चलक 99 : अलकनन्दा के पानी में घुले थे तबाही के निशान

Author:पूरन बिष्ट
Source:नैनीताल समाचार, 1 अप्रैल 1999
.अट्ठाइस मार्च की देर रात आये भूकम्प का झटका महसूस करने और टेलीफोन से अन्यत्र हुई तबाही के अधूरे समाचार मिलने के बाद हम लोग (मैं, ‘पहाड़’ के शेखर पाठक, बीबीसी संवाददाता महेश पाण्डे व संस्कृतिकर्मी प्रेम ‘पिरम’) साढे नौ बजे नैनीताल से गोपेश्वर के लिये रवाना हुए। नैनीताल में सैकड़ों भयातुर लोगों ने फ्लैट्स पर रात गुजारी थी तो अल्मोड़ा में पुलिस-प्रशासन ने लोगों को मजबूर किया कि वे घरों से बाहर रहें, रानीखेत, चौखुटिया, गैरसैण में लोगों ने भूकम्प के झटके की तीव्रता के बारे में बताया, कहीं-कहीं मकानों में दरारें आयी थीं, सिमली के पास सड़क पर भूकम्प के झटकों से पत्थर गिरे थे, पर जान-माल को कोई नुकसान यहाँ तक नहीं हुआ था। दोपहर तीन बजे कर्णप्रयाग पहुँचे। एक पीसीओ को छोड़कर पूरा बाजार बंद था। पीसीओ पर भारी भीड़ थी। यहाँ नौकरी या अन्य कार्यों के लिये बाहर से आये लोग टेलीफोन से अपने घरों को अपने सुरक्षित होने की सूचना भेज रहे थे, गोपेश्वर और चमोली, को भी लोग फोन मिला रहे थे, पर वहाँ फोन नहीं लग पा रहा था। चमोली, गोपेश्वर में रात क्या हुआ, इसकी पक्की सूचना वहाँ किसी के पास नहीं थी। अलबत्ता अलकनंदा का मटमैला पानी ऊपर हुई तबाही का संकेत अवश्य दे रहा था। कर्णप्रयाग में कुछ मकानों में दरारें आ गयी थीं। यहाँ अफवाह थी कि शाम को सात और रात के 12 बजे भूकम्प फिर आने वाला है। भूकम्प के छोटे-छोटे झटके यहाँ लगातार महसूस हो रहे थे। कर्णप्रयाग से नंदप्रयाग तक कहीं-कहीं भूस्खलन हुआ था।

नंदप्रयाग पहुँचते ही दृश्य बदलने लगा, घाट पर रात को मकान गिर जाने से दब कर मर गई नंद राम की पुत्री की चिता जल रही थी। सड़क के दाहिनी तरफ बनी दोमंजिला पुलिस चौकी ध्वस्त हो गई थी। पुलिस चौकी के निकट ही बायीं तरफ हीराबल्लभ मैखुरी और विद्यादत्त सती के मकान गिरे हुए थे। गाँव के अधिकांश महानों में दरारें आ गयी थीं। नंदप्रयाग से आगे चमोली तक का मार्ग ‘सीमा सड़क संगठन’ के जवानों ने कुछ समय पहले ही यातायात के लिए खोला था। सड़क पर जगह-जगह भीमकाय पत्थर गिरे थे। पत्थर अब भी लगातार गिर रहे थे। सड़क जगह-जगह धँस गयी थी।

सायं 6.00 बजे हम लोग अलकनंदा के दाहिने तट पर बद्रीनाथ मार्ग पर बसे और भूकम्प की सर्वाधिक तबाही के शिकार चमोली कस्बे में पहुँचे। यहाँ रात को मकान गिर जाने से 26 लोग मारे गये थे। कस्बे में एक भी पुराना मकान नहीं बचा था। सीमेंट के कुछ पक्के मकान बच गये थे। अलकनंदा के दायें तट पर तीन चितायें ज रही थीं और बायीं तरफ कब्रिस्तान में दुर्घटना में मारे गये 12 मुसलमानों के शव दफनाये जा रहे थे। पूरा चमोली कस्बा शोक व दहशत में था। श्मशान पर वातावरण गमगीन था। चमोली के तहसीलदार महिपाल सिंह घाट में मिले। वे अपने भतीजे के शव को जलाने आये थे। उनके साथ राजस्व विभाग के कुछ कर्मचारी थे, अपने चार साथियों का सामूहिक दाह संस्कार कर रहा नेपाल के हुमला जिले के तातापानी गाँव का करन बहादुर बता रहा था कि वे पाँच साथी रात को एक ही कमरे में सोये थे। आधी रात जब भूकम्प के झटके से मकान टूटा तो वे मलवे में दब गये, करन बहादुर को लोगों ने मलवे से जीवित निकाल लिया, बाकी नहीं बचाये जा सके। ये लोग मजदूरी करने दिसम्बर 98 में यहाँ आये थे।

