भुइयाँ खेड़े हर हो चार

Author:घाघ और भड्डरी

भुइयाँ खेड़े हर हो चार, घर हो गिहथिन गऊ दुधार।
अरहर दाल, जड़हन का भात, गागल निबुआ औ घिउ तात।।

खाँड दही जो घर में होय, बाँके नयन परोसै जोय,
कहैं घाघ तब सबही झूठ, उहाँ छोड़ि इहँवै बैकूंठ।।


शब्दार्थ- भुइयाँ-जमीन। खेड़े-गाँव के नजदीक। गागल- रसदार। तात-गर्म।

भावार्थ- यदि खेत गाँव के पास हो, चार हल की खेती हो, घर में गृहस्थी में निपुण स्त्री हो, दुधारू गाय हो, अरहर की दाल और जड़हन (अगहन में पकने वाला धान) का भात हो, रसदार नींबू और गर्म घी हो, दही और शक्कर घर में हो और इन सब चीजों को तिरछी दृष्टि से परोसने वाली पत्नी हो, तो घाघ कहते हैं कि पृथ्वी पर ही स्वर्ग है। इस सुक के अतिरिक्त अन्य सारे सुख मिथ्या हैं।

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