धरती के रखवाले

Author:प्रवीण कुमार
Source:राष्ट्रीय सहारा, 14 जून, 2018


पर्यावरण बचाओपर्यावरण बचाओ महिला एवं पर्यावरण के बीच क्या सम्बन्ध है, इस बारे में नोबेल पुरस्कार विजेता और मशहूर पर्यावरणविद वांगारी मथाई ने कहा था कि महिलाएँ नहीं होतीं तो धरती भी मंगल की तरह वीरान होती। उन्होंने कहा कि महिलाएँ धरती की कोख की उत्पादकता और बांझपन के दर्द को जितना बेहतर समझती हैं, उतना पुरुष कभी समझ ही नहीं सकते। उन्होंने पर्यावरण के सन्दर्भ में जिस चार आर- रिड्यूस रियूज, रिसाइकिल और रिपेयर की अवधारणा रखी थी, उसमें महिलाओं की भूमिका को हमेशा तवज्जो देती थीं।

विख्यात नारीवादी लेखिका सुसान ग्रिफीन कहतीं थी कि जिस प्रकार पुरुषों ने महिलाओं का शोषण और दमन किया है, उसी प्रकार से पुरुषों ने पर्यावरण का शोषण किया है। अपने देश की प्रसिद्ध पर्यावरणविद वंदना शिवा और प्लावुड एडिना मर्चेंट जैसी पर्यावरणविदों का मानना है कि प्रकृति और महिलाओं में समानता है, क्योंकि दोनों ही पोषण करती हैं। महिलाएँ वृक्षों, नदियों जल-स्रोतों व कुओं की पूजा विविध रूप में करती हैं। जो उनके प्रकृति प्रेम और प्रकृति के प्रति आस्था व समर्पण का परिचायक है। दरअसल महिलाएँ स्वाभाविक तौर पर पर्यावरण प्रेमी हैं।

महिलाओं ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई आन्दोलन खड़े किये और कार्यक्रम चलाए। हमारे यहाँ राजस्थान जैसे प्रान्त में तो महिलाओं ने पर्यावरण रक्षण में सदियों पहले अपनी कु्र्बानी दी। राजस्थान में तीन सौ साल पहले रजवाड़े ने यह फरमान जारी किया था कि खेजड़ी के पेड़ काटे जायें। ऐसा फर्मान चूना बनाने के नाम पर जारी हुआ था। इस फरमान के बाद अमृता देवी नामक विश्नोई महिला के नेतृत्व में सैकड़ों महिलाओं ने इस वृक्ष से चिपक कर वृक्षों की कटाई को रोका। हालांकि रजवाड़े का उन्हें कोपभाजन होना पड़ा और कई विश्नोई महिलाओं ने अपनी जान भी गँवाई।

जैव विविधता को लेकर एफएओ की रिपोर्ट
फूड एंड एग्रीकल्चर अॉर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिकों के मुकाबले महिलाएँ जैव विविधता की अधिक जानकार होती हैं। इसकी जानकारी उनमें स्वाभाविक और स्वतः स्फूर्ति होती है। एफएओ ने बताया कि शिक्षा में पिछड़े नाइजीरिया जैसे देश में महिलाएँ अपने घरेलू बगीचे में 57 प्रकार की पौध प्रजातियाँ उगाती हैं। इसी तरह उप सहारा क्षेत्र में महिलाएँ 120 विभिन्न प्रजाति के पौधे उपजाती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ग्वाटेमाला और भारत के सतपुड़ा अंचल में बाडियों में कई प्रकार की सब्जियाँ और फलदार वृक्ष महिलाओं के कारण संरक्षित हैं। देश में बीजों के संरक्षण का आन्दोलन महिलाओं की बदौलत ही फल-फूल रहा है।

मौसम की मार महिलाओं पर

संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक पर्यावरण परिवर्तन का सबसे अधिक असर महिलाओं पर होता है। खासकर विकासशील देशों की महिलाओं पर । संयुक्त राष्ट्र का आकलन बताता है कि प्राकृतिक विपदाओं में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के मरने की आशंका अधिक होती है। रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों की लाखों महिलाएँ मजदूरी करती हैं। ऐसे में सूखा या बाढ़ आदि की स्थिति में महिलाओं को भोजन जुटाने के लिये अधिक श्रम करना पड़ता है।

लकड़ियाँ नहीं सूखे पत्तों से बनाएँगे खाना

उड़ीसा, मध्य प्रदेश, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में महिलाओं ने तय किया है कि भले ही उनका चूल्हा नहीं जले, लेकिन वे खाना केवल सूखे पत्तों और सूखकर गिरी सूखी टहनियों से खाना बनाएँगे। झारखण्ड के गुमला जिले में कम-से-कम 20 गाँव ऐसे हैं, जहाँ एक आन्दोलन के तौर पर महिलाएँ रसोई गैस और कोयले का इस्तेमाल बन्द कर चुकी हैं। महिलाएँ सूखे पत्तों का उपयोग कई कारणों से करती हैं। एक तो इससे जलावन के लिये पेड़ नहीं काटने पड़ते, दूसरे सूखे पत्तों के बटोर जाने से जंगल में आग लगने का खतरा कम होता है। तीसरा यह कि इन गाँवों की बेसहारा महिलाओं को एक रोजगार मिल गया है। चौथा लाभ यह भी है कि पत्ते जलने से जो राख बचती हैं वो एक बेहतरीन खाद होती हैं। यह आन्दोलन देश के सभी जंगली इलाकों में फैलाने की जरूरत है।

राखी बाँधकर पेड़ों की रक्षा

पेड़ो पर रक्षासूत्र बाँधकर उसकी रक्षा का आन्दोलन देश के कई हिस्सों में महिलाओं द्वारा संखलित हो रहा है। झारखण्ड में इसे वन रक्षा आन्दोलन का नाम दिया गया है, उत्तराखण्ड में देव वन आन्दोलन और महाराष्ट्र में वनराई आन्दोलन। देश के कई हिस्सों में महिलाएँ धूमधाम से पेड़ों का रक्षाबन्धन कार्यक्रम मनाती हैं। यहाँ तक कि ग्रामीणों को इस दौरान प्रसाद भी बाँटा जाता है। सवाल है कि क्या इसका असर दिखा है? यकीनन हाँ। आन्दोलन से जुड़ी महिलाओं का मानना है कि रक्षासूत्र बँधे पेड़ काटने के इक्का-दुक्का मामले सामने आते हैं। उनका कहना है कि आन्दोलन तभी सफल होगा जब ज्यादा-से-ज्यादा पेड़ों में रक्षा सूत्र बाँधा जाए और पेड़ काटने पर दंडात्मक व्यवस्था भी हो। हालांकि महिलाएँ उस पर इतना सक्रिय हैं कि रक्षा सूत्र आन्दोलन वाले इलाकों में पेड़ों की तादाद बढ़े-न-बढ़े उसके कटने की रफ्तार थम गई है।

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