बंगाल के भूजल में आर्सेनिक मानव इतिहास की गंभीरतम त्रासदी (Arsenic in Bengal groundwater gravest tragedy of human history)

Author:बृजेश बड़थ्वाल एवं साधना
Source:योजना, जून 2003
आर्सेनिकयुक्त जल का नियमित सेवन चर्मरोग, पेट के रोग और फेफड़ा एवं आंत, अमाशय के कैंसर का कारण बन सकता है। अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी ने सुरक्षित पेयजल में 50 पीपीबी आर्सेनिक की मात्रा नियत की थी। वर्ष 2001 में इसे पुनर्निर्धारित कर 10 पीपीबी किया गया। विडंबना यह है कि अनवरत शोध के बावजूद बंगाल डेल्टा में आर्सेनिक के उत्तरदायी कारणों पर वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं।सदियों से भारत सहित विश्व के सभी देशों में सिंचाई एवं पीने के लिए नदीय जल का उपयोग किया जाता रहा है। बीसवीं सदी में मानव विकास ने अभूतपूर्व भूमिका निभाई। लेकिन शहरीकरण एवं औद्योगीकरण का खामियाजा नदियों को भुगतना पड़ा। मल-मूत्र, घरेलू कचरे से लेकर औद्योगिक कचरा अंततः नदी में ही समाने लगा। दूषित पेयजल का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रदूषण के चलते अनेक नदीय प्राणी लुप्त होने के कगार तक पहुँच गए हैं। विकसित देशों ने तो सातवें दशक तक नदी प्रदूषण पर नियंत्रण करने में सफलता प्राप्त कर ली। लेकिन विकासशील देशों में स्थिति आज तक जस की तस बनी हुई है। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए आठवें दशक में तीन हजार करोड़ से अधिक लागत की महत्वाकांक्षी परियोजना आरंभ हुई। लेकिन प्रशासनिक लालफीताशाही और नागरिकों की उदासीनता से गंगा प्रदूषण में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। हरिद्वार के बाद पवित्र गंगा-जल को आज भी असुरक्षित पेयजल की श्रेणी में रखा गया है। इस वर्ष मौनी अमावस्या के अवसर पर साधु-संतों ने भी (संगम) इलाहाबाद में प्रदूषित गंगा में पवित्र स्नान का बहिष्कार किया। विदित हो कि इस अवसर पर बीसियों लाख श्रद्धालु गंगा तट पर स्नान करते हैं। नदियाँ सिंचाई, पेयजल और उद्योग की माँग पूरी करने में भी असमर्थ रही। भूजल सतही प्रदूषण से अपेक्षाकृत सुरक्षित है। अतएव देश की 70 प्रतिशत आबादी पेयजल के लिए भूजल पर ही निर्भर है।

पेंट, डाई, धातु, ड्रग, साबुन, अर्धचालक, कृषि, खनन एवं प्रगालक यानी स्मेलटर उद्योग, कीट एवं शाक-नाशकों में बहुधा आर्सेनिक का उपयोग होता है। केवल अमेरिका में ही काष्ठ संरक्षण उद्योग में 90 फीसदी औद्योगिक श्रेणी के आर्सेनिक का उपयोग होता है। अमेरिका के प्रत्येक राज्य का भूजल प्राकृतिक अथवा मानवजनित आर्सेनिक से प्रदूषित है। सामान्यतः आर्सेनिक प्रदूषण का मुख्य कारण मानवजनित कारक ही है। भू-पृष्ठ में आर्सेनिक की मात्रा दो भाग प्रति दस लाख यानी 2 पीपीएम है। उत्तरी गोलार्द्ध के वायुमंडल में भी आर्सेनिक की मात्रा भू-पृष्ठ की तुलना में अधिक है। ज्वालामुखी एवं वनीय अग्निकांड से आर्सेनिक वाष्प वायुमंडल में पहुँचती है। खनिज एवं अयस्क से अपरदन प्रक्रिया द्वारा आर्सेनिक घुलनशील अवस्था में भूजल में पहुँचता है। भू-गर्भीय कारणों से आर्सेनिक विषाक्तता का प्रकोप मैक्सिको, अर्जेंटाइना, चिली, ताइवान, मंगोलिया, चीन, जापान, भारत एवं बंग्लादेश में देखने को मिलता है।

