भारत के सर्वाधिक लुभावने समुद्र तट

Author:मनोहर पुरी
Source:योजना, अगस्त 2002

समुद्र का भारतीय सभ्यता, संस्कृति, धर्म और अर्थ के क्षेत्र में विशेष स्थान रहा है। रत्नाकर के रूप में सागर भारत भूमि को अनादि काल से धन-धान्य से समृद्ध करते रहे हैं। सदियों से हमारे पर्यावरण की रक्षा भी इन्हीं से होती रही है। जहाँ तक पर्यटन की दृष्टि से समुद्र और समुद्र-तटों के विकास की बात है वह अपेक्षाकृत नई सोच है। पिछले कुछ ही वर्षों से हमने इस दिशा में सोचना प्रारम्भ किया है।

जिधर दृष्टि उठाएँ, चारों ओर गहरी नीली जल राशि का ही साम्राज्य हो; नीले पानी के अन्तिम छोर से उगता अथवा उसमें डूबता लालिमायुक्त सूर्य हो तो कौन ऐसे दृश्य के स्वामी, समुद्र के मोहपाश में स्वयं ही बँधने के लिये लालायित नहीं हो जाएगा। आज देश-विदेश की पर्यटक कम्पनियाँ समुद्री सैर के इसी पक्ष का प्रचार करके सैलानियों को लम्बी-लम्बी समुद्री यात्राओं की ओर आकर्षित कर रही हैं। बड़े-बड़े जलयानों पर ऐसी यात्राओं अर्थात ‘क्रूज’ का आकर्षण भारतीय पर्यटकों में भी तेजी से बढ़ रहा है। वैसे व्यापार के लिये लम्बी एवं कठिन समुद्री यात्राएँ करना और समुद्र के सुनहरे और लुभावने तटों पर मनोरंजन के लिये सैर-सपाटा करना भारतीयों के लिये कोई नई बात नहीं है। आज तक भारतीय समुद्र को वरुण देवता मान कर उसका आदर करते हैं। फलतः समुद्री तटों के रख-रखाव का वे निरन्तर ध्यान रखते हैं। भारतीय नतमस्तक हो समुद्र तटों पर फूल और नारियल अर्पित करते रहे हैं। शास्त्रों के अनुसार हम समुद्र से उतना ही माँगते आए हैं जितने से हमारा निर्वाह हो जाए। अपने स्वार्थ के लिये हमारे पूर्वजों ने समुद्र का शोषण कभी नहीं किया। इन दिनों भौतिकता का अंधी दौड़ में न तो उनके प्रति श्रद्धा शेष है और न ही पर्यावरण की चिन्ता।

सदियों से सागर भारत की जन-आस्थाओं के पूरे परिवेश के साथ जुड़े रहे हैं। समुद्र का भारतीय सभ्यता, संस्कृति, धर्म और अर्थ के क्षेत्र में विशेष स्थान रहा है। रत्नाकर के रूप में सागर भारत भूमि को अनादिकाल से धन-धान्य से समृद्ध करते रहे हैं। सभ्यता के प्रारम्भ से लेकर आज तक भारत की जनसंख्या का एक बड़ा भाग अपने जीवन निर्वाह के लिये पूरी तरह से समुद्रों पर ही आश्रित रहा है। आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये हमने हर प्रकार से समुद्र का आशीर्वाद लिया है। हमारा तो विश्वास रहा है कि समुद्र मंथन से प्राप्त रत्नों के कारण ही हमें विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता होने का अवसर प्राप्त हुआ। सदियों से हमारे पर्यावरण की रक्षा भी इन्हीं से होती रही है। जहाँ तक पर्यटन की दृष्टि से समुद्र और उसके तटों के विकास की बात है वह अपेक्षाकृत नई सोच है। पिछले कुछ ही वर्षों से हमने इस दिशा में सोचना प्रारम्भ किया है। अभी भी भारत के समुद्री तटों पर भारतीय सैलानियों की अपेक्षा विदेशी पर्यटकों की संख्या अधिक दिखाई देती है।

यह जानकर अवश्य ही अचंभा होता है कि 7,000 किलोमीटर लम्बे समुद्री तटों के स्वामी होते हुए भी हमने गम्भीरतापूर्वक समुद्रतटीय पर्यटन को विकसित करने का विशेष प्रयास नहीं किया है। बंगाल से लेकर तमिलनाडु और केरल से लेकर गुजरात तक भारतीय समुद्रतट विश्व के किसी भी समुद्र तट से प्रतिस्पर्धा की क्षमता रखते हैं। इसके अतिरिक्त लक्षद्वीप, अंडमान निकोबार और दमन दीव जैसे भारतीय महाद्वीपों की सुन्दरता का तो कोई मुकाबला ही नहीं है।

