और अब हरा पूंजीवाद

Author:कैलाश वाजपेयी
Source:नेशनल दुनिया, 10 जून 2012

पानी नीला सोना है उसे बचाओ, पूरा पृथ्वी के पानी को अगर एक गैलन मान लिया जाए तो पीने योग्य पानी एक चम्मच भर बचा है उसकी इज्जत करो, वार्टर हार्वेस्टिंग करो, पैदल चलो, साइकिल पर चलो। कार को नफरत की निगाहों से देखो, हर पुस्तक एक पेड़ की लाश है उसका आकार कम करो। इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशनों को प्रोत्साहित करो, बड़े बांध मत बनाओ नदियों को हक दो कि वह खुलकर बहें। मछलियों और पक्षियों को मारो नहीं, मांसाहार छोड़ो फैशन शो प्राणघाती है।

पिछली सदी में लिन व्हाइट जूनियर ने एक पुस्तक का प्रकाशन किया था नाम था ‘द एंड ऑफ रेनेसा’ इस पुस्तक में लेखक ने यह शिकायत की थी कि यांत्रिक प्रगति की दौर में सेमाई संस्कृति के लोगों ने मनुष्य जाति पर इतने अत्याचार किए हैं, प्रकृति को इतनी क्षति पहुंचाई है कि इस नुकसान की भरपाई करने में सैकड़ों साल लग जाएंगे। सेमाई संस्कृति से उसका मतलब था दुनिया के तीन धर्म यहूदी, ईसाई और इस्लाम। हम सब इसे जानते हैं कि हमारी जिंदगी के हर क्षेत्र पर पूंजी ने उत्पात मचा रखा है। पूंजी और उसकी विकृतियों पर पहला हस्तक्षेप कार्ल मार्क्स ने किया था। हम सबको ज्ञात है कि कार्ल मार्क्स यहूदी था और हर यहूदी अपने को चुनिंदा मानता है। यहूदियों के पवित्र ग्रंथ का नाम है तालमुद-तो-हरा। यह ग्रंथ हर सायनागॉग (यहूदी मंदिर) में मिल जाएगा। यहां रहने वाले रेबाई यानी धर्मगुरु को तालमुद लगभग कंठस्थ होता है। कार्ल मार्क के पितामह एक ऐसे ही कट्टर रेबाई थे। कार्ल की मां हेनरीटा भी एक रेबाई की बेटी थी।

कार्ल मार्क्स के पिता हर्शेल-हा-लेवी मार्क्स, प्रथा में यहूदियों पर लगाए गए प्रतिबंध के कारण अपनी प्राणरक्षा के लिए ईसाई हो गए थे। यही नहीं अपने को विश्वसनीय साबित करने के लिए उन्होंने बेटे का ईसाई पद्धति के अनुसार ‘बापतिस्मा’ भी करवाया था, इसके बाद उसे जंसुइट पाठशाला में डाल दिया। यह कहना मुश्किल है कि जिंदगी के शुरू के वर्षों में मार्क्स को कैसा लगा होगा उसकी मां हेनरीटा कभी-कभी कार्ल की जिद पर ओ-तोहरा की कुछ पंक्तियां दोहरा दिया करती थीं। मार्क्स जिंदगी की विडंबना के बारे में सोचिए उसे अपनी मातृभूमि से दूर ही नहीं होना पड़ा उसे अपनी मातृभाषा से भी वंचित रखा गया। कवि मार्क्स, पत्रकार मार्क्स और नैतिक सदाचारी मार्क्स, यानी ऐस्केटालाजिकल मार्क्स अर्थात युगांत विज्ञानी की भाषा बोलने वाला मार्क्स, मनुष्य की पीड़ित दुर्दशा से पगलाया पहला युग दृष्टा मार्क्स, इसी कार्ल मार्क्स को सन 1851 में संयोग से एक पुराना समाजवादी मित्र मिल गया-नाम था राबर्ट ओवेन जिसे न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून में ताजी-ताजी नौकरी मिली थी, उसने मार्क्स से हर सप्ताह दो लेख लिखने के लिए कहा।

