अटल भूजल योजना भागः3- क्षमता निर्माण

Author:Manisha Shah, Nikita Deshpande
Source:इंडिया वाटर पोर्टल

अटल भूजल योजना एक बड़े पैमाने वाली योजना है और देखा जाए तो इस तरह के सभी बड़े कार्यक्रमों में सभी भागीदारों की क्षमता निर्माण बहुत अहम है। खासतौर पर तब जब इसमें बड़े स्तर पर सामुदायिक भागीदारी शामिल हो, वहां कार्यक्रम को सफल बनाने के लिये, इसमें शामिल सभी भागीदारों की क्षमता निर्माण करना बहुत अहम हो जाता है। संस्थागत सशक्तिकरण और क्षमता निर्माण इस कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू है जिसके लिये पूरे कार्यक्रम में लगने वाली धनराशि का लगभग एक -चौथाई हिस्सा इसी क्षमता निर्माण के काम के लिये इस्तेमाल होगा। 

कार्यक्रम में हर स्तर पर क्षमता निर्माण की जिम्मेदारी तय की गई है। यह जिम्मेदारी राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रबंधन इकाई यानी NPMU से ही शुरु हो जाती है जिसकी जिम्मेदारी है कि वो भूजल प्रशिक्षण पर अनुभव रखने वाली विभिन्न एजेंसियों जैसे केंद्रीय भूजल आयोग, राजीव गांधी राष्ट्रीय भूजल प्रशिक्षण और शोध संस्थान और गैर सरकारी संगठनों आदि को एक साथ लाए। भूजल पर नोलेज देने के साथ साथ अन्य पहलूओं जैसे डेटा इकट्ठा करना, डेटा एंट्री, एमआईएस का ऑपरेशन आदि इन सब का प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी भी NPMU और SPMU की है।

राज्य और जिला स्तर पर ट्रेनिंग कार्यक्रमों का आयोजन करना, आईईसी एक्टिविटीज करना, नोलेज और अनुभव साझा करने के लिये विभिन्न कार्यशालाओं का आयोजन करना जैसे काम SPMU  के अंतर्गत आते हैं। गांव के स्तर पर जल संरक्षण के नए तरीकों को अपनाने के लिये लोगों के व्यवहार और दृष्टिकोण में बदलाव लाने का प्रयास करना DPMU की मुख्य भूमिकाओं में शामिल है।

जबकि दूसरी ओर सरकारी कर्मियों को कार्यक्रम के भागीदारों की क्षमता निर्माण के लिये यथा संभव प्रयास करने हैं। DIP के तौर पर,  समुदायों को सहायता देने और क्षमता निर्माण योजनाओं के क्रियान्वयन में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका ज्यादा अहम है। डेटा कलेक्ट करने के लिये फ्रंटलाइन वर्कर्स की ट्रेंनिंग तक सभी में डीएलआई यानी Disbursement linked Indicaters का पूरा होना निहायत जरूरी है जिसके लिये स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर जल सुरक्षा योजनाएं बनानेे में मदद करने के लिये डीआईपी की भूमिका अहम है।  

 जैसा हमने पहले भी बताया कि कार्यक्रम के हर स्तर पर क्षमता निर्माण जरूरी है लेकिन यह हर स्तर पर भिन्न प्रकार से होगा।  ग्राम पंचायत स्तर पर कर्मियों को जल आपूर्ति और मांग की योजना बनाना, जल बजट बनाना, ग्रामीण जल प्रबंधन समिति को सशक्त बनाना आदि  में दक्ष होना चाहिये। जबकि जिला स्तर की बात करें तो  क्षमता निर्माण का मुख्य केंद्र जल सुरक्षा योजनाओं का संग्रह और उन पर पुनर्विचार या समीक्षा करना, जिला स्तर की योजनाएं बनाना और भूजल प्रबंधन के तकनीकी ज्ञान के अलावा बजट बनाना आदि शामिल है। राज्य स्तर के सभी कर्मियों को एमआईएस और शिकायत निवारण व्यवस्था के प्रबंधन में दक्ष होना चाहिए और साथ ही राज्य स्तरीय बजट बनाने, मॉनिटरिंग और रिपोर्टिंग में कुशल होना चाहिये। 

सभी मास्टर ट्रेनर के लिये राजीव गांधी भूजल प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान कार्यशाला की तरह प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन करेगा। सभी प्रशिक्षुओं को कार्यशाला में भाग लेते समय अपने संबंधित राज्य के रियल टाइम डेटा और अन्य जानकारी होनी चाहिये ताकि वे विभिन्न टूल्स के माध्यम से उस जानकारी का व्यवहारिक इस्तेमाल  करना सीख सके जिसका इस्तेमाल उनको भविष्य में ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स के दौरान करना है। ये मास्टर ट्रेनर DPMU, DIPs और अन्य कर्मियों को प्रशिक्षण देंगे। ग्राम पंचायत स्तर पर इन कर्मियों के प्रशिक्षण के लिये रिसोर्स मटीरियल यानी संसाधन सामग्री को स्थानीय संदर्भों के साथ स्थानीय भाषा में अनुवाद भी किया जाएगा।

अटल जल कार्यक्रम में न केवल प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण करने में सहायता करने के लिये विभिन्न राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों को चिन्हित किया गया है बल्कि हिवड़े बाजार और मारवी जैसे बहुत से सफल प्रयासों से प्राप्त अनुभव और ज्ञान को भी साझा करने के लिये ये एजेंसियां सहायता करेंगी। मौजूदा और नई प्रशिक्षण सामग्री का इस्तेमाल करते हुए राजीव गांधी संस्थान राष्ट्रीय स्तर पर कार्टशाला का आयोजन करेगा। राज्य भी राज्य, जिला और पंचायत स्तर पर प्रशिक्षण कार्यशाला के आयोजन के लिये किसी एजेंसी का चयन कर सकते हैं। 

बड़े स्तर पर जल उपभोक्ताओं के व्यवहार में बदलाव लाए बिना अटल जल योजना जमीन पर सफल नहीं हो सकती। इसलिये इसके मद्देनजर सूचनाएं, शिक्षा और संचार बहुत ही अहम हो जाते हैं। कार्यक्रम का मकसद टेलीविजन के माध्यम से बड़े पैमाने पर प्रचार करना, नुक्कड़ नाटक, वॉल पेंटिंग, छोटी फिल्मों, विज्ञापन बोर्ड आदि के जरिये स्थानीय कैम्पेन करना है ताकि स्थानीय समुदायों को मुद्दों के प्रति संवेदनशील और जागरूक किया जा सके क्योंकि इसके बिना मांग प्रबंधन और सतत भूजल के लक्ष्य को नहीं पाया जा सकता।

जैसा कि हम सब जानते हैं कि देश भर में तकनीकी के इस्तेमाल में तेजी आ रही है तो ऐसे में अटल भूजल योजना भी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिये सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर जोर देगी। जबकि DIPs और प्रशिक्षित फ्रंटलाइन वर्कर्स स्थानीय समुदायों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिये काम करते रहेंगे, संचार विशेषज्ञ ज्ञान और प्रसार सामग्री का प्रचार प्रसार करके बड़े पैमाने पर इस बदलाव के लाने में मदद कर सकते हैं।