समुद्र तटों से हमारा परिचय बंगाल की खाड़ी के मुहाने पर स्थित पश्चिम बंगाल से शुरू हो जाता है। भले ही यहाँ कोई विश्व प्रसिद्ध समुद्री तट न हों फिर भी डिघा और बक्खाली के सुनहरी समुद्री तट और डायमंड हार्बर का डेल्टा, जहाँ गंगा समुद्र में समाहित होने के लिये हिमालय पर्वत से दौड़ी चली आती है, बहुत ही दर्शनीय स्थल है। गंगा हर भारतीय के लिये मोक्षदायिनी है और गंगासागर में स्नान करना किसी भी भारतीय की जीवन भर की साध हो सकती है। हर वर्ष यहाँ लाखों लोग पवित्र स्नान के लिये आते हैं।

हमारे चार धामों में से एक धाम होने के कारण उड़ीसा की धार्मिक नगरी पुरी भले ही भगवान जगन्नाथ के मंदिर के लिये विश्वविख्यात है परन्तु इसका समुद्री तट अपने आप में बेजोड़ है। इस तट पर लगभग एक किलोमीटर की दूरी तक समुद्र गहरा नहीं है। इस कारण सैलानी बहुत दूर तक समुद्र स्नान का आनंद उठाते हैं। अच्छे तैराक अपने आप और नौसिखिए पर्यटक स्थानीय मछुआरों की सहायता से घंटों जलक्रीड़ा करते हैं। इस तट की सुनहरी रेत को देखकर किसी भी पर्यटक का मन उसे बिछौना मान कर लेटने को मचल उठता है। प्रातः सूर्योदय एवं सायं सूर्यास्त के समय सैलानी घंटों इस सुनहरी रेत के बिछौने पर विश्राम करते हुए बंगाल की खाड़ी की विशाल जल राशि को अपलक निहारा करते हैं। मीलों लम्बे इस समुद्री तट के साथ-साथ सड़क पर सजे बाजार में उड़ीसा के अद्भुत हस्तशिल्प देखकर पर्यटक आश्चर्य से दाँतों तले उँगली दबा लेते हैं। गहरे समुद्र से निकले शंख और सीपियाँ यहाँ बहुत ही कम दामों पर उपलब्ध होते हैं। समुद्र से प्राप्त अनेक प्रकार की वस्तुओं से बनी कलाकृतियाँ किसी भी सैलानी को अपनी ओर आकृष्ट करने में सक्षम हैं।

पुरी के अतिरिक्त गोपालपुर, कोणार्क और चांदीपुर के तट भी बहुत ही लुभावने हैं। गोपालपुर के शांत समुद्री तट पर नीली जलराशि की लहरों का नर्तन पर्यटक को घंटों अपने सम्मोहन में बाँधे रखता है। यहाँ पर हरे वृक्षों से आच्छादित संकरी खाड़ियों और ‘लगूनों’ की मौन शांति जो सुखद अनुभूति प्रदान करती हैं उसका वर्णन शब्दों में करना सम्भव नहीं। कोणार्क सूर्यमंदिर की स्थापत्य कला के लिये विश्वप्रसिद्ध है। इस मंदिर में ऐसी बेजोड़ मूर्तियाँ बनाई गई हैं जिनका दुनिया में अन्यत्र उदाहरण नहीं मिलता। मंदिर में बनी मूर्तियों की सजीवता किसी भी पर्यटक को अभिभूत कर देती है। 13वीं शताब्दि में निर्मित इस मंदिर की विशालता, मूर्तिकला की गहराई और बारीकियों को देखकर आश्चर्य होता है कि आज जैसे आधुनिक यंत्रों के अभाव में उस युग में किस प्रकार इतने विशाल पत्थरों को इतनी ऊँचाई पर ले जाया गया होगा और किस प्रकार इतनी सूक्ष्मता से मूर्तियों में प्राण भरे गए होंगे। पत्थर पर अंकित इस कविता के रस में सैलानी बार-बार डूबता और सराबोर होता है। इन कविताओं को छायांकन के लिये सैलानियों को अवश्य ही एक दो फिल्में बचा कर रखनी चाहिए।

