भारत में बाढ़-नियंत्रण: आवश्यकता एवं उपाय

Author:डा. वी.के. तोमर, डा. श्याम सुन्दर सिंह चौहान
Source:योजना, जुलाई, 1994

वर्षा के पानी को जलग्रहण क्षेत्रों (कैचमेन्ट एरिया) में ही जगह-जगह चेक-डैम, मिट्टी के बाँध एवं बंधियों तथा जलाशयों का निर्माण करके बाढ़ को नियन्त्रित किया जा सकता है। लेकिन, भारत में इस दिशा में किये गये प्रयास अपर्याप्त एवं अनियोजित हैं। जिन क्षेत्रों में ऐसा कर लिया गया है वहाँ बाढ़ की विभीषिका बहुत बड़ी सीमा तक कम हो गयी है।

नदियों में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है जो विश्व के अनेक भागों में करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति को निगल जाती है। गाँव के गाँव पलक झपकते ही जल-समाधि ले लेते हैं। हरे-भरे खेत, लहलहाती फसलें, बाग, घर-मकान, देखते-देखते नदियों की तेज धारा के साथ बह जाते हैं। अनगिनत पेड़-पौधे एवं दुर्लभ वनस्पतियाँ पानी के तीव्र बहाव के साथ विलीन हो जाते हैं। हजारों व्यक्ति एवं लाखों पशु बाढ़ की भेंट चढ़ जाते हैं। यद्यपि मानव ने अनेकों क्षेत्रों में नित-नयी खोजों से असंख्य समस्याओं का निदान खोज लिया है, बाढ़ की अग्रिम चेतावनी देने के लिये सुदूर-संवेदी उपग्रहों तक का प्रयोग किया जाने लगा है, तथापि बाढ़ से होने वाली विनाशलीला को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सका है।

भारत में बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र


भारत विश्व के उन देशों में से है जहाँ प्रतिवर्ष किसी न किसी भाग में बाढ़ आती है। ब्रह्मपुत्र, गंगा एवं सिंधु नदी तन्त्रों की नदियों से असम, प. बंगाल, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा एवं पंजाब में भयंकर बाढ़ आती है। उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, राजस्थान भी प्रायः बाढ़ से प्रभावित होते रहते हैं। भारत में लगभग 400 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ के खतरे वाला है। यह देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का आठवां भाग है। प्रतिवर्ष औसतन 77 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित होता है; 35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की फसलें नष्ट हो जाती हैं। सर्वाधिक विनाशकारी वर्षा में लगभग 100 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की फसलें नष्ट होने का अनुमान है।

जल आप्लावन का प्रभाव


भारत में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ से जन-धन की अपार क्षति होती है। योजना आयोग के एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष औसतन 1,439 लोग बाढ़ के कारण मारे जाते हैं। वर्ष 1977 में आयी भीषण बाढ़ से 11,316 लोग मौत के शिकार हुए थे। वर्ष 1953-87 की अवधि में बाढ़ के कारण फसलों, मकानों, पशुओं तथा सार्वजनिक सुविधाओं को पहुँचने वाली अनुमानित क्षति 26,800 करोड़ रुपये है। बाढ़ से होने वाली अधिकतम वार्षिक क्षति 4,059 करोड़ रुपये है, जो वर्ष 1985 में हुई थी।

राज्यों से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार वर्ष 1990 में 49 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित हुआ और उस पर 28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खड़ी फसल नष्ट हो गयी। इस वर्ष लगभग 162 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए और इनमें से 882 लोग मारे गये; 1,22,498 पशुओं की मृत्यु हुई। फसलों, मकानों एवं जन सुविधाओं सहित लगभग 41.25 करोड़ रुपये की क्षति हुई। वर्ष 1993 में हिमाचल प्रदेश, पंजाब एवं हरियाणा में अभूतपूर्व बाढ़ आयी, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गये तथा करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति नष्ट हो गयी। देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों, प. बंगाल एवं बिहार में बाढ़ की विनाशलीला प्रतिवर्ष की भाँति जारी है।

