भारत में जल संचय की परंपराएं

Author:कृष्ण गोपाल 'व्यास’
Source:पानी, समाज और सरकार (किताब)

पृथ्वी, जल का आश्रय है। जल का सूक्ष्य रूप ही प्राण है। मन, जलीय तत्वों अर्थात विचारों का समुद्र है। वाणी की सरसता और जीवों में आर्द्रता का कारण भी जल ही है। आंखों की देखने की ताकत और उसकी सरसता का कारण भी जल है। जल, कानों का सहवासी है। जल का निवास धरती पर है। अंतरिक्ष में जल व्याप्त है। समुद्र, जल का आधार है तथा समुद्र से ही, जल वाष्प बनकर वर्षा के रूप में धरती पर आता है उपर्युक्त सभी विवरण, तत्कालीन समाज को, पानी के बारे में वैज्ञानिक जानकारी देते प्रतीत होते हैं। पानी, समाज और सरकार के रिश्तों की यह कहानी बहुत पुरानी है। इस कहानी का पहला पात्र जो पानी से जुड़ा वो निश्चय ही आदमी रहा होगा। कबीले, राजे-महाराजे, बादशाह और सरकारें बाद में आई। जहां तक भारत का प्रश्न है तो लगता है कि भारत में सबसे पहले ऋषि, मुनि और समाज के योग-क्षेम से जुड़े विद्वानों ने ही इस रिश्ते को कायम करने और आगे ले जाने का काम किया होगा।

भारत में जलय संचय की पुरानी प्रणालियों और परंपराओं का इतिहास लगभग 5000 साल पुराना है। पानी और समाज के संबंधों की कहानी का सबसे अधिक पुराना और पुख्ता प्रमाण वैदिक साहित्य में मिलता है। इस विवरण के अनुसार हजारों साल पहले, भारतीय मनीषियों ने वैदिक साहित्य में पानी की महिमा; जो समाज के लिए अर्जित किए जा रहे ज्ञान, पानी के प्रति सम्मान, नजरिए, जनहित एवं योग-क्षेम से जुड़ी है; का वर्णन किया है।

वैदिक साहित्य में पानी


ऋग्वेद (18.82.6) में उल्लेख है कि जल में सभी तत्वों का समावेश है। जल में सभी देवताओं का वास है। जल से पूरी सृष्टि, सभी चर और अचर जगत पैदा हुआ है। यजुर्वेद (27.25) में कहा है कि सृष्टि का बीज, सबसे पहले, पानी ही में पड़ा था और उससे अग्नि पैदा हुई। ऋग्वेद की ऋचा (18.82.6) में प्राकृतिक जल चक्र का वर्णन है जिसके अनुसार सूर्य की गर्मी/ताप से पानी छोटे-छोटे कणों में बंट जाता है।

हवा के द्वारा ऊपर उठाया जाकर बादलों के रूप में बदलकर, वह, बारम्बार बरसात के रूप में धरती पर लौटता है। वेदों ने भी उपर्युक्त तथ्यों की पुष्टि की है जिसके अनुसार सूर्य एवं वायु मिलकर जल को, भाप (वाष्प) में बदलकर, मेघ बनाते हैं और (मेघ से) पानी, बरसात के रूप में, धरती पर लौटता है।

यजुर्वेद की ऋचा (13.53) में कहा गया है कि पानी का आश्रय स्थल हवा है। हवा, पानी को आकाश में इधर से उधर बहाकर ले जाती है। जल, औषधियों में है। जल के कारण ही औषधियों की वृद्धि होती है। बादल का रूप ही जल का सार है। जल का प्रकश, विद्युत है। जल से ही विद्युत की उत्पत्ति होती है।

पृथ्वी, जल का आश्रय है। जल का सूक्ष्य रूप ही प्राण है। मन, जलीय तत्वों अर्थात विचारों का समुद्र है। वाणी की सरसता और जीवों में आर्द्रता का कारण भी जल ही है। आंखों की देखने की ताकत और उसकी सरसता का कारण भी जल है। जल, कानों का सहवासी है। जल का निवास धरती पर है। अंतरिक्ष में जल व्याप्त है। समुद्र, जल का आधार है तथा समुद्र से ही, जल वाष्प बनकर वर्षा के रूप में धरती पर आता हैं उपर्युक्त सभी विवरण, तत्कालीन समाज को, पानी के बारे में वैज्ञानिक जानकारी देते प्रतीत होते हैं।