आर्सेनिकयुक्त जल का नियमित सेवन चर्म रोग, पेट के रोग और फेफड़ा एवं आंत, अमाशय के कैंसर का कारण बन सकता है। अमेरिका पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी ने सुरक्षित पेयजल में 50 पीपीबी आर्सेनिक की मात्रा नियत की थी। वर्ष 2001 में इसे पुनर्निर्धारित कर 10 पीपीबी किया गया। एजेंसी के अनुसार पेयजल में आर्सेनिक नियंत्रित करने में 18.1 करोड़ डॉलर का व्यय होगा जबकि स्वतंत्र संस्था, अमेरिकन वाटरवर्क्स एसोसिएशन रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार 10 करोड़ डॉलर की आवश्यकता पड़ेगी। नवीनतम परीक्षणों के अनुसार 10 पीपीबी आर्सेनिकयुक्त जल का सेवन करने से भी जीवनकाल में कैंसर होने की संभावना प्रति हजार तीन से अधिक पाई गई जबकि पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी के मानदंडों के अनुसार स्वीकार्य कैंसर संभावना स्तर प्रति दस हजार की आबादी में मात्र एक है। अतएव पेयजल में आर्सेनिक के अधिकतम मान्य स्तर में और कमी करने की माँग की जा रही है।

हरित क्रांति को मूर्त्त रूप देने के लिए वर्ष 1965 में भारत सरकार और राज्य सरकारों ने महत्वाकांक्षी योजना आरंभ की। इसके अंतर्गत भूजल को सिंचाई एवं शुद्ध पेयजल के रूप में प्रस्तुत किया गया। पश्चिम बंगाल में लगभग 10 हजार करोड़ की लागत से हजारों नलकूप खोदे गए। 1976 में पहली बार एक निवासी की त्वचा में बदरंग का प्रभाव देखा गया। लेकिन बंगाल डेल्टा के भूजल में आर्सेनिक की उपस्थिति का सर्वप्रथम प्रमाण 1984 में ही प्रकाश में आया। कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में चर्म रोग के प्रोफेसर के.सी. साहा को एक रोगी का त्वचा में विचित्र बीमारी के लक्षण जान पड़े। प्रोफेसर साहा ने उसके नाखून, बाल और त्वचा का आर्सेनिक के लिए परीक्षण किया। इनमें आर्सेनिक की भारी मात्रा पाई गई। रोगी के गाँव के भूजल में भी आर्सेनिक की मात्रा अधिक मिली। तभी से वैज्ञानिकों ने इस दिशा में अन्वेषण आरंभ किया। पर्यावरण अध्ययन केंद्र जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता के डॉ. दीपंकर चक्रवर्ती एवं सामुदायिक अस्पताल, ढाका, बंगला देश के डॉ. काजी कुनारुजान ने इस विषय पर सराहनीय कार्य किया। लेकिन प्रदेश एवं केंद्र सरकर ने आर्सेनिक प्रदूषण को गंभीरता से नहीं लिया। उत्तरोत्तर अध्ययन से ज्ञात हुआ कि समूचा बंगाल डेल्टा आर्सेनिक प्रदूषण से प्रभावित है। अंततः वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों एवं मीडिया के दबाव से पश्चिम बंगाल और बंगलादेश सरकार ने आर्सेनिक विषाक्तता को गंभीर समस्या के रूप में स्वीकार किया।

आसवन यानी डिस्टिलेशन तकनीक पर आधारित फिल्टर द्वारा दोनों प्रकार के आर्सेनिक-आर्सेनाइट व आर्सेनेट को पृथक किया जा सकता है। निक्षेपण एवं अधिचूषण द्वारा आर्सेनिक के महीन कणों का स्कंदन, लाइम ट्रीटमेंट, आयन एक्सचेंज रेसिन, मेंब्रेन तकनीक एवं सूक्ष्मजीवी प्रक्रिया द्वारा ही संभव है।बंगाल की खाड़ी के मुहाने पर पहुँचने से पूर्व गंगा दो प्रमुख धाराओं—हुगली एवं पद्मा में बंट जाती है। ब्रह्मपुत्र एवं पूर्वी बंगलादेश की मेधना नदियाँ भी अंततः मद्मा नदी में मिलती हैं। पंद्रह लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले बंगाल डेल्टा की गणना विश्व की सबसे बड़े डेल्टा प्रदेश में होती है। गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेधना नदियों द्वारा निर्मित इस डेल्टा में प्रतिवर्ष नदियों द्वारा 2.4 बिलियन टन जलोढ़ लाया जाता है। जलोढ़ की गहराई 100 मीटर से 21 कि.मी. तक है। सामान्यतः प्रत्येक वर्ष मानसून की भारी वर्षा और बाढ़ से प्रभावित इस प्रदेश में नदी, नाले एवं उथले भूजल में प्राकृतिक प्रदूषण की संभावना नगण्य है। लेकिन व्यापक स्तर पर आर्सेनिक प्रदूषित भूजल ने वैज्ञानिकों को सोचने के लिए बाध्य कर दिया।

