एकजुट न हुए तो गंगा अर्थी उठाने को तैयार रखें अपने कंधे

Author:अरुण तिवारी

निर्णायक दौर में गंगा तपस्या


बंद फाइल में जा चुका गंगाएक्सप्रेस-वे का जिन्न अखिलेश यादव की सरकार की पहल पर एक बार फिर से गंगा के सीने पर मूंग दलने के लिए बाहर आने की तैयारी कर चुका है। उत्तराखंड की सरकार तो और भी खराब भूमिका में उतर आई है। उसने राष्ट्रीय नदी का गला घोंट डालने वालों के पक्ष में ही आंदोलन प्रायोजित कर डाला है। वे धमकी दे रहे हैं कि यदि उत्तराखंड की एक भी जलविद्युत परियोजना रोकी गई, तो वे न मालूम क्या कर देंगे।

संकेत मिलने लगे है कि अब गंगा तपस्या निर्णायक दौर में पहुंच गई है। आगामी गंगा दशहरा की तिथि यानी 31 मई इस तपस्या की गाथा में कोई निर्णायक मोड़ ला सकती है। इसकी संभावना बढ़ गई है। पांच में से तीन गंगा तपस्वियों की हालत नाजुक है। बाबा नागनाथ, ब्रह्मचारी कृष्णप्रियानंद और गंगाप्रेमी भिक्षु जी। बाबा नागनाथ ने ड्रिप लगाने पर आत्मदाह की धमकी दे दी है। लिहाजा प्रशासन उनके पास फटकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। कृष्णप्रियानंद और गंगा प्रेमी को प्रशासन ने अस्पताल में जबरन भर्ती करा दिया है। गंगासेवा अभियानम् के सार्वभौम प्रमुख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भी 7 मई को अन्न त्याग कर अपनी तपस्या के श्रीगणेश की घोषणा कर दी है। इसके बाद से उक्त तीनों गंगा तपस्वियों ने मुंह से जरिए कुछ भी लेने से इंकार कर दिया है। इसके साथ ही हालात ज्यादा नाजुक हो गये हैं। फिलहाल एक जटिल तपस्वी की भांति स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने साफ कह दिया है कि सरकार कुछ न करे। बस! भगवान के लिए हमारी तपस्या में कोई बाधा न डाले। समाचार है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद 15 मई को दिल्ली में आगे की रणनीति की घोषणा करेंगे।

यह सही है कि गंगा सेवा अभियानम् द्वारा मकरसंक्रान्ति - 2012 को आहूत गंगा तपस्या अब तपस्या की असल परिभाषा के अनुरूप परवान चढ़ रही है। तपस्वी बिना किसी की प्रतिक्रिया व समर्थन की प्रतीक्षा अपने मन के संकल्प की दिशा में रत हो जाता है। वह इसकी प्रतीक्षा भी नहीं करता कि उसके संकल्प को पूरा करने वाला देवता कब आयेगा। गंगा तपस्या अब इसी रास्ते पर चल पड़ी है। यह तपस्या कब तक चलेगी, पता नहीं। क्योंकि सरकार द्वारा पहल की जो थोड़ी-बहुत उम्मीद पहले थी, वह 16 अप्रैल की राष्ट्रीय नदी गंगा बेसिन प्राधिकरण की बैठक के साथ ही खत्म हो गई। गंगा के लिए संघर्ष की बात करने वाले संगठनों द्वारा बनाई दूरी व एकजुटता के अभाव ने यह नाउम्मीदी और बढ़ा दी है।

