भारत में साठ फीसदी बीमारियों का कारण अशुद्ध पानी

Author:राहुल यादव
Source:कुरुक्षेत्र, जनवरी 2013
भारत सरकार की ओर से हर नागरिक को शुद्ध पेयजल एवं स्वच्छ वातावरण मुहैया कराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन यह कोशिश तभी परवान चढ़ पाएगी जब आम आदमी इसमें सहयोग करे। शुद्ध पानी को निरंतर हासिल करने के लिए हमें परंपरागत जल स्रोतों को भी शुद्ध रखना होगा। यदि परंपरागत जलस्रोतों को भुला दिया गया तो आने वाले समय में दोहरी चुनौतियों से जूझना होगा क्योंकि भारत में 60 फीसदी से ज्यादा बीमारियां अशुद्ध पानी की वजह से हो रही हैं।

भूजल समस्या खड़ी हो गई है। इस समस्या से निबटने के लिए पारंपरिक जल स्रोतों की ओर लौटना होगा। पुराने कुओं एवं तालाबों की मरम्मत के साथ ही नए कुओं एवं तालाबों की खुदाई करानी होगी।भारत विकास से विकसित देश बनने की तैयारी में है। समय के साथ भारत में नए संसाधनों का विकास हो रहा है तो ग्रामीण संरचना में भी काफी हद तक परिवर्तन दिखने लगा है। भारत सरकार की ओर से ग्रामीण पेयजल एवं स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। सरकार की मंशा है कि हर नागरिक को स्वच्छ माहौल मिले और पीने के लिए शुद्ध पानी। चूंकि तमाम बीमारियों की जड़ पानी होती है। इस वजह से सरकार शुद्ध पानी मुहैया कराने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन इस प्रयास में कई तरह की दिक्कतें भी खड़ी हो रही हैं। अभी भी ग्रामीण इलाके में पेयजल के तमाम परंपरागत स्रोत हैं।

पेयजल के नए संसाधन विकसित होने के बाद परंपरागत जल स्रोतों को लोग भुला दे रहे हैं। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि परंपरागत जलस्रोत दूषित हो गए हैं, लेकिन अहम सवाल यह है कि परंपरागत जलस्रोत को दूषित करने वाला कौन है?

जाहिर-सी बात है कि यदि हमें परंपरागत जलस्रोत का उपयोग करना है तो उसे स्वच्छ एवं साफ रखना होगा। परंपरागत जलस्रोत को संरक्षित करके जहां हम शुद्ध पानी हासिल कर सकते हैं वहीं जल संकट से भी निबट सकते हैं। आज हमें अत्याधुनिक संसाधनों से शुद्ध पेयजल तो मिल रहा है, लेकिन भूजल समस्या खड़ी हो गई है। इस समस्या से निबटने के लिए पारंपरिक जल स्रोतों की ओर लौटना होगा। पुराने कुओं एवं तालाबों की मरम्मत के साथ ही नए कुओं एवं तालाबों की खुदाई करानी होगी। कुओं और तालाबों को स्वच्छ रखकर हम दोहरी समस्या का निराकरण कर सकते हैं। इस बात का ध्यान रखना होगा कि कुएं व तालाब कचरा फेंकने के लिए नहीं हैं। यदि हमने उसमें कचरा फेंका तो हमारी जिंदगी में जहर घुल सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में 86 फीसदी से अधिक बीमारियों का कारण असुरक्षित व दूषित पेयजल है। वर्तमान में 1600 जलीय प्रजातियां जल प्रदूषण के कारण लुप्त होने के कगार पर हैं।वैज्ञानिक भी पानी बचाने का एकमात्र जरिया पारंपरिक जल स्रोतों को बता रहे हैं। इसलिए केंद्र एवं राज्य सरकार की ओर से पानी को एकत्रित करने पर जोर दिया जा रहा है। मेड़बंदी के जरिए खेत का पानी खेत में ही रोका जा रहा है तो तालाब के जरिए रिचार्ज क्षमता बढ़ाई जा रही है। तालाबों को शुद्ध एवं स्वच्छ रखने के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। निश्चित रूप से जिस अभियान के तहत पारंपरिक जलस्रोतों की ओर ध्यान आकृष्ट हुआ है, यह बरकरार रहा तो दो-तीन साल में सुधार दिखने लगेगा। हमें इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए जिस हैंडपंप के पानी को हम शुद्ध मानकर पी रहे हैं, यदि उसके आसपास गंदगी रही और पास में स्थित तालाब गंदा रहा तो हैंडपंप का पानी भी देर-सवेर दूषित हो सकता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि पानी के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसलिए कहा जाता है कि पानी ही जीवन का मूल आधार है। यानी जल है तो जीवन है और पानी बचेगा तभी जीवन बचेगा और जीवन बचाने के लिए सिर्फ पानी ही नहीं बल्कि शुद्ध पानी का इंतजाम करना होगा। भारत ही नहीं विश्व के ज्यादातर देश जल संकट से जूझ रहे हैं। हमारे पास जो पानी है उसमें एक बड़ा हिस्सा अशुद्ध पानी का है जिसका प्रयोग करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। आज जल की मात्रा ही नहीं बल्कि अब जल की गुणवत्ता को लेकर भी संकट उत्पन्न हो गया है क्योंकि बढ़ते प्रदूषण के कारण पानी की कमी के साथ ही उसकी गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। बढ़ती इस समस्या को देखते हुए हमें एक बार फिर परंपरागत जलस्रोतों की ओर लौटना होगा। परंपरागत जलस्रोतों को शुद्ध बनाना होगा। विशेषज्ञों का भी मानना है कि हमें पारंपरिक तरीकों की ओर वापस लौटना होगा। तालाब और कुओं को अहमियत दिए बगैर इस समस्या से निजात मिलना मुश्किल है। पुराने तालाबों की मरम्मत के साथ ही नए तालाबों पर भी ध्यान देना होगा। उसमें होने वाली गंदगी को खत्म करना होगा।

