औद्योगीकरण का प्रभाव : कोरबा एक अध्ययन

Author:एस.सी. लाहिरी, कुसुम तिवारी
Source:योजना, 30 सितम्बर 1993

 

प्रत्येक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों ने वनारोपण कार्यक्रम भी प्रारम्भ किये हैं ताकि पर्यावरण की सुरक्षा हो सके। इसके अलावा, प्रत्येक इकाई ने परिधि विकास कार्य को भी अपने सामाजिक दायित्व के रूप में प्रारम्भ किया है कोरबा क्षेत्र में कई परियोजना अस्पताल भी हैं, जिनमें आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जिससे बढ़ती हुई जनसंख्या के स्वास्थ्य की देखभाल सम्बन्धी जरूरत पूरी होती है।

योजना काल के प्रारम्भ से ही सार्वजनिक क्षेत्र के माध्यम से महत्त्वपूर्ण एवं प्रमुख क्षेत्रों में निवेश को बढ़ाने के लिये अपनाई गई केन्द्र सरकार की सजग नीति के परिणामस्वरूप छत्तीसगढ़ क्षेत्र में कुछ ऐसे छोटे-छोटे स्थान विकसित किए गए हैं, जहाँ औद्योगिक गतिविधियाँ केन्दित हो गई हैं। स्रोतों की समीपता के कारण तथा प्राकृतिक व आधारभूत संरचना के अनुकूल होने के कारण इन स्थानों पर उद्योगों की स्थापना की गई। मध्यप्रदेश (छत्तीसगढ़) का कोरबा भी एक ऐसा ही स्थान है। यह अब विकास की ओर अग्रसर एक नगर है जहाँ बिलासपुर जिले के अधिकांश प्रमुख उद्योग स्थित हैं। पाँचवें दशक के प्रारम्भिक वर्षों तक कोरबा जंगलों से घिरा एक छोटा सा आदिवासी गाँव था। वर्ष 1951 की जनगणना के अनुसार यहाँ की आबादी 2,000 से कुछ ही अधिक थी। इसे चतुर्थ श्रेणी के नगर का दर्जा 1961 में मिला। 1961-71 के दशक में जनसंख्या वृद्धि की दर 162 प्रतिशत थी जोकि 1971-81 की अवधि में 155 प्रतिशत रिकॉर्ड की गई। वर्ष 1991 की जनगणना के अनुसार कोरबा की जनसंख्या 1,24,365 है और इसका क्षेत्रफल 15 किलोमीटर हैं यहाँ आदिवासी बड़ी संख्या में हैं।

पाँचवें दशक के अन्तिम वर्षों में कोयला खनन, 100 एम.डब्ल्यू क्षमता के ताप बिजली घर की स्थापना के साथ कोरबा का औद्योगिक विकास प्रारम्भ हुआ। वर्तमान समय में यह सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों का केन्द्र बन गया है। जैसे-जैसे दक्षिणी पूर्वी कोयला कम्पनी, भारत अल्युमिनियम कम्पनी, नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन, मध्यप्रदेश विद्युत बोर्ड और आई.बी. पेट्रोलियम कम्पनी का औद्योगिक विस्फोटक संयंत्र। कोरबा क्षेत्र में कार्यरत कोयला खादानों से प्रति वर्ष 2.5 करोड़ टन कोयला प्राप्त होता है। यहाँ की खुली खदानों का कुल कोयला उत्पादन में 90 प्रतिशत का योगदान है।

कोरबा में चार ताप बिजली घर लगाए गए हैं जिनमें 2,100 एम.डब्ल्यू क्षमता का राष्ट्रीय ताप बिजली निगम का भी एक बिजलीघर है।

भारत अल्युमिनियम कम्पनी द्वारा एक लाख टन क्षमता का एक अल्युमिनियम संयंत्र यहाँ लगाया गया है इसके अलावा लगभग 15 लघुस्तरीय उद्योग जिनमें रसायन, चूना, कास्टिंग, इलेक्ट्रोड आदि शामिल हैं, कोरबा औद्योगिक एस्टेट क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं।

यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि ये परियोजनाएँ प्रमुख तौर पर राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय माँगों को पूरा करती हैं और स्थानीय माँग तो मात्र प्रासंगिक है जबकि राष्ट्रीय नियोजन के अंतर्गत, स्थानीय आवश्यकताओं के लिये स्थानीय रूप से उपलब्ध साधनों से वस्तुओं के उत्पादन को बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया है।

अपने प्रारम्भ के समय से ही प्रमुख परियोजनाएँ कोरबा के स्थानीय लोगों तथा इसके आस-पास के गाँवों के लोगों के जीवन एवं संस्कृति को प्रभावित करती रही हैं। दो दशकों से कुछ अधिक के समय में ही, भारत और मध्यप्रदेश के औद्योगिक नक्शे में कोरबा को एक महत्त्वपूर्ण स्थान हासिल हो गया है।

सामाजिक-आर्थिक प्रभाव


आगे दी गई तालिका कोरबा की जनसंख्या के व्यावसायिक स्वरूप में परिवर्तन को स्पष्ट करती है :-

 

 

 

जनसंख्या का प्रतिशत-वितरण 1961 व 1991 की जनगणनानुसार

श्रेणियाँ

1961

1991

कृषक

13.89

0.73

कृषि श्रमिक

1.25

1.21

गृह उद्योग

5.40

3.71

अन्य श्रमिक

79.46

94.35

स्रोत : जनगणना, 1961 एवं 1991

 

उपरोक्त आंकड़ों से यह पता चलता है कि 1961 से 1991 की अवधि में कृषक श्रेणी में तेजी से गिरावट आई है। कृषि श्रमिकों के प्रतिशत में विशेष अंतर नहीं आया है। अन्य श्रेणियों में कार्यरत श्रमिकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह ध्यान देने योग्य है कि 1991 में 10 प्रतिशत से कम लोग कृषकों की श्रेणी में रह गए जबकि 1961 में यह प्रतिशत लगभग 14 था। यह इस बात का संकेत है कि स्थानीय जनसंख्या के व्यावसायिक स्वरूप में परिवर्तन आया है और वे अब कृषि की बजाय अन्य कार्यों जैसे खनन, खदान, निर्माण आदि कार्यों में संलग्न हैं।

यह कहा जा सकता है कि प्रमुख उद्योग जैसे कोयला खदानें, बिजली संयंत्र, एवं बाल्कों आदि के स्थापित होने से कुशल एवं अकुशल दोनों ही प्रकार के श्रमिकों को पर्याप्त संख्या में रोजगार उपलब्ध हुआ है। कोरबा में कोयला खनन के कार्य में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग कार्यरत हैं। इसके अलावा छठे दशक से ही अन्य निर्माण कार्यों में दैनिक मजदूरी पर श्रमिक कार्य कर रहे हैं।

औद्योगीकरण का प्रभाव


मध्यप्रदेश के दक्षिण पूर्वी जिले के आदिवासियों पर औद्योगीकरण के प्रभाव से सम्बन्धित 1988 में एक अध्ययन से यह पाया गया कि जिन स्थानीय निवासियों के पास भूमि थी और जिनके परिवार के सदस्य कभी-कभी वेतन से जुड़े कार्यों में संलग्न थे, उनकी वार्षिक आय उन लोगों की आय के मुकाबले दोगुने से भी अधिक हो गई, जिनकी गतिविधियाँ सिर्फ भूमि और वनों से सम्बन्धित आर्थिक क्रियाओं तक ही सीमित थी। कोरबा संयंत्र के आस-पास आधुनिक रिहायसी बस्तियों का विकास हुआ और उसके साथ ही अन्य जनोपयोगी सुविधाओं का। इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि प्रमुख प्रोजेक्ट अपनी स्थापना के समय से ही, यहाँ के स्थानीय निवासियों तथा आस-पास के, कटधोरा तहसील के, गाँवों के निवासियों के जीवन एवं संस्कृति को प्रभावित करते रहे हैं। इस क्षेत्र में इन परियोजनाओं का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव आदिवासियों के आर्थिक जीवन पर पड़ा है, वे अब मुद्रा आधारित बाजार की ओर उन्मुख हो गए हैं।

