भारतवर्ष के निरंतर विकास में जल-संसाधनों की भूमिका

Author:किरणकुमार जोहरे
Source:राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान
पीने के पानी और मल निस्सारण पर हो रहे खर्च का आठ गुणा खर्च भारत में रक्षा पर होता है। एक तृतीयांश से भी अधिक आबादी वाली ऐसी 14 नदियों का क्षेत्र बुरी तरह से प्रदूषित है। हर गर्मियों में पानी के लिए लंबी कतारें और अखबार की सुर्खियों में इसके चर्चे हमें दिखाई देते हैं। ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति में भी स्वतंत्रता के 60 साल बाद भी जीवन द्रव्य माने जाने वाले पानी के संरक्षण के प्रति हमारी लापरवाही स्पष्ट झलकती है।

बिजली उत्पाद और जल का गहरा सम्बंध है। बिजली, राष्ट्रीय उत्पादन एवं राष्ट्र का विकास, ये सभी कड़ियां एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। गंगा एवं ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के क्षेत्र में उपलब्ध विपुल जल संसाधनों के सुनियोजित उपयोग से इस क्षेत्र की बेरोजगारी, गरीबी, पिछड़ापन और बेरोजगारी से बढ़ने वाले उग्रवाद की समस्याओं से बखूबी निपटा जा सकता है।

कृषि प्रधान भारत की आर्थिक नीति मानसून से जुड़ी हुई है। मानसून का प्रभाव भारत के संपूर्ण विकास चक्र पर पड़ता है। हमें मौसम के बदलाव के प्रति जागरुक रहना होगा। छोटे और बड़े प्रदेश के पैमाने पर होने वाले वातावरण सम्बंधी बदलाव को भी हमें समझना होगा। मुम्बई में विगत वर्ष में हुई अकस्मात एवं तीव्र वर्षा वाली घटना मौसम को समझने और जल संसाधनों के व्यवस्थापन में हमारी कमियों को अधोरेखित करती है, साथ ही मानसून को समझना वर्तमान में एक चुनौती के रूप में ही है। मानसून को समझना, उससे सम्बंधित जानकारी इकट्ठा करना, जानकारी का विश्लेषण करना, अनुमान लगाना तथा किसी नतीजे पर पहुंचकर मानसून से जुड़ी समस्याओं का समाधान करना भारत के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। मानसून से जुड़ी गुत्थियों को हल करने के लिए हमें नए तरीके खोजने होंगे। मानसून के सॉफ्टवेयर मॉडल्स की कमियों को समझते हुए, मानसून और वर्षा मान की सही जानकारी देने वाले नए मॉडल्स हमें खुद ही विकसित करने होंगे। सौर मंडल और वैश्विक किरणों का वातावरण एवं जल स्रोतों पर पड़ने वाला प्रभाव हमें समझना होगा।

नदियों एवं जलाशयों का राष्ट्रीय नेटवर्क बनाते समय हमें वैज्ञानिक तरीके से सोचना होगा। नदियों एवं जलाशयों से अचानक छोड़े जाने वाले पानी से होने वाली हानि रोकने के लिए प्रभावशाली चेतावनी यंत्रणा बनानी होगी। प्रगतिशील कृषि बजट बनाना होगा तथा पानी की उपलब्धता के अनुसार फसल उगाना होगा। एक मीटर प्रति वर्ष की दर से भारतीय भूगर्भ-जल नीचे की ओर जा रहा है। इसे गंभीरता से लेते हुए हमें ठोस कदम उठाने होंगे। समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाने हेतु परियोजना तैयार कर उसका कार्यान्वयन करना आवश्यक है। हमें न केवल अपने अस्तित्व के लिए बल्कि भारतवर्ष के निरंतर विकास के लिए भी जल संसाधनों के व्यवधानों के व्यवस्थापन में आवश्य कदम शीघ्र ही उठाने होंगे।

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