बुंदेलखंड: पलायन से उपजते प्रश्न

Author:लालसिंह गौर
Source:सर्वोदय प्रेस सर्विस, जुलाई 2011

बुंदेलखंड में पलायन अब व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामुदायिक कार्य हो गया है। पूरे के पूरे गांव पलायन को मजबूर हैं और सरकारें बुंदेलखंड पैकेज की दुहाई देकर स्थितियों के सामान्य होने की बात दोहरा रही हैं। भारत शायद 9 प्रतिशत की वृद्धि दर से इसीलिए विकास कर पा रहा है क्योंकि इस प्रक्रिया में उसे अपने ही एक अंग बुंदेलखंड के शोषण में कोई शर्म महसूस नहीं हो रही है।

देश और संसार में विभिन्न परिस्थितियों में पलायन होते रहे हैं। इसके पीछे स्वयं का आर्थिक विकास तथा और भी कई कारण रहे हैं। लेकिन पिछले करीब 6-7 वर्षों के दरम्यान बुंदेलखंड से जिस पैमाने में जनसमुदाय का पलायन हुआ वैसा दृश्य पूर्व में कहीं भी नजर नहीं आया। बुंदेलखंड के गांवों में पलायन का अनुपात कहीं तो 70-80 प्रतिशत तक है तथा कई आदिवासी क्षेत्रों में इसे 100 प्रतिशत कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि वहां वे बूढ़े व्यक्ति जो काम करने लायक या जाने लायक नहीं हैं, गांव में बचे हैं तथा बाकी का पूरा गांव पलायन कर चुका है।यहां पलायन होने का एक बड़ा कारण प्रकृति के प्रकोप यानि अवर्षा को माना जा सकता है। कृषि आम जनता के जीवननिर्वाह का बड़ा साधन है। यहां कृषि वर्षा पर निर्भर करती है। अवर्षा की स्थिति में ये कृषक एवं कृषि पर निर्भर मजदूर सभी को अपना जीवनयापन करने हेतु नए आश्रय की खोज में देश के अन्य भागों में जाना पड़ा। दूसरा कारण देश की प्रशासनिक अव्यवस्था। इसके माध्यम से देश के मात्र 15 प्रतिशत लोगों द्वारा 85 प्रतिशत जनता का शोषण किया गया है। अपनी गरीबी का कारण न तो देश का किसान ही समझ पाता है तथा न ही मजदूर क्योंकि शोषण की यह प्रक्रिया इतनी तेज है जिसे या तो बुद्धिजीवी वर्ग समझ पाता है या समझदार अर्थशास्त्री।

संसार में चीन एवं क्यूबा जैसे कई उदाहरण हैं जिनमें कि विपरीत परिस्थितियां आने पर भी ये देश अपने आपको समृद्ध रखने से सफल हो पाए हैं। यद्यपि पलायन का यह क्रम तो पूरे देश में चल रहा है। लेकिन एक प्राकृतिक प्रकोप के कारण बुंदेलखंड की स्थिति अलग है और यहां पलायन देश की अन्य जगहों से बहुत ज्यादा है। इस पलायन के जो स्वरूप देखने में आते हैं उनमें सुखद कम हैं लेकिन दुखद परिणाम ज्यादा देखने आए हैं।

एक अन्य पलायन जिसे विस्थापन भी कहा जा सकता है अक्सर शासन द्वारा जबरन कराए जाने वाला पलायन होता है। जैसे मध्यप्रदेश के बरगी बांध तथा तवा बांध का निर्माण। इसी तरह देशभर में टिहरी बांध से लेकर अभ्यारण्यों तथा अन्य कई परियोजना के चलते पलायन देखे गये हैं। यद्यपि सरकारों का मानना है कि इन बांधों से लाखों लोगों को सिचाईं के साधन मिले हैं तथा कृषि में सिंचाई की सुविधा से कई गुना लाभ हुआ है। लेकिन विचार करने पर जब हम बरगी बांध एवं तवा बांध के विस्थापितों की स्थिति को देखते हैं तो यह समझ में आता है कि लाखों- करोड़ों व्यक्तियों के लिए संसाधनों के नाम पर विस्थापितों को ऐसी दयनीय परिस्थिति में पहुंचा देना और एक पशु जैसा नारकीय जीवन जीने को मजबूर कर देना कहां का न्याय है?

इससे शासन की मंशा साफ जाहिर होती है। यह एक गैर बराबरी के क्रम का निर्धारण है। इतना ही नहीं विस्थापितों तथा उनकी भविष्य की कई पीढि़यों तक शिक्षा का अभाव भी बना रहता है। अपनी रोजी-रोटी की खोज में भटक रहे समुदाय की गरीबी का दायरा इतना बढ़ जाता है कि अमीरी की खाई का गैर बराबरी का यह दायरा कभी भी पूरी तरह भर नहीं पाएगा। परिणामस्वरूप इस बढ़ती हुई गैर बराबरी से जो निकल कर आता है वह एक लम्बी होती बिलखती सिसकी भर होती है। जिसको हम आगे चलकर चाहे आतंकी (आतंकवादी) गतिविधि से जोड़ें या उसे समाज में किसी अन्य तरह की बगावत करने वालों की श्रेणी में लें।

बुंदेलखंड के पलायन करने वाले परिवारों की बड़ी विचित्र कहानी है। यहां कई लोग दुर्घटना का शिकार होकर अपने जीवन से हाथ धो बैठे हैं। कई के परिवार इसलिए उजड़ गये हैं क्योंकि इन परिवारों की महिलाएं ही गायब हो चुकी है। कई परिवार ऐसे हैं जिनकी मजदूरी को हड़प कर उन्हें भगा दिया गया है। यहां तक कि एक दो परिवार के लोगों को तो महीनों कार्यस्थल पर ही बंधक बनाकर रख कर नाममात्र को खाने को देकर जिंदा रखकर उनसे काम कराया गया तथा जीवन की आशा छोड़कर उन्हें वही कैद रहकर जीवन पूरा करने को मजबूर कर दिया गया। उन माफियाओं की लापरवाही से कहीं कभी एक दो लड़के निकल कर भाग सकने में सफल हुए। उनकी जुबानी सुनी यह कहानी दिल को दहला देने वाली स्थिति बयां करती है।

पलायन से होने वाले संकट का सामना करने के लिए हममें से जो समाज में प्रभाव रखते हैं उनका परम कर्तव्य इन बेसहारा लोगों को सहारा देना होना चाहिए। शायद यही सच्चे धर्म की परिभाषा भी है। हम सब एक ऐसी समझ विकसित कर सकें जो कि सरकार को भी ऐसी राह पर लाने में सफल हो जिससे कि इस गैर बराबरी को कम किया जा सके। यही हमारे देश का तथा हम लोगों का सबसे बड़ा सौभाग्य होगा।

श्री लालसिंह गौर ग्राम ककावनी जिला टीकमगढ़ (म.प्र.) के सरपंच रहे हैं। वर्तमान में सर्वोदय आंदोलन से जुड़े हैं।