गागर में सिमटते सागर

Author:अरविंद कुमार सिंह

पुस्तक समीक्षा


दफन होते दरिया
पंकज चतुर्वेदी
यश पब्लिकेशंस
1/10753, गली नं. 3 सुभाष पार्क
नवीन शाहदरा
दिल्ली 110032
पृ. 174(सजिल्द) रू. 595/


.नब्बे के दशक में श्री अनुपम मिश्र की पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ छप कर आई और उसकी पांच लाख से ज्यादा प्रतियाँ कई लोगों ने छापीं। आज भी उस पुस्तक का छपना, बिकना, पढ़ा जाना और उस पर विमर्श जारी है। कह सकते हैं कि वह एक उदाहरण था कि किस तरह से एक पुस्तक आंदोलन बन जाती है। श्री मिश्र की उस किताब के लिए बुंदेलखंड के तालाबों पर कुछ सामग्री मुहैया करवाने वाले पत्रकार पंकज चतुर्वेदी के लिए भी वह पुस्तक एक प्रेरणा-पुंज थी। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में नाम के उल्लेख से उत्साहित श्री चतुर्वेदी उसके बाद देश-दुनिया में जहां भी गए, वहां की जल-निधियों को देखना नहीं भूले और उन्होंने अपने अनुभवों का ‘‘दफन होते दरिया’ में प्रस्तुत कर दिया।

वैसे भी प्रकृति की अनमोल भेंट, बारिश की हर एक बूंद को सहेजना व साल भर आड़े वक्त पर काम लेने की कला हमारे पूर्वजों ने कई-कई सदियों में सीखी, विकसित की और सहेजी थी और इस अनुकरणीय श्रम को अगली पीढ़ी तक सहेज कर रखना हमारी भी नैतिक ज़िम्मेदारी है। अब हाकिमों को, बड़ी-बड़ी डिगरी वाले इंजीनियरों को भी समझ आ गया है कि चाहे कंठ को तर करना हो या फिर खेत को संतुष्ट; ना तो जमीन का पेट चीर कर इस मांग को पूरा किया जा सकता है और ना ही नदियों से। जरूरी है कि अपने गांव-कस्बों के पुराने जल-कुंडों को उनका समृद्ध अतीत लौटाया जाए।

‘‘दफन होते दरिया’ पुस्तक में कुल आठ ऐसे महानगरों व उनके करीबी शहरों को लिया गया है, जहां की आबादी साल भर पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रही है, जबकि उनके चप्पे-चप्पे पर पारंपरिक तालाब थे, जो विकास की आंधी में कहीं समतल मैदान तो कहीं कालोनी बन गए। प्रयास किया गया है कि इसमें अधिकांश उन तालाब-प्रणालियों को शामिल किया जाए , जो गैर हिंदी भाषी राज्यों में हैं और जहां की खबरें हिंदी इलाकों तक कम ही आती हैं। फिर अनुपम बाबू ने हिंदी भाषी इलाकों के तालाबों पर अपनी किताब में जो लिख दिया, उसके आगे उन प्रणालियों पर कुछ कहने को रह नहीं जाता है। यह पुस्तक तालाबों की विकसित तकनीकी और फिर आजादी के बाद उनकी उपेक्षा से उपजे हालातों की बानगी है।

दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, अहमदाबाद...... किसी भी शहर का नाम ले लो, बस शहर का नाम व भौगोलिक स्थिति बदलेगी, वहां रोजी-रोटी की आस में आए परदेशियों को सिर छिपाने की जगह देना हो या फिर सड़क, बाजार बनाने का काम; तालाबों की ही बलि दी गई और फिर अब लोग गला सूखने पर अपनी उस गलती पर पछताते दिखते हैं। तालाबों को चौपट करने का खामियाजा समाज ने किस तरह भुगता, इसकी सबसे बेहतर बानगी हमारे शहर हैं। थोड़ी सी बारिश हुई तो सड़क-गलियां पानी से तरबतर और अगले ही दिन एक-एक बूंद के लिए त्राहि-त्राहि। अब तो देश के 32 फीसदी हिस्से को पानी की किल्लत के लिए गरमी के मौसम का इंतजार भी नहीं करना पड़ता है- बारहों महीने, तीसों दिन यहां जेठ ही रहता है। सरकार संसद में बता चुकी है कि देश की 11 फीसदी आबादी साफ पीने के पानी से महरूम है। दूसरी तरफ यदि कुछ दशक पहले पलट कर देखें तो आज पानी के लिए हाय-हाय कर रहे इलाके अपने स्थानीय स्रोतों की मदद से ही खेत और गले दोनों के लिए अफरात पानी जुटाते थे। एक दौर आया कि अंधाधुंध नलकूप रोपे जाने लगे, जब तक संभलते जब तक भूगर्भ का कोटा साफ हो चुका था। समाज को एक बार फिर बीती बात बन चुके जल-स्रोतों की ओर जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है - तालाब, कुंए, बावड़ी। लेकिन एक बार फिर पीढ़ियों का अंतर सामने खड़ा है, पारंपरिक तालाबों की देखभाल करने वाले लोग किसी और काम में लग गए और अब तालाब सहेजने की तकनीक नदारद हो गई है। असल में तालाब की सफाई का काम आज के अंग्रेजीदां इंजीनियरों के बस की बात नहीं है।

