आर्थिक लाभ और पर्यावरण संरक्षण

Author:कु. सीमा दोल्हे
Source:पर्यावरण विमर्श
आर्थिक विकास के इस दौर में सभी मान रहे हैं कि अमीरी एवं गरीबी के बीच खाई बढ़ रही है। आर्थिक विकास का लाभ चंद लोगों को मिल रहा है, तब गरीबों के लिए स्वच्छ पेयजल तो सपना ही रहेगा, उन्हें अस्वच्छ पानी भी मिल पाएगा या नहीं, कह पाना कठिन है। हालात तो ऐसे हैं कि राज्य में पानी को लेकर अक्सर हिंसक झड़प की खबर आती है। भूजल स्तर गिर जाने से पानी में कारखानों के अवशिष्ट पदार्थों एवं रसायनों के घुल जाने से, भूजल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ रही है। मध्य प्रदेश में फ्लोरोसिस रोग से पीड़ितों की संख्या बढ़ रही है। हमारे पूर्वजों ने आचरण का मंत्र दिया था- ‘धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष’ अर्थात् धर्म के लिए अर्थ को त्याग दो, अर्थ के लिए काम को त्याग दो। यहां धर्म का अर्थ हिंदू, मुस्लिम एवं ईसाई धर्मों से नहीं है, बल्कि पर्यावरण, शांति एवं सौहार्द से लेना चाहिए। अर्थात् यह मंत्र बताता है कि पर्यावरण की रक्षा करने के लिए आर्थिक लाभ को त्याग देना चाहिए। जैसे घर के आंगन में नीम का पेड़ हो तो पर्यावरण शुद्ध रहता है। पेड़ को बचाए रखने से आय लंबे समय तक होती है। पर्यावरण शुद्ध रहता है, बीमारी कम होती है और कार्य करने की क्षमता में वृद्धि होती है।

सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों में संभवतः यह सबसे मुश्किल लक्ष्य है, क्योंकि यह मुद्दा इतना सरल नहीं है, जितना दिखता है। टिकाऊ पर्यावरण के बारे में जिस अवधारणा के साथ लक्ष्य सुनिश्चित किया गया है, सिर्फ उस अवधारणा के अनुकूल परिस्थितियां ही तय सीमा में तैयार हो जाएं तो उपलब्धि ही मानी जाएगी। यद्यपि यह माना जाए कि विकास की राष्ट्रीय नीतियों एवं कार्यक्रमों के बीच समन्वय एवं उनमें व्यवस्थित रूप से एकीकरण किया जाए, पर यह संभव नहीं दिखता।

इस लक्ष्य के मुख्य रूप से तीन भाग हैं, पहला है प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण को कम करना, यानी अब तक प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न राज्यों को अगली पंक्ति में शुमार किया जाता रहा है, पर राज्य में अवैध तरीके से प्राकृतिक संसाधनों का जितना अधिक दोहन हुआ है, उससे कुछ कम ही वैध तरीकों से भी हुआ है। राज्य की औद्योगिक नीति के तहत जीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रदेश में आमंत्रित किया गया, उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का बंटाधार कर दिया। जंगल माफियाओं ने अधिकारियों की मिली-भगत से लाखों पेड़ काट लिए हैं। नदियों के किनारे स्थित कारखाने अपने अवशिष्टों को यूं ही फेंक रहे हैं, जिससे आस-पास के खेतों की उर्वरता खत्म हो रही है और भूजल के साथ-साथ नदियां भी प्रदूषित हो रही हैं। उन पर कोई अंकुश नहीं है। जानवरों की अवैध तस्करी अभी भी जारी है। वन संरक्षण हो या वन्य प्राणी संरक्षण, दोनों को संरक्षित रख पाना मुश्किल हो रहा है।

