भारत की सूखती नदियाँ और बेखबरी का आलम

Author:कृष्ण गोपाल 'व्यास’

आजाद बहती लोहित नदी, फोटो साभार : पेमा खांडू

भारत नदियों का देश है और उन्हें जिन्दा रखने वाले आँकड़े बताते हैं कि भारत को हर साल लगभग 4000 लाख हेक्टेयर मीटर पानी प्राप्त होता है। उसमें से लगभग 1963 लाख हेक्टेयर मीटर पानी, बतौर रन-आफ, नदियों में बहता है। हर साल विभिन्न स्रोतों से लगभग 432 लाख हेक्टेयर मीटर पानी, भूजल भंडारों में जमा होता है। बाँधों की आवश्यकता पूर्ण करने के बाद, नदियों में लगभग 1273 लाख हेक्टेयर मीटर पानी बहता है। मौजूदा समय में भूजल की सालाना दोहित मात्रा 250 लाख हेक्टेयर मीटर से थोड़ा अधिक है। 

सामान्य आदमी के लिए आँकड़ों का अर्थ केवल इतना ही है कि बरसात के मौसम में बाँधों को भरने के बाद नदियों में लगभग 1273 लाख हेक्टेयर मीटर पानी बहता है और वहीं नदी की तली में डिसचार्ज हुआ भूजल, नदी को जिन्दा रखता है। नदियों को बारहमासी बनाए रखने के मामले में सामान्य आदमी की जिज्ञासा मात्र इतनी है कि वह, दर-दर भटकने के बजाए किस सरकारी विभाग से सम्पर्क करें ?  

 

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बरसात के दिनों में भारतीय नदियों में पर्याप्त पानी बहता है। इसलिए वह मुद्दा नहीं है। मुद्दा है, नदियों में बरसात के बाद के प्रवाह में कमी तथा नदियों के सूखने का। यह सिलसिला सन 1960 के दशक के बाद प्रारंभ हुआ। उसका असर, सबसे पहले नेशनल वाटरशेड एटलस की पांचवीं इकाई अर्थात छोटी नदियों पर दिखा। इस संकेत के अलावा बरसात के बाद, प्रवाह की कमी को दर्शाने वाला एक और मुखर संकेत था - वह था, जिन-जिन इलाकों में भूजल के दोहन का प्रतिशत बढ़ रहा था, उन-उन इलाकों की नदियों के सूखने का सिलसिला शुरु हो रहा था। इन दोनों महत्वपूर्ण संकेतों को लोगों ने अनुभव किया पर व्यवस्था के स्तर पर उनकी अनदेखी हुई और धीरे-धीरे नेशनल वाटरशेड एटलस की चौथी इकाई का प्रभावित होना प्रारंभ हुआ। यह सिलसिला आगे बढ़ रहा है और नेशनल वाटरशेड एटलस में दर्ज तीसरी और दूसरी इकाई की नदियों के भी आगे बढ़ता नजर आ रहा है। उसके असर से गंगा जैसी बडी नदी के प्रवाह में गंभीर कमी देखी जा रही है। 

दूसरा मुद्दा नदियों के प्रदूषित होने का है। बरसात में लगभग हर नदी साफ हो जाती है। उनके प्रदूषण का सिलसिला प्रारंभ होता है बरसात बाद के घटते प्रवाह के साथ। यह हालत उस समय है जब देश के पास नदियों के प्रदूषण पर पर्याप्त अध्ययन, अनुसन्धान तथा तकनीकें उपलब्ध है। यदि सीवर ट्रीटमेंट प्लांट के साथ-साथ, बरसात के बाद के प्रवाह की वृद्धि को जोड़ दिया जाए तो बिना धन खर्च किए, प्रदूषण की कुछ मात्रा का निपटान हो सकता है। इस पर कार्यवाही की आवश्यकता है।

सतही जल और भूजल, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं इसलिए माना जा सकता है कि जल संसाधन विभाग ही सतही जल और भूजल का नोडल विभाग है। अनेक लोगों का मानना है कि नोडल विभाग की सतही जल की शाखा, मुख्य रुप से विभिन्न प्रकार के बांध बनाती है और जल को जलाशय में जमा कर सिंचाई सुविधा का विस्तार करती है। वह पनबिजली के उत्पादन के लिए भी काम करती है लेकिन इस हेतु वह उस तकनीक के साथ खड़ी है जिसकी उपयोगिता, इक्कीसवीं सदी में त्याज्य है। इसके अलावा, वह बाढ़ नियंत्रण के लिए बांधों में अतिरिक्त क्षमता का भी निर्माण करती है लेकिन सतही जल और भूजल के मिलेजुले उपयोग पर आधारित, किसी योजना पर, अपवाद स्वरुप ही काम करती है। अब बात करें भूजल शाखा की।

 

