भूकम्प क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण

Author:डॉ. ओे. पी. जोशी
Source:सर्वोदय प्रेस सर्विस, दिसम्बर 2015
भूकम्प कोई भौगोलिक सीमा नहीं मानता अतः इस समस्या से जुड़े देशों को संयुक्त रूप से अध्ययन व निगरानी का कार्य करना चाहिए। 9.3 तीव्रता की सुनामी के तीन माह बाद उसी स्थान पर 8.6 तीव्रता का भूकम्प आया एवं वर्ष 2005 में 7.6 तीव्रता का भूकम्प फिर भारत व पाकिस्तान में आया। वर्ष 2009 में पूर्वोतर क्षेत्र में प्रत्येक दस दिन में भूकम्पीय झटके आये एवं भूगर्भीय हलचल तेज हुई। शिलांग स्थित सेंट्रल सिस्मोलॉजिकल आब्जर्वेटरी के अनुसार इस क्षेत्र में पिछले 25 वर्षाें में हल्के व मामूली तीव्रता के 34 झटके आये। भारत विश्व के उन पाँच देशों में शामिल है जहाँ भूगर्भीय आपदाओं का सबसे ज्यादा खतरा है। ब्यूरो ऑफ इण्डियन स्टैंडर्ड के अनुसार देश को पाँच भूकम्पीय क्षेत्रों (जोन) में बाँटा गया था। परन्तु बाद में किये गए अध्ययनों के आधार पर चार जोन ही रह गए। वर्ष 2005 में भूगर्भ वैज्ञानिकों ने बताया कि देश का कोई भी हिस्सा जोन एक में नहीं है।

पहले देश का निचला हिस्सा यानी दक्षिण भारत के कुछ भागों को जोन एक में रखा गया था। वर्तमान में केवल 2 से 5 तक जोन हैं। जोन दो, जिसे सबसे कम खतरे वाला माना जाता है, अब दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्र शामिल हैं। जोन तीन, जहाँ झटके आने की सम्भावना बनी रहती है, उसमें देश के मध्य भाग को रखा गया है।

जोन चार, जहाँ खतरा लगातार बना रहता है, उसमें उत्तर भारत सहित दिल्ली व तराई के क्षेत्र शामिल हैं। जोन पाँच के अन्तर्गत भूकम्प के हिसाब से माने जाने वाले सबसे खतरनाक हिमालयीन क्षेत्र, पूर्वी तट क्षेत्र एवं कच्छ आते हैं।

दक्षिण भारत को भूकम्प के सन्दर्भ में सुरक्षित समझे जाने वाली अवधारणा को उस क्षेत्र में आये भूकम्पों ने गलत साबित कर दिया है। 11 दिसम्बर 1967 को जब भूकम्प आया तो वैज्ञानिक आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि तब तक यह माना जाता था कि यह इलाक़ा भूगर्भीय गतिविधियों से सुरक्षित है।

पश्चिमी तटीय क्षेत्र भी भूकम्प के सन्दर्भ में अब उतना सुरक्षित नहीं है जितना कि माना जाता था। यहाँ वर्ष 1598 से लेकर 1832 तक 10 भूकम्पों का वर्णन मिलता है। वर्ष 1757 व वर्ष 1764 के भूकम्प महाबलेश्वर के क्षेत्र में आये थे।

सितम्बर 1993 में महाराष्ट्र के लातूर तथा उस्मानाबाद में आये भयानक भूकम्प पर बंगलुरु के सेंटर फॉर मेथेमेटिक्स के वैज्ञानिक प्रो. विनोद गौड़ ने बताया था कि लातूर के भूकम्प ने प्रचलित मान्यताओं को हिलाकर रख दिया है जिससे साबित होता है कि भारतीय महाद्वीप में कहीं भी 6.5 तीव्रता का भूकम्प आ सकता है अर्थात कन्याकुमारी से हिमालय तक फैला देश भूकम्प का शिकार बन सकता है।

इस भूकम्प ने स्पष्ट कर दिया कि दक्षिण भारत का क्षेत्र भी अब स्थायी एवं सुरक्षित नहीं है। दिसम्बर 2004 में आई सुनामी ने भी कई पुरानी प्रचलित मान्यताओं को बदल दिया। इस समय देश-विदेश के प्रसिद्ध भू-वैज्ञानिकों तथा भूकम्प विशेषज्ञों ने बताया था कि भारतीय प्लेट भूकम्प के हिसाब से ज्यादा सक्रिय हो गई है जिसका लगातार अध्ययन कर निगरानी रखना जरूरी हो गया है।

भूकम्प कोई भौगोलिक सीमा नहीं मानता अतः इस समस्या से जुड़े देशों को संयुक्त रूप से अध्ययन व निगरानी का कार्य करना चाहिए। 9.3 तीव्रता की सुनामी के तीन माह बाद उसी स्थान पर 8.6 तीव्रता का भूकम्प आया एवं वर्ष 2005 में 7.6 तीव्रता का भूकम्प फिर भारत व पाकिस्तान में आया।

वर्ष 2009 में पूर्वोतर क्षेत्र में प्रत्येक दस दिन में भूकम्पीय झटके आये एवं भूगर्भीय हलचल तेज हुई। शिलांग स्थित सेंट्रल सिस्मोलॉजिकल आब्जर्वेटरी के अनुसार इस क्षेत्र में पिछले 25 वर्षाें में हल्के व मामूली तीव्रता के 34 झटके आये। इसी संस्थान के आकलन के अनुसार वर्ष 2005, 2006 एवं 2007 में क्रमशः 38, 23 एवं 26 कम्पन महसूस किये गए।

अप्रैल 2015 में नेपाल में आया भूकम्प तथा 24 अक्टूबर 2015 को पाकिस्तान व अफगानिस्तान में आया 7.8 तीव्रता का भूकम्प प्लेट की सक्रियता बढ़ने को दर्शाते हैं। तिरुवनन्तपुरम स्थित सेंटर फॉर अर्थ साइंस के प्रो. सी.पी. राजेन्द्रन ने भी प्लेट की सक्रियता बढ़ने को सही बताते हुए देश भर में सतर्कता रखने हेतु कहा था।

अप्रैल 2015 में नेपाल में आये विनाशकारी भूकम्प के सन्दर्भ में आईआईटी खड़गपुर के भूकम्प वैज्ञानिक प्रो. एसके नाथ ने कहा था कि भूगर्भीय संरचनाओं में आ रहे बदलाव के कारण भूकम्प के क्षेत्रों का फिर से निर्धारण करना जरूरी हो गया है। कल तक देश के जो शहर भूकम्प के जोन तीन में थे वे आज जोन चार में हो सकते हैं। वैसे भी भूकम्प मानव द्वारा बनाए नियम, कानून या जोन आदि को नहीं मानता। कुछ वर्षों पूर्व तक दक्षिण भारत सुरक्षित था परन्तु अब नहीं रहा। भविष्य में यह भी हो सकता है कि पूरा देश ही भूकम्प के प्रति संवदेनशील हो जाये। अभी देश में विकास की आँधी चल रही है, स्मार्ट शहर बनाए जा रहे हैं, मेट्रो रेल परियोजनाओं की डीपीआर बन रही है, विदेशी पूँजी निवेश कई क्षेत्रों में बढ़ रहा है, कस्बे नगर व नगर महानगर बन रहे हैं एवं इण्डिया डिजिटल हो रहा है। इन सभी में भूकम्प की सम्भावनाओं को प्राथमिकता देना जरूरी है।

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