भूकम्प के झटकों का आना अभी भी जारी था। जब हम लोग श्मशान में लोगों से बातचीत कर रहे थे, तब भी एक तीव्र झटका आया, श्मशान से लौटते समय गोपेश्वर के निकट पपरियाणा गाँव में मारे गये नेपाली परिवार के पाँच शव लाये जा रहे थे, जिनमें तीन महिलायें और दो मासूम बच्चे थे। यह मजदूर परिवार 1991 के भूकम्प से क्षतिग्रस्त हुई पपरियाणा गाँव की पटवारी चौकी में रह रहा था।

चमोली कस्बा अलकनंदा की घाटी पर बसा है। इसके दोनों तरफ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ हैं। सुरक्षित स्थान के नाम पर अलकनंदा पुल के किनारे स्थित 50 मीटर का एक मैदान था, जिसमें चमोली कस्बे के 150 लोग खुले आसमान के नीचे शरण लिये हुए थे। वहाँ पर रात बिताने के लिये लोग अब भी पहुँच रहे थे। वहीं सड़क पर व्यापारी अख्तर अली मिले वह अपने परिवार को ट्रक में लेकर आये थे। यह बकरीद के त्यौहार का दिन था। लेकिन चमोली के मुस्लिम परिवारों के लिये ईद का यह दिन मौत की क्रूरता लेकर आया था। चमोली से गोपेश्वर तक सड़क जगह-जगह बड़े-बड़े पत्थरों से पटी थी। गोपेश्वर में लोग घरों को छोड़कर रात बिताने के लिए स्थानीय पुलिस लाईन के मैदान, मंदिर के आँगन, खेत और सड़कों पर शरण ले रहे थे, नगर में मरघट जैसी खामोशी छायी थी। नगर के टेलीफोन बूथों पर भारी भीड़ थी पर फोन मिल नहीं पा रहे थे। भूकम्प से जानमाल को हुए नुकसान की ताजा जानकारी लेने जिलाधिकारी कार्यालय पहुँचे। जिलाधिकारी उमाकांत पंवार अगले दिन यानी 30 मार्च को गोपेश्वर पहुँच रहे मुख्यमन्त्री कल्याण सिंह के दौरे की तैयारियों की बैठक ले रहे थे। जिलाधिकारी कंट्रोल रूम में तब तक हताहतों की सुबह दस बजे की सूची उपलब्ध थी, जिसके अनुसार जिले में 56 लोगों की मृत्यु हुई थी और 119 घायल हुए थे। दस बजे तक डेढ़ लाख रूपया मुआवजा लाशों को फूँकने के खर्च के रूप में बाँटा गया था। कंट्रोल रूम के कर्मचारी बता रहे थे कि नीती घाटी से अब तक कोई सूचना नहीं पहुँची है। कंट्रोल रूम के तीन फोन लगातार घनघना रहे थे। एक कर्मचारी दो-दो फोनों पर एक साथ बात कर जिले में हुए मौतों की जानकारी लोगों को दे रहा था। अधिकांश फोन बाहर से आ रहे थे, जो यहाँ नौकरी कर रहे लोगों के घरवालों के थे। जिलाधिकारी कार्यालय के बाद हम लोग लोक निर्माण विभाग के निरीक्षण गृह गये, जहां उत्तरांचल विकास मन्त्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, राज्यमन्त्री मातबर सिंह कंडारी, सांसद भुवन चन्द्र खंडूरी और विधान परिषद् सदस्य पृथ्वीपाल सिंह आये थे। निरीक्षण गृह के कर्मचारियों की चिंता थी कि मंत्रियों, सांसद और विधान परिषद सदस्य के सोने के लिये निरीक्षण गृह के अपेक्षाकृत मजबूत कमरों की व्यवस्था कैसे हो, इन वीआइपियों ने आज पूरे दिन प्रभावित क्षेत्र का हेलीकॉप्टर से दौरा किया था।

रात 10.30 बजे हम लोग दसौली ग्राम स्वराज मंडल के मुख्यालय को लौटे, सड़कों पर अब भी लोगों की चहल-पहल थी। एक छात्र स्ट्रीट लाईट के नीचे बैठकर अगले दिन की परीक्षा की तैयारी कर रहा था। स्वराज्य मण्डल के कार्यकर्ता आँगन में सोये हुए थे। हम उन गिने-चुने लोगों में शामिल थे, जो कमरे के भीतर सोये, हालांकि हमने भी कमरे का दरवाजा और लाईट खुले रखे थे। ताकि भूकम्प आने पर भाग सकें। यद्यपि हमें भूकम्प को लेकर उड़ रही अफवाहों पर कोई भरोसा नहीं था। पर जिस तरह सारे गोपेश्वर के लोग घर छोड़ कर सड़कों पर निकल आये थे, उससे हम भी आतंकित थे। छोटे-छोटे झटकों के बीच मुश्किल से रात कटी। भूकम्प के हर झटके के साथ सारा शहर चीत्कार करने लगता था।