वैज्ञानिकों की ओर से दी गई चेतावनी और भविष्य की स्थिति को देखते हुए केंद्र एवं राज्य सरकार की ओर से भी पारंपरिक जल स्रोतों को बढ़ावा देने के साथ ही उन्हें शुद्ध बनाने की कोशिश की जा रही है। गांवों में स्थित तालाबों की खुदाई के लिए भरपूर पैसा खर्च किया जा रहा है। पंचायती राज अधिनियम के तहत ग्राम पंचायतों को यह अधिकार दिया गया है कि वे गांवों में स्थित तालाब एवं पोखरों की खुदाई कराएं। साथ ही पुराने कुओं की मरम्मत के लिए भी उन्हें निर्देश दिया गया है। गांव में कुओं की मरम्मत तो हो जाएगी और तालाब पोखरे भी खुद जाएंगे, लेकिन उन्हें स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी ग्रामीणों की होगी। जब तक ग्रामीण इस दिशा में पहल नहीं करेंगे तब तक ग्रामीण पेयजल एवं स्वच्छता का मिशन अधूरा रहेगा। ग्रामीणों का अधिक से अधिक जोर हैंडपंपों की ओर है, लेकिन सरकार की कोशिश है कि हैंडपंप तो लगाए जाएं पर किसी भी कीमत पर कुओं की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। इसलिए कुओं की मरम्मत पर भी ध्यान देने के निर्देश दिए गए हैं।

कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश में हुई राज्य-स्तरीय समीक्षा बैठक में उन अफसरों को वाहवाही मिली जिनके इलाके में कुओं एवं तालाबों पर विशेष काम हुए हैं। सभी जिला पंचायती राज अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि अपने कार्य क्षेत्र वाले जिलों में परंपरागत जलस्रोतों को बढ़ाने की कोशिश करें। केंद्र सरकार की ओर से चलाई जा रही मनरेगा योजना के तहत भी सबसे ज्यादा ध्यान तालाब खुदाई पर ही दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों में भूजल स्तर में गिरावट का सिलसिला कायम है। एक अनुमान के तहत कुछ क्षेत्रों में प्रतिवर्ष एक मीटर तक की गिरावट दर्ज की जा रही है। स्पष्ट है कि यदि इस समय भी जागरूकता नहीं दिखाई गई तो भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है। वैज्ञानिक साफतौर पर चेताने लगे हैं कि एक से डेढ़ दशक में भूगर्भ से पानी निकालना दुरुह और महंगा हो जाएगा। भूजल के अति दोहन से ऐसी भी नौबत आ सकती है कि नलकूप व्यर्थ हो जाएं, क्योंकि उनकी पानी खींचने की क्षमता सीमित है।

