अरहर उगाकर ले रहे हैं दोहरा फायदा

Author:प्रेमविजय पाटिल

जलवायु परिवर्तन के दौर में आदिवासी अंचल के गाँव ने दिखाई समझदारी
अरहर के पौधे से तापमान नियंत्रण में भी मिलती है सहायता

कुछ विशेष श्रेणी की तुअर को लगाया जाता है तो वह और भी लाभप्रद रहती है। उन्होंने बताया कि एक और लाभ यह भी मिलता है कि तुअर के पौधों को यदि खेत की मेढ़ पर लगा दिया जाए तो सोयाबीन की फसलों पर तापमान का असर कम होता है। यानी मौसम यदि तीखा है तो कुछ-न-कुछ फसल पर राहत तुअर के पौधों के कारण हो सकती है। इस तरह किसान जलवायु परिवर्तन के दौर में न केवल अपनी आजीविका सुरक्षित रख सकता है। धार। जिले के आदिवासी अंचल के गाँव के लोगों ने जो चीजें अपनाई है वह अन्य किसानों के लिये आदर्श बन सकती है। दरअसल जलवायु परिवर्तन का दौर चल रहा है। ऐसे में नालछा विकासखण्ड के आदिवासी ग्रामों में किसानों ने अरहर यानी तुअर की बोवनी की है।

इन किसानों ने सोयाबीन तो लगाया ही है किन्तु सोयाबीन की खेत की मेड़ पर तुअर लगाकर उस तकनीक का फायदा लेने की कोशिश की है जिससे कि सोयाबीन को सहारा मिल रहा है। दरअसल मेढ़ पर तुअर लगाने से तापमान नियंत्रण में कहीं-न-कहीं मदद मिलती है। हालांकि बहुत ज्यादा मदद नहीं मिलती है। लेकिन कुछ-न-कुछ सामान्य परिस्थितियों से अधिक लाभ होता है।

वैज्ञानिकों द्वारा दी जाने वाली समझाइश को किसान अपनाने लगे हैं। दरअसल सोमवार को भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के सचिव जेके मोहपात्रा भ्रमण पर आए थे। इसी दौरान कृषि वैज्ञानिक व कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रभारी डॉ. ए.के. बड़ाया भी मौजूद थे। भ्रमण समाप्त होने के बाद उन्होंने मैदानी स्तर पर फसलों की स्थिति देखी तो कई महत्त्वपूर्ण बातें सामने आई। वर्तमान में तुअर दाल के भाव आसमान पर है और इसी कारण आम आदमी की थाली का बजट बढ़ गया है।

ऐसे में आदिवासी अंचल के लोग तुअर की बोवनी करके कहीं-न-कहीं खुद के लिये तो फायदा कर ही रहे हैं। लेकिन अधिक उत्पादन लेकर आम लोगों के लिये भी दाल सस्ते में सुलभ हो। इस दिशा में भी एक कदम है। मियाँपुरा, मेघापुर, शिकारपुरा, जीरापुरा सहित जिले के कई आदिवासी ग्रामों में इस समय जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से तुअर की बोवनी की जा रही है।

क्या है जलवायु परिवर्तन की समस्या


कृषि वैज्ञानिक डॉ. बड़ाया ने बताया कि जलवायु परिवर्तन का दौर ऐसा है जिसमें कि लगातार बारिश की सम्भावनाएँ कम रहती हैं। पहले 90 दिन बारिश होने का अनुमान रहता था। लेकिन अब घटकर 40 दिन ही बारिश होने लगी है। यदि सभी किसान सोयाबीन और मक्का की बोवनी करते हैं तो उसके साथ में तुअर जैसी फसल की बोवनी भी लाभप्रद होती है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में कहीं-न-कहीं पानी बरसे को थोड़ा समय हो चुका है। हालांकि फसलें अभी खराब नहीं है। लेकिन तापमान में अचानक वृद्धि हुई है।

पानी नहीं बरसना और तापमान बढ़ना यह जलवायु परिवर्तन का ही एक कारक है। इसी के चलते दिक्कत होती है। कई बार यह हालात होते हैं कि मुख्य फसल की नुकसानी का डर रहता है। ऐसे में यदि तुअर जैसी फसल खेत की मेढ़ पर लगाई जाए तो छोटे किसान अपनी आजीविका को सुरक्षित रख सकते हैं। उन्होंने बताया कि हमने सोमवार को उक्त गाँव में जब स्थिति देखी तो खुशी हुई कि आदिवासी अंचल का किसान अब वैज्ञानिकों की समझाइश पर अमल कर रहा है। उन्होंने बताया कि मौसम की तब्दीली को समझकर इस तरह का प्रयोग करना बेहतर रहता है।

तुअर में है क्षमता मौसम से लड़ने की


दूसरी ओर डॉ. बड़ाया ने बताया कि तुअर की फसल में मौसम से तो लड़ने की क्षमता रहती है। यदि तापमान वृद्धि होती है और पानी की स्थिति कमजोर रहती है तो उसमें भी तुअर पक जाती है। खासकर कुछ विशेष श्रेणी की तुअर को लगाया जाता है तो वह और भी लाभप्रद रहती है। उन्होंने बताया कि एक और लाभ यह भी मिलता है कि तुअर के पौधों को यदि खेत की मेढ़ पर लगा दिया जाए तो सोयाबीन की फसलों पर तापमान का असर कम होता है। यानी मौसम यदि तीखा है तो कुछ-न-कुछ फसल पर राहत तुअर के पौधों के कारण हो सकती है। इस तरह किसान जलवायु परिवर्तन के दौर में न केवल अपनी आजीविका सुरक्षित रख सकता है। बल्कि फसलों के माध्यम से दोहरा लाभ भी ले सकता है।

Latest

भारत में क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस

वायु प्रदूषण कम करने के लिए बिहार बना रहा है नई कार्ययोजना

3.6 अरब लोगों पर पानी का संकट,भारत भी प्रभावित: विश्व मौसम विज्ञान संगठन

अब गंगा में प्रदूषण फैलाना पड़ेगा महंगा!

बीएमसी ने पानी कटौती की घोषणा की; प्रभावित क्षेत्रों की पूरी सूची देखें

देहरादून और हरिद्वार में पानी की सर्वाधिक आवश्यकता:नितेश कुमार झा

भारतीय को मिला संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान

जल दायिनी के कंठ सूखे कैसे मिले बांधों को पानी

मुंबई की दूसरी सबसे बड़ी झील पर बीएमसी ने बनाया मास्टर प्लान

जल संरक्षण को लेकर वर्कशॉप का आयोजन