पुलिस लाईन के मैदान और खुली सड़कों पर शरण लिये लोग सुबह चार बजे घरों को लौटना शुरू हुए, 28 की रात के भूकम्प में गोपेश्वर के पश्चिमी हिस्से में स्थित पहाड़ी में जबरदस्त भूस्खलन हुआ था। जिससे गोपेश्वर नगर की पेयजल लाइन ध्वस्त हो गयी थी। पूरे नगर में पानी का जबर्दस्त संकट था, कुछ सरकारी गाडि़यां पानी वितरित कर रही थी। नगर की जनसंख्या को देखते हुए वे काफी कम थीं।

30 मार्च की सुबह हम लोग चंडीप्रसाद भट्ट ओर रमेश पहाड़ी के साथ रूद्रप्रयाग जिले के भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों की ओर रवाना हुए। प्रेम ‘पिरम’ को हमने स्वराज्य मंडल के कार्यकताओं के साथ बिरही घाटी के गाँवों में भेज दिया। चमोली के श्मशान घाट में पंक्ति से सात शव रखे गये थे। तब इन शवों को जलाने की व्यवस्था में एक आदमी लगा था। रूद्रप्रयाग जिले में अगस्त्यमुनि तक विशेष नुकसान नहीं दिखायी दिया। अगस्त्यमुनि में मुख्यमन्त्री कल्याण सिंह के आगमन की तैयारी में प्रशासनिक अमला लगा था। दूर-दराज के गाँवों के लोग भी अब अगस्त्यमुनि चंपापुरी स्थानों पर पहुँचने लगे थे और अपने इलाकों में हुई क्षति और जनहानि का ब्यौरा दे रहे थे। पिछले वर्ष बरसात में कालीमठ, मदमहेश्वर और उखीमठ क्षेत्र के गाँवों में भीषण तबाही हुई थी, ये लोग उस सदमे से उबर भी नहीं पाये थे कि भूकम्प ने उनके कष्ट और बढ़ा दिये। यद्यपि इन गाँवों में ताजा भूकम्प से जनहानि नहीं हुई, पर यहाँ की कनिष्ठ प्रमुख जीवन्ती देवी ने बताया कि इन गाँवों में जो मकान बरसात में बच गये थे। भूकम्प के कारण अब रहने लायक नहीं रह गये हैं, बरसात में बेघर हुए इस क्षेत्र के 17 परिवारों ने भारत सेवक समाज के मकान में शरण ली थी। उखीमठ के पत्रकार रमेश नौटियाल ने बताया कि मनसूना तक का मार्ग कई स्थानों पर भूस्खलन से क्षतिग्रस्त हो गया है। मनसूना से आगे एक विशालकाय चट्टान गिर जाने से गडगू गाँव का सम्पर्क शेष स्थानों से कट गया था। उखीमठ तहसील में लोगों की भारी भीड़ थी।

यहाँ हमें पता चला कि मक्कू गाँव में 28 की रात सर्वाधिक तबाही हुई है। तीसरे पहर एक बजकर पन्द्रह मिनट पर हम मक्कू गाँव के लिये रवाना हुए, मक्कू उखीमठ से गोपेश्वर - मंडल वाले मार्ग पर 30 किमी. आगे जाकर 7 किमी. कच्चे मोटर मार्ग पर स्थित है। गोपेश्वर वाली सड़क छोड़कर जब हम मक्कू के लिए रवाना हुए तो पूरी सड़क पर जगह-जगह दरारें हमने देखीं। बड़े-बड़े पत्थर सड़क पर गिरे थे। सड़क की हालत ऐसी थी कि यदि निकट भविष्य में वर्षा हो गयी तो दरारों से पटी इस सड़क का नामोनिशान भी मिट जायेगा। ढाई बजे हम मक्कू के ऊपर स्थित चड़ियाखोड़ में पहुँचे, यहाँ कार्तिक सिंह, कलम सिंह, हीरा सिंह, दरबान सिंह की दुकानें पूरी तरह ध्वस्त हो गयी थीं। तीन मकान भी यहाँ टूट गये थे। गबर सिंह (65), कलम सिंह (26) घायल हो गये थे। इन्हें गाँव वालों ने उखीमठ अस्पताल पहुँचाया था। चड़ियाखोड़ के ये सभी लोग मक्कू गाँव के थे। वहाँ स्थित भेड़ पालन फार्म व चारे की उपलब्धता के कारण इन लोगों ने वन विभाग की भूमि पर अपने कच्चे मकान बनाये थे। टूटे मकानों के टिन निकालकर लोगों ने सड़कों पर ही दोबारा झोपड़ी खड़ी कर ली थी। यहाँ नारायण सिंह की एक गाय मर गयी थी और घोड़ा घायल हुआ था। इन लोगों ने बताया कि अब तक यहाँ प्रशासन का कोई आदमी नहीं पहुँचा हैं।