अथर्ववेद में कहा गया है कि जल औषधि है। जल रोगों को दूर करता है। जल सब बीमारियों का नाश करता है, इसलिए यह तुम्हें भी सभी कठिन बीमारियों से दूर रखे। हे ईश्वर, दिव्य गुणों वाला जल हमारे लिए सुखदायी हो, अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति कराए, हमारी प्यास बुझाए, संपूर्ण बीमारियों का नाश करे, रोग जनित भय से मुक्त करे तथा हमारी नजरों के सामने (सदा) प्रवाहमान रहे। यह विवरण तत्कालीन समाज को पानी के औषधीय गुणों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी देता प्रतीत होता है।

भारतवर्ष में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र माना जाता है। इसके जल के बारे में कहा जाता है कि उसमें कीटाणु नष्ट करने की अदभुत क्षमता है। यह क्षमता भारत की अन्य किसी भी नदी के पानी में नहीं है। भारत के कोने-कोने से लोग गंगा स्नान करने आते हैं। आने वाले हिन्दू श्रद्धालु अपने साथ गंगा जल ले जाते हैं जिसका उपयोग धार्मिक कृत्यों और पूजा पाठ में किया जाता है।

नदियों के तट पर बरसों से मेले और महोत्सव मनाए जा रहे हैं। इस अनुक्रम में कुंभ और सिंहस्थ, जल के महापर्व हैं। वे भारतीय संस्कृति में सदियों से रचे बसे हैं और हिन्दुओं की अटूट आस्था के केन्द्र हैं।

समुद्र मंथन की पौराणिक कथा बताती है कि अमृत पाने के लिए देवों और दानवों के बीच संग्राम हुआ था। संग्राम के दौरान जिन चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरीं थीं, कालांतर में, उन्हीं स्थानों पर कुंभ मेले आयोजित किए जाने लगे। उल्लेख है कि अमृत की बूंदें हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में गिरी थीं। इन चारों स्थानों पर 12 साल के अंतराल से कुंभ मेले आयोजित होते हैं। केवल उज्जैन का (कुंभ) मेला सिंहस्थ कहलाता है। हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में इन कुंभ मेलों के आयोजन की तिथियां राशियों एवं ग्रहों की स्थिति के अनुसार तय की जाती हैं।

वाराहमिहिर का भूजल विज्ञान


आर्यभट्ट प्रथम के शिष्य वाराहमिहिर (ईसा से 587-505 साल पहले, कुछ लोग इसे बाद का भी मानते हैं) ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ वृहत्संहिता में भूजल की खोज और उसके उपयोग के बारे में 125 सूत्र प्रस्तुत किए हैं। निश्चय ही वाराहमिहिर ने धरती पर मौजूद विभिन्न लक्षणों और उन लक्षणों को पैदा करने में पानी की भूमिका को समझा होगा और फिर पानी की मौजूदगी की सटीक भविष्यवाणी को सूत्रों के रूप में वर्णित किया। इन सूत्रों की मदद से करीब 600 मीटर की गहराई तक मिलने वाले पानी के बारे में भविष्यवाणी करना संभव है। निश्चय ही, यह वाराहमिहिर की अदभुत उपलब्धि है जो समाज को पानी प्राप्त करने वाले ज्ञान से जोड़ती है।

वृहत्संहिता के अनुसार, जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में नाड़ियां होती हैं उसी प्रकार धरती में भी कई ऊंची और कई नीची शिराएं या नाड़ियां होती हैं। यह सर्वविदित है कि पृथ्वी पर आठ दिशाएं हैं। इन आठों दिशाओं के स्वामी आठ देवता हैं। वृहत्संहिता के अनुसार, धरती में भी आठ शिराएं होती हैं और इनके बीच एक बड़ी शिरा होती है जिसे महाशिरा कहते हैं। इसके अलावा धरती में और भी सैकड़ों शिराएं होती हैं।

इन शिराओं के नाम, उनकी दिशाओं के स्वामियों के नाम पर रखे गए हैं। वृहत्संहिता के अनुसार पाताल से सीधे ऊपर की ओर निकलने वाली तथा पूर्व, दक्षिण, उत्तर एवं पश्चिम से निकलने वाली शिराएं शुभ तथा आग्नेय कोण, नैऋत्य कोण, वायव्य कोण और ईशान कोण से निकलने वाली शिराएं अशुभ होती है।