सत्ता व समाज सवालों के घेरे में


मनेरी भाली जल विद्युत परियोजना फेज-1 के बाद सूख चुकी भागीरथी गंगामनेरी भाली जल विद्युत परियोजना फेज-1 के बाद सूख चुकी भागीरथी गंगाआगे जो भी हो, फिलहाल इस पूरे प्रसंग ने कई प्रश्न उठा दिए हैं। अविश्वास का सबसे पहला प्रश्न तो सत्ता पर ही उठ गया है। गंगा के प्रति संबंधित मंत्रालय व राज्य संभालने वाले मंत्रियों व मुख्यमंत्रियों की प्रतिबद्धता पूरी तरह संदिग्ध हो गई है। कड़वा सच तो यह है कि अब प्रतिबद्धता तो गंगा भक्तों की भी संदिग्ध ही हो गई है। यदि कोई एक पर्यावरण इंजीनियर मुख्यमंत्री, दूसरे पर्यावरण इंजीनियर के दर्द को न समझ सके; एक वकील जलसंसाधन मंत्री सत्य की वकालत न कर सके; देवभूमि में राज पाया जज मुख्यमंत्री न्याय करने के स्थान पर खुद ही जुर्म करने पर उतारू हो जाये, तो इसे क्या कहेंगे? क्या यह बेशर्मी और संवेदनहीनता की हद नहीं कि एक ओर देश की राष्ट्रीय नदी के खतरे में पड़ चुके राष्ट्रीय सम्मान को वापस दिलाने के लिए गंगा तपस्वी जान की बाजी लगा रहे हों, दूसरी ओर सत्ता पक्ष-विपक्ष, संत व समाज सब के सब कान में रुई डालकर बहरे बन जायें?

गंगा हत्या को सत्ता पक्ष-विपक्ष सब सहमत


बंद फाइल में जा चुका गंगाएक्सप्रेस-वे का जिन्न अखिलेश यादव की सरकार की पहल पर एक बार फिर से गंगा के सीने पर मूंग दलने के लिए बाहर आने की तैयारी कर चुका है। उत्तराखंड की सरकार तो और भी खराब भूमिका में उतर आई है। उसने राष्ट्रीय नदी का गला घोंट डालने वालों के पक्ष में ही आंदोलन प्रायोजित कर डाला है। वे धमकी दे रहे हैं कि यदि उत्तराखंड की एक भी जलविद्युत परियोजना रोकी गई, तो वे न मालूम क्या कर देंगे। ऐसी ही धमकी उत्तराखंड की पूर्व भाजपा सरकार के सहयोगी दल उत्तराखंड क्रांति दल के अगुवा ने जलविद्युत परियोजनाओं से हो रहे नदियों के बिगाड़ का विरोध कर रहे जलपुरुष राजेन्द्र सिंह के उत्तराखंड प्रवेश पर दी थी। इसे क्या माने? यह गंगा को मारने के नाम पर पक्ष-प्रतिपक्ष, केंद्र और राज्य के बीच गजब की सहमति नहीं तो और क्या है? दुर्योग है तो बस! इतना कि ऐसी गजब की सहमति संतों व सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच नहीं बन पा रही।

एकजुट नहीं झंडाबरदार


भागीरथी गंगा पर बना कोटेश्वर बांधभागीरथी गंगा पर बना कोटेश्वर बांधउत्तराखंड में गंगा का झंडा बुलंद करने का जिम्मा उठाये स्वामी चिदानंद गंगा का भविष्य गंगा थाने और पुलिस में देख रहे हैं। प्रेस वार्ता कर बता रहे हैं कि गंगा रक्षा के लिए कड़े कानून बनाये जायें। गंगा के लिए एक सन्यासी की शहादत वाले हरिद्वार के मातृसदन की प्रतिबद्धता तो जगजाहिर है। उत्तराखंड में कभी गंगा रक्षा के प्रखर प्रहरी रहे सुंदरलाल बहुगुणा, बहन राधा भट्ट, सुरेश भाई, शमशेरसिंह बिष्ट, बहन सुशीला भंडारी, भरत झुनझुनवाला, प्रेम बूड़ाकोटी, नौजवान लक्ष्मणसिंह नेगी, हेमन्त ध्यानी और ‘नदी तू बहती रहना। एक दिन मेरे गांव में आना, बहुत उदासी है’ के ओजस्वी गीतकार डॉ. अतुल शर्मा न मालूम कहां हैं?