चार बजे हम मक्कू मठ पहुँचे, चार सौ परिवारों का यह गाँव किसी पुराने भूस्खलन के मलबे पर बसा है। चारों तरफ हरियाली और तुंगनाथ भगवान के 6 महीने के इस निवास स्थान में मातम छाया था। 28 की रात की त्रासदी के बाद 30 मार्च के चार बजे तक वहाँ मेडिकल टीम या राहत दल के नाम पर मात्र एक एम्बुलेंस पहुँची थी जो गाँव से चार लाशें लेकर लौट चुकी थी। तब से वहाँ कोई नहीं आया था। सारा गाँव खेतों में शरण लिये हुए था। 400 परिवारों के इस गाँव में 40 परिवार हरिजनों के हैं। भूकम्प ने यहाँ चार को छोड़ शेष लोगों की जान तो बख्स दी पर बेघर सबको कर दिया। जो मकान बच भी गये हैं, उनमें इतनी बड़ी दरारें आ गयी हैं कि वे अब रहने लायक नहीं रह गये हैं। पहले हम लोग दलीप सिंह के यहाँ गये, जिसकी भाभी जसोदा देवी (50) की मकान के मलबे में दबकर मृत्यु हो गयी थी। जसोदा देवी का पति उदय सिंह दिल्ली में ठेली लगाता है। उसने वही दूसरी शादी कर ली थी। जसोदा देवी अकेले ही गाँव में रह रहीं थीं। उस रात उसके दो भतीजे, सुनील (9), भरत (14) भी उसी कमरे में सोये थे। वे भी मलबे में दब गये थे। पर भरत ने साहस दिखा कर अपने मां-बाप और भाई को मलवे से जीवित निकाल लिया। हरिजन बस्ती में भूकम्प ने ज्यादा तबाही मचायी थी।

इंदिरा आवास योजना में बनाये गये ये मकान भरभरा कर गिर पड़े। हरिजन बस्ती में लोहार का काम करने वाले भूपत राम के बच्चे राहुल और बिन्दु की मृत्यु हुई थी। भूपत राम का परिवार खुले में शरण लिये हुए था। उसकी पत्नी और जीवित बची एकमात्र पुत्री भी घायल थी। हरिजन बस्ती में ही जयपालु लाल के पुत्र जयप्रकाश की मकान टूट जाने से दब कर मृत्यु हुई थी। इन हरिजन परिवारों के मृतकों की अंत्येष्टि के लिये एक-एक हजार रुपया दिया गया था। मक्कू मठ के ऐतिहासिक शिव मंदिर का शीर्ष भूकम्प की तीव्रता बता रहा था। भूकम्प ने मंदिर का शीर्ष मरोड़ दिया था। गाँव के सामने के जंगल में भीषण आग लगी थी। इसी गाँव के अध्यापक हरिबल्लभ मैठाणी का कहना था कि यह आग भूकम्प की रात टूटी चट्टानों के आपस में टकराने से निकली चिंगारियों से लगी। खेतों में शरण लिये ग्रामीणों में भूकम्प के दोबारा आने की आशंका के साथ ही बाघ का आतंक भी व्याप्त था। ग्रामीण बता रहे थे रात को बाघ गाँव में घूम रहा है। आग जला कर शोर मचाने पर भी वह भाग नहीं रहा था। शाम करीब साढ़े पाँच बजे हम मक्कू से उखीमठ होते हुए गोपेश्वर को लौटे।

रात को नौ बजे चन्द्रापुरी के निकट भटवाड़ी सुनार गाँव पहुँचे। इस गाँव में वयोवृद्ध सामाजिक कार्यकर्ता गबर सिंह जगवाण की दो पोतियां दब कर मर गयी थीं। उनके दो मकान पूरी तरह ध्वस्त हो गये थे। दोपहर में मुख्यमन्त्री कल्याण सिंह ने गाँव का दौरा किया था। गाँव में भी लोग खेतों में शरण लिये हुए थे। राहत के नाम पर मुख्यमन्त्री के दौरे के अलावा कुछ नहीं मिला था। ग्रामीणों का अनाज, कपड़े सभी कुछ मकानों के मलबे में दब गया था। अनाज व तिरपालें अभी सड़क से लगे इस गाँव में नहीं पहुँचे थे। कुछ राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि भाजपाइयों ने राहत का पैसा ज्यादा दिलाने का लालच दिखा कर शोक में डूबे इस गाँव के लोगों से ‘कल्याण सिंह जिन्दाबाद’ के नारे लगवाये और रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने किसी मांगलिक समारोह की तरह कल्याण सिंह के सम्मान में स्वागत भाषण दिया। पर मुख्यमन्त्री ने गाँव में सिर्फ गबर सिंह को दस हजार रूपये की राशि दी। अन्य किसी को न राहत राशि दी गयी न खाद्यान्न।