हिंद महासागर

कोणार्क के समुद्री तट पर सूर्योदय का नयनाभिराम दृश्य देखने के लिये प्रतिदिन हजारों दर्शक एकत्र होते हैं। पर्यटन के विकास की दृष्टि से यहाँ पर अनेक विकास कार्य करने की योजनाएँ बनती रही हैं। यह माना जाता रहा है कि पर्यटन की दृष्टि से यदि इस क्षेत्र को अंधाधुंध ढंग से विकसित करने का प्रयास किया गया तो यहाँ के पर्यावरण को क्षति पहुँचेगी और समुद्र में उपलब्ध कछुओं की एक विशेष प्रजाति लुप्त हो जाएगी।

चांदीपुर के तट पर समुद्र का पानी प्रतिदिन पाँच किलोमीटर पीछे हट जाता है और धीरे-धीरे पुनः चढ़ता है। इस पानी की लय एक मधुर संगीत का आनंद देती है। उड़ीसा के समुद्री तटों पर प्रातःकालीन स्फूर्तिदायक समुद्री वायु किसी को भी मंत्रमुग्ध करके उसका मन हर्षित करने में सक्षम है। इस समय मछुआरे अपनी-अपनी नावों में मछली पकड़ने के लिये समुद्र में जाते हैं। सूर्य की रश्मियों में नहाती हुई दूर जाती नौकाएँ छोटे-मोटे पक्षियों सरीखी दिखाई देती हैं।

आंध्र प्रदेश के 666 किलोमीटर लम्बे समुद्री तट पर दस प्रसिद्ध बंदरगाह हैं। 14वीं शताब्दि से अरब व्यापारियों के आगमन की साक्षी और ईस्ट इंडिया कम्पनी का पूर्वी तट पर प्रथम पड़ावस्थल मछलीपत्तनम का तट सैलानियों के स्वागत को सदैव तत्पर रहता है। यह नगरी विश्व में कलमकारी कला के लिये प्रसिद्ध है। मछलीपत्तनम से मात्र 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मनगिनापुरी तट अपने मनोहारी दृश्यों के लिये प्रसिद्ध है। यहाँ प्रतिदिन सैकड़ों लोग पिकनिक मनाने आते हैं। माघ पूर्णिमा के दिन यहाँ लाखों तीर्थयात्री पवित्र स्नान के लिये डुबकी लगाते हैं। इसके तट पर ही स्थित दत्ताश्रम भी सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र है।

विशाखापत्तनम के सुनहरे बालू से भरे तट हमेशा से पर्यटकों को लुभाते रहे हैं। इस तट से डॉलफिन की नाक सरीखा रेखाचित्र नीले आकाश की पृष्ठभूमि में देखते ही बनता है। ‘डॉलफिन नोज’ एक बहुत बड़ी 174 मीटर ऊँची चट्टान है। समुद्र तट से इसकी ऊँचाई 358 मीटर है। यह समुद्र तट को मुख्य भूमि से पृथक करती है। आकृति डॉलफिन की नाक जैसी होने के कारण इस चट्टान को यह नाम दिया गया है।

ऋषिकोंडा का तट सूर्य की गर्मी से गर्म हुए समुद्र द्वारा सदैव धुला-धुला दिखाई देता है। यह तट पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त होने के कारण अपने मनोहारी दृश्यों के लिये प्रसिद्ध है। इस तट पर बड़े-बड़े रेत के टीले सैलानियों के लिये विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक दृश्य प्रस्तुत करते हैं। काकीनाड़ा, कृष्णापत्तनम तथा कलिपत्तनम भी अपनी-अपनी तटीय सुन्दरता के लिये प्रसिद्ध हैं। इन सभी स्थानों पर ठहरने का अच्छा प्रबंध है।

