भारत के लिए बढ़ती जल प्रबंधन की चुनौती और बाढ़ का खतरा

Author:हिमांशु भट्ट

फोटो - The Third pole

अभी तक हम कहते थे कि बिहार के लिए बाढ़ न्यू नार्मल है, लेकिन बाढ़ अब पूरे भारत के लिए ‘न्यू नार्मल’ हो गई है, जो हर साल आती ही है। मानसून की शुरुआत में बिहार और असम में बाढ़ आई, तो अब उत्तर प्रदेश और केरल बाढ़ का सामना कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। जिस कारण करीब 650 गांव बाढ़ से प्रभावित हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में भी बाढ़ जैसी स्थिति बनी हुई है। हरिद्वार के निचले इलाकों में पानी भरने लगा है। बारिश के कारण मुम्बई की सड़कों पर हर तरफ सैलाब दिखाई दिया है। राजधानी दिल्ली में बारिश ने बाढ़ के हालात पैदा कर दिए थे, तो वहीं जयपुर की सड़कों पर भी पानी और मलबे ने जमकर तांडव मचाया। गुजरात में 70 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई है, जिस कारण नदियां उफान पर हैं। कई इलाके जलमग्न हो गए हैं। कर्नाटक का हाल भी कुछ ऐसा ही है। देशभर में पानी के इस सैलाब में अभी तक सैंकड़ों लोगों की मौत हो चकी है, जबकि करोड़ों रुपयों की संपत्ति पानी लील गया है। करोड़ों लोग बेघर हुए हैं। ऐसे में उचित जल प्रबंधन के अभाव में भारत के लिए हर साल बाढ़ चुनौती बनती जा रही है।

प्रकृति को ताक पर रखकर अनियमित विकास के माॅडल के कारण बाढ़ और सूखा भारत की नियति बन चुके हैं। जिस कारण दुनिया भर में बाढ़ के कारण होने वाली मौतों में पांचवा हिस्सा भारत में होता है। साथ ही देश को हर साल एक हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान होता है। बाढ़ की विभीषिका राज्यों के विकास और अर्थव्यवस्था को काफी पीछे भी धकेल देती है, जिसका उदाहरण हर साल बाढ़ का सामना करने वाला बिहार है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान द्वारा सन् 1900 के बाद साल दर साल हुई वर्षा के आंकड़ों के आधार पर 2014 में किए गए अध्ययन में बताया गया था कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते मानसूनी बारिश की तीव्रता बढ़ती जा रही है और विनाशकारी बाढ़ की घटनाएं आगे और बढ़ेंगी। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शोधों में भी भविष्य में बाढ़ की घटनाओं के बारे में कहा गया है। इनमें भारत जैसे देश के लिए विशेष रूप से चेतावनी जारी की गई है।

वैसे तो भारत में आजादी के पूर्व से ही बाढ़ आ रही है। इसीलिए, भारत में बाढ़ को नियंत्रित करने एवं उसका प्रबंध करने की शुरुआत 1954 की प्रलयंकारी बाढ़ के बाद से हुई है। सन 1954 के नीतिगत वक्तव्य के बाद 1957 में उच्च स्तरीय कमेटी का गठन हुआ। बाढ़ नियंत्रण, बाढ़ राहत इत्यादि के लिए समय-समय पर अनेक समितियों का गठन किया गया। फिर वर्ष 1980 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग का गठन किया गया। राष्ट्रीय जल नीति ने बाढ़ों के नियंत्रण और प्रबंध के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत देश में 150 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करने के लिए कई हजार किलोमीटर लंबे तटबंध और बड़े पैमाने पर नालियां व नाले बनाए गए। बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करने के लिए  निचले क्षेत्रों में बसे कई गांवों को ऊंची जगहों पर बसाया गया। इस प्रकार के सभी कार्यों या कहें की बाढ़ से बचने और राहत आदि में हमारीं सरकारें पिछले 50 सालों में डेढ़ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर चुकी है, लेकिन बाढ़ का आना एक प्रतिशत भी कम नहीं हुआ। 

