भागीरथी की संगिनी : चम्पा नदी के अस्तित्व पर खतरा

Author:कुमार कृष्णन

एक ओर पूरे देश में स्वच्छ भारत का नारा दिया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर अंग जनपद की प्रमुख नदी चम्पा के अस्तित्व को खत्म करने पर भागलपुर नगर निगम आमादा है। अंग देश या महाजनपद पौराणिक 16 महाजनपदों में से एक था। वर्तमान के बिहार के मुँगेर और भागलपुर ज़िले इसमें आते थे। महाजनपद युग में अंग महाजनपद की राजधानी चम्पा थी। वर्तमान में भागलपुर का चम्पानगर ही उसकी राजधानी थी। इस क्षेत्र में कर्णगढ़ का होना इस तथ्य को बताने के लिए काफी है। महाभारतकाल में अंग और मगध एक ही राज्य के दो भाग थे। शान्ति पर्व के अनुसार मगधराज जरासंध के पिता वृहद्रथ को ही अंग का शासक थे।

शान्ति पर्व में वर्णित है कि 'प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनीं नगरमथ, अंगेषु नरशार्दूल स राजासीत् सपत्नजित्। पालयामास चम्पा च कर्ण: परबलार्दन:, दुर्योधनस्यानुमते तवापि विदितं तथा' से स्पष्ट है कि जरासंध ने कर्ण को अंगस्थित मालिनी या चम्पापुरी देकर वहाँ का राजा मान लिया था। तत्पश्चात दुर्योधन ने कर्ण को अंगराज घोषित कर दिया था। यह क्षेत्र जैन धर्म के 12 वे तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य की पंचकल्याणक भूमि है। नदी के तट पर मन्दिर इसकी पुष्टि करते हैं। अंग क्षेत्र की प्राचीन चम्पा नदी के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं। इतिहास गवाह है कि चम्पा नदी में लोक पर्व बिहुला-विषहरी के कथा के पात्र चाँदो सौदागर स्नान किया करते थे। अंग क्षेत्र में प्रसिद्ध रही चम्पा नदी कभी धार्मिक स्नान के लिए जहाँ पवित्र रही वहीं इसके पावन जल से पूरा इलाका कृषि के लिए भी वरदान साबित हुआ करता था।

लेकिन ब्रिटिश शासन काल से ही चम्पा नदी की पवित्रता पर अंग्रेजों की बुरी नजर रही। और इस नदी का नाम चम्पा नाला कर दिया गया। जो पुल पर अंकित चम्पा नाला शब्द गवाह बना हुआ है। बहरहाल भागीरथी की संगिनी बनी चम्पा नदी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने तक को विवश है। उस समय से लेकर आज तक पूरे शहर की गन्दगी इस नदी में बहा रही है। इससे स्थानीय लोगों के साथ जल जीवों पर भी प्रभाव पड़ने लगा है। अब तो भागलपुर नगर निगम ठोस कचरा के निष्पादन की जगह के रूप में इस नदी को तब्दील कर दी है। जबकि छठ से लेकर अनेक धर्मिक अनुष्ठान इसके तट पर होते हैं।

मदद फाउंडेशन की सचिव बंदना झा कहती हैं- ''नदी के तट पर जहाँ कचरा फेंक कर इसके वास्तविक स्वरूप को खत्म किया जा रहा है। वहीं दूसरे कई जगहों पर अवैध खनन हो रहा है। इस अवैध उत्खनन ने तो कई सहायक नदियों का अस्तित्व खत्म कर दिया। इसे अविलम्ब रोका जाना चाहिए। मदद फाउंडेशन इसे लेकर गम्भीर हैं और इस सन्दर्भ में दिल्ली में पूरी स्थिति से जलसंसाधन मन्त्री उमा भारती को वाकिफ कराया जाएगा।''