तमिलनाडु का महाबलिपुरम का समुद्री तट शताब्दियों पूर्व पल्लव साम्राज्य के प्रमुख बंदरगाह के रूप में विकसित हुआ था। आज भी इस तट पर सातवीं शताब्दि में बने द्रविड़ शैली के मंदिरों में स्थापत्य कला के अद्वितीय नमूने देखे जा सकते हैं। यह समुद्री तट निरंतर तेज लहरों के शोर और तीव्र गति से चलने वाली हवाओं की सनसनाहट से गूँजता रहता है। नारियल और नागफनी के पेड़ों से अच्छादित यह तट पर्यटकों के सामने एक अलग तरह का सौन्दर्य प्रस्तुत करता है। मद्रास के ‘गोल्डन बीच’ की अपनी अलग विशिष्टता है। शहरी आबादी के एकदम निकट होने के कारण उसके रख-रखाव में आने वाली कठिनाई का कोई अच्छा समाधान मद्रास शहर के प्रशासक ढूँढने में अभी तक सफल नहीं हुए हैं। फिर भी इस ‘बीच’ का आकर्षण हजारों पर्यटकों को निरंतर अपने मोहपाश में बाँधे रखता है। समुद्र के बीच खड़े हुए जब पर्यटक इसकी फेनिल लहरों की अठखेलियों का आनंद उठा रहा होता है तो कई बार उसके शरीर से आ टकराने वाला कोई लावारिस शव उसका सारा मजा किरकिरा भी कर सकता है।

काला सागर

मद्रास के समुद्र तट के साथ-साथ सर्पाकार मार्ग पर यात्रा करते हुए जब सैलानी इस तट पर द्रविड़ शैली के मंदिरों को देखता है तो आश्चर्यचकित रह जाता है। स्थापत्य कला के सौन्दर्य से भरपूर समुद्री तट पर निर्मित पुराने मंदिरों का अनोखा संगम है महाबलीपुरम। पांडिचेरी के समुद्री तट पर प्रातःकाल ही पर्यटकों का आना शुरू हो जाता है। इस तट से सूर्योदय का दृश्य बहुत मनोहारी होता है। सूरज के निकलने से पूर्व शनैः शनैः दूर समुद्र की लहरें जैसे अपने परिधान बदलने लगती हैं। उसी के साथ ही बदलने लगती है क्षितिज पर रंगों की छटा।

कन्याकुमारी भारत की मुख्य भूमि का अंतिम स्थल बिंदु, तीन सागरों की त्रिवेणी के रूप में जाना जाता है। तीन रंगों का नीला, हरा और मटमैला पानी मिलकर जिस इंद्रधनुष की संरचना करता है, उसे देखने का सुख हर किसी के नसीब में नहीं होता। यहाँ एक ही स्थल से पर्यटक सूर्योदय और सूर्यास्त के दिलकश नजारे देख सकते हैं। प्रातः जब बंगाल की खाड़ी से बाल रवि उदित होते हैं तो लगता है कि भानुभास्कर स्नान करके निकले हों। सायंकाल जब थके मांदे सूरज अरब सागर में विश्राम को जाते हैं तो आभास होता है जैसे उन्होंने किसी गहरी नीली जलराशि की चादर ओढ़ ली हो। चैत्र पूर्णिमा को सांझ ढले यदि आकाश मेघों से युक्त हो तो इस स्थान से बंगाल की खाड़ी में चंद्रोदय और अरब सागर में सूर्यास्त देखने योग्य होता है। अगले दिन इसके विपरीत प्रातःकाल बंगाल की खाड़ी में सूर्योदय और अरब सागर में चंद्रास्त का दृश्य अत्यन्त मनोहार और विस्मयकारी होता है। इस समुद्री तट पर अलग-अलग रंगों की रेत की छटा भी निराली है। पर्यटकों के लिये यह रेत दुकानदार छोटी-छोटी थैलियों में भरकर बेचते हैं।

जहाँ कन्याकुमारी के तटपर उत्ताल तरंगें सैलानी के मन को उद्वेलित करती हैं वहीं रामेश्वरम का ठहरा सागर उसे अपने सौन्दर्य से जड़वत बना देता है। रामेश्वरम भारत के दक्षिण भाग में स्थित एक छोटा-सा टापू है। हिन्दूओं के चार पवित्र धामों में से एक होने के कारण इसका भारतीय जन-जीवन में अपना अलग स्थान है। धार्मिक दृष्टि से यात्रा करने के लिये यहाँ प्रतिदिन हजारों तीर्थयात्री आते हैं। पहले पावन और मंडप नामक दो रेलवे स्टेशनों के मध्य समुद्र के ऊपर बंधी हुई रेलवे की पटरियों द्वारा ही यहाँ पहुँचा जाता था। अब सड़क मार्ग भी बन गया है। जब समुद्र के बीचों-बीच छोटी सी रेल की पटरी पर गाड़ी आती है तो ऐसा लगता है कि विश्व का सबसे अद्भुत आश्चर्य दृष्टि के सामने आ गया हो। अपने दोनों ओर विशाल जलराशि देखना एक रोमांचकारी अनुभव है। रामेश्वरम में शंख और सीप से बनी हस्तशिल्प की वस्तुएँ भी विशेष आकर्षण का केन्द्र हैं।