बिहार की बात करें तो बाढ़ से बचाव के लिए यहां कई मजबूत तटबंध बनाए गए थे। कई सालों तक ये तटबंध लाभकारी रहे, लेकिन फिर समय के साथ कमजोर होते चले गए। वर्तमान में ये तटबंध इतने कमजोर हैं, कि पानी बढ़ने से टूट जाते हैं। आलम ये है कि हल्की बारिश होने पर ही तटबंधों में दरार आ जाती है। यही बिहार में हर साल बाढ़ आने का कारण भी बनता है। तो वहीं हरियाणा में भी तटबंध टूटना आम बात हो गई है। जिस कारण हर साल यहां के लोगों को भी बाढ़ का सामना करना पड़ता है।  ऐसे में सरकारें और प्रशासन हर साल बाढ़ को प्राकृतिक आपदा का नाम दे देते हैं, लेकिन वास्तव में ये मानवजनित आपदा है, लेकिन ये समझ नहीं आता कि समय रहते तटबंधों की मरम्मत करने का कार्य क्यों नहीं किया जाता है ? बारिश या मानसून शुरु होते ही प्रशासन और सरकार के सभी वादे कहां बह जाते हैं ? 

यदि बाढ़ के कारणों पर गौर करें तो अनियोजित और अनियंत्रित विकास के चलते हमने पानी की निकासी के अधिकांश रास्ते बंद कर दिए हैं। ऐसे में बारिश कम हो या ज्यादा, पानी आखिर जाएगा कहां? दूसरी समस्या यह है कि प्रकृति में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के चलते समुद्रों का तल लगातार ऊंचा उठ रहा है, जिससे समुद्रों में नदियों का पानी समाने की गति कम हो गई है। यह भी अक्सर बाढ़ का बड़ा कारण बनता है। बाढ़ से नुकसान कम हो, इसके लिए हमें नदियों में गाद का भराव कम करना होगा, साथ ही निचले स्थानों को और गहरा कर उनमें बारिश तथा बाढ़ के पानी को एकत्र करने की ओर भी ध्यान देना होगा, जिससे बाढ़ के खतरे से निपटने के साथ-साथ गर्मियों में जल संकट से निपटने में भी मदद मिले। मानसून के दौरान बाढ़ की विनाशलीला देखने और बाकी साल जल संकट से जूझते रहने के बाद भी यह बात हमारी समझ से परे रह जाती है कि बाढ़ के रूप में जितनी बड़ी मात्रा में वर्षा जल व्यर्थ बह जाता है, अगर उसके आधे जल का भी संरक्षण कर लिया जाए तो अगले दो दशकों तक देश में जल संकट की कमी नहीं रहेगी और खेतों में सिंचाई के लिए भी पर्याप्त जल होगा। उत्तर प्रदेश और बिहार में इस दिशा में कुछ कार्य शुरू किया गया है। वहां मनरेगा के तहत हजारों तालाबों की गहराई बढ़ाने से लेकर उनके किनारों का पक्कीकरण करने का कार्य किया जा रहा है, जिससे बारिश के पानी की कुछ मात्रा तालाबों में जरूर सहेजी जा सकेगी। ऐसी पहल देश के हर राज्य में की जानी चाहिए मगर इस तथ्य को भी रेखांकित करने की जरूरत है कि तकरीबन सभी राज्यों में तालाब जिस तेजी से विलुप्त होते गए हैं, उसके पीछे केवल प्राइवेट बिल्डरों और अन्य माफिया की गैरकानूनी अतिक्रमणकारी गतिविधियों की ही भूमिका नहीं है बल्कि सरकारी योजनाओं के तहत पूर्ण कानूनी स्वरूप में चलाए गए कई प्रोजेक्ट भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। सरकार की प्राथमिकताओं और विकास के मॉडल का सवाल यहीं पहुंचकर प्रासंगिक हो जाता है।

