भूकम्प और भारतीय धर्म विज्ञान

Author:ज्ञानेन्द्र रावत
.Earthquake and Indian theodicy

बीते दिनों नेपाल में लामजंग में आए विनाशकारी भूकम्प ने इस बहस को और बल प्रदान किया है कि आखिर भूकम्प का कारण क्या है और इसका भारतीय धर्म विज्ञान से क्या सम्बन्ध है। अब यह साबित हो चुका है और उदाहरणों से भी स्पष्ट है कि विज्ञान का चिन्तन किस प्रकार भारतीय ऋषि चिन्तन के इर्द-गिर्द घूम रहा है।

पाश्चात्य विज्ञान की यह सबसे बड़ी भूल है कि पश्चिमी विद्वान-वैज्ञानिक भूकम्प के कारणों को ‘प्लेट टेक्टॉनिक सिद्धान्त’ के आधार पर लगातार अनुसन्धान एवं भविष्यवाणी करने में जुटे हैं। यह कितना हास्यास्पद है कि गैलेक्टिक सिविलाइजेशन में पृथ्वी को अलग कर सिर्फ उसके प्लेटों के खिसकने के आधार पर नासा, यू.एस. जियोलॉजिकल सर्वे एवं भारत समेत विश्व की कई भूकम्प पर अनुसन्धान करने वाली संस्थाएँ कार्य कर रही हैं।

जबकि यथार्थ यह है कि इस ब्रह्माण्डीय सभ्यता में पृथ्वी का एकान्तिक अध्ययन करना सबसे बड़ी बेवकूफी है। जबकि भूकम्प के सन्दर्भ में पृथ्वी के अन्तरसम्बन्धों को गुरुत्वीय दृष्टि ‘ग्रेविटेशनल थ्योरी’ एवं ‘थर्मोडायनामिक्स’ के मूलभूत सिद्धान्तों के अन्तर्गत भूकम्प के कारणों पर चर्चा की बेहद जरूरत है।

पृथ्वी एवं सूर्य के अन्तरसम्बन्ध प्रत्येक महीने एक दूसरे के सापेक्ष बदलते रहते हैं और इसी प्रकार भारतीय परम्परा के अनुसार चार संक्रान्ति या नवरात्र मौसम के सन्धिकाल में मनाने की परम्परा है। सूर्य और पृथ्वी के बीच अन्तरसम्बन्धों को बारह राशियों में विभक्त करने के मूल कारण गुरुत्वीय (ग्रेवीटेशनल) बदलाव एवं पृथ्वी पर मौसमीय बदलाव है। यह सत्य है कि पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों पर मौसम में बदलाव के सिद्धान्त अलग-अलग है।

वराहमिहिर या नासा का अध्ययन सूर्यग्रहण एवं भूकम्प के सन्दर्भ में पर्याप्त नहीं है। इस विशेष परिस्थिति से हटकर भी अध्ययन की आवश्यकता है। परिभ्रमण पथ पर सूर्य और पृथ्वी के अन्तरसम्बन्धों पर गम्भीर बदलाव आते रहते हैं। पृथ्वी जब सूर्य से परिभ्रमण पथ पर जैसे-जैसे दूर जाती है, पृथ्वी पर विद्यमान पिण्डों के द्रव्यमानों में ब्रह्माण्ड का सबसे रहस्यतम गुरुत्वीय बल निहित है जिसके फलस्वरूप पृथ्वी तेजी के साथ पृथ्वी के केन्द्रक (नाभिक) में सघनीभूत पिण्डों में स्थित महत गुरुत्वीय बल के आगोश में खिंचती चली जाती है।

इससे पृथ्वी के आन्तरिक भागों में ऊर्जा का दबाव बढ़ता जाता है और इसमें पृथ्वी की बाह्य एवं आन्तरिक थर्मोडायनॉमिक्स अवस्था केटलिस्ट अर्थात उत्प्रेरक की भूमिका निभाती है। भीषणतम् भूकम्पों के पीछे सूर्य एवं पृथ्वी के बीच अन्तर दूरियाँ मौसम का सन्धिकाल, उत्तरायण से दक्षिणायन या दक्षिणायन से उत्तरायण, ब्रह्ममूहूर्त या इससे पूर्व एवं इसके बाद का निकटतम काल एवं शीत एवं वर्षा काल अत्यधिक खतरनाक होता है।

मौसम का सन्धि काल एवं उत्तरायण से दक्षिणायन एवं दक्षिणायन से उत्तरायण में पृथ्वी के गुरुत्वीय बलों का अन्तर बड़े पैमाने पर क्रियाशील रहता है। ब्रह्ममूहूर्त या उसके पूर्व या बाद का निकटतम काल शीतकाल एवं वर्षाकाल विनाशकारी भूकम्प के उत्प्रेरक काल हैं। यह उर्जा संचरण ताप गतिक सिद्धान्त का अनुसरण करता है।

