बारिश से नहीं बुझ रही धरती की प्यास

Source:दैनिक जागरण, 12 जून, 2018

हमारा दून किस भविष्य की तरफ बढ़ रहा है। एक ओर पानी के लिये भूजल पर हमारी निर्भरता 90 फीसद तक बढ़ गई है और दूसरी तरफ हम भूगर्भ के भण्डार के पुनर्भरण की तरफ भी ध्यान नहीं दे रहे। भवनों में वर्षा जल संग्रहण के लिये छत पर टैंक निर्माण की बात तो दूर सिस्टम की अनदेखी ने प्राकृतिक रूप से वर्षा जल रिचार्ज की राह भी बाधित कर दी है। एमडीडीए के ट्रांसपोर्ट प्लानर जगमोहन सिंह के ताजा शोध पर गौर करें तो अनियोजित शहरी विकास के चलते दून की जमीन महज 15 फीसद वर्षाजल ही सोख पा रही है।

शोध के अनुसार राज्य गठन से पहले जब दून के 20 फीसद हिस्से पर शहरीकरण था, तब 42 फीसद तक बारिश का पानी जमीन में समा जाता था। राज्य गठन के कुछ समय बाद तक 50 फीसद हिस्से पर शहरीकरण में भी 35 फीसद तक वर्षाजल भूगर्भ में समा जाता था। आज शहरीकरण ने 75 फीसद भूभाग को अपनी चपेट में ले लिया है और अब महज 15 फीसद ही वर्षा जल वापस धरती के गर्भ में समा रहा है।

शहरीकरण से अधिक अनियोजित विकास घातक

शहरीकरण में कोई बुराई नहीं, दिक्कत सिर्फ इस बात की है कि दून अनियोजित विकास की भेंट चढ़ गया है। बिना ले-आउट पास कराये किये भवन निर्माण के चलते मानक के अनुरूप ग्रीन बेल्ट दून के हिस्से नहीं आ पाई। शहर के भीतर जहाँ सड़कों का निर्माण भी किया गया है, वहाँ किनारों पर तक खाली जगह नहीं छोड़ी गई है, जिससे वर्षा जल के प्राकृतिक रिचार्ज में भी दिक्कत आ रही है।

आखिर कब तक रहेंगे मानसून के भरोसे

मानसून सीजन में भूमिगत जल में 1.26 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) जल रिचार्ज हो पाता है। जबकि अन्य स्रोतों से हम सिर्फ 0.24 बीसीएम जल का ही रिचार्ज कर पाते हैं। इसके बाद भी भूजल को रीचार्ज करने की दिशा में कदम न बढ़ाना हमारे भविष्य को लगातार गम्भीर संकट की तरफ धकेल रहा है। क्योंकि पेयजल के साथ ही सिंचाई के लिये भी भूजल पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। केन्द्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार यदि हालात ऐसे ही रहे तो वर्ष 2025 तक सिंचाई के लिये वर्तमान में 1.01 बीसीएम जल की जगह 0.98 बीसीएम जल ही रह जाएगा। क्योंकि घरेलू व व्यावसायिक माँग में भी तेजी से इजाफा हो रहा है। ऐसे में बारिश के पानी की बूँद-बूँद सहेजने के इंतजाम अभी से करने की जरूरत है।

समस्या
1. अनियोजित निर्माण से मानसून में भी ठीक से नहीं भर पा रहा धरती का गर्भ।
2. राज्य गठन के कुछ समय बाद तक 50 फीसद तक समा जाता था जल।

 

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