आर्थिक विकास के इस दौर में सभी मान रहे हैं कि अमीरी एवं गरीबी के बीच खाई बढ़ रही है। आर्थिक विकास का लाभ चंद लोगों को मिल रहा है, तब गरीबों के लिए स्वच्छ पेयजल तो सपना ही रहेगा, उन्हें अस्वच्छ पानी भी मिल पाएगा या नहीं, कह पाना कठिन है। हालात तो ऐसे हैं कि राज्य में पानी को लेकर अक्सर हिंसक झड़प की खबर आती है। भूजल स्तर गिर जाने से पानी में कारखानों के अवशिष्ट पदार्थों एवं रसायनों के घुल जाने से, भूजल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ रही है। मध्य प्रदेश में फ्लोरोसिस रोग से पीड़ितों की संख्या बढ़ रही है।

अपने पर्यावरण को समझें


हमारे देश में लंबे समय से नीतिगत निर्णयों अंतर्गत के समग्र विकास के नाम पर पर्यावरण संरक्षण के तकाजे की बलि दी जाती रही है। आर्थिक वृद्धि के नाम पर पर्यावरण को जमकर नुकसान पहुंचाया गया। इसी का नतीजा है कि हालिया सालों में पर्यावरण संबंधी विवाद खूब उभरकर आए। इस पर विराम लगाने के लिए आखिरकार हमारी सरकार संजीदा हुई है। औद्योगिक और खनन परियोजनाओं में पर्यावरण संबंधी विवादों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ही एक स्वतंत्र नियामक राष्ट्रीय पर्यावरण आकलन और निगरानी प्राधिकरण का गठन करेगी। यह प्राधिकरण देश में विकास की तमाम परियोजनाओं को पर्यावरण संबंधी मंजूरी देने के लिए एक स्वतंत्र नियामक के तौर पर कार्य करेगा।

यह प्राधिकरण यदि अस्तित्व में आया तो न सिर्फ परियोजनाओं द्वारा पर्यावरण मंजूरी लेने की प्रक्रिया में पूरी तरह से बदलाव आ जाएगा, बल्कि परियोजनाओं पर पर्यावरण संबंधी मुद्दों के चलते होने वाली मुकदमेबाजी पर भी रोक लगेगी। बीते कुछ सालों में मुल्क में चल रही कई बड़ी औद्योगिक और खनन परियोजनाओं पर सवाल उठते रहे हैं। जो मुख्यतः पर्यावरण संबंधी हैं। इन परियोजनाओं में सभी कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर पड़े पैमाने पर पर्यावरण व वन-संबंधी नियमों का उल्लंघन किया गया। कई परियोजनाओं की तो मंजूरी देने से भी पर्यावरण मंत्रालय ने इनकार कर दिया। स्टील क्षेत्र की दिग्गज दक्षिण कोरियाई कंपनी पास्को व अनिल अग्रवाल की वेदांत से लेकर रियल्टी कंपनी लवासा कॉरपोरेशन की परियोजनाओं पर पर्यावरण कानून के उल्लंघन के इलजाम लगे और मंत्रालय व अदालतों ने बार-बार काम रोका।

उड़ीसा स्थिति बेड़ाबहल अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजना (यूएमपीपी) जैसी कुछ परियोजनाओं और उससे जुड़े कोयला ब्लॉक के उत्खनन को लेकर भी तमाम एतराज उठे जिसके चलते बिजली और पर्यावरण मंत्रालय आमने-सामने आ गए। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के कार्यकाल में एवं पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर पर्यावरण मंत्रालय का दूसरे मंत्रालयों से कई बार टकराव हुआ। पर्यावरण मंत्रालय और कोयला मंत्रालय के बीच यह तकरार काफी दिनों तक चली। जयराम रमेश ने 203 नए कोयला क्षेत्रों में खनन की मंजूरी देने से साफ इनकार कर दिया था। प्रधानमंत्री ने विकसित देशों को लक्ष्य कर एक बात और दो-टूक शब्दों में कही कि भारत पर्यावरण संरक्षण के मकसद से कदम उठाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आम सहमति होने तक इंतजार नहीं करेगा।