यूनेस्को की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हर साल करीब 22 लाख व्यक्ति प्रदूषित जल पीने से मर जाते हैं, जिसमें अधिकांश बच्चे होते हैं।एक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले दस साल में उत्तर प्रदेश में लखनऊ, कानपुर नगर, कानपुर देहात, उन्नाव, आगरा, इलाहाबाद, प्रतापगढ़, वाराणसी, गाजियाबाद और झांसी के भूजल स्तर में छह से दस मीटर तक की गिरावट पाई गई है। सबसे अधिक गिरावट मिर्जापुर में 16.31 मीटर पाई गई। इसमें राजगढ़ ब्लॉक की स्थिति सबसे खराब बतायी जा रही है। इसके अलावा अहरौरा, इसके बाद पानी संकट से जूझते रहने वाले बांदा का स्थान है। यहां 12.33 मीटर तक भूजल स्तर घटा है। यह तो भयावह है। समस्या यह भी है कि भूगर्भ जल तेजी के साथ प्रदूषित भी हो रहा है। नोएडा में 40 मीटर के नीचे तक पानी की गुणवत्ता क्षारीय हो गई है। इसका सीधा मतलब है जल संकट से बचने के उपाय अमल में लाने के स्थान पर उसे बढ़ाने वाले काम किए जा रहे हैं। यही वजह है कि सरकार की ओर से भी भूजल स्तर उठाने की कोशिश की जा रही है। इसके लिए भूजल पुनर्भरण और संचयन पद्धति को प्रत्येक 200 वर्गमीटर के भूखंड में लागू कर दिया गया है। शहरों में रूफ टाप रेनवाटर हार्वेस्टिंग और ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा जल के संचयन को सख्ती से लागू करने की कोशिश की जा रही है।

राज्य में हर छोटा-बड़ा किसान अपना पंपसेट रखता है। ऐसे में जलदोहन धुआंधार हो रहा है, लेकिन रिचार्ज की स्थिति काफी खराब है। गर्मी के दिनों में नदी के किनारे बसे गांवों में भी कुओं का जलस्तर काफी कम हो जाता है। पंपसेट पानी देना बंद कर देते हैं। यह समस्या अब लोगों की समझ में आने लगी है। मनरेगा की ओर से तालाब की खुदाई पर जोर दिए जाने से भी काफी सुधार हुआ है। अब लोगों को तालाब का महत्व समझ में आने लगा है। यही वजह है कि जिन लोगों के पास पर्याप्त जमीन हैं अथवा उनके घर के आसपास पुराने तालाब हैं वे व्यक्तिगत स्तर पर भी उसकी सफाई कराकर मछली पालन करा रहे हैं। इससे काफी फायदा मिल रहा है। अब पूर्व में किए गए प्रयासों पर गौर करें तो यह स्थिति साफ हो जाती है कि जिस इलाके में पारंपरिक जलस्रोतों को बरकरार रखा गया वहां जल संकट काफी कम है।

हैंडपंप/कुएं का संरक्षण

हैंडपंप सुरक्षित जल का सामान्यतः उपलब्ध स्रोत है। इसका रख-रखाव करें। गांव के मिस्त्री से हमेशा सम्पर्क रखें व देखें कि आवश्यक स्पेयर पार्ट्स व मरम्मत के औजार उपलब्ध है। हैंडपंप से कम से कम 15 मीटर दूर तक कचरा/मलमूत्र का निस्तारण ना करें। हैंडपंप के बहते पानी को बागवानी आदि के काम में लें व उसके आसपास पानी जमा न होने दें। वर्षा के जल से भूजल का पुनर्भरण आपके हैंडपंप/कुएं में पानी की उपलब्धता बनाए रखेगा। कुएं में जल का पुनर्भरण आप कुएं के पास एक सोख्ता गड्ढा खोदकर कर सकते हैं। कुएं एवं सोख्ते गड्ढे को हमेशा ढक कर रखें। कुएं निजी हो या सार्वजनिक इनके पानी की समय-समय पर जांच करवानी चाहिए तथा कुएं के पानी को जीवाणु रहित करने के लिए कुएं में ब्लीचिंग पाउडर का घोल डालना चाहिए, उसके लिए आवश्यक हो तो विभाग से सम्पर्क कर परामर्श लेना चाहिए। समय-समय पर कुओं की सफाई भी करें तथा कुओं को ढक कर रखे। हैंडपंप लगाने के लिये बोरवैल की गहराई पर खास ध्यान रखें। जिन गांवों में बाढ़ का खतरा रहता है वहां ऊंचे सुरक्षित स्थल पर एक हैंडपंप होना चाहिए ताकि पीने का पानी उपलब्ध रहे।