प्रकृति में तांबे, सीसे, जस्ते, सोने इत्यादि धातुओं के खनिज भंडार पाए जाते हैं। कई बार ये भंडार जमीन में दबे होते हैं और विभिन्न गहराइयों पर मिलते हैं। उपर्युक्त भूमिगत खनिज भंडारों की उपस्थिति को दर्शाने वाले संकेतक, इन खनिज भंडारों के ऊपर की जमीन की सतह पर मिलते हैं। इसी तरह अनेक फूलों और वनस्पतियों में धरती के नीचे के खनिज भंडरों के संकेतक पाए जाते हैं।

इन उदाहरणों से लगता है कि इसी तरह कतिपय वनस्पतियां, चट्टानें और जीव-जंतु मूल रूप से भूजल की उपर्युक्त शिराओं की उपस्थिति को दर्शाते हों, इसलिए यह अनुमान लगाना उचित होगा कि वराहमिहिर ने भूमिगत जल के उपर्युक्त संकेतकों को पहचान लिया हो और उन संकेतकों को जमीन के नीचे के पानी की भविष्यवाणी करने में प्रयुक्त किया हो।

भूमिगत जल की उपस्थिति तथा शिराओं के संकेतों को समझने के लिए वराह संहिता के सूत्र 54.6 एवं 54.7 का उदाहरण लेना उपयोगी होगा जिनके अनुसार जल विहीन क्षेत्र में यदि बेंत का वृक्ष दिखाई दे तो उस वृक्ष के पश्चिम में तीन हाथ (4.5 फीट या 53 इंच) दूर डेढ़ पुरुष (एक पुरुष बराबर पांच हाथ या 7.5 फीट) की गहराई पर पानी मिलेगा।

इस निष्कर्ष का आधार, पश्चिमी शिरा है जो पानी मिलने वाले स्थान से बहती है। अगले सूत्र में आगे कहा है कि आधा पुरुष खुदाई करने पर हल्के पीले रंग का मेंढक मिलेगा, उसके बाद पीले रंग की मिट्टी और उसके बाद सपाट परतों वाला पत्थर मिलेगा। इस सपाट परतदार पत्थर के नीचे 11.25 फीट की गहराई पर पानी मिलेगा।

आधुनिक युग में इकोलाजी परिचित विज्ञान है। यह वनस्पति विज्ञान की शाखा है। इसका अध्ययन करने वाले बताते हैं कि प्रकृति में चंद ऐसे वृक्ष मौजूद हैं जो जमीन में पानी की मौजूदगी की जानकारी देते हैं। प्रोसोपिस-स्पाइसिजेरा, अकेसिया अरेबिका और साल्वेडोरा ओलीवायडिस नामक वृक्षों की जड़ें, मरुस्थलीय परिस्थितियों में भी, पानी तक पहुंचने की क्षमता रखती हैं। इसी तरह जामुन और टरमिनेलिया स्पाइसिजेरा के वृक्ष, सामान्यतः नम और घाटियों के निचले भाग में ही पाए जाते हैं। इसी तरह बलुआ, ग्रिटी तथा पीली, धूसर, किस्म की मिट्टियों के नीचे अक्सर पानी मिलता है। इकोलॉजी पारिस्थितिकी और वराहमिहिर के परंपरागत विज्ञान के बीच गहरा संबंध प्रतीत होता है इसलिए वैज्ञानिक आधार पर दोनों विज्ञानों के बीच समझ विकसित करने की आवश्यकता है।

वनस्पति शास्त्र एवं प्राणी शास्त्र में बहुत तरक्की हुई है पर वह तरक्की और अद्यतन ज्ञान, भूजल की सटीक खोज को बहुत आगे नहीं ले जा सका है। इसी तरह भूजल विज्ञान ने पिछले 40 से 50 साल में बहुत तरक्की की है। चट्टानों के गुणधर्म एवं भू-भौतिकी की विधियों की मदद से काफी गहराई तक के पानी की खोज होने लगी है पर आधुनिक भूजल-विज्ञान एवं वराहमिहिर के देशज विज्ञान के चश्मे से देखे संकेतकों पर आधारित खोजों के बीच, समझ और समझदारी का पुल, आज तक नहीं बन पाया है।