पृथ्वी के पिण्डों में निहित ब्रह्माण्ड का सबसे रहस्यमय गुरुत्वीय बल, तेजी के साथ पृथ्वी के केन्द्र में सघनीभूत पिण्डों में स्थित महत्त गुरुत्वीय बल के आगोश में जब पृथ्वी खिंचती चली जाती है, तब पृथ्वी के आन्तरिक भाग में ऊर्जा का दबाव बनाता चला जाता है। फिर पृथ्वी के उपभ्रंश से होकर विस्फोटक रूप से उर्जा निःसृत होती है।

यह परिस्थिति बिल्कुल वैसा ही होता है जैसे फुटबाल के ऊपर दबाव आने से आन्तरिक ऊर्जा निःसृत होने के लिये उसके ऊपरी धरातल पर छिद्र की तलाश में होती है। लेकिन पृथ्वी के सन्दर्भ में दबाव पृथ्वी के केन्द्र की ओर के पिण्डों में निहित महत्त गुरुत्वीय बल एवं पिण्डों के नाभिक के तरफ खिंचाव के कारण होता है। दूसरी स्थिति पृथ्वी और सूर्य के बीच दक्षिणायन से उत्तरायण के गमन के अन्तरसम्बन्धों का काल है। इसमें परिभ्रमण पथ पर पृथ्वी सूर्य के निकट बढ़ती जाती है।

वराहमिहिर या नासा का अध्ययन सूर्यग्रहण एवं भूकम्प के सन्दर्भ में पर्याप्त नहीं है। इस विशेष परिस्थिति से हटकर भी अध्ययन की आवश्यकता है। परिभ्रमण पथ पर सूर्य और पृथ्वी के अन्तरसम्बन्धों पर गम्भीर बदलाव आते रहते हैं। पृथ्वी जब सूर्य से परिभ्रमण पथ पर जैसे-जैसे दूर जाती है, पृथ्वी पर विद्यमान पिण्डों के द्रव्यमानों में ब्रह्माण्ड का सबसे रहस्यतम गुरुत्वीय बल निहित है जिसके फलस्वरूप पृथ्वी तेजी के साथ पृथ्वी के केन्द्रक में सघनीभूत पिण्डों में स्थित महत गुरुत्वीय बल के आगोश में खिंचती चली जाती है। सूर्य के गुरुत्वीय खिंचाव से पृथ्वी की नाभिक की ओर अग्रसर होने वाला महत्त गुरुत्वीय बल के आगोश से पृथ्वी का शेष भाग सूर्य के महत्त गुरुत्वीय प्रभाव के सन्निकट आने के कारण कहीं-कहीं अपभ्रंश का विस्तार होता है और पृथ्वी के आन्तरिक हिस्से में इससे पूर्व की परिस्थिति के दौरान एकत्र उर्जा तेजी से निःसृत होकर विनाशकारी भूकम्प का रूप ले लेती है। 11 फरवरी 2011 को जापान में आया भूकम्प एवं 18 फरवरी 1906 के सेन फ्रांसिस्को का भूकम्प इसका जीता जागता उदाहरण है।

ब्रह्ममुहूर्त के लगभग 5.15 मिनट पर सेन फ्रांसिस्को का भूकम्प एवं 26 जनवरी, 2001 का भुज भूकम्प, 8 अक्टूबर 2005, को जम्मू कश्मीर में आया भूकम्प पृथ्वी के थर्मोडायानामिक्स एवं गुरुत्वीय विक्षोभ एवं भीषण भूकम्प का हाल बयाँ करने में सक्षम है। 14 जनवरी 1934 एवं 14 जनवरी 2010 का हैती का भीषणतम भूकम्प दक्षिणायन से उत्तरायण के दौरान गुरुत्वीय महत्त विक्षोभ एवं शीत काल में पृथ्वी के थर्मोडायनामिक्स का हाल बयाँ करता है।

16 जुलाई 2007 को जापान में आया भूकम्प उत्तरायण से दक्षिणायन में पृथ्वी-सूर्य के अन्तरसम्बन्धों में परिभ्रमण पथ पर गमन के दौरान गुरुत्वीय परिवर्तन के कारण घटित हुआ है। 11 अक्टूबर 1737 को आया कलकत्ता का भीषणतम भूकम्प एवं 8 अक्टूबर 2005 को जम्मू कश्मीर मुजफ्फराबाद में आया विश्व इतिहास का भीषणतम भूकम्प जिनमें क्रमशः 300000 लाख एवं 100000 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुईं, मौसम के सन्धिकाल के दौरान घटित होने का सर्वोत्तम उदाहरण है। नवदुर्गा अर्थात् जागरण की परम्परा चैत एवं आश्विन के सन्धि काल एवं संक्रान्ति के दौरान नदी किनारे स्नान की परम्परा आपदा प्रबन्धन का पारम्परिक सुन्दरतम उदाहरण है।