तालाब व जोहड़ के जल का संरक्षण
जलग्रहण क्षेत्र में अतिक्रमण न होने दे। यदि अतिक्रमण हो तो सलाह कर हटा दे। जब भी सम्भव हो तालाब व जोहड़ को गहरा करते रहें ताकि पानी को अधिक मात्रा में संग्रहित किया जा सके। जिन तालाबों का पानी पीने के काम आता हो उनकी पशुओं एवं अन्य संक्रमणों से रक्षा करें। तालाब व जोहड़ के निकट शौच न करें। बरसात के मौसम के बाद में जल के जीवाणु परीक्षण करवाएं। यह सुविधा नजदीकी जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग में उपलब्ध है। गांव में नए तालाब व जोहड़ समुचित कैचमेंट के साथ हैंडपंप के नजदीक बनाए ताकि बरसात के पानी से भूजल का स्तर बना रहे एवं आपका हैंडपंप लम्बे समय तक आपको साफ पानी देता रहे।

60 फीसदी बीमारियों का मूल कारण जल प्रदूषण


विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब साठ फीसदी बीमारियों की मूल वजह जल प्रदूषण है। जल प्रदूषण का मुख्य कारण मानव या जानवरों की जैविक या फिर औद्योगिक क्रियाओं के फलस्वरूप पैदा हुए प्रदूषकों को बिना किसी समुचित उपचार के सीधे जलधाराओं में विसर्जित कर दिया जाना है। हालांकि प्राकृतिक कारणों से भी जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। लेकिन अवशिष्ट उपचार संयंत्र के बगैर फैक्ट्रियों से निकलने वाले अवशिष्ट का पानी में मिलना सबसे बड़ा कारण है। ये रासायनिक तत्व पानी में मिलकर मानव या जानवरों में जलजनित बीमारियां पैदा करते हैं। कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम, पोटैशियम, आयरन, मैग्नीज की अधिकता और क्लोराइड, सल्फेट, कार्बोनेट, बाई-कार्बोनेट, हाइड्राक्साइड, नाइट्रेट की कमी के साथ ही ऑक्साइड, तेल, फिनोल, वसा, ग्रीस, मोम, घुलनशील गैसे (आक्सीजन, कार्बन-डाइ-आक्साइड, नाइट्रोजन) आदि जल की वास्तविकता को प्रभावित करते हैं। जल प्रदूषण से बचने के लिए समय-समय पर नियम-कानून भी बनाए गए, लेकिन जिस अनुपात में जल प्रदूषण बढ़ रहा है, ये नियम कानून कारगर साबित नहीं हो पा रहे हैं।

बढ़ता जल प्रदूषण


विकास की दौड़ में जीवन की सबसे मूल्यवान प्राकृतिक संपदा जल खत्म होता जा रहा है। जो पानी बचा हुआ है वह प्रदूषित होता जा रहा है। यही वजह है कि जल संकट से निबटने के लिए पुख्ता रणनीति बनाई जा रही है। राज्य सरकारें और केंद्र सरकार जल को बचाने और प्रदूषित जल से मुक्ति पाने के लिए बजट में करोड़ों रुपये का प्रावधान कर रही है क्योंकि जल ही जीवन है। प्राणी कुछ समय के लिए भोजन के बिना तो रह सकता है लेकिन पानी के बिना नहीं। अगर हम समूचे विश्व की स्थिति को देखें तो चौंकाने वाली बातें सामने आती हैं। विश्व में 260 नदी बेसिन ऐसे हैं, जो सिर्फ एक ही नहीं बल्कि कई देशों तक पहुंचते हैं। इसके बाद भी दुनिया के कुल उपलब्ध जल का एक प्रतिशत ही जल पीने योग्य है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में आधी से ज्यादा नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं और इनका पानी पीने योग्य नहीं रहा है और इन नदियों में पानी की आपूर्ति भी निरन्तर कम हो रही है।