पूर्व और पश्चिम के ज्ञान के अंतर और समझ के बीच की दूरी कम नहीं हुई है। कुछ लोगों को लगता है कि ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में इस दूरी को पाटने की जरूरत है तो ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो भारत के प्राचीन ज्ञान को गुजरे जमाने की फालतू चीज मानते हैं। कुछ लोग आधुनिक विज्ञान को अंतिम सत्य समझते हैं।

सौभाग्य से सेंटर फार साइंस एंड इंवायरमेंट की सुनीता नारायण, तरुण भारत संघ के राजेन्द्र सिंह और गांधी शांति प्रतिष्ठान के अनुपम मिश्र जैसे कुछ लोग, देश की प्राचीन परंपराओं और उनके पीछे छिपी विज्ञान सम्मत तार्किक बुनियाद की समझ को समाज के सामने लाने और उसे आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

भारत में जल संचय की परंपराएं


भारत में जल संचय की प्राचीन परंपराओं का प्रामाणिक दस्तावेजीकरण सेंटर फार साइंस एंड इंवायरमेंट (सीएसई), नई दिल्ली के अनिल अग्रवाल और सुनीता नारायण ने किया है। इस दस्तावेजीकरण में देश के विभिन्न जलवायु क्षेत्रों की पारंपरिक जल संचय प्रणालियों के विकास, ह्रास और उनमें मौजूद संभावनाओं की कहानी का सजीव चित्रण उपलब्ध है। इसके अलावा अनुपम मिश्र ने अपनी पुस्तकों ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ और ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में प्राचीन परंपराओं का सजीव विवरण दिया है। इन प्राचीन जल प्रणालियों और देशज परंपराओं की समझ की झलक अगले पृष्ठों में दी गई है।

भारत में सतही जल संचय की प्राचीन प्रणालियों के बारे में कई स्थानों पर ऐतिहासिक प्रमाण मिले हैं। सबसे पहला प्रमाण धौलावीरा में मिला है। यह स्थान कच्छ के रण में खादिर द्वीप के उत्तर पश्चिमी छोर पर स्थित है। इस स्थान पर सिंधु घाटी की सभ्यता (ईसा से 3000 से 1500 साल पूर्व) के अवशेष मिले हैं।

तत्कालीन समाज ने इस स्थान पर, बरसात के पानी को एकत्रित करने के लिए अनेक जलाशयों का निर्माण किया था। हड़प्पा काल के ऐतिहासिक स्थलों की खुदाई से पता चलता है कि उस काल में बने हर तीसरे मकान में कुआं था। कुओं के मिलने का अर्थ है कि उस काल में पानीदार कुएं बनाने की तकनीक विकसित हो गई थी।

कौटिल्य (ईसा से 321 से 297 साल पूर्व) के अर्थशास्त्र में बरसाती पानी को एकत्रित कर उससे सिंचाई करने वाली प्रणाली का जिक्र है। इस जानकारी के आधार पर कहा जा सकता है कि ईसा से लगभग 300 साल पहले लोगों को बरसात के चरित्र, मिट्टी के भेद और सिंचाई की तकनीकों की जानकारी थी। उस काल में जल वितरण प्रणालियों को बनाने, चलाने और रखवाली करने का काम समाज करता था। उस काल में राजा का काम समाज को आवश्यक मदद देने और गड़बड़ी करने वालों को कठोर सजा देने का था।

जल रोगों को दूर करता है। जल सब बीमारियों का नाश करता है, इसलिए यह तुम्हें भी सभी कठिन बीमारियों से दूर रखे। हे ईश्वर, दिव्य गुणों वाला जल हमारे लिए सुखदायी हो, अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति कराए, हमारी प्यास बुझाए, संपूर्ण बीमारियों का नाश करे, रोग जनित भय से मुक्त करे तथा हमारी नजरों के सामने प्रवाहमान रहे। यह विवरण तत्कालीन समाज को पानी के औषधीय गुणों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी देता प्रतीत होता है।पुरातत्ववेत्ता बीबी लाल को गंगा की बाढ़ के अतिरिक्त पानी को तालाबों में एकत्रित करने वाली प्रणाली के अवशेषों के प्रमाण इलाहाबाद से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित श्रृंगवेरपुरा में मिले हैं। इस तालाब की आयु लगभग 2700 साल आंकी गई है। महाभारत काल के तालाबों में ब्रह्मसर, कर्णझील और शुक्रताल उल्लेखनीय हैं। गीता के उपदेश एवं कौरवों और पांडवों की युद्धभूमि के रूप में विख्यात कुरूक्षेत्र में ब्रह्मसर है। करनाल के पास कर्णझील स्थित है तो हस्तिनापुर में शुक्रताल।

