बयानों के आइने में कोप 21

Author:अरुण तिवारी

.‘कोप 21’ यानी कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज। एक समझौते के साथ जलवायु के मसले पर सबसे अधिक संख्या में राष्ट्र प्रमुखों के जुटाव का यह आयोजन हाल ही में पेरिस में सम्पन्न हुआ। समझौता कितना मजबूत है, कितना कमजोर? कितना राजनयिक था, कितना प्रकृति हितैषी? पेश है बयानों के आइने में एक जाँच:

बान की मून (संयुक्त राष्ट्र महासचिव)- “यह धरती के लिये ऐतिहासिक जीत का क्षण है। इससे दुनिया से गरीबी खत्म करने का मंच तैयार होगा। यह सभी देशों के सामूहिक प्रयास का नतीजा है। कोई यह लक्ष्य अकेले हासिल नहीं कर सकता था।’’

बाराक ओबामा (अमेरिकी राष्ट्रपति)- आज अमेरिकी गर्व कर सकते हैं कि सात सालों से हमने अमेरिका को जलवायु परिवर्तन से लड़ने में विश्व प्रमुख बनाया है। यह समझौता धरती को बचाने के हमारे प्रयासों को सफल बनाएगा।’’

अल गोर (पूर्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति)- “मैं पिछले दो दशक से इस तरह के सम्मेलनों में जाता रहा हूँ। मेरी नजर में यह सबसे कुशल कूटनीति का नतीजा है।’’

माइगेल एरिस कनेटे (जलवायु प्रमुख, यूूरोप) - “यह आखिरी मौका था और हमने इसे पकड़ लिया।’’

डेविड कैमरन (ब्रितानी प्रधानमंत्री)- “इस पीढ़ी ने अपने बच्चों को सुरक्षित धरती सौंपने के लिये अहम कदम उठाया है। इस समझौते की खूबी यह है कि इसमें धरती बचाने के लिये हर देश को ज़िम्मेदारी दी गई है।’’

नरेन्द्र मोदी (भारतीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार) - “पेरिस समझौते का जो परिणाम है, उसमें कोई भी हारा या जीता नहीं है। जलवायु न्याय जीता है और हम सभी एक हरित भविष्य के लिये काम कर रहे हैं।’’

प्रकाश जावेड़कर (केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री, भारत सरकार)- “यह एक ऐसा ऐतिहासिक दिन है, जब सभी ने सिर्फ एक समझौते को अंगीकार ही नहीं किया, बल्कि धरती के सात अरब लोगों के जीवन में उम्मीद का एक नया अध्याय भी जोड़ा।..हमने आज भावी पीढ़ियों को यह आश्वासन दिया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण उपजी चुनौती को कम करने के लिये हम सब मिलकर काम करेंगे और उन्हें एक बेहतर भविष्य देंगे।’’

कुमी नायडू ( कार्यकारी अधिकारी, ग्रीनपीस इंटरनेशनल)- “कभी-कभी लगता है कि संयुक्त राष्ट्र संगठन के सदस्य देश कभी किसी मुद्दे पर एकजुट नहीं हो सकते, किन्तु करीब 200 देश एक साथ आये और समझौता हुआ।’’

स्ट्रर्न (अगुआ जलवायु अर्थशास्त्री)- “उन्होंने अत्यन्त सावधानी बरती; सभी को सुना और सभी से सलाह ली।.. यह फ्रांस के खुलेपन, राजनयिक अनुभव और कौशल से सम्भव हुआ।’’

शी जेनहुआ (चीन के वार्ताकार)- “हालांकि, यह समझौता हमें आगे बढ़ने से नहीं रोकता, किन्तु समझौता श्रेष्ठ नहीं है। कुछ मामलों में काफी सुधार की जरूरत है।’’

पॉल ओक्टिविस्ट (निकारगुआ के प्रतिनिधि)- “हम सन्धि का समर्थन नहीं करते। यह वैश्विक तापमान को कम करने व प्रभावित गरीब देशों की मदद के मामले में नाकाफी है।’’

तोसी मपाने (कांगों के वार्ताकार ) - “ग्रीन क्लाइमेट फंड की बात समझौते में होनी थी, किन्तु यह बाध्यकारी हिस्से में नहीं है। उन्होंने इसे कानूनी रूप नहीं लेने दिया।’’

सुनीता नारायण (महानिदेशक, सीएसई, दिल्ली)- “यह एक कमज़ोर और गैर महत्त्वाकांक्षी समझौता है। इसमें कोई अर्थपूर्ण लक्ष्य शामिल नहीं है।’’

जेम्स हेनसन (विशेषज्ञ)- “यह समझौता, एक झूठ है। यह धोखापूर्ण है। यही इसकी सच्चाई है।...इसमें कोई कार्रवाई नहीं है, सिर्फ वादे हैं।... जब तक जीवाश्म ईंधन सस्ते में उपलब्ध रहेगा; यह जलाया जाता रहेगा।’’

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