यह बात सच भी है। बीते कुछ सालों में सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन के लिए कई उल्लेखनीय कदम उठाए हैं। चार साल से केंद्र सरकार पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन की चुनौतियों से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय एजेंडे पर काम कर रही है। कुल मिलाकर, आज बढ़ते वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के चलते पर्यावरण सुरक्षा और संरक्षण एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। विकसित-विकासशील देश कोशिश कर रहे हैं कि पर्यावरण सुरक्षा और भी बेहतर हो और पर्यावरण नुकसान कम-से-कम हो, यह उनका महत्वपूर्ण एजेंडा है और बदलते वक्त की दरकार भी है।

भारत सरकार द्वारा जारी स्टेट ऑफ द एनवायरमेंट रिपोर्ट, 2009 में कहा गया है कि देश का पर्यावरण बुरी तरह से बिगड़ रहा है। हवा, पानी और जमीन तीनों ही खतरनाक रूप से प्रदूषित हो रहे हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि देश की कुल जमीन में 45 प्रतिशत जमीन खराब (डिग्रेडे) हो चुकी है। देश के सभी शहरों में हवा का प्रदूषण बढ़ रहा है और वनस्पतियों तथा पशु-पक्षियों की प्रजातियां भी तेजी से विलुप्त हो रही हैं। यही नहीं, शहरों में बढ़ती झुग्गी-बस्तियों के कारण पर्यावरण की नई तरह की समस्या पैदा हो रही है। रिपोर्ट कहती है कि भारत अपने कुल जल-संसाधन का जितना पानी प्रयोग कर सकता है, उसका 75 प्रतिशत इस्तेमाल कर रहा है।

गैर-सरकारी संस्था डेवलपमेंट आल्टरनेटिव्ज के सहयोग से तैयार की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि देश की माटी में क्षारीय तत्व तेजी से बढ़ रहा है और बंजर जमीन का दायरा भी बड़ा हो रहा है। रही-सही कसर जगह-जगह होने वाले जल भराव के कारण पूरी हो रही है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि देश की 45 फीसदी भूमि अनुत्पादक और अनुपजाऊ हो गई है। भूमि की इस बिगड़ी दशा का मुख्य कारण यह बताया गया है कि जिस तरह वनों का विनाश हो रहा है, खदान और पानी का अनियमित दोहन किया जा रहा है तथा गलत तरीके से खेती की पद्धतियों का इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे भूमि को सबसे अधिक नुकसान पहुंच रहा है। हालांकि रिपोर्ट में इस बात की संभावना जताई गई है कि अगर थोड़ी सावधानी बरती जाए और कुछ प्रयास किया जाएं तो खराब हो चुकी 14.7 करोड़ हेक्टेयर जमीन को दोबारा ठीक करके माटी की गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकता है।

दिल्ली के पत्र सूचना कार्यालय द्वारा रिपोर्ट जारी करने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा, “इस बात की उम्मीद करना कि आने वाले दिनों में वन क्षेत्रों में हम तेजी से वृद्धि कर लेंगे, जो थोड़ी अव्यावहारिक सोच होगी।” उन्होंने कहा कि “हमारी योजना है कि आने वाले 10 सालों में हम वर्तमान 21 प्रतिशत वन क्षेत्र को और अधिक सघन कर सकें।” वर्तमान में देश में केवल 2 प्रतिशत वन क्षेत्र ऐसा है, जो उच्च सघनता वाले क्षेत्र में आता है, जबकि मध्यम सघनता वाला वन क्षेत्र कुल भूक्षेत्र का 10 प्रतिशत है। पर्यावरण के संबंध में क्या महज यह कह देने भर से हमारे कर्तव्यों की इतिश्री हो जाएगी कि यह ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन का असर है? भारत एक विशाल क्षेत्रफल वाला देश है, जहां पैदावार अच्छी होगी अथवा सूखा पड़ेगा, इसका पूरा दारोमदार गैर भरोसेमंद वर्षा पर निर्भर करता है। देश की कृषि-योग्य जमीन का 85 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई के लिए या तो प्रत्यक्ष रूप से वर्षा जल पर निर्भर है या भूजल पर। भूजल का स्तर प्रतिवर्ष होने वाली बारिश से ही तय होता है।