सिंधु घाटी में प्राचीन जल प्रणालियों के चिह्न 10वी शताब्दी से मिलते हैं। तोमर वंश के राजा अनंगपाल ने सन 1020 में सूरजकुंड नाम का अर्ध चंद्राकार तालाब बनवाया था। दिल्ली में राजधानी बनने के बाद, अलग-अलग कालखंडों में अनेक तालाब और जलमार्ग या नहरें बनाई गईं। गंगा के कछार में तालाबों का प्रचलन था। ये तालाब सामान्य आकार के होते थे और उनका क्षेत्रफल अक्सर एक हेक्टेयर के आसपास होता था। उनकी पाल मिट्टी की होती थी और अधिकतम गहराई छह मीटर होती थी।

सांची, मध्य प्रदेश में ईसा से 300 साल पहले सम्राट अशोक ने पहाड़ी पर तीन तालाब बनवाए थे। एक पहाड़ के ऊपर और दो पहाड़ के ढलान पर - करीब 500 मीटर की दूरी पर। बरसात का पानी, एक के बाद एक तालाब को भरता था। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा तालाबों के पानी का उपयोग निस्तार कार्यों में किया जाता था। इन तीनों तालाबों की जल भराव क्षमता लगभग 22.7 लाख लीटर है।

दसवीं सदी में जैसलमेर और जोधपुर के रेगिस्तानी इलाके में बरसात के पानी को खडीनों में रोककर, उनसे सैकड़ों मन अनाज पैदा किया जाता था। अनुपम मिश्र के शब्दों में खडीन खेत बाद में है, पहले तालाब है।

भोपाल के पास इस्लामनगर (जगदीशपुरा) में जल संचय की अनोखी प्रणाली है। इस्लामनगर के पास हलाली और पातरा नदियों का संगम है। इन दोनों नदियों पर एक दूसरे के लम्बवत दो बांध बनाए गए हैं जो नहर द्वारा एक दूसरे से जुड़े हैं। इस प्रणाली की पहली विशेषता यह है कि पानी की कमी होने पर बांध (जलाशय) एक दूसरे की पानी की कमी दूर करते हैं। इस प्रणाली की दूसरी विशेषता यह है कि दोनों जलाशयों के पूरा भरते ही अतिरिक्त पानी पातरा नदी में मिलकर बह जाता है।

मध्य हिमालय तथा लोअर हिमालय के बीच की चौड़ी घाटियों जहां कश्मीर घाटी, जम्मू, हिमाचल प्रदेश, टिहरी गढ़वाल, दार्जिलिंग, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मेघालय, मणीपुर, मिजोरम और ब्रह्मपुत्रा नदी की असम घाटी स्थित है, में कुहल (नहर) प्रणाली प्रचलन में थी। ये नहरे पहाड़ों के ढाल को काटकर बनाई जाती थीं। ढाल पर बहने वाली नदियों एवं सोतों से नहरों को पानी मिलता था।

इस पानी से सीढ़ीदार खेतों की सिंचाई की जाती थी। बड़े कुहलों से लगभग 400 हेक्टेयर तक के रकबे की सिंचाई संभव थी।

मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले के सोंडवा ब्लाक के भील आदिवासियों ने अपने इलाके की भू-आकृतियों से तालमेल बिठाती पाट पद्धति विकसित की है। इस पद्धति में किसान पहाड़ी स्रोतों के पानी को मोड़कर अपने खेतों में ले जाता है और सिंचाई करता है। यह जल प्रबंध का पर्यावरण के अनुकूल, व्यावहारिक और देशज तरीका है। यह पद्धति गुरुत्व बल के विरूद्ध काम करती है और नदी तल के ऊपर स्थित खेतों को पानी उपलब्ध कराती है।

तमिलनाडु में तालाब, कुएं और नहरें बनाने का चलन था। मदुरै में नदियों से पानी लेकर नहरें बनाई गई थीं। ये नहरें रास्ते के तालाबों को भी पानी देती थीं। उत्तरी अर्काट जिले में तालाब और एनीकट का चलन था। इन एनीकटों से असंख्य तालाबों को पानी दिया जाता था।