कोवलम केरल के 600 किलोमीटर तटीय प्रदेश का सबसे शांत एवं खूबसूरत तट है। यहाँ पर सैलानी जितनी शांति और खुलेपन का एहसास करता है उतना अन्यत्र कहीं नहीं। पर्यटकों के लिये यहाँ पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध हैं। नौकायन तैराकी, वाटर-स्कीइंग इत्यादि का पूरा प्रबंध है। जड़ी बूटियों से निकाले गए तेल से केरल की परम्परागत मालिश कराने की सुविधा भी यहाँ उपलब्ध है। कोवलम के समुद्र तट ने अब अन्तरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थान बना लिया है। तिरुवनंतपुरम शहर से मात्र 16 किलोमीटर की दूरी पर होने के बावजूद ऐसा लगता है जैसे व्यक्ति कहीं सुनसान स्थल पर पहुँच गया है। यहाँ पहुँचने के लिये सैलानी हरे-भरे नारियल के वृक्षों के झुरमुटों को पार करता हुआ आता है तो कोवलम की सुन्दरता को देखकर अभिभूत हो उठता है। जब तक पर्यटक तट पर नहीं पहुँचता उसे ऐसा लगता है जैसे वह किसी छोटे पर्वतीय स्थल की यात्रा कर रहा हो।

प्रदूषणरहित इस तट की पृष्ठभूमि में सागर की विशाल नीलाभ जल-राशि सैलानी का मन मोह लेती है। नितांत अनगढ़ और चिर कुंवारा सपना सा है यह तट। जैसे पलक झपकने की भूल करते ही सम्पूर्ण सौन्दर्य राशि ओझल हो जाएगी। किंवदंती है कि यह समुद्र कुंआरा है, इसलिये सांझ ढलने पर कोई नारी इसे नहीं छूती। यदि वह यह भूल करती है तो समुद्र उसे लील जाता है, ऐसी ही मान्यता है यहाँ के स्थानीय लोगों की। ऐसा लगता है कि यह पर्यटन स्थल मुख्य रूप से विदेशी पर्यटकों के लिये विकसित किया गया है। कोवलम के इस विकसित क्षेत्र से थोड़ी दूर हटते ही काफी गंदगी दिखाई देने लगती है। इस ओर के तट पर पहुँचने के मार्ग को भी अधिक सुन्दर बनाया जा सकता है। यदि मध्यम दर्जे के सैलानियों के लिये भी यहाँ कुछ प्रबंध कर दिए जाएँ तो निश्चित रूप से कोवलम भारी संख्या में सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है।

लाल सागरकोचीन विश्व व्यापार का एक ऐसा महत्त्वपूर्ण तट है जहाँ से व्यापारी कालीमिर्च, काजू, मछली और रबर का व्यापार दुनिया भर में करते हैं। अरब सागर की महारानी के नाम से प्रसिद्ध यह बंदरगाह छोटे-छोटे टापुओं और ‘बैक वाटर’ से सुसज्जित एक रमणीय पर्यटन स्थल है। पाँच सौ वर्ष पूर्व पुर्तगालियों ने इस स्थान की खोज की थी। बाद में डच, यहूदी और अंग्रेज इसकी सुन्दरता के मोहजाल में बंधकर यहीं के होकर रह गये। प्राचीन कोचीन में पुर्तगाली, इंग्लिश और यूरोपीय सभ्यताओं के चिन्ह आज भी मिलते हैं। पाँच सौ वर्ष पुराने महल और भारत में बनने वाला पहला चर्च आज भी उस इतिहास के साक्षी बन कर खड़े हैं। 1524 में वास्कोडिगामा के निधन के पश्चात उसे यहाँ के सेंट फ्रांसिस चर्च में दफनाया गया था। कोचीन और अर्नाकुलम के मध्य ‘फेरी’ से यात्रा जहाँ सैलानियों के लिये रोमांचकारी अनुभव है वहीं सड़क मार्ग की अपेक्षा जल मार्ग अधिक सुविधाजनक भी है। दूरी की दृष्टि से भी यह मार्ग छोटा है।