रात दस बजे हम रूद्रप्रयाग पहुँचे, वहाँ जिला पंचायत अध्यक्ष गंगाधर नौटियाल और कांग्रेस के जिलाध्यक्ष प्रदीप बगबाड़ी से भेंट हुई। इन लोगों ने बताया कि किस तरह भाजपाइयों ने उन्हें और पत्रकारों तक को मुख्यमन्त्री से नहीं मिलने दिया। मुख्यमन्त्री केवल भाजपा कार्यकर्ताओं से घिरे रहे और जिले को राहत देने के लिये कोई घोषणा उन्होंने नहीं की।

रात 12.30 बजे हम गोपेश्वर पहुँचे। आज भी गोपेश्वर की सड़कों पर 29 मार्च की शाम जैसा ही वातावरण था। दोपहर को फिर आये भूकम्प के झटकों से लोगों में आतंक बढ़ा हुआ था। रात को ढाई बजे भूकम्प का एक तीव्र झटका आया और दहशत में डूबे गोपेश्वर के लोगों की चीखें आकाश में गूंज गई। हम लोग भी घबराकर बाहर निकल आये।

पानी की किल्लत यहाँ अब भी बरकरार थी। प्रशासन ने राहत के लिये सेना और भारत तिब्बत सीमा पुलिस के जो जवान बुलाये थे। उन्हें पेयजल लाइन की मरम्मत में लगने के बजाय पानी बाँटने में लग जाना पड़ा। भाकपा (माले) के उत्तराखंड प्रभारी राजा बहुगुणा बता रहे थे कि अस्पताल में घायलों के लिये दवा तो हैं, लेकिन दवा निगलने के लिये पानी नहीं।

हमारे साथी प्रेम ‘पिरम’ बिरही घाटी के गाँवों से देर रात लौटे थे। उन्होंने उस घाटी में भूकम्प से हुई तबाही का विवरण दिया। बिरही गौना से बिरही एक सड़क में कई स्थानों पर दरोरें आयी हैं। अब भी भूकम्प के झटके आ रहे हैं। भूस्खलन के कारण बिरही का पानी मटमैला हो गया था। बिरही से आगे की सड़कें भूस्खलन से अवरूद्ध हो गयी थीं, इसलिये हम पैदल आगे बढ़े। सैंजी गाँव के प्रधान कुंदन सिंह हमें स्कूटर पर गोपेश्वर को आते हुए मिले। वे स्कूटर में एक मजदूर को बिठा कर लाये हुए थे, जो पत्थर हटाकर स्कूटर निकालने के लिये रास्ता बना रहा था। उन्होंने बताया कि उनके गाँव में आछरी देवी का रात्रि जागरण चल रहा था, इसलिए लोग बच गये। गाँव में 36 मकान ध्वस्त हो गये। यहाँ रामेश्वरी (11), दिपेंद्री (9), बीजा (5), रणजीत सिंह की पुत्री मंजू और जमुना भी मलबे में दबकर घायल हो गयीं। कुछ देर पैदल चलने के बाद दुर्मी गाँव के राजेन्द्र सिंह और मक्खन सिंह मिले। उन्होंने बताया कि दुर्मी में जमीन फट गयी है और उसमें से गरम गैस निकल रही है। निजमूला गाँव पैदल गये। इस गाँव में भूकम्प के 36 घंटे बाद भी सरकार का कोई नुमाइंदा नहीं पहुँचा था। यहाँ के कनिष्ठ प्रमुख कंचन सिंह रावत ने बताया कि निजमूला 86 परिवारों और 500 जनसंख्या वाला गाँव है। वहाँ मान्द्रातोक में 40 मकान ध्वस्त हो गये। यहाँ भी आछरी का रात्रि जागरण चल रहा था, इसलिये जनहानि नहीं हुई। घरों में सोये मथुरा देवी, राजुला देवी, बैशाखी देवी, बिसनी देवी घायल हो गये। मान्द्रा में भूकम्प के बाद जो पशु भाग गये थे, वे अब तक लौट कर नहीं आये थे।

थौली गाँव में 10 मकान ध्वस्त हो गये थे। पाणा गाँव में मंगली राम, मोहनी राम, मोहन सिंह, प्रेमलाल और ग्राम प्रधान बचन सिंह का मकान टूट गया। इराणी गाँव के काम सिंह नेगी गोपेश्वर में पढ़ाई कर रहे अपने बच्चों को देखने के लिये पैदल आ रहे थे। यह गाँव ब्यारा से 26 किमी. दूर पैदल मार्ग पर है।