आर्सेनिक प्रदूषण मुख्यतः मिडिल होलोसीन काल यानी 10 से 7500 हजार वर्ष पूर्व निर्मित सामान्यतः 18 से 21 मीटर उथले जलभृत तक सीमित है। अपवाद स्वरूप घेटागाची क्षेत्र के 111 मीटर गहरे नलकूप में 970 पीपीबी आर्सेनिक पाया गया। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार सामान्यतः 150 मीटर से कम गहराई के उथले जलभृत में ही आर्सेनिक पाया जाता है। बंगलादेश के बीस लाख नलकूप आर्सेनिक प्रदूषण से प्रभावित हैं जबकि दो लाख से अधिक व्यक्तियों में आर्सेनिक विषाक्तता के लक्षण परिलक्षित हैं। एक अनुमान के अनुसार बंगलादेश में 2.1 करोड़ व्यक्ति आर्सेनिक विषाक्तता के प्रति संवेदनशील हैं जबकि पश्चिम बंगाल में प्रभावित व्यक्तियों की संख्या बीसियों लाख तक पहुँच गई है। वैज्ञानिकों, समाजसेवियों एवं संचार माध्यमों ने एकमत से इसे आधुनिक युग की गंभीरतम जानलेवा विषाक्तता की संज्ञा दी है।

सांद्रता


उष्णजलीय अयस्क एवं जैविक तत्वों से समृद्ध अवसादी चट्टानों यथा—कोयला, फास्फोराइट में आर्सेनिक तत्व का असामान्य सांद्रण संभव है। आर्सेनिक प्रधान पायराइट एवं कोयला इसके प्रमुख स्रोत हैं। आर्सेनिकप्रधान सल्फाइड (पायराइट), वायु एवं जल की उपस्थिति में सहजता से ऑक्सीकृत होकर घुलनशील फेरिक व फेरस लौह, आर्सेनाइट, आर्सेनेट और सल्फेट निर्मित करता है। अवसादी अथवा उष्णजलीय आर्सेनियन पायराइट में दस फीसदी तक आर्सेनिक पाया जाता है। जितना अधिक आर्सेनिक होगा, पायराइट के कण उतने ही सूक्ष्म और ऑक्सीकरण एवं घुलन की गति भी तेज होगी। लौह ऑक्सीकृत होकर हाइड्रस फेरिक ऑक्साइड निर्मित करता है जबकि आर्सेनिक ऑक्सीकरण पर फेरिक ऑक्साइड की सतह पर अधिचूषित होता है। कम pH होने पर हाइड्रेटेड फेरिक आर्सेनेट, (स्कोरोडाइट) निर्मित होता है जिससे घुलनशील आर्सेनिक की सांद्रता में कमी दर्ज होती है। अतएव ऑक्सीकरण क्रिया द्वारा आर्सेनिक अवश्य मुक्त होता है लेकिन अधिचूषण व अवक्षेपण क्रिया द्वारा इसकी मात्रा सीमित रह पाती हैं। फेरीहाइड्रेट में आर्सेनेट अधिचूषण का बंधन अधिक सुदृढ़ बनता है जबकि कम pH पर आर्सेनाइट कमजोर बंधन सिद्ध होता है।