बाढ़ एवं जल आप्लावन के लिये उत्तरदायी कारण


भारत में प्रतिवर्ष बाढ़ आती है और उससे जल आप्लावन की स्थिति उत्पन्न होती है। बाढ़ एवं जल आप्लावन की स्थिति के लिये कोई एक कारण उत्तरदायी नहीं है। इसके लिये कुछ कारण जहाँ नितांत प्राकृतिक हैं, वहीं कुछ कारण मानव के स्वयं के कृत्यों की देन हैं। प्राकृतिक कारणों में असमान वर्षा सर्वाधिक प्रमुख कारण है। भारत एक असमान वर्षा वाला देश है। यहाँ का मौसम विशेष प्रकार है। यहाँ 70 से 90 प्रतिशत वर्षा मॉनसून के चार महीनों-जून से सितम्बर में ही हो जाती है। यह भी नहीं कि सभी क्षेत्रों में इन महीनों में एक सी वर्षा होती हो, कहीं बहुत कम तो कहीं बहुत अधिक होती है। विगत वर्षों में वर्षानुवर्ष सामान्य अथवा सामान्य से अधिक मौसम-विज्ञानी उपखण्डों में अंतर आता रहा है। जब किसी वर्ष कुछ उपखण्डों में एक साथ सामान्य से अधिक वर्षा हो जाती है तो उस क्षेत्र में जल भराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। तब उस क्षेत्र से गुजरने वाली नदियों के जल-स्तर में होने वाली वृद्धि नदियों की निचली धारा वाले क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर देती है।

अधिकाधिक भूमि को खेती योग्य बनाने एवं घरेलू व व्यावसायिक कार्यों में लकड़ी का प्रयोग करने लिये जंगलों को साफ किया गया तथा पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की गयी। इससे पर्यावरण में असन्तुलन उत्पन्न हुआ है। इससे जहाँ एक ओर मॉनसून प्रभावित हुआ है, वहीं दूसरी ओर भू-क्षरण एवं नदियों द्वारा कटाव किये जाने की प्रवृत्ति भी बढ़ी हैै।

अत्यधिक वर्षा होने पर शहरी क्षेत्रों में होने वाले जल-भराव एवं हानि के लिये तो मानव ही पूरी तरह से उत्तरदायी है। नदियों के किनारे बसे हुए कस्बों एवं शहरों में विगत वर्षों में जो विस्तार एवं विकास हुआ है उसमें पानी की उचित निकासी की ओर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। गन्दे नालों की सफाई न किए जाने से उनकी पानी बहा ले जाने की क्षमता लगातार कम होती जा रही है। नगर नियोजन का सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें शहर के निचले इलाकों में मकान न बनायें जाकर वहाँ पार्क एवं खेलकूद के मैदान आदि बनाए जाने की ओर ध्यान नहीं दिया गया है। जैसे-जैसे शहरों का आकार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इनमें गन्दी बस्तियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। अधिकांश गन्दी बस्तियाँ निचले इलाकों, नालों के किनारे, तटबंधों के नीचे बस गयी है। बाढ़ आने पर सर्वाधिक हानि इन्हीं बस्तियों में रहने वाले लोगों को उठानी पड़ती है। शहर के जो गन्दे नाले नदियों में गिरते हैं उनमें बाढ़ के पानी के विपरीत बहाव को रोकने के उपाय नहीं किये गये हैं। अधिकांश नगरों में नदियों के पानी को शहर में प्रवेश न करने देने के लिये तटबंध आदि भी नहीं बनाये गये हैं।

बाढ़ की स्थिति को उत्पन्न होने से रोकने के लिये प्रतिरोधात्मक उपाय न अपनाकर बाढ़ आने पर बचाव एवं राहत कार्यों पर अधिक ध्यान दिया गया है। वर्षा के पानी को जलग्रहण क्षेत्रों (कैचमेन्ट एरिया) में ही जगह-जगह चेक-डैम, मिट्टी के बाँध एवं बंधियों तथा जलाशयों का निर्माण करके बाढ़ को नियन्त्रित किया जा सकता है। लेकिन, भारत में इस दिशा में किये गये प्रयास अपर्याप्त एवं अनियोजित हैं। जिन क्षेत्रों में ऐसा कर लिया गया है वहाँ बाढ़ की विभीषिका बहुत बड़ी सीमा तक कम हो गयी है।