गंगा महासभा ने सरकार से इस पूरे प्रकरण पर कुछ नाराजगी व कुछ सुझाव जाहिर कर ही इतिश्री कर ली है। महासभा ने गंगा रक्षा के लिए जब तक कानून पारित न हो जाये, तब तक अध्यादेश लाने के लिए राजनैतिक पहल के प्रयास व तीन संत सम्मेलन की बात कही जरूर है, लेकिन उनकी प्रतिबद्धता प्राधिकरण के पुनर्गठन हेतु उनके सुझाये सदस्यों वाली कमेटी के निर्माण और कुंभ के प्रबंधन का ठेका पाने में अधिक दिखाई देती है। गंगा महासभा पूर्व भाजपा नेता व चिंतक के एन गोविंदाचार्य के मार्गदर्शन, प्रेमस्वरूप पाठक की कार्यकारी अध्यक्षता और आचार्य जितेन्द्र के महामंत्रित्व में चलने वाला संगठन है।

कब साथ आयेंगे पैरोकार?


बदहाल स्थिति में भागीरथी गंगाबदहाल स्थिति में भागीरथी गंगागंगा प्राधिकरण के सदस्यों के अलावा चुनाव पूर्व और अब उसके पश्चात् गंगा-गंगा की माला जपने वाली नेता साध्वी उमाभारती, सदन में गंगा पर अत्याचार के खिलाफ गुस्सा दिखाने वाले सांसद प्रदीप टम्टा, अन्नू टंडन, रेवती रमण सिंह, लालू यादव, शरद यादव व हुकुमदेव नारायण सिंह की संवेदना भी जैसे नाटकीय होकर रह गई लगती है। उत्तर प्रदेश में सई-गोमती-मंदाकिनी-हिंडन-यमुना जिये के अगुवा क्रमशः आर्यशेखर, लोकभारती के अतिसक्रिय ब्रजेन्द्र भाई और अभिमन्यु सिंह, डा कृष्णपाल, मनोज मिश्र आखिर कैसे भूल सकते हैं कि यदि गंगा निर्मल अविरल हो गई, तो उनकी नदियां की अविरलता और निर्मलता का रास्ता भी खुल जायेगा? कहां हैं जलबिरादरी के गंगासिपाही? क्या क्रांति की फैक्ट्रियां रहे इलाहाबाद और बनारस के विश्वविद्यालय में भी अब चिंगारी नहीं बची? कलम के धनी अनुपम मिश्र की कलम आखिर क्या सोचकर चुप है? क्या गंगा नहीं बची, तो तालाब ज्यादा दिन खरे रह पायेंगे? तालाब और नदी एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं। क्या उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में गंगा क्षीण हुई, तो बिहार-बंगाल की गंगा दुष्प्रभावित नहीं होगी?

चेतावनी पतन की


गंगा में सीधे गंदे नाले का पानी छोड़ा जा रहा हैगंगा में सीधे गंदे नाले का पानी छोड़ा जा रहा हैचेतावनी है सिर्फ इतनी कि योगगुरू रामदेव व गांधीवादी अन्ना के बाद अब यदि सरकार स्वामी निगमानंद की मौत से शुरू हुआ गंगा रक्षा संघर्ष को भी पीछे ढकेलने में कामयाब रही, तो यह सामाजिक उत्थान की दृष्टि से बहुत बुरा होगा। जे पी आंदोलन के तीन दशक बाद इस देश में एक जलजला से उठा है। यदि एक बार यह दौर चूक गया, तो जाने कब इस देश में दोबारा यह दौर आये? उनकी लड़ाइयां व्यवस्था के खिलाफ थी। उनकी लड़ाई मीडिया के कंधों पर लड़ी गई। यह तपस्या मां के जीवन के लिए है। मां के प्राणों के लिए सिर्फ मीडिया ही नहीं, समाज के कंधों को आगे आना चाहिए। हरेक को अपनी भूमिका तलाशकर गंगा संघर्ष को गति देने में लग जाना चाहिए।

मैं एक लेखक हूं। लिख रहा हूं और आप?....

यदि ये कंधे अभी एकजुट होने को तैयार नहीं हैं, तो आगे गंगा की अर्थी अपने कंधे पर उठाने को तैयार रहें।

करोड़ो लोगों को अपना पानी पीलाने वाली गंगा में जहर डाला जा रहा हैकरोड़ो लोगों को अपना पानी पीलाने वाली गंगा में जहर डाला जा रहा है

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