जलोढ़ के निक्षेपण के साथ जैविक पदार्थ यथा-वनस्पति एवं जंतु भी निक्षेपित हुए जो कालांतर में पीट में रूपांतरित हुए। अतएव पीट में सूक्ष्मजीवी बैक्टीरिया की उपस्थिति बनी रहती है। विशिष्ट कोटि के बैक्टीरिया चट्टानों से आर्सेनिक मुक्त करने में सहायक सिद्ध होते हैं। ऐसे बीस से अधिक बैक्टीरिया की प्रजातियाँ निर्दिष्ट की जा चुकी हैं। जलभृत अवसाद की प्रकृति, स्थानीय रासायनिक परिवेश यानी पीएच एवं ईएच (pH-Eh) अवस्था और बैक्टीरिया की उपस्थिति आर्सेनिक अधिचूषण एवं भूजल में विचूषण प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाती है। आर्सेनिक के असमान वितरण का भी यही कारण प्रतीत होता है। जलभृत अवसाद क्षेत्र में वायु-जल इंटरफेस की उपस्थिति सूक्ष्मजीवियों की सक्रियता बढ़ाने में प्रभावी कारक है। अतएव उथले संरध्र अवसाद आर्सेनिक सांद्रता के उपयुक्त एवं अनुकूल क्षेत्र हैं। अत्यधिक भूजल दोहन से जल स्तर में गिरावट होती है जिससे सूक्ष्मजीवियों के प्रसार क्षेत्र में वृद्धि होती हैं। अंततः जलभृत अवसाद में आर्सेनिक अधिचूषण एवं भूजल में विचूषण की संभावना बढ़ जाती है। जलभृत में मृत्तिका की स्थूल परत आर्सेनिक प्रदूषण के रिसाव को नियंत्रित करने में सहायक है।

अत्यधिक भूजल दोहन से जल स्तर में गिरावट होती है जिससे सूक्ष्मजीवियों के प्रसार क्षेत्र में वृद्धि होती हैं। अंततः जलभृत अवसाद में आर्सेनिक अधिचूषण एवं भूजल में विचूषण की संभावना बढ़ जाती है। जलभृत में मृत्तिका की स्थूल परत आर्सेनिक प्रदूषण के रिसाव को नियंत्रित करने में सहायक है।विडंबना है कि अनवरत शोध के बावजूद बंगाल डेल्टा में आर्सेनिक के उत्तरदायी कारणों पर वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं। भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक एवं निवर्तमान जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता में ऐमरिटस प्रोफेसर शुभंकर कांति आचार्य भूजल के अधिकाधिक दोहन को व्यापक आर्सेनिक विषाक्तता का कारण मानते हैं। अधिक दोहन द्वारा जलभृत के अवसाद कणों में ऑक्सीकरण प्रक्रिया तेजी से होती है। जलोढ़ कणों में उपस्थित पायराइट और आर्सेनोपायराइट से आर्सेनिक मुक्त होकर भूजल में घुल जाता है। मृदा परतों से भी ऑक्सीकरण द्वारा आर्सेनिक मुक्त होता है। दूसरे मतानुसार ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में खनिज के फेरिक एवं हाइड्रोक्साइड आयन की मुक्त अवस्था द्वितीयक आयरन व अल्युमीनियम से विमुक्त आर्सेनिक की क्रियाशीलता में सहायक सिद्ध होती है। सरंध्र अवसाद द्वारा अर्सेनिक क्षारीय अवस्था में भूजल तक पहुँच पाता है। भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के ताराकांत पाल एंव अन्य ने पश्चिम बंगाल के 24 परगना जनपद के बारुइपुर क्षेत्र के भू-गर्भीय जलोढ़ का गहन अध्ययन किया। होलासीन काल में अवसाद का निक्षेपण शृंखलाबद्ध प्रक्रिया यानी पहले स्थूल कण यानी ग्रिट, बालू, सिल्ट और अंत में महीन मृत्तिका से हुआ। आर्सेनिक प्रायः सभी संस्तरों में मिला। मृत्तिका व पीट में आर्सेनिक सर्वाधिक क्रमशः 2-31 मिलीग्राम/कि.ग्रा. एवं 9-40 मिलीग्राम/कि.ग्रा. पाया गया जबकि सिल्ट व बालू कण में क्रमशः 2-6 मिलीग्राम/कि.ग्रा. एवं 1-7 मिलीग्राम/कि.ग्रा. मिलता है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से मृत्तिका एवं पीटयुक्त जलभृत क्षेत्र में आर्सेनिक की मात्रा 0.03 मिलीग्राम/कि.ग्रा. से भी कम पाई गई। यह परिणाम मैकार्थर की अवधारणा यानी 'पीट ही आर्सेनिक का स्रोत है'के विपरीत है।

