आत्ममंथन से सुलझेंगी ये उलझी गाँठें

Author:अरुण तिवारी
पिछले तीन सप्ताह के दौरान आन्ध्र के अकेले अनन्तपुर के हिस्से में 22 किसानों ने आत्महत्या की। जिन सिंचाई और उन्नत बीज आधारित कृषि नीति के कारण, उड़ीसा का नवरंगपुर कभी मक्का के अन्तरराष्ट्रीय बीज बिक्री का केन्द्र बना, आज वही गिरावट के दौर में है। भारत की कपास, दुनिया में मशहूर है। फिर भी कपास किसानों की मौत के किस्से आम हैं। कभी भारत का खाद्य कटोरा कहे जाने वाले पंजाब का हाल किसी से छिपा नहीं है। इसने पहली हरित क्रान्ति के दूरगामी असर की पोल खोल दी है। एक ओर तो भारत सरकार, चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र पर पनबिजली परियोजनाओं बनाने को लेकर चिन्तित है, दूसरी ओर उसकी चिन्ता है कि भारत में बाँध आधारित पनबिजली परियोजनाओं को जल्दी से जल्दी मंजूरी कैसे दे।

उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की चिन्ता है कि हीराकुंड, चिपिलिमा और बालीमेला पनबिजली परियोजनाओं की क्रमशः दो, एक और छह इकाइयों का जल्द-से-जल्द नवीनीकरण कैसे किया जाये। इसके लिये उन्होंने 800 करोड़ तक खर्च करने को तैयार हैं। पिछले सप्ताह हुई एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद ऊर्जा सचिव सुरेश चन्द्र महापात्र ने यह जानकारी दी।

बढ़ते विवाद : बढ़ती लागत


पनबिजली में सार्वजनिक क्षेत्र की अग्रणी कम्पनी एनएचपीसी चिन्तित है कि उसके द्वारा तैयार बिजली की लागत, मौजूदा दरों से ज्यादा होने के कारण राज्य बिजली बोर्ड आगे खरीद में रुचि नहीं ले रहे हैं। कम्पनी कह रही है कि राज्यों के बीच विवाद, भौगोलिक मुद्दों तथा स्थानीय नागरिकों के विरोध के कारण लागत बढ़ रही है।

लोग कह रहे हैं कि कम्पनी के कारण, उनके जीवन की सांसत बढ़ रही है। आन्ध्र प्रदेश में गोदावरी पर बनी इन्दिरा सागर पोलावरम अन्तरराज्यीय परियोजना से हुए विस्थापन के कारण आदिवासी ग्रामीण की जिन्दगी में कठिनाई बढ़ गई है। अतः आरटीआई कार्यकर्ता डी.एस. कुमार जानना चाहते हैं कि परियोजना को वन विभाग से मंजूरी व मौके का सच क्या है?

मुख्य सूचना अधिकारी ने सच बताने के लिये केन्द्र को निर्देश तो दे दिया है, किन्तु क्या इससे विस्थापितों के कष्ट कम हो जाएँगे?

महाराष्ट्र एक : विवाद अनेक


बाँधों के कारण, महासिर मछली की जान सांसत में है। वे, अपना विरोध भले ही दर्ज नहीं कर पा रही हो, किन्तु मुम्बई की पिंजल गार्गे बाँध परियोजना के कारण हुए विस्थापन से 17 गाँव सांसत में आये हैं, तो वे विरोध करेंगे ही।

भामा अस्खेद बाँध परियोजना स्थल पर शिवसेना कार्यकर्ताओं द्वारा पत्थरबाजी को हिंसात्मक होने के नाते, आप अवश्य नाजायज कह सकते हैं, किन्तु क्या विस्थापित किसानों द्वारा अपने पुनर्वास और मुआवजे के माँग को लेकर किये जा रहे विरोध-प्रदर्शन को नाजायज ठहराया जा सकता है?

नासिक के माकाणे बाँध की लागत तो बिना विरोध ही 36 करोड़ ही बढ़ गई। नागपुर की गोसीखुर्द ब्रांच कैनाल और राइट बैंक कैनाल परियोजनाओं में बढ़ी लागत तो अब भ्रष्टाचार निरोधक शाखा की जाँच के दायरे में भी आ गई हैं।

बाँध बहुत, पर जलाशय सूखे


मराठवाड़ा, सूखे से त्राहि-त्राहि कर रहा है। मराठवाड़ा में किसानों की आत्महत्या का आँकड़ा, पिछले 10 माह में आठ सैकड़ा की संख्या पार कर गया है। उस्मानाबाद, बीड़ और नांदेड़ क्रमशः सबसेे अधिक दुष्प्रभावित जिले हैं। मराठावाड़ा के सभी बाँधों में उनकी कुल जल भण्डारण क्षमता का मात्र 15 फीसदी पानी शेष है।

मजालगाँव, माजरा, लोअर टेरना यहाँ के सबसे बड़े बाँध - जयकवाड़ी के जलाशय में तो उसकी कुल क्षमता का मात्र छह फीसदी पानी ही है। लिहाजा, मराठवाड़ा सिंचाई विकास निगम को आदेश करने पड़ रहे हैं कि जयकवाड़ी बाँध के लिये, उत्तर महाराष्ट्र के बाँध 12.85 हजार मिलियन क्यूबिक फीट पानी छोड़ें।