अब उनमें गैर कृषि क्षेत्र में कार्य करने की भावना भी जागृत हो गई है। अब वे वन में, निर्माण कार्यों में और खदानों में वेतन मजदूर के रूप में कार्य करने लगे हैं। लेकिन, यह परिवर्तन कोरबा के नजदीक के गाँवों में निवास करने वालों में ही दिखाई पड़ता है, शेष आदिवासी जनसंख्या अभी तक उसी परम्परागत तरीके से जीवन निर्वाह कर रही है। एक सकारात्मक प्रभाव कोरबा के आदिवासियों पर यह पड़ा है, कि वे शिक्षा के मूल्य को समझने लगे हैं और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग करना सीख रहे हैं। अब वे अपने बच्चों को शिक्षित करने में रुचि लेने लगे हैं ताकि उनके बच्चे कुशल श्रम के रूप में ऊँचे वेतन वाले पदों पर कार्य कर सकें और स्थानीय उपक्रमों तथा अन्यत्र भी तरक्की कर सकें।

मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि स्थानीय जनसंख्या पर औद्योगीकरण का प्रभाव मुख्य केन्द्रों पर अधिक दिखाई पड़ता है (मुख्य केन्द्र, वे हैं जहाँ उद्योग स्थापित हैं।) अधिकांश जनसंख्या, जो इन केन्द्रों की परिधि के बाहर रहती है, इनसे लाभान्वित नहीं हुई है और इस प्रकार के विकास से अप्रभावित है। इस कारण जो स्पष्ट आर्थिक असमानता लोगों में आई है, उसने यहाँ के निवासियों में सामाजिक तनाव को जन्म दिया है, साथ ही उन्हें औद्योगिक प्रदूषण तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी संकट के अनिवार्य प्रभावों के सामने निहत्था खड़ा कर दिया है।

1988 के अध्ययन के अनुसार कोरबा में शत प्रतिशत आदिवासियों के बीच ऋणग्रस्तता विद्यमान है। कोरबा के आदिवासी बहुल इलाके अब आदिवासी अल्प इलाकों में परिवर्तित हो गए हैं। इसका मुख्य कारण बाहर से आई हुई जनसंख्या में बढ़ोत्तरी है। इन परियोजनाओं ने यद्यपि यहाँ समृद्धि और आराम की अनेक सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं परन्तु आदिवासी लोग अब भी अपनी छोटी-छोटी झोपड़ियों में रहकर इन सुविधाओं का लाभ नहीं उठा रहे हैं।

प्रदूषण में वृद्धि


केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड दिल्ली की 1990 अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार कोरबा अत्यधिक प्रदूषणग्रस्त क्षेत्र हो गया है और यहाँ के निवासी औद्योगिक कचरे, धुएँ एवं जल प्रदूषण के खतरे का सामना कर रहे हैं। जहाँ तक आस-पास के वायुमंडल की वायुगुणवत्ता का प्रश्न है, रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि सल्फर डाइआक्साइड और वायुमंडल में हानिकारक धूल और गैसों की काफी अधिक मात्रा कोरबा के आवासीय क्षेत्र में विद्यमान है। हसदेव नदी की जल गुणवत्ता पर गौर करें तो यह पता चलता है कि इसमें थर्मोटोलरेंट बैक्टीरिया उपस्थित हैं जोकि इसे पीने योग्य नहीं रहने देते। साथ ही, भूमिगत जलस्रोतों में कॉलिफार्म बैक्टीरिया और आवश्यक मात्रा में अधिक लोहा तथा जिंग उपस्थित है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि प्रथम वर्षा के जल के विश्लेषण से यह पता चलता है कि वातावरण में उच्च क्लोराइड (0.9 एमजी/लीटर) सहित अत्यधिक वायु प्रदूषण तत्व भरे हुए थे।