दिसम्बर 11, 1967 का महाराष्ट्र के सतारा स्थित कोयना डैम बनने के कारण आए भीषण भूकम्प एवं 11 फरवरी 2011 के जापान में आए भीषणतम भूकम्प के कारणों को एवं चीन में जिपिंगमू में 156 मीटर बने ऊँचे डैम के कारण आए भूकम्प जिसमें 85,000 लोग मारे गए, के पीछे ‘प्लेट-टेक्टॉनिक मूल कारण’ बिल्कुल नहीं था। दक्षिण के सतारा स्थित कठोर पठार के महत्त ऊर्जा के केन्द्र पर कोयना डैम का निर्माण, यह जाहिर करता है कि पृथ्वी के ऊर्जा निःसृत होने हेतु रेडिएशन विंडो का कार्य करने लग गईं। वहीं समुद्र के बीच स्थित जापान द्वीप समूह पृथ्वी के आन्तरिक ऊर्जा निःसृत करने हेतु रेडिएशन विंडो के रूप में आचरण करने लगा।

स्पष्ट है कि गुरुत्वीय बदलाव एवं पृथ्वी की थर्मोडायनामिक्स परिस्थिति उस समय उत्प्रेरक की भूमिका निभाने लगती है। विश्व के 60 प्रतिशत से ज्यादा आए भूकम्प प्रमाण हैं कि अधिकाधिक भूकम्प ब्रह्ममुहूर्त एवं इसके आसपास मौसम के सन्धि काल एवं शीतकाल में ही आते हैं। पृथ्वी का गुरुत्वीय बदलाव एवं थर्मोडायनामिक्स परिस्थिति इन भूकम्पों के महत्त कारण है। इस सन्दर्भ में आँकड़ों पर गौर करना आवश्यक है। भूकम्प एवं ज्वालामुखी के सन्दर्भ में अन्य सभी कारण गौण ही है।

ज्योर्तिलिंग का शाब्दिक अर्थ है जिसमें लय है ऊर्जा। प्राचीन काल में प्रतीकात्मक रूप में स्थापित द्वादश ज्योर्तिलिंग पृथ्वी की गुरुत्वीय अधिकता, महत्त ऊर्जा एवं शिव के ताण्डव के प्रतीक हैं। 1934 के भूकम्प में काठमाण्डू एवं मुंगेर जहाँ ज्योर्तिलिंग स्थित है, सबसे ज्यादा विनाश हुआ था। 25 अप्रैल 2015 का यह भूकम्प भी 1934 के भूकम्प की पुनरावृत्ति है। इसे नकारा नहीं जा सकता। तत्कालीन मुंगेर स्थित वैद्यनाथ धाम जहाँ प्राचीन ज्योर्तिलिंग स्थापित है का प्राचीन नाम चित्ताभूमि (Funeral Ground) है।

भूकम्प विज्ञान के महान अध्येता चार्ल्स रिक्टर इन स्थानों पर विनाश के कारणों को समझ नहीं पाए थे जिसका जिक्र उन्होंने भू-विज्ञान के बाईबल कहे जाने वाली अपनी पुस्तक ‘एलीमेंट्री सेस्मॉलौजी’ में भी किया है। नार्थ सुमात्रा का भूकम्प, दिनांक 23 अप्रैल 2006, 4.53 सुबह (रिक्टर 5.1) मुजफ्फराबाद एवं जम्मू कश्मीर का भूकम्प 8 अक्टूबर 2005, 8.25 सुबह (मृत्यु 100000) एवं हिन्द महासागर 2005, 26 अक्टूबर, 7.30 सुबह (मृत्यु 300000), भुज का भूकम्प 26 जनवरी, 2001, 8.30 सुबह (मृत्यु 100000), इजमिट टर्की का भूकम्प, 17 अगस्त, 3 बजे सुबह (मृत्यु 40000), लातुर उस्मानाबाद भूकम्प, महाराष्ट्र, 30 सितम्बर 1993, 3.54 सुबह (भारी वर्षा, मृत्यु 50000-100000 के बीच), तेंगशान चीन का गणराज्य का भूकम्प, 28 जुलाई 1976 3.42 सुबह (मृत्यु 7,50000), उत्तरकाशी का भूकम्प 2 बजे सुबह लगभग (मृत्यु 20000), बिहार-नेपाल का भूकम्प 21 अगस्त 1988 3.45 सुबह (भारी वर्षा, मृत्यु 10000), बिहार-नेपाल का 1934 भूकम्प (भयानक शीतकाल), सेनफ्रांसिस्को भूकम्प 18 फरवरी 1906 5.15 सुबह (मृत्यु, 10000), सेंडाई जापान, 11 मार्च 2011, 2.40 सुबह (भारी वर्षा, शीत, बर्फपात, मृत्यु 20000 से ज्यादा), चीन मिलिट्री इंटेलिजेंस सूत्रों के अनुसार 1000000। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि यदि विश्व के विनाशकारी भूकम्पों का कारण ‘प्लेट टेक्टानीक’ है तो वृहंणी, ब्रह्म, ब्रह्ममुहूर्त का सम्बंध भारतीय वाङ्ग्मय में प्रसरणधर्मिता एवं विस्फन्ट का पर्याय कभी नहीं बनता। इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता। इसमें दो राय नहीं।

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