बदलते परिवेश में जल संसाधन प्रबन्धन

Author:इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)
Source:इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)
पाँचवी राष्ट्रीय जल संगोष्ठी - 2015
दिनांक: 19-20 नवम्बर 2015
स्थान : राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की
आयोजकः जलविज्ञान संस्थान (ISO-9001:2008) जलविज्ञान भवन रुड़की-247667 (उत्तराखण्ड)


परिचय


विश्व के अधिकांश देशों में जल से जुड़ी विभिन्न समस्याओं में निरन्तर वृद्धि हुई है जिससे नियोजन तथा प्रबन्धन का संकट बढ़ा है। आज जल संकट को लेकर पूरा विश्व समुदाय चिंतित और भयभीत है इसलिए इस समस्या के समाधान के लिए सभी स्तरों पर पूरी जिम्मेवारी तथा निष्ठा से समन्वित प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। नियोजन की समस्याएँ प्रायः असमान विकास, गुणवत्ता हृास तथा पर्यावरण के क्षय के कारण पैदा होती हैं। जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मन्त्रालय, भारत सरकार के दिशा-निर्देशों तथा राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान (रा.ज.सं.) रुड़की की राजभाषा कार्यान्वयन समिति की बैठक में लिए गए निर्णयानुसार रा.ज.सं. द्वारा वर्ष 1999 में तकनीकी एवं वैज्ञानिक प्रकृति के सरकारी कार्यों में राजभाषा हिन्दी के प्रगामी प्रयोग को सर्वोच्च प्राथमिकता एवं सम्मान देने के उद्देश्य से पहली राष्ट्रीय जल संगोष्ठी का आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न किया गया। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए, प्रत्येक चार वर्ष के अन्तराल में अर्थात वर्ष 2003, 2007 तथा 2011 में रा.ज.सं. द्वारा राष्ट्रीय संगोष्ठियों का सफल आयोजन किया गया। तद्नुसार इस वर्ष भी रा.ज.सं. 19-20 नवम्बर, 2015 को पाँचवीं राष्ट्रीय जल संगोष्ठी का आयोजन कर रहा है।

हाल ही के वर्षों में विश्व के अधिकांश देशों में जल से जुड़ी विभिन्न समस्याओं में निरन्तर वृद्धि हुई है जिससे नियोजन तथा प्रबन्धन का संकट बढ़ा है। आज जल संकट को लेकर पूरा विश्व समुदाय चिंतित और भयभीत है इसलिए इस समस्या के समाधान के लिए सभी स्तरों पर पूरी जिम्मेवारी तथा निष्ठा से समन्वित प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। नियोजन की समस्याएँ प्रायः असमान विकास, गुणवत्ता हृास तथा पर्यावरण के क्षय के कारण पैदा होती हैं। हमारे देश की जलविज्ञानीय समस्याएँ स्थान एवं समय के अनुसार परिवर्तनशील रही हैं। यह एक चौंकाने वाला सत्य है कि हमारे देश में वर्षा के मौसम में एक ओर बाढ़ की स्थिति होती है तो दूसरे क्षेत्रों में भयंकर सूखे की स्थिति रहती है। एक ही समय में कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि, कहीं जल ग्रसन समस्या तो कहीं जल प्रदूषण और मृदा अपरदन इत्यादि समस्याएँ देखने को मिलती हैं। ये समस्याएँ जल संसाधन नियोजकों के लिए एक बड़ी चुनौती हैं।

आज भारत में ही नहीं अपितु समूचे विश्व में जल संसाधनों के समुचित प्रबन्धन पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। बदलते परिवेश में जल संसाधन प्रबन्धन हमारे सामने आज एक चुनौती के रूप में विद्यमान है। अतः इसके हर पहलू पर विशेष ध्यान देकर ही हम जल से जुड़ी विभिन्न समस्याओं का हल ढूँढ सकते हैं। आज हमारे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, प्रबन्धकों तथा पर्यावरणविदों को एकजुट होकर इस दिशा में विशिष्ट कार्य करने की आवश्यकता है।

उद्देश्य एवं कार्यक्षेत्र


भारतवर्ष के दीर्घकालिक विकास के सन्दर्भ में बदलते परिवेश में जल संसाधन प्रबन्धन की भूमिका विषय पर गहन विचार-विमर्श करने तथा इनसे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर व्यापक चर्चा-परिचर्चा के बाद इनके बेहतर प्रबन्धन के लिए एक कारगर रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान (रा.ज.सं.) द्वारा रुड़की स्थित अपने मुख्यालय में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है।