कोरबा में स्थित परियोजनाओं के कारण पर्यावरण असंतुलन की समस्या आई है क्योंकि विशाल मात्रा में वनों की कटाई की गई है। जनसंख्या की वृद्धि के दबाव के कारण अत्यधिक खनन के कारण, इन परियोजनाओं के नज़दीकी क्षेत्र में आबादी, पशुधन तथा वनस्पति पर विपरीत प्रभाव पड़ा है और पर्यावरण में निरंतर ह्रास होने के साथ-साथ दीर्घकाल में ये और भी दुष्प्रभावित होंगे। यहाँ आसमान पर हमेशा धूल व धुएँ का गुबार छाया रहता है। इसलिये कोरबा टाउनशिप में अक्सर धुँधलापन रहता है। यहाँ के निवासियों में साँस सम्बन्धी रोग, आंत सम्बन्धी रोग, आँख और त्वचा का संक्रमण बहुत अधिक मिलता है। यद्यपि कोरबा के उद्योगों ने औद्योगिक प्रदूषण को न्यूनतम करने के लिये कुछ उपाय अपनाए हैं, परन्तु अधिक प्रभावशील कदम, जैसे प्रदूषण सहिष्णु प्रजाति के पौधे लगाना, औद्योगिक कूड़ा-कर्कट का पुनर्चक्र और दूषित मल मुक्त जल निकासी का सही प्रबंध आदि अपनाने की जरूरत है।

कोरबा औद्योगिक क्षेत्र के आस-पास विकास के अन्य सकारात्मक पहलुओं में से एक है आधुनिक बस्ती का विकास, जहाँ समस्त सुविधाओं व साधनों से युक्त आवासीय कॉलोनी स्थापित हो गई है। सम्पर्क मार्ग, पार्क, खेल के मैदान, परिवहन, विपणन केन्द्र, विद्यालय, स्वास्थ्य केन्द्र, बैंकिंग और डाक सेवाएँ भी यहाँ के लोगों के लिये विकसित की गई हैं। प्रत्येक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों ने वनारोपण कार्यक्रम भी प्रारम्भ किये हैं ताकि पर्यावरण की सुरक्षा हो सके। इसके अलावा, प्रत्येक इकाई ने परिधि विकास कार्य को भी अपने सामाजिक दायित्व के रूप में प्रारम्भ किया है कोरबा क्षेत्र में कई परियोजना अस्पताल भी हैं, जिनमें आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जिससे बढ़ती हुई जनसंख्या के स्वास्थ्य की देखभाल सम्बन्धी जरूरत पूरी होती है। आस-पास के गाँवों के निवासियों की चिकित्सा भी यहीं होती है। अब तो यहाँ अनेकों निजी चिकित्सालय भी खुल गए हैं।

औद्योगिक इकाइयों द्वारा खोले गए प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक एवं माध्यमिक स्तर के विद्यालयों के अलावा राज्य सरकार तथा अन्य निजी संगठनों द्वारा भी विद्यालय चलाए जा रहे हैं। वहाँ केन्द्रीय विद्यालय तथा सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों द्वारा संचालित विद्यालय हैं जिनमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों को रियायती शिक्षा शुल्क और परिवहन सुविधा की व्यवस्था है।

इन संस्थाओं ने खेल कूद व मनोरंजन की क्रियाओं को भी प्रोत्साहन दिया है। वार्षिक क्रीड़ा आयोजन, संगीत व नाटक प्रतिस्पर्धाएँ नियमित रूप से यहाँ होती रहती हैं। लोक नृत्य, विविध मनोरंजन, क्रिकेट और बॉलीवाल जैसे खेल अक्सर आयोजित होते हैं। आय स्तर में वृद्धि के साथ कोरबा के अधिकांश लोगों ने घरेलू उपयोग की मशीनें तथा अन्य टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ प्राप्त कर ली हैं। कोरबा की यह विशेषता औद्योगिक समाज के चरित्र से मेल खाती है।

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