बिगड़ते पर्यावरण के कारण बरसात की स्थिति हर साल अनियमित होती जा रही है, जबकि घरेलू जरूरतों के साथ ही सिंचाई का पानी हमें बेहतर मौसमी बारिश से ही मिलता है। पशुओं की परवरिश का भी यह सबसे महत्वपूर्ण जरिया है, लेकिन लंबे समय से भूजल के दोहन से स्थितियां बेकाबू हुई हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा में उत्पन्न अनिश्चितता से लोग कैसे जूझ पाएंगे? साथ ही जिस तरह किसानों द्वारा गन्ना, गेहूं तथा चावल की फसलों की सिंचाई के लिए ट्यूबवेल के रूप में भूजल का दोहन किया जा रहा है तो इस बात की क्या गारंटी है कि जल-स्तर भयावह स्थिति तक नहीं पहुंच जाएगा?

पर्यावरण संरक्षण एवं इसकी जागरूकता के लिए सरकार द्वारा काफी योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाता है, लेकिन इसके अपेक्षाकृत परिणाम नहीं निकलते। पर्यावरण संरक्षण के प्रति जब तक लोग व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदारी नहीं लेंगे, तब तक हालात नहीं सुधरेंगे। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के हिवरे बाजार गांव का जिक्र करना बेहतर होगा। यहां ‘चोर के हाथ में चाबी देने’ वाली कहावत चरितार्थ होती प्रतीत दिखाई देती है। 15 साल पहले तक सूखाग्रस्त इस गांव में सिवाय पलायन के लोगों के पास कोई दूसरा चारा नहीं था, लेकिन 90 के दशक में वैज्ञानिक सोच और सरकारी योजनाओं के सही कार्यान्वयन के बाद बदलाव की बयार आई तो यह गांव आज समृद्ध दिखने लगा है।

सिंचाई के मामले में कहीं-न-कहीं सरकार की गलत नीतियां जिम्मेदार हैं और राज्य सरकारों ने नदियों पर बांध, नहरें वगैरह बनाकर सतह के पानी का प्रबंधन अपने पास रखा है। आज भी लोग सिंचाई के लिए सबसे ज्यादा भूजल का ही दोहन करते हैं। किसी की व्यक्तिगत जमीन का भूजल उसी की मिल्कियत माना जाता है। आज भी लगभग तीन-चौथाई हिस्से की सिंचाई भूजल से की जाती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में लगभग 1.9 करोड़ ट्यूबवेल, कुएं जैसे भूजल के स्रोत हैं। सरकार को अपनी इस नीति पर पुनर्विचार करके सोचना चाहिए कि क्यों उसके प्रबंधन से केवल 35-40 प्रतिशत भूभाग की सिंचाई हो पाती है, जबकि ग्राऊंड वाटर से 65-70 प्रतिशत भूभाग की। जब हमने वर्षा जल संचयन के पारंपरिक तरीकों को छोड़कर नई तकनीक अपना ली तो उनकी कोई वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से निपटने के लिए जब तक कोई वैश्विक नीति नहीं तैयार की जाती, तब तक इस समस्या से निपटना नामुमकिन होगा। कहने को तो पिछले 17 सालों से बड़ी-बड़ी संधियां होती हैं और वादे किए जाते हैं, लेकिन रहती सब बेनतीजा ही हैं। इन सत्रह सालों में हमने इस मामले में एक इंच भी प्रगति नहीं की और आज भी वहीं खड़े हैं, जहां उस समय थे। इसकी सबसे बड़ी वजह शायद यह है कि ग्रीन हाउस गैसों तथा प्रदूषण नियंत्रण के वादे तो सब करते हैं, मगर कोई पैमाना नहीं तय किया जाता कि कौन किस हद तक नियंत्रण करेगा? अमेरिका, जापान, कनाडा तथा न्यूजीलैंड जैसे कई विकसित देश यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि वे तब तक कुछ नहीं करेंगे, जब तक चीन, भारत, ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देश प्रदूषण नियंत्रण के उपाय नहीं करते।

रिसर्च स्कॉलर
पं. आरएसयू. रायपुर

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