बाँध से बेसहारा होने का भय

Author:रमेश कुमार ‘रिपु’
Source:यथावत 1-15 सितम्बर 2015

पोलावरम बाँध को लेकर बस्तर में विरोध का माहौल है। इसके पीछे वजह निकटवर्ती कई गाँवों के अस्तित्व पर मँडरा रहा संकट हैं। इस परियोजना की जद में अबूझमाड़ और उससे लगे हुए अन्य वन्य भी आ रहे हैं। यह वन क्षेत्र विश्व में अपनी जैवविविधता के लिये जाना जाता है। परियोजना की वजह से इसके नष्ट होने की सम्भावना है। समय रहते यदि सरकार ने इस पोलावरम प्रोजेक्ट से होने वाले नफे और नुकसान की ओर ध्यान नहीं दिया तो माओवादियों के गुस्से का निशाना भी इस प्रोजेक्ट की सफलता में रोड़ बन सकता है।

पोलावरम बाँध संकट का कारण बन गया है। दोरला जनजाति और छत्तीसगढ़ के कई गाँवों में इसे लेकर भय का माहौल बना हुआ है। तत्कालीन अजीत जोगी सरकार ने पोलावरम बाँध का विरोध किया था। लेकिन मौजूदा सरकार ने इसे हरी झण्डी दिखा दी है।

इस परियोजना से छत्तीसगढ़ की करीब 800 हेक्टेयर भूमि डूब जाएगी। इसके अलावा एर्राबोर व कोंटा के बीच पड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग का 13 किमी हिस्सा भी बारिश में डूबने का अन्देशा है। इससे बरसात में बस्तर को सीमान्ध्र से जोड़ने वाली एकमात्र सड़क सम्पर्क भी टूट जाएगा। यही नहीं परियोजना से बैक स्ट्रोक का पानी बढ़ने की सम्भावना है। इससे कोंटा तहसील के करीब डेढ़ दर्जन गाँव डूबने की संकट में पड़ जाएँगे।

साथ ही सात हजार हेक्टेयर खेतीहर ज़मीन को भी नुकसान होगा। इस बाँध की वजह से जो गाँव प्रभावित हो रहे हैं, उन्हीं गाँवों में दोरला जनजाति के लोग रहते हैं। ऐसे में पूरी जनजाति के समाप्त होने का खतरा मँडरा रहा है। सबरी व सिलेरू नदियों में पोलावरम बाँध के बैक वॉटर से बस्तर के सुकमा व ओडिशा के मलकानगिरी जिले की करीब 15 हजार हेक्टेयर वन एवं राजस्व भूमि डूब जाएगी।

दोनों जिलों के 45 से अधिक गाँवों के करीब 50 हजार आबादी को विस्थापन की मार झेलनी पड़ेगी। इतने नुकसान के एवज में प्रदेश को न बिजली मिलेगी न पानी। असल में केन्द्र सरकार ने इंचमपल्ली एवं पोलावरम अन्तरराज्यीय परियोजना के जरिए देश की छह नदियों को जोड़ने का निर्णय लिया है। इसके चलते इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जा रहा है।

यह खासा दिलचस्प है कि प्रोजेक्ट के खतरे से निपटने के लिये सरकार ने अभी तक कोई ठोस योजना नहीं बनाई है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का कहना है कि पोलावरम परियोजना से छत्तीसगढ़ राज्य को होने वाले नुकसान और तबाही को देखते हुए सभी वर्गों को इसका विरोध करना चाहिए। उनके मुताबिक इस परियोजना में दर्जनों आदिवासी गाँव आ रहे हैं। उनमें विकासखण्ड मुख्यालय कोंटा के अतिरिक्त हिर्राबोर, भज्जी, इंगरम जैसे महत्त्वपूर्ण गाँव पूरी तरह से जलमग्न हो जाएँगे। इसी इलाके के भूगर्भ में बहुमूल्य खनिज जैसे ग्रेनाइट, क्वार्टज, कोंडरम और लौह अयस्क भी सदा के लिये बाँध के नीचे दब जाएँगे। सबरी और उसकी सहायक नदियों में लगभग वर्ष भर पानी भरा रहता है और बाँध बन जाने के बाद जो बैक वाटर है, उससे दोरनापाल तक के इलाके जलमग्न हो जाएँगे। जोगी ने कहा कि यदि प्रदेश सरकार परियोजना का विरोध नहीं करती तो छत्तीसगढ़ की जनता को जन आन्दोलन के लिये तैयार रहना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में ओडिशा राज्य की तरह इस योजना का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए।

कवासी लखमा ने पोलावरम बाँध को लेकर सदन में सवाल भी उठाया। इस पर जल संसाधन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा सर्वे का काम जारी है। बाँध का काम आन्ध्र सरकार कर रही है। इसलिये इसकी पूरी जानकारी वहाँ से मँगाई जा रही है। उन्होंने आगे कहा कि पोलावरम एक राष्ट्रीय महत्त्व की परियोजना है और इस मामले में राष्ट्रीय हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसे लेकर छत्तीसगढ़ सरकार प्रदेश का भी अहित नहीं होने देगी।

ब्रृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि केन्द्र सरकार से पोलावरम के मामले में परामर्श लिया जाएगा और केन्द्रीय जल आयोग से भी चर्चा की जाएगी। छत्तीसगढ़ सरकार ने पोलावरम परियोजना से सुकमा जिले को होने वाले नुकसान का आकलन करने के लिये सर्वेक्षण कराने का फैसला लिया है। कवासी लखमा ने कहा कि पोलावरम बाँध को लेकर बस्तर में विरोध का माहौल है। इसके पीछे वजह निकटवर्ती कई गाँवों के अस्तित्व पर मँडरा रहा संकट हैं।

इस परियोजना की जद में अबूझमाड़ और उससे लगे हुए अन्य वन्य भी आ रहे हैं। यह वन क्षेत्र विश्व में अपनी जैवविविधता के लिये जाना जाता है। परियोजना की वजह से इसके नष्ट होने की सम्भावना है। समय रहते यदि सरकार ने इस पोलावरम प्रोजेक्ट से होने वाले नफे और नुकसान की ओर ध्यान नहीं दिया तो माओवादियों के गुस्से का निशाना भी इस प्रोजेक्ट की सफलता में रोड़ बन सकता है।

एक नजर पोलावरम प्रोजेक्ट पर


परियोजना का नाम- इंचमपल्ली बहुउद्देशीय परियोजना।
उद्देश्य- सिंचाई, विद्युत उत्पादन, पेयजल आपूर्ति, कृष्णा कछार में जल व्यपवर्तन।
जलग्रहण- 269000 वर्ग किमी,
जल भराव- 112.77 मीटर कुल
विद्युत उत्पादन- 975 मेगावाट।
अनुमानित लागत- 1900 करोड़ है।

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