मौसम की मार से फसलों के साथ मानव जीवन को भी नुकसान

स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2020 इन फिगर्स रिपोर्ट बताती है कि साल 2014-15 से 2018-19 के बीच अतिशय मौसम की घटनाओं के वजह से आई आपदाओं के कारण 8,723 लोगों की जान गई। सबसे अधिक नुकसान घरों और पशुधन का हुआ। 2018-19 में इन आपदाओं की वजह से 15,57,908 घर क्षतिग्रस्त हो गए। जबकि 1,23,014 पशु मारे गए। रिपोर्ट बताती है कि 2014-15 से 2018-19 के बीच यानी पांच साल के दौरान लगभग 14.796 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में लगी फसलों का नुकसान हुआ। सबसे अधिक 2017-18 में 4.744 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में लगी फसलों का नुकसान हुआ। साल 2018-19 में जहां सरकारों ने 37,21,248 लाख रुपए खर्च किए थे, वहीं साल 2019-20 में सरकारों ने 28,85,854 लाख रुपए ही खर्च किए। आपदा प्रबंधन विभाग, केंद्रीय गृह मंत्रालय और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की विभिन्न रिपोर्ट्स के आधार पर बने इस चार्ट के माध्यम से आंकड़ों को विस्तार से दिया गया है। 

आंकड़ें - स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2020 इन फिगर्स

जल प्रबंधन के प्रमुख तरीके

सही प्रकार से जल प्रबंधन न करने के कारण ही भारत को हर साल बाढ़ का सामना करना पड़ता है और अनियमित शहरीकरण के कारण ये समस्या साल दर साल बढ़ती जा रही है, लेकिन नीचे दिए कुछ तरीकों से न केवल जल प्रबंधन किया जा सकता है, बल्कि बाढ़ के प्रकोप को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। 

  • अपशिष्ट जल प्रबंधन प्रणाली

उपयुक्त सीवेज सिस्टम साफ और सुरक्षित तरीके से अपशिष्ट जल के निपटान में मदद करते हैं। इसमें गंदे पानी को रिसाइकिल किया जाता है और उसे प्रयोग करने योग्य बनाया जाता है ताकि उसे वापस लोगों के घरों में पीने और घरेलू कार्यों में इस्तेमाल हेतु भेजा जा सके।

  • सिंचाई प्रणालियाँ

सूखा प्रभावित क्षेत्रों में फसलों के पोषण के लिये अच्छी गुणवत्ता वाली सिंचाई प्रणाली सुनिश्चित की जा सकती है। इन प्रणालियों को प्रबंधित किया जा सकता है ताकि पानी बर्बाद न हो और अनावश्यक रूप से पानी की आपूर्ति को कम करने से बचने के लिये इसके पुनर्नवीनीकरण या वर्षा जल का भी उपयोग कर सकते हैं।

  • प्राकृतिक जल निकायों की देखभाल करना

झीलों, नदियों और समुद्रों जैसे प्राकृतिक जल स्रोत काफी महत्त्वपूर्ण हैं। ताज़े पानी के पारिस्थितिकी तंत्र और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र दोनों ही विभिन्न जीवों की विविधता का घर हैं और इन पारिस्थितिक तंत्रों के समर्थन के बिना ये जीव विलुप्त हो जाएंगे।

  • जल संरक्षण

देश में जल संरक्षण पर बल देना आवश्यक है और कोई भी इकाई (चाहे वह व्यक्ति हो या कोई कंपनी) अनावश्यक रूप से उपकरणों के प्रयोग को कम कर रोज़ाना कई गैलन पानी बचा सकता है।

अन्य तरीके:

  • रेनवाटर हार्वेस्टिंग द्वारा जल का संचयन।
  • वर्षा जल को सतह पर संग्रहित करने के लिये टैंकों, तालाबों और चेकडैम आदि की व्यवस्था।

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