बालू संस्तरों का भी व्यापक एवं गहन विश्लेषण करने पर चौंका देने वाले परिणाम सामने आए। आयरन ऑक्सी-हाइड्रोक्साइड एवं अवशेषी मेग्नेटाइड एवं इल्मेनाइटयुक्त परत में 14-112 मिलीग्राम/कि.ग्रा., इल्लाईट में 10-40 मिलीग्राम/कि.ग्रा., आयरन हाइड्रोक्साइड की सामान्य परत में 30 मिलीग्राम/कि.ग्रा., क्लोराइट में 5-31 मिलीग्राम/कि.ग्रा., बायोटाइट में 9 मिलीग्राम/कि.ग्रा. और सिडेराइट (लौह कार्बोनेट) में 7-9 मिलीग्राम/कि.ग्रा. आर्सेनिक पाया गया। अतएव बंगाल के मैदान में आर्सेनिक का मुख्य स्रोत परतदार बालूकण ही हैं। सिडेराइट के सूक्ष्मदर्शी अध्ययन में सूक्ष्मजीवी गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं। अतएव अमुक जलभृत स्थान में आर्सेनिक का बालू में अधिचूषण व अंततः भूजल में विचूषण प्रक्रिया में संभवतः जलभृत अवसाद में उपस्थित सूक्ष्मजीवियों की भी निर्णायक भूमिका रही। पीट के संस्तर सूक्ष्मजीवियों के लिए अनुकूल प्रवास हैं। अतएव जलोढ़ में पीट की उपस्थिति की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

एस.के. आचार्य के अनुसार बंगाल के डेल्टा प्रदेश में आर्सेनिक का मूल स्रोत हिमालय प्रदेश की आर्सेनिक बाहुल्य ज्वालामुखी एवं अन्य संबंधित चट्टानों को मानते हैं। लेकिन कुमार और फारुकी को उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा के मैदान में भूजल एवं नदीय जल और अवसाद के किसी भी नमूनों में आर्सेनिक की मात्रा स्वीकार्य सीमा 50 पीपीबी से अधिक प्राप्त नहीं हुई। किंचित अपवादों को छोड़ दें तो आर्सेनिक प्रदूषण गंगा नदी के दाएं तट यानी हुगली आदि क्षेत्र में अनुपस्थित है। यह तथ्य वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बन गया है। भट्टाचार्य झारखंड के छोटानागपुर व राजमहल की ज्वालामुखी चट्टानों को बंगाल की गंगा द्रोणी में असामान्य आर्सेनिक सांद्रता का स्रोत मानते हैं। बंगाल डेल्टा के आर्सेनिक का प्राथमिक स्रोत हिमालय नहीं अपितु छोटानागपुर-राजमहल की अम्लीय ज्वालमुखी चट्टानों एवं मेघालय-असम की ग्रेनाइट में संभव है। आर्सेनिक संबंधित बैक्टीरिया का प्रिय आवास डेल्टा क्षेत्र की पीट है। अतएव समूचे आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र में पीट के संस्तरों को अभिनिर्धारित किया जाना चाहिए। यद्यपि कुछ वैज्ञानिक इस समस्या को मानवजनित मानते हैं। उनके अनुसार बंगाल डेल्टा में अधिक जनसंख्या घनत्व, पर्यावरण एवं इंजीनियरिंग प्रैक्टिस का असंतुलन इस मानव इतिहास की गंभीरतम त्रासदी के लिए उत्तरदायी है। इस विषय में गहन शोध एवं अध्ययन की आवश्यकता है।