अब इस पर तो अहमदनगर और नासिक के बीच विवाद होगा ही। नासिक कुम्भ में शाही स्नान के लिये पानी छोड़ा, तो आखिर विवाद हुआ ही। मुम्बई हाईकोर्ट ने इसे नीति विरुद्ध बताया ही; कहा ही कि शाही स्नान आखिरी प्राथमिकता है और पेयजल पहली।

पहले पुनर्स्थापना, तब गेट बंदी


जब श्री नरेन्द्र मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उनकी चिन्ता थी कि सरदार सरोवर बाँध की ऊँचाई और अधिक कैसे हो; अब भारत की सर्वोच्च अदालत को चिन्ता हो गई है कि इस बढ़ी ऊँचाई के कारण सम्भावित विस्थापित लोगों की पुनर्स्थापना कैसे सुनिश्चित हों।

अपने ताजा फैसले में उसने मध्य प्रदेश शासन को भी निर्देश दिया है कि सिर्फ प्रभावित के सबसे बड़े बेटे ही नहीं, बल्कि सभी व्यस्क व अव्यस्क बेटों को भूमि तथा आर्थिक मुआवजा दिया जाये। मुझे उम्मीद है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देने वाली सरकारें, मुआवजा सूची में बेटे और बेटी.. दोनों शामिल करेंगी।

खैर, सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कह दिया है कि जब तक विस्थापित हुए अन्तिम व्यक्ति की पुनर्स्थापना सुनिश्चित नहीं हो जाती, सरदार सरोवर के गेट बन्द न किये जाएँ।

संकट में किसानी


सिंचाई के लिये बने बाँध वाले राज्यों में किसानों में सबसे ज्यादा त्राहि-त्राहि है, तो पनबिजली वाले बाँधों की नदियों में पानी की गुणवत्ता को लेकर। तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश में नकदी फसलों को लेकर मौत पसरी है। नए राज्य के रूप में तेलंगाना ने 1,269 आत्महत्याओं का आँकड़ा पार कर लिया है। सूखे के कारण, आर्थिक नुकसान बेइन्तहा है।

पिछले तीन सप्ताह के दौरान आन्ध्र के अकेले अनन्तपुर के हिस्से में 22 किसानों ने आत्महत्या की। जिन सिंचाई और उन्नत बीज आधारित कृषि नीति के कारण, उड़ीसा का नवरंगपुर कभी मक्का के अन्तरराष्ट्रीय बीज बिक्री का केन्द्र बना, आज वही गिरावट के दौर में है। भारत की कपास, दुनिया में मशहूर है। फिर भी कपास किसानों की मौत के किस्से आम हैं।

कभी भारत का खाद्य कटोरा कहे जाने वाले पंजाब का हाल किसी से छिपा नहीं है। इसने पहली हरित क्रान्ति के दूरगामी असर की पोल खोल दी है। इसकी एक के बाद, दूसरी फसल पिट रही है। बासमती, बढ़िया चावल है; फिर भी पंजाब के बासमती की परमल चावल की तुलना में माँग कम है। इधर पूरे भारत में दालों का उत्पादन घट रहा है। महंगाई पर रार बढ़ रही है।

ये रार और बढ़ेगी; क्योंकि मौसम बदल रहा है। कहीं गर्मी बढ़ रही है, तो कहीं सर्दी। गर्मी के मौसम लम्बे हो रहे हैं। सर्दियों की अवधि घट रही है। बसंत और हेमंत गायब हो रहे हैं। उन्नत बीज, कीटों का प्रहार झेलने में नाकामयाब साबित हो रहे हैं। देसी बीजों को बचाने की कोई जद्दोजहद सामने नहीं आ रही है।

आत्ममंथन जरूरी


इन तमाम ताजा घटनाक्रमों को लेकर स्पष्ट है कि खेती और पानी को लेकर संकट बढ़े हैं; सो, रार भी बढ़ चली है। नदी मध्य बाँध, इसका विशेष कारण बनते जा रहे हैं। बाँधों के कारण मुनाफे से ज्यादा, नुकसान हो रहा है। मेहनतकश किसान संकट में है और उसका उत्पादन बेचने वाला व्यापारी मौज कर रहा है।

यह विरोधाभासी चित्र है। ऐसा न हो। क्या इसके लिये जरूरी नहीं कि एक बार बैठकर किसान और बाजार के तालमेल को बना लें? क्या जरूरी नहीं कि हम अपनी सिंचाई योजनाओं, परियोजनाओं और पद्धतियों का पुर्नआकलन कर लें? पनबिजली बाँध परियोजनाओं के जलाशयों की जलक्षमता घट रही है।

पानी से उत्पादित बिजली की लागत बढ़ रही है; तो क्या जरूरी नहीं कि पनबिजली परियोजनाओं को लेकर नित्य उठते स्थानीय मुद्दों और पर्यावरणीय मसलों का नीतिगत स्तर पर आत्ममंथन कर लें? क्या जरूरी नहीं कि हर भूगोल व स्तर के बाँधों की जरूरत और व्यावहारिकता का आकलन कर एक बार बाँध की नीति बना ले? शासन सोचे; वरना पानी, खेती, बिजली और बाजार की गाँठे आपस में उलझने का वक्त आ ही गया है। लड़ और मर भी हम रहे ही हैं।