हमें पीने का पानी ग्लेशियरों से प्राप्त होता है और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर का पानी भी हमसे दूर होता जा रहा है। दुनिया में जल उपलब्धता 1989 में 9000 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति थी जो 2025 तक 5100 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति हो जाएगी और यह स्थिति मानव जाति के संकट की स्थिति होगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में 86 फीसदी से अधिक बीमारियों का कारण असुरक्षित व दूषित पेयजल है। वर्तमान में 1600 जलीय प्रजातियां जल प्रदूषण के कारण लुप्त होने के कगार पर हैं।

अगर हम भारत की बात करें तो यहां वर्तमान में 303.6 मिलियन क्यूबिक फीट पानी प्रतिवर्ष एशियाई नदियों को हिमालय के ग्लेशियर्स से प्राप्त हो रहा है। भारत में सिंचाई कार्यों के लिए 70 प्रतिशत जल भूमिगत जल स्रोतों से प्राप्त होता है और घरेलू कार्यों के लिए 80 प्रतिशत जल की आपूर्ति भूमिगत जल स्रोतों से की जाती है। लेकिन यह भूमिगत जल भी अब प्रदूषित होता जा रहा है। औद्योगिकीकरण व जल प्रदूषण के कारण हमारी नदियां व जलस्रोत प्रदूषित होते जा रहे हैं और इस कारण पेयजल का संकट उत्पन्न हो रहा है। दूसरी तरफ बढ़ती आबादी और बढ़ता औद्योगिकीकरण से जल की खपत बढ़ा रहा है। ऐसी स्थिति में हमारे सामने दोहरी चुनौतियां हैं। एक तरफ स्वच्छ पानी कम हो रहा है तो दूसरी तरफ पानी की जरूरत बढ़ रही है।

पर्यावरण संबंधी तमाम अध्ययन देश में जल प्रदूषण के दिनोंदिन भयावह होते जाने के बारे में चेताते रहते हैं। अब सीएजी यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी इस बारे में आगाह किया है। विभिन्न प्रकार के रासायनिक खादों और कीटनाशकों के व्यापक इस्तेमाल ने खेतों को इस हालत में पहुंचा दिया है कि उनसे होकर रिसने वाला बरसात का पानी जहरीले रसायनों को नदियों में पहुंचा देता है। भूजल के गिरते स्तर और उसकी गुणवत्ता में कमी को लेकर कई अध्ययन सामने आ चुके हैं। जिसमें कहा गया है कि देश में चौदह बड़ी, पचपन लघु और कई सौ छोटी नदियों में मल-जल और औद्योगिक कचरा लाखों लीटर पानी के साथ छोड़े जाते हैं। जाहिर है कि यह कचरा किसी न किसी रूप में पानी के जरिए हमें प्रभावित करता है। एक अध्ययन के मुताबिक बीस राज्यों की सात करोड़ आबादी फ्लोराइड और एक करोड़ लोग सतह के जल में आर्सेनिक की अधिक मात्रा घुल जाने के खतरों से जूझ रहे हैं। इसके अलावा, सुरक्षित पेयजल कार्यक्रम के तहत सतह के जल में क्लोराइड, टीडीसी, नाइट्रेट की अधिकता भी बड़ी बाधा बनी हुई है।

दुनिया में पानी की उपलब्धता पृथ्वी पर कुल 71 फीसदी उपलब्ध है। इस पूरे हिस्से में 97.3 फीसदी पानी खारा होने के कारण पीने योग्य नहीं है। अब बचता है सिर्फ 2.7 फीसदी पानी। इसमें भी भूजल 22.6 फीसदी है और 2.2 फीसदी पानी झीलों, नदियों, वातावरण, मिट्टी और वनस्पति आदि की नमी के रूप में उपलब्ध है। यद्यपि पृथ्वी पर 146 करोड़ घन किलोमीटर पानी है। यह पृथ्वी की तीन किमी मोटाई की परत की तरह ढक सकता है, लेकिन इसमें से सिर्फ 2.7 प्रतिशत पानी ही स्वच्छ है। इस प्रकार प्रकृति में उपलब्ध कुल जलराशि का 12,500 से 14,000 अरब लीटर जल ही प्रतिवर्ष मानवीय उपयोग के लिए उपलब्ध हो पाता है। यूनेस्को की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हर साल करीब 22 लाख व्यक्ति प्रदूषित जल पीने से मर जाते हैं, जिसमें अधिकांश बच्चे होते हैं। विश्व के केवल 75 प्रतिशत शहरी और 40 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में ही स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है। विश्व के जो 25 देश जलसंकट से त्रस्त हैं, उनमें से 19 देश अफ्रीकी हैं।