31 मार्च की सुबह 10 बजे से सेना के हेलीकॉप्टर खाद्यान्न बाँटने लगे थे। दूर-दराज क्षेत्रों के लोग भी गोपेश्वर पहुँचने लगे थे। धीरे-धीरे नुकसान के आंकड़े भी बढ़ते जा रहे थे। गोपेश्वर में इस दिन योजना आयोग के अध्यक्ष कृष्ण चन्द्र पंत और कृषि मन्त्री सोमपाल शास्त्री पहुँचे थे। राहत कार्यों में ढिलाई के लिये उन्हें नाराज जनता की खूब खरी-खोटी सुननी पड़ी, 30 की रात आये भूकम्प के झटके के बाद गोपेश्वर में यह चर्चा भी जोरों पर थी कि जोशीमठ में 60 लोग मर गये हैं, जिलाधिकारी कार्यालय में फोन करने के बाद पता चला कि यह मात्र अफवाह है। इस दौरान भी लगातार आ रहे झटकों के बीच ही दोपहर एक बजे नैनीताल के लिये वापस चल पड़े।

भूकम्प में 10 हजार से अधिक मकानों के ध्वस्त हो जाने से लगभग 50 हजार लोग बेघर हो गये हैं। प्रशासन जिन मकानों को आंशिक क्षतिग्रस्त बता रहा है, उनमें भी इतनी दरारें हैं कि उनमें रहा नहीं जा सकता। लोग खुले मैदानों और खेतों में रात बिता रहे हैं।

प्रभावित क्षेत्रों में सिर छुपाने को छत और खाद्यान्न तत्काल उपलब्ध करवाना आवश्यक है, पुराने हादसों का अनुभव बताता है कि सरकार और स्वैच्छिक राहत सड़क से लगे गाँवों में ही बंट जाती है, सड़क से दूर पैदल मार्ग पर स्थित गाँवों में न राहत पहुँचती है, न राहत दल, इसलिए स्वैच्छिक राहत दलों को पीड़ितों की प्राथमिक ज़रूरतों का सामान तथा खाद्यान्न और तिरपाल सुदूरवर्ती गाँवों में पहुँचना चाहिए।

दीपावली के अनार की तरह फटा भूकम्प


इस बार का भूकम्प 20 अक्टूबर 1991 को गढ़वाल के उत्तरकाशी और टिहरी क्षेत्र में आये भूकम्प से भिन्न था। 91 के भूकम्प में देखा गया कि मकान एक दिशा की ओर गिरे या टेंढ़े हो गये थे। परन्तु ताजा भूकम्प में मकान टेंढ़े नहीं हुए। बल्कि उसी स्थान पर भरभराकर गिर पड़े। वैज्ञानिकों के अनुसार भूकम्प के झटके तरंगों के रूप में फैलते हैं, इसलिए जिस दिशा में तरंगे चलेंगी, मकान भी उसी दिशा में गिरते हैं। चमोली, मक्कू और अन्य स्थानों पर हमने देखा कि यह भूकम्प तरंगों के रूप में नहीं, बल्कि दीवाली के अनार की तरह गहराई से ऊपर की ओर फटा है। वैज्ञानिकों के अनुसार भूकम्प की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 6.8 थी। इसका केन्द्र गोपेश्वर के उत्तर पश्चिम में रूद्रनाथ में था। 91 के भूकम्प की तुलना में इसकी तीव्रता 0.2 ज्यादा थी। वैज्ञानिकों के अनुसार 0.1 तीव्रता का अर्थ सौगुना ज्यादा तीव्रता होता है इसलिए 91 के मुकाबले इस भूकम्प में तीव्रता 200 गुना ज्यादा थी। संयोग से इसका केन्द्र धरती के अन्दर अपेक्षाकृत नीचे था।

क्या यह मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं ?


मनुष्य द्वारा कानून का उल्लंघन करने की सजा काट रहे लोगों को प्राकृतिक आपदाओं से अपनी जान की सुरक्षा का अधिकार है या नहीं? जब कानून बनाने और लागू करने वाले स्वयं अपनी जान बचाने के लिये भाग रहे हों, तब बंदियों को जान बचाने का मौका भी न देना क्या मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं है ?

चमोली बंदीगृह में मारे गये 6 विचाराधीन कैदियों की मौत ने इन गम्भीर सवालों को खड़ा किया है। हवालात में बन्द इन कैदियों में एक महिला भी शामिल थी। ये अधिकांश कैदी सजायाफ्ता अपराधी नहींं थे। विचारधीन बंदी थे। उखीमठ का गजपाल सिंह, समय पर बैंक की किस्त न दे पाने के कारण हवालात में बन्द था, इसी प्रकार शेष लोग भी सरकारी ऋणों की अदायगी न करने के कारण हवालात में बंद कर दिये गये थे।

आधी रात को जब भूकम्प आया तो बंदियों की अभिरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी अपनी जान बचाने को भाग निकले, बंदीगृह के भीतर से ‘बचाओ बचाओ’ की करूण पुकार आती रही, पर कानून के अनुसार बंदीगृह का ताला नहीं खोला जा सकता था। इसके बाद भूकम्प का दूसरा झटका आया, जिससे बंदीगृह की दीवार भरभराकर बंदियों पर गिर गई और ये लोग मारे गये। चमोली तहसील के एक कर्मचारी ने बताया कि हवालात की ये बैरकें काफी पुरानी और असुरक्षित थीं। बंदीगृह की मरम्मत के लिए प्रशासन को कभी कई बार लिखा जा चुका था पर कोई कार्यवाही नहीं की गयी।

देवी ने बचाया भक्तों को!