भारत में बाढ़-नियंत्रण हेतु किये गये उपाय


भारत सरकार एवं राज्य सरकारें बाढ़ की विभीषिका को कम-से-कम करने के लिये योजना काल से ही प्रयत्नशील हैं। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में अलग से धन की व्यवस्था की जाती है। इस दिशा में किये गये प्रयासों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है:-

(1) राष्ट्रीय बाढ़-प्रबंधन कार्यक्रम:- सन 1954 की भीषण बाढ़ के बाद भारत सरकार ने एक राष्ट्रीय बाढ़-प्रबंधन कार्यक्रम की घोषणा की। यह कार्यक्रम तीन चरणों में विभाजित किया गया है, (1) तात्कालिक, (2) अल्पकालिक एवं (3) दीर्घकालिक। तात्कालिक बाढ़ प्रबंधन, बाढ़ से सम्बंधित आँकड़ों के संकलन तथा आपातकालीन बाढ़ सुरक्षा उपायों तक सीमित है। अल्पकालिक चरण में कुछ चुने हुए क्षेत्रों में नदियों के किनारे तटबंधों का निर्माण किया जाता है, जबकि, दीर्घकालिक चरण में वर्षा के पानी का भंडारण; नदियों, सहायक नदियों पर जलाशयों के निर्माण कार्य आदि किये जाते हैं।। इन कार्यक्रमों पर पहली योजना में 133.77 करोड़, रुपये, दूसरी योजना में 49.15 करोड़ रुपये, तीसरी योजना में 86 करोड़ रुपये, चौथी योजना में 171.8 करोड़ रुपये, पाँचवीं योजना में 298.61 करोड़ रुपये, छठीं योजना में 596.07 करोड़ रुपये तथा सातवीं योजना में 941.58 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है। सन 1954 से मार्च 1989 तक लगभग 15,600 किलोमीटर लम्बे तटबंधों का निर्माण किया जा चुका है, 33,100 किलोमीटर लम्बी जल-निकासी नालियाँ खोदी गयी हैं, 765 नगर-बचाव हेतु वनरोपण कार्य किया गया है तथा 4,705 ग्रामों को ऊँचाई वाले सुरक्षित स्थानों पर बसाया गया है।

(2) जलाशयों का निर्माण:- जिन नदियों की निचली धाराओं में सर्वाधिक एवं विनाशकारी बाढ़ आती थी, उन पर बड़े-बड़े बाँध बनाकर जलाशयों में वर्षा के पानी को रोकने की व्यवस्था की गयी है। इन वृहत-स्तरीय परियोजनाओं में महानदी पर हीराकुंड बाँध, दामोदर नदी घाटी परियोजनाओं सतलुज पर भाखड़ा बाँध, व्यास पर पोंग बाँध तथा ताप्ती पर उकाई बाँध प्रमुख हैं।

(3) समुद्री क्षेत्रों में बाढ़-नियंत्रण:- केरल, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश के समुद्र-तटीय क्षेत्रों में समुद्री बाढ़ आती है। समुद्री तटों पर क्षरण को रोकने की कई परियोजनाएँ प्रारम्भ की गयी हैं। केरल राज्य में सर्वाधिक प्रभावित 320 किलोमीटर लम्बे समुद्री तट में से 311 किलोमीटर लम्बे तट को मार्च, 1990 के अंत तक प्रतिरक्षित कर लिया गया है। इसके अतिरिक्त 42 किलोमीटर लम्बी सामुद्रिक दीवार को मजबूत बनाया गया है। इसी प्रकार कर्नाटक राज्य में मार्च 1990 के अंत तक 73.3 किलोमीटर लम्बे समुद्री तट को सामुद्रिक क्षरण से रोकने हेतु बचाव कार्य किये गये हैं।