भारत में पानी की स्थिति


भारत में ग्राउंडवाटर का 90 फीसदी हिस्सा खेती में प्रयोग किया जाता है जबकि औद्योगिक सेक्टर में करीब 50 बिलियन क्यूबिक किलोमीटर पानी का प्रयोग किया जाता है। इकोनॉमी ग्रोथ के 9 फीसदी आंकड़े का मतलब है कि इंडस्ट्री में पानी की डिमांड आने वाले दिनों में बेतहाशा बढ़ जाएगी। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 1997 में भारत में करीब 600 क्यूबिक किलोमीटर प्रति वर्ष पानी था और करीब इतनी ही डिमांड भी थी। 2050 तक उपलब्ध 100 क्यूबिक किलोमीटर प्रति वर्ष रह जाएगा, लेकिन मांग दुगुनी होकर 1200 क्यूबिक किलोमीटर प्रति वर्ष पर पहुंच जाएगी। वर्ष 1997 में भूजल 300 क्यूबिक किलोमीटर प्रति वर्ष था जो 2050 में 50 क्यूबिक किलोमीटर प्रति वर्ष रह जाएगा। इतना ही नहीं भारत में घरेलू, खेती और औद्योगिक प्रयोग में 829 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का प्रयोग हर साल करता है, जो 2050 में 1.4 ट्रिलियन क्यूबिक मीटर प्रति वर्ष हो जाएगा।

जानलेवा हुआ पानी


संयुक्त राष्ट्र के अनुसार हर साल हम करीब 1500 घन किमी पानी बर्बाद कर देते हैं। वहीं पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण भी जलजनित बीमारियां हैं। दुनिया में सालाना होने वाली कुल मौतों में से 3.1 फीसदी पर्याप्त जल साफ-सफाई न होने से होती हैं। असुरक्षित पानी से हर साल डायरिया के चार अरब मामलों में 22 लाख मौतें होती हैं। भारत में बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण यह बीमारी है। हर साल करीब पांच लाख बच्चे इसका शिकार बनते हैं। भूजल पर आश्रित दुनिया में 24 फीसदी स्तनधारियों और 12 फीसदी पक्षी प्रजातियों की विलुप्ति का खतरा है, जबकि एक तिहाई उभयचरों की स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। विश्व के करीब 70 देशों के 14 करोड़ लोग आर्सेनिक युक्त पानी पीने को विवश हैं। इतना ही नहीं इससे भी गंभीर बात यह है कि 50 साल में पानी के लिए विभिन्न स्थानों पर 37 भीषण हत्याकांड हो चुके हैं।

यूनेस्को की सलाह


यूनेस्को का कहना है कि फिलहाल दुनिया के वर्चुअल वाटर का समुचित प्रबंधन और उपयोग दुनिया भर में फसलों के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले पानी का पांच प्रतिशत बचाता है। इसके पीछे एक सामान्य-सा तर्क है कि कम पानी वाले क्षेत्र पानी की अघिक मांग करने वाले खाद्य पदार्थों को उन क्षेत्रों से आयात कर लेते हैं, जहां अच्छी बारिश होती है या पानी की पर्याप्त आपूर्ति है। इससे पानी की कमी वाले क्षेत्र अपने जलस्रोतों का इस्तेमाल अन्य कामों के लिए ज्यादा कार्यकुशलता से कर सकते हैं। इस तरह पानी बचा सकते हैं। भारत के जिस हिस्से में पानी की कमी हो वहां उन फसलों को उगाने की कोशिश की जाए जहां कम से कम पानी की जरूरत होती है। इस तरह फसल तो तैयार होगी ही साथ ही पानी की समस्या भी काफी हद तक कम हो जाएगी। इसके अलावा पानी को फिर से प्राप्त करने का सबसे उपयुक्त तरीका है वाटर हार्वेस्टिंग। इसमें गांवों के परंपरागत स्रोतों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। यदि हम फिर से तालाब एवं कुओं की स्थिति में सुधार कर लें तो पानी की समस्या का काफी हद तक समाधान हो जाएगा।

(लेखक प्रौद्योगिकी शिक्षा परिषद से जुड़े हैं।)