सैंजी, निजमूला और पाणा गाँवों में भी भूकम्प ने मौत की इबारत लिख देने की भरसक कोशिश की, पर आंछरी देवी ने अपनी इन भक्तों को काल के क्रूर हाथों से बचा लिया।

28 मार्च की देर रात जिस समय भूकम्प आया, इन गाँवों के लोग मंदिर के प्रांगण में आंछरी देवी का जागरण (जागर) कर रहे थे। इसलिए वे बच गये। वहाँ भूकम्प का झटका इतना तीव्र था कि सैंजी में 36, निजमूला में 48 और पाणा गाँव में 6 मकान पूर्णतः ध्वस्त हो गये। रात्रि जागरण के कारण इन गाँवों में जनहानि नहीं हुई। लोग घरों में सोये होते तो गाँव के ध्वस्त और दरारयुक्त मकान तथा जगह-जगह फटी जमीन बता रही है कि इन लोगों का हश्र क्या होता। ग्रामीण अपनी जान बच जाने का श्रेय अपनी अराध्य आंछरी देवी को देते हुए उसका शुक्रिया अदा कर रहे हैं।

प्रकृति के ताण्डव से हार गये महादेव


प्रकृति के भीषण तांडव ने मक्कू मठ में भगवान महादेव को दूसरी बार परास्त कर दिया। मक्कू में तुुंगनाथ महादेव मंदिर के शीर्ष को भूकम्प ने न केवल मरोड़ दिया, बल्कि वहीं पर श्रद्धालुओं के लिए बनी धर्मशाला को भी पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

यह दूसरा मौका है जब भूकम्प महादेव के इस पौदाणिक महत्व के मंदिर को क्षतिग्रस्त किया है। मक्कू निवासी अध्यापक हरिबल्लभ मैठाणी के अनुसार 1803 के भूकम्प में यह मंदिर पूर्णतः ध्वस्त हो गया था। तब इस मंदिर में 12 कोने थे। 1804 में मंदिर का पुनर्निमाण कर इसे केवल 4 कोनों का बनाया गया। 196 वर्ष बाद 28 मार्च 99 की रात आये भूकम्प ने दोबारा महादेव के इस मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया है। मंदिर का शीर्ष भाग भूकम्प के झटकों से टेढ़ा हो गया है, जिसे देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे किसी ने शीर्ष को पकड़ कर मरोड़ दिया हो।

पंचकेदारों में से एक तुंगनाथ महादेव की मूर्तियां ऊपरी इलाकों में बर्फ पड़ने से पहले तुंगनाथ से यहाँ लायी जाती हैं। मंदिर का संचालन बद्रीनाथ, केदारनाथ मंदिर समिति करती है। गर्मियों में बद्रीनाथ, केदारनाथ की मूर्तियों के साथ मक्कू से महादेव की मूर्तियां तुंगनाथ ले जायी जाती हैं। इस मौके पर यहाँ श्रद्धालुओं का मेला लगता है, मंदिर के पास बनी धर्मशाला पूर्णतः ध्वस्त हो गयी है।

सौ से अधिक लोग मारे गये भूकम्प में


अब तक मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार 100 से अधिक लोग भूकम्प में मारे गये और 300 लोग घायल हुए। चमोली जिले में 60 और रूद्रप्रयाग में 38 लोगों के मारे जाने की पुष्टि प्रशासन ने की है। मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। गोपेश्वर में कंट्रोल रूम से प्राप्त जानकारी के अनुसार चमोली में 27, मुडियाली में 1, तिलफारा में 6, पीपलकोटी में 1, पाखी में 1, गुलाबकोठी में 3, पपरियाणा में 6, सीरों में 1, ब्रह्मासैण में 1, घिघराण में 2, कुंजा मैणी में 1, गंगोल गाँव में 2, पवाधार में 2, मदाकोटी बैरागना में 3 और नन्द प्रयाग में 1 व्यक्ति की मृत्यु हो गयी। रूद्रप्रयाग जिले के कंट्रोल रूम से मिली जानकारी के अनुसार वहाँ 38 लोगों की मृत्यु हुई है। मृतकों में उखीमठ विकासखंड के 23, जखोली के 13 और पोखरी विकासखंड के 2 लोग शामिल हैं। उखीमठ तहसील में मक्कू में 4, परकंडी धारकोट में 2, तथ्वारा में 1, तैला में 1, अखोड़ी में 2, क्यूँजा में 8 और भटवाड़ी में दो लोगों की मृत्यु हुई।