मार्क्स ने ट्रिब्यून में लगभग दस वर्षों तक एक पाउंड प्रति लेख के हिसाब से कोई पांच सौ लेख लिखे इन्हीं लेखों में एक में कार्ल मार्क्स ने लिखा धर्म एक मायामय या भ्रामक सूर्य है जिसके आसपास चक्कर लगाते हुए आदमी स्वयं एक दिन अपनी ही चक्कर लगाने लग जाता है। यहूदियों का पूंजी प्रेम जगजाहिर है। वे धार्मिक तो कहने के लिए हैं, उनके प्राण पूंजी में बसते हैं। यहूदियों से दूर मातृभाषा से वंचित मार्क्स के केंद्रीय पीड़ा जाहिर है। पूंजी न होती तो क्या होती। लेकिन ढेर-ढेर दुखों से तार-तार कार्ल मार्क्स ने दुनिया को जो दर्शन दिया उसे आज की तारीख में दुनिया के हर देश में न केवल पढ़ा जाता रहा है उसका अंतर्पाठ भी हो रहा है, जिसकी परिणति हुई है एक नए दर्शन में जिसे हरा पूंजीवाद संज्ञा से अबिहित किया जा रहा है।

हरा पूंजीवाद, पूंजीवाद या महापूंजीवाद से इतना घबरा गया है कि डेविन लियोनार्ड ने ग्रीन गॉन रौंग नाम से एक पुस्तक ही लिख डाली है। हरा पूंजीवाद खो गई हरीतिमा को वापस लाने के लिए हर तरह की वनस्पति को बचाने उसे पुनर्जीवित करने के लिए लोगों से प्रार्थना कर रहा है, उसे समझ में आ रहा है कि चिड़ियां गाना क्यों भूल गई हैं। कनाडा और मैक्सिको के बीच जो तितलियां हर वर्ष यात्रा किया करती थीं कहां भटक गई सेलफोन की तरंगों से कौन-कौन आहत हो रहा है। मधुमक्खियां क्यों पगलाई हुई हैं। फूलों पर न जाकर, दीवारों से टक्कर मार रही है।

पृथ्वी इस कदर घायल हो चुकी है कि उसकी मरहम-पट्टी करने में लगभग सौ से लेकर एक हजार अरब डॉलर का खर्च आएगा। ‘ग्रीन बीन्स’ नामक एक आंदोलन उठ खड़ा हुआ है जो कहता है झरे हुए पत्तों को जलाओ नहीं, पानी नीला सोना है उसे बचाओ, पूरा पृथ्वी के पानी को अगर एक गैलन मान लिया जाए तो पीने योग्य पानी एक चम्मच भर बचा है उसकी इज्जत करो, वार्टर हार्वेस्टिंग करो, पैदल चलो, साइकिल पर चलो। कार को नफरत की निगाहों से देखो, हर पुस्तक एक पेड़ की लाश है उसका आकार कम करो। इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशनों को प्रोत्साहित करो, विचारधारा, या कि धर्म से पल्ला छुड़ाओ, आकाश की ओर देखो जिसके लिए हर जीवधारी समान है वहां न कोई यहूदी है, न हिंदू न मुसलमान, कठमुल्लापन छोड़ों।

बड़े बांध मत बनाओ नदियों को हक दो कि वह खुलकर बहें। मछलियों और पक्षियों को मारो नहीं, मांसाहार छोड़ो फैशन शो प्राणघाती है। मांओ को कहो कि वे लोरियां गाएं सूर्य ऊर्जा की खान है सुबह उठकर उसके सामने हाथ जोड़ो उसे धन्यवाद दो कि उसकी वजह से हम हैं। अपने से कमजोरों को सताओ नहीं सहारा दो कि वे भी गर्व से शीश उठाकर चल सकें। कम से कम संतति को पृथ्वी पर लाओ, धरती की क्षमताओं का भी ख्याल करो। दुनिया के कई बड़े उद्योग संस्थान इस आंदोलन के उद्देश्य की पूर्ति करने के लिए अनुदान दे रहे हैं, हरा पूंजीवाद धीरे-धीरे दुनिया के सभी देशों में फैलता जा रहा है।

(लेखक वरिष्ठ कवि हैं।)