कर्नाटक राज्य भी समुद्री सौन्दर्य में अन्य राज्यों से ज्यादा पीछे नहीं है। इस राज्य के 320 किलोमीटर लम्बे सुनहरी तटों पर खिलती हुई धूप बहुत मनोहारी दिखाई देती है। अरब सागर में केरल से आगे बढ़ते ही मंगलौर के समुद्री तट पर्यटकों का खुले दिल से स्वागत करते हैं। पास के ऊँचे-ऊँचे वृक्षों, ‘बैक-वाटर’ और सुहावनी जलवायु के कारण इसे पर्यटकों के लिये स्वर्ग समान सुखद कहा जा सकता है। यह स्थान टीपू सुल्तान की नौसेना का दुर्ग रहा है। कर्नाटक का कारावली तट अपनी नीली जलराशि की सुन्दरता के लिये विश्व प्रसिद्ध है। पूरे तट के साथ-साथ राजमार्ग है जो रास्ते में आने वाले प्रत्येक शहर और कस्बे के मध्य से गुजरता हुआ पर्यटक को सम्पूर्ण आनंद और जानकारी प्रदान करने में सहायक होता है। कर्नाटक के कारवाड़ समुद्री तट को कवीन्द्र रवीन्द्र ने भारत के सुन्दरतम तट की संज्ञा दी है। यहाँ के उडीपी, उल्लाल, मारवंथा, सूरथकल, मालपी और मरुदेश्वर जैसे खूबसूरत एवं शांत समुद्री तट पर्यटकों के लिये आकर्षण का केन्द्र हैं। गोकर्ण के पाँच तटों में से एक का आकार ओम जैसा होने के कारण उसे ‘ओम बीच’ कहा जाता है। इन सभी स्थानों पर मंगलौर से पहुँचा जा सकता है। पर्यावरण की दृष्टि से कर्नाटक के तट एकदम अछूते हैं।

गोवा अरब सागर के तट पर स्थित पूर्व का रोम कहलाता है। सह्याद्रि पर्वत शृंखलाओं से नीचे आते ही पहाड़ छूने का प्रयास करती अरबसागर की लहरें दिखाई देने लगती हैं। प्राचीन ग्रन्थों में गोवा को परशुराम सृष्टि के नाम से पुकारा गया है। मान्यता है कि परशुराम ने इस क्षेत्र को महाबली समुद्र से छीनकर उत्तर के पर्वतों से आए ब्राह्मणों को तप के लिये दे दिया था। इसे ‘गोवापुरी’ नाम से पुकारा गया। इसकी लम्बाई सात योजन अर्थात 140 किलोमीटर बताई गई है। वर्तमान गोवा की लम्बाई भी इतनी ही है। यहाँ पर पूरब और पश्चिम की सांझी संस्कृति देखने को मिलती है। यहाँ के 100 किलोमीटर लम्बे समुद्री तट विदेशी सैलानियों की भीड़ से निरन्तर भरे रहते हैं। इन तटों पर सभी प्रकार की सुविधाएँ हैं। यहाँ के मछुआरों को मछली पकड़ते देखना एक अलग-सा अनुभव है। सूर्यास्त का दृश्य अत्यन्त लुभावना दिखाई देता है जब लम्बे-लम्बे ताड़ के वृक्षों के झुरमुट उसके सामने नतमस्तक से होते दिखाई देते हैं।

गोवा में समुद्री तटों की भरमार है। अंजूना और कलगंगूट सबसे प्रसिद्ध तट हैं। अंजूना बीच एक किनारे की तरफ सबसे शांत और खूबसूरत तट माना जाता है वहीं कलगंगूट मस्त लहरों, नारियल से आच्छादित सफेद रेतीले किनारों और फेनी की मादकता के लिये प्रसिद्ध है। अरब सागर के किनारे लगभग सात किलोमीटर की मेहराबी आकृति के इस तट पर पर्याप्त मात्रा में प्रदूषण दिखाई देता है। सर्वप्रथम यहाँ प्रदूषण फैलाने का कार्य हिप्पियों द्वारा किया गया। इन दिनों हिप्पी तो दिखाई नहीं देते परन्तु गंदगी वैसी ही है। प्राकृतिक वातावरण के साथ-साथ विदेशी सैलानियों ने यहाँ सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाने में भी काफी योगदान दिया है। पश्चिमी घाट पर निरन्तर होने वाले पेड़ों की कटाई ने भी गोवा के वातावरण को प्रभावित किया है।