(4) बाढ़ का पूर्वानुमान एवं चेतावनी:- बाढ़ प्रबंध हेतु पूर्वानुमान लगाना और पहले से चेतावनी देना महत्त्वपूर्ण तथा किफायती उपायों में से एक है। भारत में यह कार्य सन 1959 से ही किया जा रहा है। केन्द्रीय जल आयोग ने देश की अधिकांश अन्तरराज्यीय नदियों पर कई बाढ़ पूर्वानुमान तथा चेतावनी केन्द्र स्थापित किये हैं। इस समय 157 बाढ़ पूर्वानुमान केन्द्र कार्यरत हैं, जो देश की 72 नदी बेसिनों में हैं। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 5,500 बाढ़ सम्बंधी पूर्वानुमान जारी किये जाते हैं। इनमें से 95 प्रतिशत अनुमान शुद्धता की स्वीकृृत सीमान्तर्गत होते हैं।

(5) ब्रह्मपुत्र बाढ़-नियंत्रण बोर्ड :- ब्रह्मपुत्र और बारक नदी घाटी देश में बाढ़ से प्रभावित होने वाला प्रमुख क्षेत्र है। इस क्षेत्र में बाढ-नियंत्रण का मास्टर प्लान तैयार करने और इसे कार्यान्वित करने के लिये भारत सरकार ने संसद के एक अधिनियम द्वारा सन 1980 में ब्रह्मपुत्र बोर्ड गठित किया है।

आठवीं पंचवर्षीय योजना में बाढ़ नियंत्रण :-आठवीं पंचवर्षीय योजना में बाढ़ नियंत्रण हेतु 1623.37 करोड़ रुपये का परिव्यय निर्धारित किया गया है जो सातवीं योजना के परिव्यय से 71.35 प्रतिशत अधिक है। आठवीं योजना में बाढ़-नियंत्रण हेतु निर्धारित परिव्यय में से 1293 करोड़ रुपये राज्यों, 48.28 करोड़ रुपये संघ राज्य क्षेत्रों तथा 282.09 करोड़ रुपये केन्द्रीय क्षेत्र के लिये निर्धारित किए गए हैं। इस योजना में सर्वाधिक परिव्यय (280 करोड़ रुपये) प. बंगाल के लिये निर्धारित किया गया है, जो सातवीं योजना के वास्तविक व्यय (105 करोड़ रुपये) से 166.67 प्रतिशत अधिक है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश के लिये आठवीं योजना में मात्र 70 करोड़ रुपये का परिव्यय निर्धारित है, जो सातवीं योजना के वास्तविक व्यय 102 करोड़ रुपये से 56.52 प्रतिशत कम है। इसी प्रकार हरियाणा को सातवीं योजना के निर्धारित परिव्यय से इस बार कम आवंटन किया गया है। आंध्र प्रदेश के लिये आठवीं योजना में बाढ़-नियंत्रण हेतु निर्धारित परिव्यय सातवीं योजना की तुलना में 423.3 प्रतिशत अधिक है। आठवीं योजना में बाढ़-नियंत्रण हेतु अपनायी जाने वाली कार्यनीति के प्रमुख तत्व निम्न प्रकार हैं:-

1. जलाक्रांत क्षेत्रों की स्थिति तथा स्वरूप का पता लगाने तथा मौजूदा सिंचाई परियोजना क्षेत्रों में लवण/खारी जमीनों का मूल्यांकन करने के लिये एक क्रमबद्ध सर्वेक्षण किया जायेगा। ऐसी भूमि का उद्धार करना और किफायती ढंग से उसकी उत्पादन क्षमता बहाल करना एक ऐसा क्षेत्र होगा जिस पर अधिक जोर दिया जायेगा।

2. राज्य सरकारों तथा केन्द्रीय सरकार द्वारा बाढ़ सम्बंधी पूर्वानुमानों और चेतावनी प्रणाली का अधिक क्षेत्रों तक विस्तार किया जायेगा।