यह संगोष्ठी जल की मात्रा, गुणवत्ता, माँग, उपयोगिता व आपूर्ति के लिए एक ऐसा प्रेरक मंच होगा जहाँ पर देश के दीर्घकालिक विकास के लिए जल संसाधन प्रबन्धन से जुड़े विभिन्न मदों पर चर्चा-परिचर्चा की जाएगी तथा उपयुक्त एवं बेहतर प्रबन्धन के लिए एक ठोस रणनीति तैयार की जाएगी। संगोष्ठी के दौरान निम्नलिखित विषयों पर शोध पत्र आमन्त्रित किए जाएंगे।

तकनीकी एवं वैज्ञानिक प्रकृति के सरकारी कार्यों में राजभाषा हिन्दी के प्रगामी प्रयोग को सर्वोच्च प्राथमिकता एवं स्थान देने के उद्देश्य से इस संगोष्ठी की समूची कार्यवाही राजभाषा हिन्दी में आयोजित की जाएगी।

संगोष्ठी के विषय


1. सतही जल निर्धारण एवं प्रबन्धन
2. भूजल निर्धारण एवं प्रबन्धन
3. बाढ़ एवं सूखा प्रबन्धन
4. जलवायु परिर्वतन
5. नदियों में अविरल एवं निर्मल धारा बनाए रखने के लिए उपाय
6. पर्यावरण एवं जल गुणवत्ता
7. जल संसाधनों के मूल्यांकन एवं प्रबन्धन के लिए जलविज्ञानीय निदर्श एवं निर्णय समर्थित तन्त्र (Decision Support System)
8. जल संसाधनों के विकास के लिए नवीनतम तकनीकें
9. नदियों को आपस में जोड़ना
10. पर्वतीय क्षेत्रों में जल प्रबन्धन
11. एकीकृत जल प्रबन्धन युक्ति
12. जलविभाजक प्रबन्धन
13. कृषि में जल बचत की तकनीकें
14. वर्षा जल संचयन एवं पुनः प्रयोग
15. जल संसाधन प्रबन्धन में जनभागीदारी

संगोष्ठी स्थल


संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 19-20 नवम्बर, 2015 को राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की के सभागार में किया जाएगा। 350 व्यक्तियों के बैठने की समुचित व्यवस्था वाला यह सभागार सभी अपेक्षित सुविधाओं तथा उपकरणों से सुसज्जित है।

महत्वपूर्ण तिथियाँ


1. शोध पत्र सारांश भेजने की अन्तिम तिथि: 01 जुलाई, 2015
2. पूर्ण तैयार शोध प्रपत्र भेजने की अन्तिम तिथि: 30 अगस्त, 2015

प्रतिभागिता


वे सभी वैज्ञानिक, इंजीनियर, पर्यावरणविद, प्रबन्धक, पारिस्थितिविद, नीति निर्धारक तथा अन्य सरकारी पदाधिकारी, शोधकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता तथा शिक्षाविद जो जल के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, इसमें प्रतिभाग कर सकते हैं। प्रतिभागिता हेतु सभी प्रतिभागियों को आने-जाने का खर्च स्वयं ही वहन करना होगा।

पंजीकरण


संगोष्ठी में पंजीकरण हेतु कोई शुल्क नहीं रखा गया है।

ठहरने की व्यवस्था


संगोष्ठी में सम्मिलित होने वाले प्रतिभागियों के ठहरने की व्यवस्था संस्थान के गेस्ट हाउस तथा आई.आई.टी, रुड़की के गेस्ट हाउस में निर्धारित दरों पर ‘‘पहले आओ-पहले पाओ‘‘ आधार पर की जाएगी। शेष प्रतिभागियों की व्यवस्था स्थानीय होटलों में की जाएगी। इस मद पर होने वाले खर्च को प्रतिभागियों द्वारा स्वयं वहन किया जाएगा।

सारांश आमन्त्रण


उपर्युक्त विषयों तथा संगोष्ठी के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले विषयों पर शोध पत्र आमन्त्रित किए जाते हैं। शोध पत्र का सारांश (300 शब्दों से अधिक न हो) दिनांक 01 जुलाई, 2015 तक प्रस्तुत किया जाना अपेक्षित है। सारांशों की कम्प्यूटर साॅफ्ट काॅपी (यूनिकोड फॉंट या क्रुतिदेव-10) भी भेजी जानी अपेक्षित है। पूर्ण तैयार शोध प्रपत्र में जिन कार्यों का वर्णन किया जाना है उनका उद्देश्य, परिणाम तथा निष्कर्ष सारांश में स्पष्ट रूप से दिया जाना चाहिए।

अपने सारांश की एक प्रति पंजीकरण फार्म के साथ निम्नलिखित पते पर दिनांक 01 जुलाई 2015 तक भेजने का कष्ट करें।