बागा, बोगमालो, मेजोरडा, मोरजिम, बागाटोर, कलानग्रेट, मीरामर, डोना पाल, चपोरा एवं कोलाबा इत्यादि समुदी तट पर्यटकों को हर पल आकर्षित करते रहते हैं। शांत और एकदम निर्जन समुद्र तट की सैर के लिये उत्तर में हरमल से बेहतर कोई स्थान नहीं है। मोमनगाँव पोर्ट प्राकृतिक रूप से एक अन्य सुन्दर स्थल है। इसके समीप ही खूबसूरत तट दोण पाऊल है। यहाँ एक ऊँची मीनार है जिसके छज्जे से अरब सागर का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है। समुद्री तटों पर विकसित गोवा की विशेष प्रकार की संस्कृति भी सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र है।

महाराष्ट्र के 720 किलोमीटर लम्बे समुद्री तटों पर नहाने वालों का जमघट-सा लगा रहता है। इन तटों पर जलक्रीड़ाओं का समुचित प्रबंध होने के कारण सैलानी यहाँ स्वर्गिक आनंद का अनुभव करते हैं। मुंबई को भारत का ‘प्रवेश द्वार’ कहा जाता है। समुद्र तट पर बसी यह औद्योगिक नगरी भारत की आर्थिक राजधानी के रूप में विश्व-प्रसिद्ध है। यहाँ की महानगरीय सभ्यता किसी को भी अजनबीपन का अहसास नहीं होने देती। यहाँ के जुहू, बरसोवा, चौपाटी, दादर, गिरगांव और इरानगल जैसे बालू के तट पर्यटकों का हर प्रकार से मन बहलाने में सक्षम हैं। इन तटों पर देश विदेश से आने वाले पर्यटकों का मेला हरदम लगा रहता है। जुहू के समुद्री तट पर शहरी सभ्यता के कोलाहल के साथ-साथ समुद्री नजारे देखे जा सकते हैं तो मुंबई से मात्र 50-60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित दहाणु शहरी हलचल से रहित शांत और मनोरम समुद्र तट है। यहाँ पर सैलानी समुद्र की लहरों से अठखेलियाँ करते हुए समुद्र की गम्भीरता का लुत्फ उठाते हैं।

गुजरात भी समुद्री तटों के सौन्दर्य से मालामाल है। पोरबंदर, चोरवाड़, तिथाल, द्वारका और सोमनाथ के समुद्री तटों की सुन्दरता बेजोड़ है। समुद्र तट के साथ-साथ सड़क होने के कारण पर्यटक वाहन में बैठे भी समुद्र की सुन्दरता का आनंद उठाते चलता है। होटल में आराम करते हुए भी सैलानी विशाल जलराशि में डूबता उभरता रह सकता है। चोरवाड़ से सोमनाथ की यात्रा कुशल तैराक तैर कर करते हैं। इस क्षेत्र में तैराकी की प्रतियोगिताएँ भी पर्यटकों के आकर्षण का कारण बन रही हैं। भुज से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मांडवी का अनछुआ समुद्र तट उन सैलानियों के लिये पावन है जो वातावरण को अक्षुण्ण बनाये रखने में रुचि रखते हैं। इस तट पर पहुँचते ही समुद्र के सौन्दर्य को देखकर पर्यटकों की हृदय गति तीव्र हो जाती है। रोमांचक जल क्रीड़ाओं, तैराकी, नौका विहार की सुविधाएँ यहाँ उपलब्ध हैं। डनी प्वाइंट के पास ही खूबसूरत कोरल के भंडार हैं। यहाँ पर उछलती डालफिन और बड़े-बड़े कछुओं की भागदौड़ देखते ही बनती है। नाल सरोवर पर दूर देशों से आए प्रवासी पक्षियों की छटा का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। अहमदपुर मांडवी के तटों पर पाम के ऐसे वृक्ष मिलते हैं जो भारत में अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं हैं। यहीं से केन्द्र शासित प्रदेश दीव का प्रवेश द्वार भी है।