3. राज्य सरकारों तथा केन्द्रीय सरकार द्वारा विभिन्न नदी घाटियों के लिये बाढ़ नियंत्रण सम्बंधी मास्टर प्लान तैयार किये जायेंगे। कुछ नदी घाटियों के लिये पहले से तैयार किये गए मास्टर प्लानों को और अधिक विस्तृत बनाने और, जहाँ आवश्यक है, अद्यतन करने के बाद विस्तृत बनाने की ओर अधिक ध्यान दिया जायेगा।

4. राज्य सरकारों को बाढ़-नियंत्रण निर्माण कार्यों का बड़े पैमाने पर कार्योत्तर मूल्यांकन करना चाहिए। इन मूल्यांकन अध्ययनों के आधार पर प्रशासनिक तथा तकनीकी दोषों के बारे में सुधारात्मक कार्रवाई की जाएगी।

बाढ़-नियंत्रण हेतु कुछ अन्य सुझाव


बाढ़ प्राकृतिक आपदा हो सकती है। विकास प्रक्रिया के कतिपय दोषों के कारण इसका स्वरूप विकराल भी हो सकता है, लेकिन इस पर नियंत्रण करने का कार्य कठिन होते हुए भी, दुर्जेय नहीं है। सुव्यवस्थित आयोजन एवं कार्यनीति को अपना कर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा की जा सकती हैं कि बाढ़ एवं जल आप्लावन की स्थिति उत्पन्न ही न हो।

बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा भले ही हो लेकिन इस पर प्रभावपूर्ण तरीके से नियंत्रण करके इससे होने वाली क्षति को एक बहुत बड़ी सीमा तक कम किया जा सकता है। बाढ़-नियंत्रण हेतु दो प्रकार के उपाय अपनाने होंगे, 1. निरोधात्मक तथा, 2. राहत एवं बचाव कार्य। निरोधात्मक उपायों का सम्बंध ऐसे दीर्घकालिक एवं स्थायी उपायों से है जिन्हें अपनाने से बाढ़ एवं जल का आप्लावन की स्थिति उत्पन्न न होने देने में सहायता मिलेगी। इसके लिये नदियों, सहायक नदियों तथा नालों पर जगह-जगह पर चेक-डैम बनाकर जलाशयों का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि वर्षा के पानी को नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में ही प्रभावपूर्ण ढंग से रोका जा सके। इसके कई लाभ होंगे, जैसे-प्रथम, अत्यधिक वर्षा होने पर भी नदियों में पानी की मात्रा को नियंत्रित करके निचली धाराओं में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होने से रोकी जा सकेगी। द्वितीय; जब नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में ही पानी के बहाव को नियंत्रित कर लिया जायेगा तो पानी के तीव्र बहाव के साथ होने वाला भू-क्षरण भी कम होगा। तृतीय, नदियों द्वारा उपजाऊ भूमि के कटाव की समस्या स्वतः नियंत्रित एवं न्यूनतम हो जाएगी। चतुर्थ, जगह-जगह पर बनाए गए जलाशयों से उस क्षेत्र के भूमिगत जल स्रोतों की पुनरपूर्ति होती रहेगी, जिससे उस क्षेत्र के भूमिगत जल का स्तर नीचे नहीं जायेगा। इससे उन क्षेत्रों को बहुत अधिक लाभ पहुँचेगा, जहाँ भूमिगत जल स्रोतों का अतिदोहन किए जाने के परिणामस्वरूप जलस्तर में निरन्तर गिरावट आती जा रही है। पंचम, इस प्रकार के कार्यों से रोजगार के नवीन अवसर सृजित होंगे। निर्माण कार्यों से लोगों को तत्काल प्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त होगा। अप्रत्यक्ष रूप से जलाशयों में मत्स्य-पालन प्रारम्भ कर देने से रोजगार प्राप्त होगा तथा मत्स्य उत्पादन में भी वृद्धि होगी।

