एक दुनिया धड़कती है सागर के सीने में

Author:आरती तिवारी
Source:दैनिक जागरण, 03 जून, 2018

 

पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व बनाने में सहायक महासागरों के प्रति जागरुकता के उद्देश्य से हर साल विश्व महासागर दिवस मनाया जाता है। विश्व के सबसे विशालकाय जीव व्हेल से लेकर बेशुमार सूक्ष्म जीवों तक को रहने के लिये ठिकाना मुहैया कराते ये महासागर आज इंसानी गलतियों के चलते प्रदूषित होते जा रहै हैं।

आरम्भिक काल से आज तक महासागर जीवन के विविध रूपो को संजोए हैं। पृथ्वी के विशाल क्षेत्र में फैले अथाह जल का भण्डार होने के साथ ही महासागर अपने अन्दर व आस-पास कई छोटे-छोटे नाजुक पारितंत्रों को पनाह देते हैं। ये असीम जैव विविधता का प्रतीक है। आज विश्व की करीब 30 प्रतिशत जनसंख्या तटीय क्षेत्रों में रहती है, यही वजह है कि महासागरों में बढ़ता प्रदूषण चिन्ता का विषय बनता जा रहा है।

सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण महासागरों में अरबों टन प्लास्टिक व अन्य कचरा हर साल समा जाता है। विषैले रसायनों के मिलने से समुद्री जैव विविधता काफी प्रभावित होती है। पृथ्वी पर जीवन को बनाये रखने वाले महासागरों की उपयोगिता को देखते हुए यह जरूरी है कि हम इनके प्रति जिम्मेदारी को समझें, ताकि भविष्य सुरक्षित रहे।

अन्दर बसी है अलग दुनिया

लोककथाओं में जलपरियों के कई किस्से मिलते हैं। वास्तव में इनमें कितनी सच्चाई है इसका कोई प्रमाण नहीं मगर समुद्र के अन्दर जीवन के कई रूप देखने को मिलते हैं। एक ओर जहाँ विशालकाय व्हेल, छोटी मछलियाँ या जीव हैं तो वहीं दूसरी ओर वनस्पतियों की कई किस्में हैं। यहाँ व्हेल, शार्क, डरावनी शक्लों वाले ड्रैगन जैसी दिखने वाली मछलियाँ, चमकीली मछलियाँ, लैम्प जैसी आँखों वाली मछलियाँ, जेलीफिश, स्टार फिश, पारदर्शी मछलियाँ, रंग बदलने वाली मछलियों की हजारों प्रजातियाँ हैं। विशालकाय समुद्री साँप की हजारों प्रजातियाँ, भयानक भुजाओं वाले तरह-तरह के अॉक्टोपस, लाखों किस्म के बैक्टीरिया, असंख्य कीड़े-मकोड़े सैकड़ों केकड़े और झींगे की प्रजातियाँ समुद्र की गहराइयों में पाये जाते हैं। बात अगर वनस्पतियों की करें तो यहाँ कमल जैसे दिखने वाले रेंगते फूल, ब्लड रेड समुद्र फेनी, रेंगने और कई भुजाओं वाले पौधे, कोरल और रंगीन शैवाल समेत लाखों वनस्पतियाँ पाई जाती हैं।