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नोडल विभाग की भूजल शाखा, साल में चार बार भूजल स्तर के परिवर्तन को दर्ज करती है। परिवर्तन के आधार पर भूजल दोहन के प्रतिशत को ज्ञात करती है। प्रतिशत के आधार पर विकासखंड़ों को सुरक्षित, सेमी-क्रिटिकल, क्रिटिकल और अतिदोहित श्रेणियों में विभाजित करती है लेकिन भूजल दोहन के कारण उत्पन्न होने वाले कुदरती जलचक्र के असन्तुलन, असन्तुलन के कुप्रभाव और उन कुप्रभावों को ठीक करने की रणनीति पर कोई काम नहीं करती। इसी कारण, पूरे देश में कुओं, नलकूपों, परकोलेशन तालाबों तथा नदियों के सूखने की समस्या का इलाज नहीं हो पा रहा है। इस बेरुखी के चलते अनेक लोग, अवैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर नदियों पर काम कर रहे हैं। उदाहरण के लिए कुछ संगठन नदी के किनारे की गंदगी साफ कर रहे है। कुछ उसके पानी से प्लास्टिक या अन्य किस्म की बायलाजिकल गंदगी हटा रहे हैं। कुछ लोग, नदी की यात्रा कर रहे हैं तो कुछ प्रवाह बढ़ाने के लिए नदी की तली को खोदकर पानी दिखा रहे हैं। कुछ लोग उनमें स्टाप-डेमों की श्रंखला बना कर नदी के पुनर्जीवित होने का भ्रम पैदा कर रहे हैं या अक्टूबर-नवम्बर के चित्र दिखा कर समाज को गुमराह कर रहे है। कुछ लोग, स्टाप-डेम के पानी को नदी में छोडकर प्रवाह की अविरलता का भ्रम पैदा कर रहे हैं। कुछ लोग, रिव्हरफ्रन्ट के सौन्दर्यीकरण को नदी का पुनर्जीवन बता रहे हैं। इन टोटकों से नदियों का उद्धार असंभव है।

नदियों पर की जाने वाली उपरोक्त असंगत या अवैज्ञानिक गतिविधियों के कारण साफ है - देश में नदियों की समस्याओं, समस्याओं के निपटान के सही तौर-तरीकों या नदी के कानूनी या संवैधानिक अधिकारों की पैरवी करने वाला प्रभावी तथा मुखर नोडल विभाग अस्तित्व में नहीं है इसलिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल या हाईकोर्ट से नदी को जीवित व्यक्ति का दरजा मिलने या गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित होने के बावजूद, सारा मामला, एक काल्पनिक कहानी के इर्दगिर्द घूम रहा है। परिणाम - वही ढ़ाक के तीन पात। 

 

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अब बात जल संसाधन विभाग की भूजल शाखा के पास उपलब्ध बौद्धिक सम्पदा की। इस शाखा के पास कुओं, नलकूपों, परकोलेशन तालाबों तथा नदियों को जिन्दा करने में लगने वाले लगभग सारे आंकड़े उपलब्ध हैं। उसे केवल नदी के सूखने के सही समय पर अवलोकन कूपों में जल स्तर की माप लेनी है। माप के दिन तक उस इकाई से कितना भूजल दोहित हुआ, की गणना करनी है। अगली गणना मानसून पूर्व करनी है। उस गणना से ज्ञात करना है कि उस भौगोलिक इकाई से कितना पानी और निकाला गया। यह पानी की वह मात्रा है जो नदी को जिन्दा करने के लिए, धरती में उतारना आवश्यक है। सारे आंकडे तथा सारी तकनीकी दक्षता भूजल शाखा के पास है पर कहते हैं कि बटवृक्ष के नीचे कुछ भी नही पनपता। अर्थात यदि परिणाम हासिल करना है तो पौधे को अन्यत्र रोपना होगा। अर्थात भूजल शाखा को प्रथक नोडल विभाग बनाना होगा। उसे कुदरती जलचक्र को सन्तुलित करने के लिए काम करना होगा। यह उसके नोडल विभाग बनने के बाद ही मुमकिन है।

गौरतलब है कि भूजल संगठन पिछले कई सालों से विश्व बैक की हाईड्रालाजी परियोजना पर काम कर रहा है। इस योजना ने भूजल स्तर की माप तथा समझ को बेहतर आधार प्रदान किया है। नदी पुनर्जीवन के लिए हाईड्रालाजी परियोजना के अन्तर्गत एकत्रित आंकड़ों का उपयोग किया जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रबुद्धजन, भूजल शाखा को नोडल विभाग बनाने तथा उसे नदियों को पुनर्जीवित करने के काम की जिम्मेदारी दिलाने के लिए आवश्यक पैरवी करेंगे। संविधान में उसे उचित स्थान दिलावेंगे। उम्मीद है इस कदम के बाद, बदलाव आवेगा, भूजल शाखा अपने दायित्व का पालन करेगी और परिणाम देगी। नदियों का भला होगा। देश को जलसंकट से निजात मिलेगी। नदियों का प्रदूषण घटेगा।