भारत के संरक्षित वन क्षेत्र

Author:पंकज चतुर्वेदी

.किसी देश की सम्पन्न्ता उसके निवासियों की भौतिक समृद्धि से अधिक वहाँ की जैव विविधता से आँकी जाती है। भारत में भले ही विकास के नाम पर बीते कुछ दशकों में हरियाली को अन्धाधुन्ध उजाड़ा गया हो, लेकिन हमारी वन सम्पदा दुनियाभर में अनूठी और विशिष्ठ है। वृक्ष हमारे ऐसे मित्र हैं जो जन्म से मृत्यृ तक हमें कुछ-न-कुछ देते रहते हैं। बच्चे के पालने से लेकर मरणोपरान्त चिता तक हम लकड़ी के लिये वृक्षों पर आश्रित हैं।

वृक्षों के उपकार से मानव समाज कभी मुक्त नहीं हो सकता है। मानव अथवा कोई भी जीव भोजन के बिना कुछ दिन तक जीवित रह सकता है, जल के बिना कुछ घंटे जीवित रह सकता है किन्तु बिना वायु के कुछ मिनट भी जीवित नहीं रह सकता। प्राणवायु ऑक्सीजन ही जीवन का आधार है, यह हम सभी जानते हैं। ऑक्सीजन का केवल एकमात्र स्रोत वृक्ष हैं। इसलिये वृक्षों पर ही हमारा जीवन आश्रित है। यदि वृक्ष नहीं रहेंगे तो किसी भी जीव-जन्तु का अस्तित्व धरती पर नहीं रहेगा।

संरक्षित वन क्षेत्र महज हरे-भरे जंगल नहीं है, बल्कि दुनिया की दुर्लभ जैवविविधता को सहेज कर रखने का ख़ज़ाना भी हैं। भारतीय वेदकालीन परम्परा से ही जंगल परिवार का अंग व देवतुल्य उपासना योग्य माने जाते रहे हैं। सदियों तक विदेशी आक्रमण से जंगल भी उजड़े व वहाँ रहने वाले जानवर भी। मुगल बादशाह अकबर ने विभिन्न दुर्लभ प्रजातियों के वृक्षों के संरक्षण के लिये वाटिकाओं के निर्माण का कार्य करवाया।

ब्रितानी हुक़ूमत के सर्वप्रथम वीडनथांगल पक्षी विहार स्थापित किया गया जो आज तमिलनाडु में है। सबसे पहला राष्ट्रीय उद्यान सन् 1935 में स्थापित हेली नेशनल पार्क था, जो आज उत्तराखण्ड में कार्बेट नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता है। एक सींग के गैंडे के लिये विश्व में मशहूर काजीरंगा वन्यजीव विहार की स्थापना इससे भी पहले 1908 में हुई थी।

प्रस्तुत पुस्तक भारत में संरक्षित वनों के इतिहास, इससे सम्बन्धित कानून, देश के प्रमुख चिड़ियाघरों के साथ-साथ प्रत्येक राज्य में स्थित संरक्षित वन, उनकी भौगोलिक स्थिति, वहाँ पाये जाने वाले जानवर व वनस्पति की जानकारी देती है। इन वनों तक पहुँचने के मार्ग के साथ-साथ पारिस्थितिकी तंत्र, प्रदूषण और वन, जैव विविधता संरक्षण और राष्ट्रीय वन नीति की प्रामाणिक जानकारी भी इसमें प्रस्तुत की गई है। इसके आगे देश के प्रत्येक राज्य के संरक्षित वन क्षेत्र, उनकी भौतिक अवस्था, वहाँ मिलने वाले पेड़ व जानवरों आदि का विस्तार से विवरण है।

पुस्तक के पहले अध्याय में ही 2005 एवं 2007 के आकलन के अनुसार राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों के वनावरण में आये परिवर्तन के आँकड़े दिये गए हैं जो बेहद चौंकाने वाले हैं। पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम, मणिपुर में वन क्षेत्र में वृद्धि है तो अधिकांश राज्यों में यह घटे हैं। पुस्तक विस्तार से बताती है कि बढ़ती आबादी के दवाब के कारण हो रहे आवासीकरण व माँग आपूर्ति के लिये हरियाली को उजाड़कर खेती करने के कारण किस तरह पूरा पर्यावरणीय तंत्र गड़बड़ा रहा है और ऐसे में कहीं जीव-जन्तुओं को बचाने के लिये तो कहीं हरियाली के लिये संरक्षित वन-क्षेत्र बनाने पड़ रहे हैं। इसमें संरक्षित वन, राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव विहार में विभेद व उसकी उपादेयता को भी समझाया गया है।

विलुप्त हो रही वन्य प्रजातियों के संरक्षण हेतु देश में कई परियोजनाएँ चल रही हैं। आमतौर पर लोग केवल शेर के संरक्षण की योजना को ही जानते हैं। इस पुस्तक में बताया गया है कि देश में इस तरह के 12 विशेष अभयारण्य हैं जिसमें हंगुल, भालू, गिद्ध, कस्तुरी मृग आदि भी शामिल हैं। इस अध्याय में इन विशेष परियोजनाओं की आवश्यकता, इसके तहत हो रहे कार्य व उनके कार्य क्षेत्रों की जानकारी दी गई है। अगला अध्याय प्राण उद्यान यानि चिड़ियाघरों पर है।

प्रायः लोग यही सोचते हैं कि चिड़ियाघर महज जानवरों का प्रदर्शन है, लेकिन असल में यहाँ पर अनुसन्धान, संरक्षण व प्रजनन, जागरुकता विस्तार जैसे कार्य भी होते हैं। पुस्तक के इन पन्नों में केन्द्रीय प्राणि उद्यान बाबत नीति, चिड़ियाघर के कायदे-कानून तथा देश के सभी चिड़ियाघरों व वहाँ रहने वाले दुर्लभ जानवरों की सूचना दी गई है।

पुस्तक का समापन वन्यजीव व वन सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण क़ानूनों को सरल भाषा में प्रस्तुति से है। इसमें जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के हक सम्बन्धी कानून बेहद रोचक हैं। जंगल की लकड़ी के उपभोग, उसके परिवहन आदि पर भी विमर्श है। उल्लेखनीय है कि आमतौर पर आदिवासियों को ऐसे ही कानूनों का डर दिखाकर वन विभाग के लोग शोषण करते हैं।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इस विषय पर हिन्दी में सम्भवतया यह एकमात्र पुस्तक है जो प्रामाणिक सूचनाओं के साथ-साथ चौंकाने वाली जानकारियों के कारण पाठक की रोचकता बनाए रखती है। यह पुस्तक पर्यावरण प्रेमियों, वन्यजीव संरक्षकों, पर्यटकों और भारत के बारे में जानकारी एकत्र करने वालों के लिये महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।

पुस्तक के लेखक महेन्द्र प्रताप सिंह (21.12.1960) एमएससी (गणित) है, लेकिन हिन्दी में साहित्य सृजन करते हैं। भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी श्री सिंह की दस पुस्तकें प्रकाशित हैं और इनमें से कई को राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार मिल चुके हैं। कुछ चर्चित कृतियाँ हैं - वनोपज, गाँधी अैार कृष्ण, प्रेम-पथ, वन और मन, मानस में प्रकृति विषयक सन्दर्भ आदि।

भारत के संरक्षित वन क्षेत्र, महेन्द्र प्रताप सिंह, पृष्ठ, 254, रु. 110.00

प्रकाशक - राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, वसंत कुंज, नई दिल्ली-110070