बड़ी गहरी हैं समुद्री गुफाएँ

महासागरों में हजारों तरह की सुरंगें भी होती हैं जो पानी और अॉक्सीजन से भरी होती हैं। इनका पानी इतना साफ होता है कि गोताखोर पूरी सुरंग का मजा ले सकते हैं तो वहीं समु्द्र में गुफाएँ भी होती हैं। जब बड़ी-बड़ी लहरें चट्टानों से लगातार टकराती हैं तो उनमें सुराख कर देती हैं, धीरे-धीरे ये गुफाओं की शक्ल ले लेती हैं। समुद्री लहरों, भूकम्पों और ज्वालामुखी के कारण भी गुफाएँ बन जाती हैं। समुद्र में हजारों छोटे और बड़े पर्वत भी पाये जाते हैं। आमतौर पर इनकी ऊँचाई 1 से 3 किमी तक होती है। अधिकतर पहाड़ पानी में डूबे होते हैं। समुद्र के पानी से ऊपर उठे हुए चपटे पहाड़ों को द्वीप कहा जाता है। हवाई द्वीप समूह का जन्म ऐसे ही हुआ है। प्रशान्त महासागर के उत्तरी-पूर्वी भाग में भी बहुत से पर्वत हैं। इनमें से अधिकांश पानी में डूबे हैं।

मौसम बदलने में सहायक

महासागर धरती के मौसम को निर्धारित करने के प्रमुख कारक हैं। इनमें मौजूद पानी की लवणता और विशिष्ट ऊष्मा धारिता का गुण पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करता है। महासागर ऊष्मा का भण्डार बन कर पृथ्वी पर जीवन के लिये औसत तापमान बनाये रहते हैं। वहीं महासागर के पानी का खारा होना समुद्री धाराओं के बहाव की घटना का एक मुख्य कारण है। अगर इनका पानी मीठा होता तो लवणता का क्रम कभी बनता ही नहीं और पानी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने वाली धाराएँ सक्रिय न होतीं। परिणामस्वरूप ठण्डे प्रदेश बहुत ठण्डे रहते और गर्म प्रदेश बहुत गर्म। जलवायु परिवर्तन सहित अनेक मौसमी घटनाओं को समझने के लिये वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसन्धान परिषद क अन्तर्गत गोवा में राष्ट्रीय समुद्री विज्ञान संस्थान में ऐसे अनेक अध्ययन होते रहते हैं।

क्यों मनाते हैं महासागर दिवस

8 जून, 2009 को पहला विश्व महासागर दिवस मनाया गया। इसके बाद हर साल यह दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष की थीम है प्लास्टिक प्रदूषण को रोकना और स्वस्थ महासागर के लिये समाधान। इस दिवस को मनाने का प्रमुख कारण महासागर के महत्त्व और उनकी चुनौतियों के बारे में जागरुकता पैदा करना है। साथ ही इससे जुड़े पहलुओं जैसे खाद्य सुरक्षा, जैव-विविधता, पारिस्थितिक सन्तुलन, सामुद्रिक संसाधनों के अन्धाधुन्ध उपयोग, जलवायु परिवर्तन आदि पर प्रकाश डालना है।

मिल के भी नहीं मिलते

हिन्द महासागर और प्रशान्त महासागर दोनों अलास्का की खाड़ी में मिलते हैं लेकिन हैरानी की बात यह है कि आपस में मिलने के बाद भी इनका पानी आपस में घुलता नहीं है। प्रशान्त महासागर का अधिकतर पानी ग्लेशियर से पिघलकर आता है, जिससे इसका रंग हल्का नीला होता है तो वही हिन्द महासागर का पानी नमक और लवणों की वजह से गहरा नीला है।

हमारा अपना हिन्द महासागर

हिन्द महासागर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है। पृथ्वी की सतह पर उपस्थित पानी का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसमें मौजूद है। यह विश्व का इकलौता महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर है। गर्मियों में इसका बहाव भारत की ओर और सर्दियों में अफ्रीका की ओर रहता है।

5 महासागर हैं पृथ्वी पर। इनके नाम हैं प्रशान्त महासागर (पैसिफिक), अटलांटिक महासागर, हिन्द महासागर (इण्डियन), अंटार्कटिका महासागर और आर्कटिक महासागर।

किसी समुद्र में लहरें 3 तरह से पैदा होती हैं। पहली समुद्र की सतह पर बहने वाली हवा से, दूसरी चन्द्रमा के कारण उत्पन्न ज्वार से और तीसरी समुद्र के भीतर कहीं आये भूकम्प से।

 

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