निरोधात्मक उपायों के दूसरे वर्ग में वे उपाय आते हैं, जिन्हें अपनाकर बाढ़ के पानी को क्षेत्र विशेष में प्रवेश करने देने से रोका जा सकता है। यह विधि नदियों के किनारे बसे नगरों, कस्बों एवं ग्रामों को बाढ़ की विभीषिका से बचाने के लिये अधिक उपयोगी है। इसके लिये तटबंधों का निर्माण कराया जाना चाहिए। नगर नियोजन एवं स्थल विकास नियोजन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि निचले इलाके पार्क एवं खेल के मैदान, हरित पट्टी आदि के लिये आरक्षित कर दिये जाएँ, जबकि मकान एवं व्यावसायिक भवन आदि ऊँचे स्थानों पर बनाये जाएँ। पानी की निकासी की समुचित व्यवस्था की जाए। नदियों में गिरने वाले नालों में बाढ़ के पानी के विपरीत बहाव को रोकने की व्यवस्था की जाए। गन्दे नालों के किनारे, तटबंधों के नीचे, निचले स्थानों पर लोगों के बसने को रोका जाए।

छोटे जलग्रहण क्षेत्रों के लिये जलीय आँकड़ों पर नजर रखने, मिट्टी के छोटे बाँधों के मानकीकरण, अधिक बाढ़ वाले पानी का निपटान करने के लिये व्यवस्था और बेहतर वितरण प्रणालियों को विकसित करने की ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

बाढ़-नियंत्रण के सम्बंध में बहुत से राज्यों ने नदी अनुसंधान संस्थानों को प्रायोजित किया है। परन्तु कुछेक को छोड़कर ऐसे संस्थान निरन्तर अनुसंधान और विकास सम्बंधी प्रयासों में अधिक योगदान नहीं दे पा रहे हैं। इन संस्थानों द्वारा फोटोग्रामैट्री विधि तथा उपग्रहों से प्राप्त आँकड़ों एवं चित्रों की सहायता से बाढ़ के खतरे वाले क्षेत्रों में विस्तृत मानचित्र बनाकर जलनिकासी एवं जलाशय निर्माण की सम्भावनाओं का पता लगाना चाहिए तथा तद्नुसार बाढ़ हेतु मास्टर प्लान तैयार किये जाने चाहिए।

बाढ़-प्रबंध योजनाओं को एकीकृत दीर्घकालिक योजना के ढाँचे के अन्तर्गत और जहाँ उपयुक्त हो वहाँ सिंचाई, विद्युत एवं घरेलू जल आपूर्ति जैसी अन्य जल संसाधन विकास योजनाओं के साथ मिलाकर आयोजित किये जाने की आवश्यकता है। इससे बाढ़-नियंत्रण योजनाओं की कारगरता को बढ़ाया जा सकेगा तथा उनकी आर्थिक व्यवहार्यता में भी सुधार होगा।

निकट भविष्य में पारम्परिक निर्माण कार्यों जैसे- तटबंधों का निर्माण, जलनिकासी, नालियों की खुदाई एवं बाढ़ के क्षेत्र बनाने आदि पर जोर देना जारी रहेगा। तकनीकी एवं आर्थिक दृष्टिकोण से इस प्रकार के निवेशों की प्रभावशीलता में सुधार लाने का व्यापक क्षेत्र अभी भी विद्यमान है। इसके लिये यह आवश्यक है कि अब तक लागू की गयी बाढ़-प्रबंध परियोजनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया जाना चाहिए, ताकि यह ज्ञात हो सके कि परियोजना में किए गए बचाव की सीमा तथा गुणवत्ता के बारे में लगाए गए पूर्वानुमानों के सन्दर्भ में परियोजना किस सीमा तक लाभकारी रही है। इस प्रकार के मूल्यांकनों से प्रशासनिक एवं तकनीकी दोषों का भी पता चलेगा, जिन्हें ठीक करना आठवीं योजना में बाढ़-प्रबंध कार्यनीति का सर्वप्रथम कार्य होना चाहिए।

पूर्व में पूरे किये गये निर्माण कार्यों का अनुरक्षण करना, उनकी लागत में किफायत और अनुसंधान तथा विकास सम्बंधी निरन्तर प्रयास, विशेष रूप से प्राकल्प की लागत प्रभाविता बढ़ाने के लिये, क्योंकि फिलहाल ये अधिकांशतः अनुभव-जन्य आधार पर तैयार किए जाते हैं, आदि कुछ ऐसे कार्य हैं जिन्हें भावी कार्यनीति में सम्मिलित करना होगा।

