बैगाओं की बेंवर खेती से मिलता है संतुलित भोजन

Author:बाबा मायाराम
बेंवर खेती जैविक, हवा और पानी के अनुकूल और मिश्रित है। यह सुरक्षित खेती भी है कि चूंकि इसमें मिश्रित खेती होती है अगर एक फसल मार खा गई तो दूसरी से इसकी पूर्ति हो जाती है। इसमें कीट प्रकोप का खतरा भी नहीं रहता। इसमें रासायनिक खाद की जरूरत नहीं होती। यह खेती संयुक्त परिवार की तरह है। एक फसल दूसरी की प्रतिस्पर्धी नहीं है बल्कि उनमें सहकार है। एक से दूसरी को मदद मिलती है। मक्के के बड़े पौधे कुलथी को हवा से गिरने से बचाते हैं।मध्य प्रदेश के डिण्डौरी जिले के बैगा आदिवासी पीढ़ियों से बेंवर खेती करते आ रहे हैं। घने जंगलों के बीच बसे और आदिम जनजाति में शुमार बैगाओं की अनोखी बेंवर खेती उनकी पहचान है। इससे उन्हें दाल, चावल, रोटी, हरी सब्जियां और फल मिलते हैं। कड़ी मेहनत करने वाले बैगाओं को पौष्टिक संतुलित भोजन मिलता है। हालांकि बेंवर पर रोक और बाजार के प्रभाव में बैगा एकल फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन बीज विरासत अभियान बैगाओं को बेंवर को प्रोत्साहित कर रहा हैं।

बैगाओं के तीज-त्यौहार खेती पर आधारित हैं। जब खेती ठीक से नहीं होती तो वे त्यौहार भी ठीक से नहीं मना पाते। बीज विरासत अभियान के प्रमुख नरेश विश्वास कहते हैं कि अगर बैगाओं की फसल नहीं होती तो वे त्यौहार व नाचा भी नहीं करते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से बेंवर व मिश्रित खेती ने उनकी जीवन में बदलाव आ गया है। उनके पास खुद के बीज और खुद का अनाज होने लगा है।

बेंवर खेती बिना जुताई की होती है। इसका कारण एक तो यह मान्यता है कि धरती पर हल चलाने से धरती को पीड़ा होगी। वे इसे अपराध भी मानते हैं। दूसरा कारण हल चलाने से भूक्षरण होता है।

कांदाबानी गांव के गोठिया बताते हैं कि गर्मी शुरू होने पर हम खेत में पेड़ों की छोटी-छोटी टहनियों, पत्ते, घास और छोटी झाड़ियों को एकत्र कर बिछा देते हैं। फिर उनमें आग लगा दी जाती है। इसी राख की पतली परत पर बीजों को बिखेर दिया जाता है जब बारिश होती है तो पौधे उग आते हैं। जैसे-जैसे फसलें पक कर तैयार हो जाती हैं, काटते जाते हैं।

कोदो, कुटकी, ज्वार,सलहार (बाजरा) मक्का, सांवा, कांग, कुरथी, राहर, उड़द, कुरेली, बरबटी, तिली जैसे अनाज बेंवर खेती में बोए जाते हैं। लौकी, कुमड़ा, खीरा आदि को भी बोया जाता है। कुल मिलाकर, 16 प्रकार के अनाज को बैगा बोते हैं। इन 16 अनाजों की 56 किस्में हैं।

बैगा आदिवासियों की बेंवर खेतीएक जगह पर एक वर्ष में खेती की जाती है। अगले साल दूसरी जगह पर खेती होती है। इस खेती को स्थानांतरित खेती (शिफिंटग कल्टीवेशन) कहते हैं। हालांकि इस खेती पर प्रतिबंध लगा हुआ है। लेकिन मध्य प्रदेश के बैगाचक इलाके में यह प्रचलन में है। लोग अपने ही खेतों में बेंवर करते हैं। इसका संशोधित रूप मिश्रित खेती को अपना रहे हैं।

बेंवर खेती के प्रचार-प्रसार लगे नरेश विश्वास कहते हैं कि कुछ वर्ष पहले हमने जब यह अभियान शुरू किया था तब लोगोें के पास बेंवर के बीज ही खत्म हो गए थे। हमने बीजों के आदान-प्रदान का काम किया जिससे अब बैगा आदिवासियों के बीज उपलब्ध हैं और वे बेंवर खेती कर रहे हैं।

विश्वास कहते हैं कि बेंवर में अधिकांश लोग केवल कुटकी करते थे। उनके पास सलहार नहीं था, बैगा राहर नहीं थी। हमने इसकी तलाश की और फिर बीजों की अदला-बदली की। छत्तीसगढ़ के पहाड़ी कोरवा आदिवासी भी यहां से मड़िया का बीज लेकर गए। कुछ जगह हमने समतल जमीन में भी जुताई से मिश्रित खेती करवाने का प्रयास कर रहे हैं।

यह खेती जैविक, हवा और पानी के अनुकूल और मिश्रित है। यह सुरक्षित खेती भी है कि चूंकि इसमें मिश्रित खेती होती है अगर एक फसल मार खा गई तो दूसरी से इसकी पूर्ति हो जाती है। इसमें कीट प्रकोप का खतरा भी नहीं रहता। इसमें रासायनिक खाद की जरूरत नहीं होती।

बैगा आदिवासियों की बेंवर खेतीयह खेती संयुक्त परिवार की तरह है। एक फसल दूसरी की प्रतिस्पर्धी नहीं है बल्कि उनमें सहकार है। एक से दूसरी को मदद मिलती है। मक्के के बड़े पौधे कुलथी को हवा से गिरने से बचाते हैं। फल्लीवाले पौधों के पत्तों में नाइट्रोजन मिलती है। ये पौधे अपनी जड़ों के जरिए भूमि से अलग-अलग गहरे से पोषक तत्व लेते हैं। इससे उर्वर शक्ति अधिक होती है।

.इन अनाजों में शरीर के लिए जरूरी सभी पोषक तत्व होते हैं। रेशे, लौह तत्व, कैल्शियम, विटामिन, प्रोटीन व अन्य खनिज तत्व मौजूद हैं। चावल व गेहूं के मुकाबले इनमें पौष्टिकता अधिक होती है।

इससे दाल, चावल, पेज (सूप की तरह पेय), दाल, सब्जी सब कुछ मिलता है। खाद्य सुरक्षा के साथ पोषण सुरक्षा होती है। मवेशियों को चारा मिलता है।

चपवार गांव की भागवती कहती है कि वह बेंवर खेती में महिलाएं बहुत काम करती हैं। बीजों का रखरखाव, निंदाई, गुड़ाई, कटाई और रखवाली सभी में महिलाएं मदद करती हैं। इसके साथ घर का काम भी करती हैं।

मौसमी बदलाव के कारण जो समस्याएं और चुनौतियाँ आएंगी, उनसे निपटने में भी यह खेती कारगर है। कम बारिश, ज्यादा गर्मी, पानी की कमी और कुपोषण बढ़ने जैसी स्थिति में बेंवर खेती सबसे उपयुक्त है। इस खेती पर किताब लिखने वाले नरेश विश्वास का कहना है कि सूखा अकाल में भी बैगाओं के पास कोई न कोई फसल होती है। उनकी खेती बहुत समृद्ध रही है।

इस खेती में मौसमी उतार-चढ़ाव व पारिस्थितिकी हालत को झेलने की क्षमता होती है। इस प्रकार सभी दृष्टियों, खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, जैव विविधता और मौसम बदलाव में उपयोगी और स्वावलंबी है।