, मेडिकल सहायता और नुकसान के आकलन जैसी चुनौतियों से सक्षम तरीके से निपटने के लिये प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। उनके पास आपदा के बाद सही पुनर्वास की जरूरत की भी समझ होनी चाहिए। आपदा प्रबन्धन के सभी स्तरों पर स्थानीय नेतृत्व अहम रोल निभा सकता है। क्षमता विकास का मकसद आपदा प्रबन्धन के सभी पहलुओं की काबिलियत बढ़ाना, डीआरआर को मुख्य धारा में लाना और आपदा रोकथाम की संस्कृति और डीआरआर को बढ़ावा देना होना चाहिए। (एनडीएमपी 2016)

राष्ट्रीय योजना में समुदायों के प्रशिक्षण पर भी जोर दिया गया है। चूँकि आपदा की हालत में सबसे पहले दौड़ने वाले यही लोग होते हैं, लिहाजा समुदायों की क्षमता बढ़ाना क्षमता विकास प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। सेंदई फ्रेमवर्क में सिविल सोसायटी, समुदायों और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के कार्यकर्ताओं को जानकारी देने की जरूरत बताई गई है।

जागरूकता, संवेदनशीलता, झुकाव पैदा करने और समुदायों और सामुदायिक नेताओं के कौशल विकास को भी क्षमता निर्माण में शामिल करना होगा। राष्ट्रीय योजना में कई तरह की गतिविधियों के जरिए आपदा जोखिम कम करने की खातिर क्षमता निर्माण के लिये क्षेत्रों और एजेंसियों की पहचान की गई है। इन गतिविधियों में चेतावनी, संवाद, आपातकालीन ऑपरेशन सेंटर और आपदा प्रशासन को मजबूत किया जाना जैसे उपाय शामिल हैं।

सभी तरह की आपदाओं के दौरान खोज और बचाव क्षमताओं को बढ़ाने के लिये सरकार कार्यकर्ताओं और सिविल सोसायटी को खुद से आग और बचाव से जुड़ी सेवा शुरू के लिये प्रोत्साहित कर सकती है। पश्चिमी देशों में आग से बचाव को लेकर स्वैच्छिक सेवाओं का मॉडल उपलब्ध है। कई राज्य सरकारें पहले ही बाढ़ से बचाव के लिये कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना शुरू कर चुकी हैं। एनडीएमए ने भी बाढ़ पीड़ितों से जुड़े कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिये नई स्कीम शुरू की है। इसके अलावा, निजी क्षेत्र में भी लोगों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है। मसलन इलाज सम्बन्धी इन्तजाम के लिये निजी चिकित्सकों और कंस्ट्रक्शन सम्बन्धी गतिविधियों के लिये इंजीनियरों को इस तरह का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। निजी संस्थानों की क्षमता का भी निर्माण होना चाहिए, ताकि वे न सिर्फ अपनी जरूरतों, बल्कि आस-पास के समुदाय के लिये भी काम कर सकें। आपातकालीन राहत और बचाव के लिये एनजीओ और सिविल सोसायटी की क्षमता को भी तैयार किया जाना चाहिए और विकास परियोजनाओं में आपदा प्रबन्धन को मुख्य धारा में लाया जाए। पर्याप्त क्षमता निर्माण के लिये नगर निकाय संस्थानों, आग और बचाव सेवाओं को मानव संसाधन और उपकरण भी मुहैया कराए जाने चाहिए।

निष्कर्ष


क्षमता निर्माण एक बार का काम नहीं है। यह लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। चूँकि जोखिम गतिशील है, लिहाजा क्षमता निर्माण के कार्यक्रमों को भी बदलते रहना होगा। जैसा कि ऊपर जिक्र किया गया है, यह सभी सम्बन्धित पक्षों की जिम्मेदारी है। सभी सम्बन्धित पक्षों के लिये टिकाऊ क्षमता के निर्माण के लिये लम्बी अवधि के प्लान की जरूरत है।

क्षमता निर्माण में लगे देश के भीतर और बाहर के संस्थानों के बीच नेटवर्किंग भी जरूरी है। क्षमता निर्माण से जुड़े कार्यक्रमों, परियोजनाओं और प्रशिक्षणों का लगातार आकलन होना चाहिए, ताकि वे प्रासंगिक और उपयुक्त बने रहें। कार्यक्रमों के परिणाम और असर को माप कर इसका रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए। अहम आँकड़ों को इकट्ठा कर जरूरत के हिसाब से इनका विश्लेषण किया जाना चाहिए। इससे जुड़े संकेतकों में जानकारी, रवैये और लाभार्थियों के बीच चलन में बदलाव (आईएफआरसीआरसीएल 2010) को शामिल किया जाना चाहिए। कुछ शोध नतीजों में क्षमता निर्माण की प्रक्रिया में उच्च स्तर पर दबदबे जैसी खामियों की तरफ इशारा किया गया है। लिहाजा, भविष्य में क्षमता निर्माण की कोशिशें मुख्य तौर पर माँग आधारित समुदाय और सन्दर्भ की जरूरतों के हिसाब से होनी चाहिए। जोखिम कम करने का टिकाऊ लक्ष्य हासिल करने के लिये ज्यादा से ज्यादा भागीदारी और सशक्तीकरण की कोशिशें होनी चाहिए, जैसा कि सेंदई फ्रेमवर्क में जोर दिया गया है। महिलाओं की क्षमताओं के विकास पर जोर होना चाहिए और हमारा मकसद कमजोर आबादी की क्षमता को विकसित कर सामाजिक समावेशन का होना चाहिए। बहरहाल, उचित और सही वक्त पर क्षमता निर्माण हमें संकट से जल्द उबरने वाला भारत बनाने में मदद करेगा।

सन्दर्भ


1. आईएफआरसीआरसीएस (इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रेकेन्ट सोसायटीज) आपदा जोखिम प्रबन्धन में क्षमता निर्माण। जेनेवा, स्विट्जरलैंड/आईएफआरसीआसीएस 2010

2. सीडीएआरआई। आपदा जोखिम प्रबन्धन में क्षमता विकास की बुनियादी चीजें

3. सीईआरडी, ‘2015 में आँकड़ों में आपदाएँ’

4. कूप्पला, डैमन पी, अन्तरराष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन का परिचय। तीसरा संस्करण, ऑक्सफोर्ड, ब्रिटेन: एल्सवायर इंक, 2015।

5. एनडीएमओ (राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण) राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्लान, नई दिल्ली: एनडीएमए, 2016।

6. यूएनडीपी, क्षमता विकास प्रैक्टिस नोट: यूएनडीपी, 2008।

7. यूएनडीपी, आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिये क्षमता विकास।

8. संयुक्त राष्ट्र, आपदा जोखिम न्यूनीकरण जेनेवा, स्विट्जरलैंड, यूएनआईएसडीआर, 2009

लेखक परिचय


आर के जैन राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण (एनडीएमए) के सदस्य हैं और भारत सरकार में सचिव जैसे उच्चस्तरीय पदों पर अपनी सेवाएँ दे चुके हैं। ईमेल : secretary@gmail.com

वी तुरुपुगल यूएनडीपी और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण प्राधिकरण नेपाल के वरिष्ठ सलाहकार हैं। वह गुजरात राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण के पूर्व संयुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी रह चुके हैं। साथ ही राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण के सलाहकार के रूप में भी काम किया है।