सूर्य, रेत और सागर की अपूर्व सुन्दरता का अद्भुत मिश्रण है दीव का नन्हा-सा टापू। सौराष्ट्र के तट पर स्थित यह टापू एक समय पुर्तगालियों के नियन्त्रण में था। यहाँ पर पर्यटक शांतिपूर्वक बिना किसी प्रकार के हस्तक्षेप के प्रकृति से अपना तारतम्य स्थापित कर सकते हैं। इसके सुनहरी रेत से आच्छादित तटों का आलिंगनबद्ध करते सागर को देखने मात्र से ही पर्यटक की सारी थकान छूमंतर हो जाती है। द्वीव का 21 किलोमीटर लम्बा तट विश्व के गिने-चुने तटों में माना जाता है। सूर्यास्त का नजारा देखने के लिये यहाँ बड़ी संख्या में लोग आते हैं। वे एकटक पश्चिम के क्षितिज को तब तक देखते रहते हैं जब तक सूर्य की लालिमा सायंकाल के सलेटी रंग में परिवर्तित नहीं हो जाती। शहर से नौ किलोमीटर दूर ‘नागोआ बीच’ अत्यधिक शांत और सुन्दर है। घोड़े की नाल की आकृति वाले इस समुद्र तट पर तैरना पूरी तरह सुरक्षित है। चक्रातीर्थ और ‘जालंधर बीच’ के गुनगुने पानी में स्नान करने का अपना ही मजा है। ऐसे ही अप्रतिम सौन्दर्य से भरपूर हैं अंडमान और निकोबार के समुद्री तट।

अंडमान और निकोबार 204 द्वीपों का समूह है जिनमें से 38 निर्जन टापू हैं इनका क्षेत्रफल 6,475 वर्ग किलोमीटर है। इसमें ऐसे अनेक पर्वतीय भ्रमण स्थल हैं जहाँ से समुद्र का अथाह नीला जल चारों ओर अपने पूरे विस्तार सहित दिखाई देता है। वायुयान से नीचे देखने पर लगता है जैसे गहरी नीली पृष्ठभूमि पर वनों और नारियल के झुरमुटों का हरा गलीचा बिछा दिया गया हो। लहराती बलखाती समुद्री जल की खाड़ियाँ द्वीपों के भीतर घुसकर उन्हें घेरती मालूम देती हैं। इनकी निर्मल जलराशि में कोरल के बगीचे, जेली फिश और शंख, सीपियाँ और कौड़ियाँ प्रचुरता से बिखरी दिखाई देती हैं। यहाँ की सुनहली धूप, चमचमाती रेत वाले समुद्र तट, गहरी हरियाली से लदे पर्वत और चहचहाते पक्षी, गहरा नीला समुद्र और सतरंगी मछलियाँ किसी का भी मन मोह लेने में सक्षम हैं। अंडमान और निकोबार सागर-वक्ष पर हरे-भरे टापुओं की जीवंत स्थली है। नैसर्गिक सौन्दर्य, वन्य जीवन, भरपूर सागर सम्पदा, जनजातियों का अनुपम जीवन, मोहक रत्नाभूषणों की कारीगरी पर्यटक को बार-बार यहाँ आने के लिये प्रेरित करती हैं।

आर्कटिक महासागरलक्षद्वीप नारियम के ऊँचे-ऊँचे पेड़ों की हरियाली से आच्छादित चिकने रेतीले तटों से घिरा हुआ है। यह मालाबार तट से 220 से 440 किलोमीटर की दूरी पर फैला है। अपने प्रकार का अनोखा यह द्वीपसमूह अपने भीतर प्रकृति के अनेकानेक चमत्कार और रहस्य छिपाए हुए है। लक्षद्वीप का जादुई सौन्दर्य, डॉल्फिन की चुलबुलाहटों और उड़ने वाली मछलियों की कलाबाजियों से सैलानी को मंत्रमुग्ध कर देता है। लक्षद्वीप में कई मूंगे के द्वीप होने के कारण इसे समुद्री सम्पदा का खजाना कहा जाता है। फिरोजी रंग के स्वच्छ पारदर्शी पानी में स्थित मूंगे की चट्टानें और उनके भीतर बाहर तैरती असंख्य रंगों की मछलियाँ किसी तिलिस्म सी दिखाई देती हैं। शीशे के तले वाली नाव में बैठकर यह नजारा देखना अद्भुत अनुभव है।

भारत का प्रत्येक समुद्री तट सैलानियों के लिये कोई न कोई आकर्षण लिये है। समुद्री तटों के पर्यटन की ओर हमने अभी पूरा ध्यान नहीं दिया है। असीम सम्भावनाओं का क्षेत्र होते हुए भी यह अभी तक लगभग अछूता है। पर्यटन की सम्भावनाओं से भरपूर इस क्षेत्र को विकसित करने का प्रयास जितनी जल्दी किया जाएगा, देश के पर्यटन उद्योग के लिये उतना ही अच्छा होगा। आवश्यकता इस बात की है कि इसके लिये पर्यावरण के साथ कोई गम्भीर छेड़-छाड़ न की जाए।

(लेखक ‘युगवार्ता’ के सम्पादक हैं।)

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