ई-मेल प्रस्तुति


jalsangosthi@gmail.com, 44.rama@gmail.com

डाक प्रस्तुति


डाॅ. रमा मेहता, संयोजक: पाँचवीं राष्ट्रीय जल संगोष्ठी - 2015
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, जलविज्ञान भवन, रुड़की-247667 (उत्तराखण्ड), टेलीफोन नं. 01332 - 249228, 249257, 249267

शोध पत्र आमन्त्रण


शोध पत्र में शीर्षक, लेखकों के नाम, पदनाम, पता, ई-मेल एवं फोन नं. का उल्लेख स्पष्ट रूप से किया जाए। शोध पत्र (अधिक से अधिक 7 पेज, सिंगल स्पेस) की दो प्रतियाँ ए-4 आकार के पेपर पर (यूनिकोड या क्रुतिदेव-10 फाँट में) ई-मेल एवं डाक द्वारा भेजी जानी अपेक्षित हैं।

शोध पत्र की कम्प्यूटर साॅफ्ट काॅपी यूनिकोड अथवा क्रुतिदेव-10 फॉंट में ही स्वीकार्य होगी।


शोध पत्रों का प्रकाशन


संगोष्ठी में प्रस्तुत शोध पत्रों को संयोजन समिति द्वारा एक प्रोसीडिंग/सी.डी. के रूप में संकलित किया जाएगा। यह प्रोसीडिंग/सी.डी. सभी प्रतिभागियों को संगोष्ठी के उद्घाटन दिवस पर पंजीकरण के समय उपलब्ध कराई जाएगी। जल संसाधन के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न संस्थानों/कार्यालयों को भी यह प्रोसीडिंग/सी.डी. उनके सुलभ सन्दर्भ हेतु उपलब्ध कराई जाएगी। संगोष्ठी के उपरांत समिति द्वारा चयनित उत्कृष्ट शोध पत्रों को राष्ट्रीय विज्ञान एवं संचार सूचना स्रोत संस्थान (सी.एस.आई.आर.) द्वारा प्रकाशित भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान जर्नल में प्रकाशित कराने का प्रयास किया जाएगा।

रुड़की नगर


रुड़की नगर उत्तराखंड राज्य के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हरिद्वार से 30 कि.मी. की दूरी पर मध्य समुद्र तल से 268 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। साफ मौसम के दौरान यहाँ से ऊँची-ऊँची हिमाच्छादित चोटियों का मनोहारी दृश्य देखा जा सकता है। यहाँ पर वार्षिक औसत वर्षा 1050 मिमी. होती है, जिसमें से अधिकांश वर्षा जून मध्य से सितम्बर मध्य के दौरान होती है। शीतकाल के दौरान मौसम सुहावना और ठण्डा (तापमान लगभग 50 डिग्री से.) रहता है। इस शहर को हरिद्वार, ऋषिकेश तथा देहरादून एवं मसूरी के पर्वतीय स्थलों में स्थित तीर्थ स्थानों का प्रवेश द्वार भी माना जाता है जो कि दिल्ली से लगभग 165 कि.मी. की सड़क दूरी पर स्थित है। यह शहर अमृतसर-हावड़ा/दिल्ली-देहरादून रेल मार्गों से भी जुड़ा है। अन्तर्राष्ट्रीय बस अड्डा, नई दिल्ली से यहां के लिए सुबह से मध्य रात्रि तक नियमित रूप से बस सेवाएँ (डीलक्स तथा साधारण) उपलब्ध हैं। नई दिल्ली और देहरादून के बीच एक पूर्ण वातानुकूलित रेलगाड़ी (शताब्दी एक्सप्रेस) तथा एक अन्य सुपर फास्ट ट्रेन (जन शताब्दी एक्सप्रेस) उपलब्ध है। ये दोनों गाड़ियाँ रुड़की स्टेशन पर रूकती हैं। रूड़की के लिए अजमेरी गेट टैक्सी स्टैण्ड (दिल्ली) से टैक्सियाँ भी उपलब्ध रहती हैं।

राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान


राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान भारत सरकार के जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मन्त्रालय के अधीन कार्यरत एक स्वायत्तशासी संस्था है जो पिछले 37 वर्षों से देश में जलविज्ञान तथा जल संसाधन के क्षेत्र में एक शीर्ष अनुसंधान संस्थान के रूप में कार्य कर रही है। आज संस्थान ने आधिकारिक, अनुप्रयुक्त तथा अन्य महत्वपूर्ण अनुसंधान सम्बन्धी उपलब्धियों के चलते राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट ख्याति प्राप्त की है। संस्थान का मुख्यालय रुड़की में स्थित है। देश की क्षेत्रीय जलविज्ञान सम्बन्धी विभिन्न समस्याओं के निराकरण हेतु इस संस्थान के छः क्षेत्रीय केन्द्र भी देश के अलग-अलग प्रांतों में कार्य कर रहे हैं।

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