हाल में छत्तीसगढ़ राज्य के कौरिकशा क्षेत्र में आर्सेनिक प्रदूषण के कुछ मामले प्रकाश में आए। प्रभावित क्षेत्रों के मृदा नमूनों में आर्सेनिक की मात्रा 800 पीपीएम तक पाई गई। जाँच से ज्ञात हुआ कि प्रभावित क्षेत्र रिफ्ट भ्रंश के इर्द-गिर्द ही स्थित हैं। रिफ्ट भ्रंश भू-गर्भ में स्थित गहरी दरारें हैं जिनका प्रसार व्यापक है। (भ्रंश क्षेत्र सामान्यतः भूमिवर्तनिकी गतिविधियों के प्रति संवेदनशील माने जाते हैं) निकटवर्ती डोंगरगढ़ में स्थित आग्नेय चट्टानें यथा-ग्रेनाइट रायोलाइट क्वार्टज शिराएँ आर्सेनिक का मूल स्रोत हैं। उष्णजलीय क्रियाओं द्वारा इन चट्टानों से आर्सेनिक सांद्रण सामान्य भू-वैज्ञानिक घटना है। चट्टानों के अपक्षयण एवं अपरदन द्वारा आर्सेनिक, लौह-मैगनीज ऑक्सीहाइड्रोक्साइड अवस्था में मुक्त होकर रिफ्ट भ्रंश क्षेत्र के भूजल में पहुँच सका। लेकिन क्षेत्र की मुख्य नदी, सिओनाथ में आर्सेनिक की मात्रा केवल 10 पीपीबी पाई गई जो भारत में सामान्य ही मानी जाती है। अन्य मुख्य नाले भी आर्सेनिक से मुक्त पाए गए। अतएव एकाध स्थानों को छोड़कर संपूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य में आर्सेनिक प्रदूषण का कोई खतरा नहीं है। प्रभावित क्षेत्रों में आर्सेनिक मुक्त जलभृत अभिनिर्धारित किए जा सकते हैं। पेयजल की आपूर्ति स्थलीय जल से की जा सकती है।

निदान


भूजल में आर्सेनिक सामान्यतः तीन संयोजकता के आर्सेनाइट एवं पाँच संयोजकता के आर्सेनेट के रूप में मौजूद रहता है। पेयजल शुद्धीकरण प्रक्रिया, क्लोरोनीकरण के दौरान आर्सेनाइट, आर्सेनेट में परिवर्तित होता है। अमेरिका की समाजसेवी संस्था 'नेशनल सेनिटेशन फेडरेशन'की शेरिल लुप्टोवॉस्की के अनुसार आमतौर पर प्रयुक्त व्यावसायिक फिल्टर द्वारा आर्सेनिक पर नियंत्रण किया जा सकता है। आसवन यानी डिस्टिलेशन तकनीक पर आधारित फिल्टर द्वारा दोनों प्रकार के आर्सेनिक-आर्सेनाइट व आर्सेनेट को पृथक किया जा सकता है। निक्षेपण एवं अधिचूषण द्वारा आर्सेनिक के महीन कणों का स्कंदन, लाइम ट्रीटमेंट, आयन एक्सचेंज रेसिन, मेंब्रेन तकनीक एवं सूक्ष्मजीवी प्रक्रिया द्वारा ही संभव है। बंगाल डेल्टा प्रदेश में भूजल को फिटकरी स्कंदन द्वारा पीने योग्य जल में परिवर्तित करना सर्वाधिक प्रचलित है। अधिक प्रदूषित क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल पहुँचाने के लिए अन्यत्र स्थानों से पाइप लाइन द्वारा स्थलीय अथवा भूजल उपलब्ध कराना ही एकमात्र विकल्प है। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.एन. कृपाल की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय संविधानपीठ ने 1 नवंबर, 2002 को जारी ऐतिहासिक अंतरिम आदेश में केंद्र को 2012 तक सभी नदियों का नेटवर्क बनाने की समय-सीमा निर्धारित की है। पश्चिम बंगाल में इस योजना को व्यापक स्तर पर कार्यान्वित करना संभव है। नहरों का नेटवर्क बनने से पेयजल के लिए भूजल पर निर्भरता स्वतः कम हो जाएगी। अतएव आर्सेनिक समस्या पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। बंगलादेश में भी प्रत्येक वर्ष बाढ़ से जान-माल की व्यापक क्षति पहुँचती है। वहाँ भी नदियों का सघन नेटवर्क बनाने की नितांत आवश्यकता है ताकि भूजल पर निर्भरता न्यूनतम रहे।

(लेखकद्वय प्रोजेक्ट हिमालय भूविज्ञान, भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण, उत्तरी क्षेत्र, अलीगंज, लखनऊ में कार्यरत भू-वैज्ञानिक हैं)