उधर जखोली खंड में 13 लोगों की मृत्यु हुई। सूचना के अनुसार लौंग में 1, नाग में 2, उरेली में 2, तैला में 2, सीसों में 2, तिलवाड़ी में 2, त्योखर में 2, लोगों की मृत्य हुई है। रूद्रप्रयाग जिले में डेढ़ सौ लोग घायल हुए, प्रारम्भिक जानकारी के अनुसार दस हजार से अधिक मकान पूर्णतः ध्वस्त हो गये। पालतू पशुओं को हुई क्षति का आंकलन अब तक नहीं जुटाया जा सका है। टिहरी से भी पाँच लोगों की मृत्यु का समाचार है, कुमाऊँ मंडल में बागेश्वर जिले में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी। यहाँ कई स्थानों में मकानों के दरकने की सूचना है।

वीआइपियों की आवभगत में व्यस्त है मशीनरी


चमोली और रूद्रप्रयाग जिले की प्रशासनिक मशीनरी भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल राहत और बचाव कार्य चलाने में असफल रही। 31 मार्च तक जिला प्रशासन मृतकों की सूची जारी नहीं कर सका था। राहत कार्यों का यह हाल था कि 31 मार्च की दोपहर 2 बजे तक गोपेश्वर से 8 किमी. दूर चमोली कस्बे में ही खाद्यान्न और तिरपाल नहीं बांटे गये थे। रामलीला की चाँदनी में 150 लोग चमोली में रात बिताने को मजबूर थे। मकानों व पशुओं को पहुँची क्षति का आंकड़ा जुटाना तो अब तक शुरू भी नहीं किया गया था। इसी प्रकार रूद्रप्रयाग जिले व चन्द्रापुरी के पास सड़क से लगे भटवाड़ी सुनार गाँव और उखीमठ के मक्कू गाँव में 30 मार्च की रात तक राहत और बचाव कार्य शुरू नहीं किये गये थे।

राहत कार्यों में ढिलाई का एक बड़ा कारण प्रशासनिक मशीनरी का वीआईपियों के कार्यक्रमों की तैयारियों में व्यस्त हो जाना था। सारा प्रशासनिक अमला मुख्यमन्त्री कल्याण सिंह, योजना आयोग के अध्यक्ष के. सी. पन्त, कृषि मन्त्री सोमपाल शास्त्री, लोक सभा में विपक्ष के नेता शरद पंवार और सोनिया गांधी के दौर की तैयारियों में जुटा रहा। इसलिए दूर-दराज क्षेत्रों के लिये राहत बचाव और मेडिकल टीमें समय पर रवाना नहीं हो सकीं।

वीवीआईपी दौरों से राहत कार्यों में पड़ रही बाधा से लोग गुस्से में थे। चमोली में कल्याण सिंह और गोपेश्वर में केसी पन्त और शरद पंवार को लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा। चंडी प्रसाद भट्ट कह रहे थे कि प्रधानमन्त्री कार्यालय में सचिव और उप्र के प्रभारी अशोक सैकिया से उन्होंने क्षेत्र में वीआईपी भेजने के बजाय तिरपाल और खाद्यान्न के पैकेट भेजने को कहा। इसी सिलसिले में जब वे हैलीपैड में केसी पन्त से मिलने गये तो बताते हैं कि वह इन बातों को टालकर हेलीकॉप्टर में बैठ गये।

मुख्यमन्त्री कल्याण सिंह ने भूकम्प में मारे गये प्रत्येक कमाऊ व्यक्ति के आश्रित को एक लाख रूपया, न कमाने वाले का 50 हजार तथा पूर्णतः ध्वस्त मकानों के लिये 25 हजार रुपये की घोषणा की है। किन्तु प्रभावित न इस धनराशि से संतुष्ट हैं, न घोषणा पर उन्हें भरोसा है। क्योंकि बरसात में उखीमठ, मदमहेश्वर और कालीमठ क्षेत्र में की गयी घोषणायें ही पूरी नहीं की गयी हैं। पता चला कि इस क्षेत्र में इंदिरा आवास योजना के अन्तर्गत 20 हजार मकान बनाने के लिये केन्द्र से पैसा भी मिला, लेकिन मकान बनाने की बजाय सरकार ने इस पैसे से कर्मचारियों का वेतन बाँट दिया। भटवाड़ी सुनार गाँव में आये मुख्यमन्त्री से बीबीसी के संवाददाता महेश पांडे ने जब उखीमठ के भूस्खलन के प्रभावितों के लिये की गयी घोषणाओं पर अमल न किये जाने का सवाल पूछा तो मुख्यमन्त्री परेशानी में पड़ गये और इस सवाल को टाल कर खिसक गये। उसके बाद उन्होंने असुविधा से बचने के लिये रूद्रप्रयाग की पत्रकारवार्ता ही स्थगित कर दी।