बाढ़-नियंत्रण का दूसरा पहलू बचाव एवं राहत तथा पुनर्वास कार्यों से सम्बंधित है। उपग्रहों से प्राप्त चित्रों एवं अन्य पैरामीटरों का प्रयोग करके अब बहुत पहले से क्षेत्र विशेष में भारी वर्षा होने तथा बाढ़ आदि आने के बारे में चेतावनी दी जा सकती है। इस कार्य में मौसम-विज्ञान विभाग, केन्द्रीय जल आयोग, आकाशवाणी व दूरदर्शन तथा दूर-संचार विभाग के बीच उच्चस्तरीय समन्वय होना चाहिए ताकि लोगों को अग्रिम चेतावनी देकर उन्हें सुरक्षित स्थानों पर भेजा जा सके। इस प्रकार की चेतावनी देने के लिये आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर विशेष बुलेटिन प्रसारित किए जाने चाहिए।

बाढ़ से घिरे लोगों को यथाशीघ्र निकालने, उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर राहत सामग्री उपलब्ध कराने की व्यवस्था युद्धस्तर पर की जानी चाहिए। बाढ़ के बाद महामारियों को रोकने के उचित प्रबंध कर लिये जाने चाहिए।

बाढ़ से क्षतियों का निर्धारण करने के वर्तमान तरीकों में भी सुधार करने की आवश्यकता है। उपलब्ध आँकड़े अलग-अलग योजनाओं के किसी समूह के लाभ-लागत-अनुपात का निर्धारण करने के लिये पर्याप्त आधार उपलब्ध नहीं कराते। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने सिफारिश की थी कि राज्य सरकार को तीन अलग-अलग अभिनिर्धारित वर्गों के अन्तर्गत घाटीवार बाढ़ की क्षतियों का मूल्यांकन करना चाहिए, अर्थात (1) असुरक्षित क्षेत्र, (2) सुरक्षात्मक निर्माण कार्यों की असफलता के कारण असुरक्षित क्षेत्र, (3) तटबंध और नदी के बीच क्षेत्र। वर्तमान में राज्यों में अलग-अलग विभागों और केन्द्र में विभिन्न मंत्रालयों द्वारा बाढ़ की क्षति के आँकड़े एकत्रित किए जाने से अनेक प्रकार की भ्रान्तियाँ उत्पन्न होती हैं। बाढ़-नियंत्रण सम्बंधी कार्यनीति और प्राथमिकताओं की आयोजना के आधार को सुदृढ़ बनाने के लिये क्षेत्र में बाढ़ की क्षति के आँकड़े एकत्र करने, उनका मूल्यांकन करने, उनका रिकार्ड रखने की वर्तमान तकनीकों में सुधार किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष:- बाढ़ प्राकृतिक आपदा हो सकती है। विकास प्रक्रिया के कतिपय दोषों के कारण इसका स्वरूप विकराल भी हो सकता है, लेकिन इस पर नियंत्रण करने का कार्य कठिन होते हुए भी, दुर्जेय नहीं है। सुव्यवस्थित आयोजन एवं कार्यनीति को अपना कर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा की जा सकती हैं कि बाढ़ एवं जल आप्लावन की स्थिति उत्पन्न ही न हो। अब तो ऐसी टेक्नोलाॅजी का विकास हो गया है जिसका प्रयोग करके दो या तीन दिन पूर्व ही अधिकाधिक वर्षा होने या बाढ़ आने की चेतावनी देकर लोगों को बाढ़ के खतरों से बचाया जा सकता है तथा बहुत बड़ी सीमा तक बाढ़ से होने वाली क्षति को न्यूनतम किया जा सकता है।

डा. वी.के. तोमर
के.ए. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कासगंज, एटा, (उ.प्र.)
डा. श्याम सुन्दर सिंह चैहान
अध्यक्ष, अर्थशास्त्र विभाग, राजकीय महाविद्यालय, चरखारी, हमीरपुर (उ.प्र.)

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