आलम यह है कि राष्ट्रीय उच्च पथ संख्या 80 से गुजरते हुए फेंके गए कचरे और उससे उत्पन्न प्रदूषण का एहसास दुर्गंध तो करा ही देती है। पत्रकार यदुनाथ मंडल का कहना है कि इसका व्यापक विरोध होना चाहिए। इस क्षेत्र के मछुआरे इस नदी पर आश्रित हैं। मछलियों के मरने से उनकी आजीविका पर खतरा उत्पन्न हो गया है। इस क्षेत्र की नगर निगम की वार्ड पार्षद काकुली घोष का कहना है कि- “उन्होंने एक जन प्रतिनिधि के हैसियत से भागलपुर नगर निगम के इस कृत्य का विरोध किया है। इस सम्बन्ध में पर्यावरण से सरोकार रखनेवाले किशोर जायसवाल की मानें तो गन्दे पानी को सीधे तौर पर नदी में गिराने से भूमि की ऊपरी सतह को नुकसान होता है।”

आज यही वजह है कि फसलें बाँझ हो रही हैं। जैसे दियारा क्षेत्रों में की गई मक्का की खेती में दाना नहीं आने की समस्या आ रही है। गन्दे पानी के जीवाणु बीज के अंकुरण को बर्बाद करने के साथ फसल को नुकसान पहुँचा रहे हैं। इसके आस-पास के क्षेत्रों में ज्वाइंडिस, डायरिया, ट्यूमर आदि बीमारियों पानी की वजह से ही फैल रही हैं। इसके लिए पानी को स्वच्छ कर ही नदी में गिराने की व्यवस्था की जानी चाहिए। ताकि जलीय जीव भी प्रभावित न हों, स्थित चम्पा नदी व एनएच 80 के दोनों ओर नगर निगम द्वारा फेंका जा रहा कचरा पशु-पक्षियों के जीवन को प्रभावित करने लगा है। निगम के कचरे में प्रयुक्त रासायनिक तत्व कौवे व बगुलों की जान ले रहा है।

इसके अलावा इस कचरे ने क्षेत्र को प्रदूषित कर खेतों में अपना प्रभाव छोड़ना प्रारम्भ कर दिया है। नदियाँ भी प्रदूषित हो रही हैं। निगम पूरे शहर की गन्दगी को नाथनगर के आस-पास डाल रही है। अगर देखा जाए तो इसी क्षेत्र में पक्षियों के मरने का सिलसिला चला है। टी.एन.बी कॉलेज के जन्तु विज्ञान के प्राध्यापक डॉ. फारूक अली के मुताबिक- “कचरे में कई मृत अवशेष, प्रदूषित पदार्थ व रासायनिक पदार्थ समेत अन्य तत्व होते हैं। कूड़े के निस्तारण के लिए निगम प्रशासन को व्यवस्था करनी चाहिए।'' इसका असर पक्षियों पर भी पड़ रहा है। कई पक्षी लुप्त हो रहे हैं। पर्यावरण को सन्तुलित बनाएँ रखने के लिए पक्षियों की रक्षा जरूरी है। कचरे में प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के हैवी मेटल होते हैं जो भूमि में अवशोषित होकर जलस्तर के साथ पौधों को नुकसान कर रहे हैं। पौधे सर्वप्रथम आर्सेनिक और लेड को ग्रहण करते हैं।इसके सेवन से इंसान एवं जानवर को नुकसान पहुँचता है। हैवी मेटल में फ्लोरिन टॉक्सीस की अधिक मात्रा होती है जिससे पक्षियों द्वारा सेवन करने से मौत होने की सम्भावना बन रही है। पर्यावरण को सन्तुलित बनाएँ रखने में निगम का भी दायित्व बनता है। निगम यह कहकर पल्ला झाड़ रहा है कि डम्पिंग के लिए जगह नहीं मिलने के कारण समस्या उत्पन्न हुई है।

नाथनगर के कजरैली के समीप डम्पिंग के लिए जमीन तलाशी गई है। जिला प्रशासन की सहमति पर वहाँ डम्पिंग किया जाएगा। प्रतिदिन यहाँ 180 मीट्रिक टन कचरा गिराया जाता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि हैदराबाद की संस्था रैमकी ने नगर निगम के कूड़ा निस्तारण की जिम्मेदारी ली है। इसने भी कचरा निस्तारण की जगह उपलब्ध नहीं होने के कारण वर्ष 2013 में ही काम बंद कर दिया है। उसका कहना था कि निगम कचरा डम्पिंग के लिए जगह उपलब्ध कराने में विफल रहा है।