इस पुस्तक का पहला अध्याय मिसाईलों-राकेटों को छोड़ने के लिए मशहूर श्रीहरीकोटा के ऐसे तालाब पर है जो असल में अनूप या लगून है- पुलिकट। यह स्थान कभी राजहंसों की शरणस्थली था। यहां की मूल संरचना से हुई छेड़छाड़ का ही नतीजा है कि जहां जल होना चाहिए था, वहां रेत है। ‘कंक्रीट का जंगल बन गए बंगलूरे वाले अध्याय में मैसूर, धारवाड़ की झीलों और बीजापुर की आदिलशाही जल प्रबंधन व्यवस्था की भी चर्चा है। इसमें खुलासा किया गया है कि किस तरह महानगर की डेढ़ सौ से ज्यादा झीलों पर मकान, दुकान, स्टेडियम बना दिए गए और इसके चलते थोड़ी सी वर्षा हुई व शहर जाम हो जाता है। हैदराबाद के तालाबों वाले अध्याय में हुसैन सागर के अलावा शहर की कई सौ तालाबों की खोज पर सामग्री है और यह भी है कि किस तरह भूमाफिया सरकारी मदद से तालाबों को पाट कर जमीन बेचता है। मद्रास के पारंपरिक सिंचाई प्रणाली ‘एरी’ पर सामग्री बताती है कि किस तरह पहले का समाज पानी, तालाब और सिंचाई को खुद ही नियोजित व संचालित करता था।

मणिपुर की लोकटक झील को बचाने के लिए स्थानीय निवासी व प्रशासन दोनों ही अपनी-अपनी मुहिम चला रहे हैं, लेकिन दोनों के बीच ना तो संवाद है और ना ही एकदूसरे के हितों की रक्षा का संकल्प। दुनिया में अपने तरीके से विरली इस झील में तैरते हुए गांव, बाजार और यहां तक कि राष्ट्रीय संरक्षित वन क्षेत्र भी है। इस झील को शहरीकरण व बिजली के लिए बांधना श्राप सिद्ध हुआ है। श्रीनगर की डल लेक के अलावा कई अन्य झीलें भी शहरीकरण के दर्द से अंत की ओर अग्रसर हैं। इस अध्याय में झील की सफाई के नाम पर सरकारी पैसे की सफाई, नगीन, वुल्लर जैसी अन्य झीलों पर मंडरा रहे खतरे पर बेहद खोजपरक सामग्री है।

लेखक पंकज चतुर्वेदी बुंदेलखंड से हैं और शायद इसीलिए वहां के मध्य प्रदेश के तालाबों पर एक अध्याय जोड़ना वे नहीें भूले। इसमें सागर, छतरपुर, टीकमगढ़ के शहरी तालाबों को हड़पने के कई किस्से और उससे उपजे बुंदेलखंड के सूखे व पलायन पर काफी सामग्री है। आखिर अध्याय सबसे तीखा है- यह दिल्ली, उससे सटे गाजियाबाद व पश्चिमी उत्तर प्रदेश व एक नए राज्य की राजधानी रायपुर में तालाबों को बिराने से बने जल-संकट के हालात पर है।

यह पुस्तक लेखक पंकज चतुर्वेदी के चार साल के भ्रमण और शोध का प्रतिफल है। तालाब जैसे भुला दिए गए विषय पर ‘आज भी खरे हैं तालाब’ के बाद संभवतया यह पहली पुस्तक है। सबसे बड़ी बात इस पुस्तक में शहरीकरण, जल संकट और पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण कहीं जरूरत को एक साथ प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक समाज को जागरूक करती है, पश्चाताप को मजबूर करती है, आधुनिकता की आंधी के विपरीत दिशा में ‘‘अपनी जड़ों को लौटने’’ की इच्छा शक्ति विकसित करती है और चेतावनी देती है कि तालाबों के प्रति थोड़ी-सी कोताही मानवता के लिए खतरा बन सकता है।

अरविंद कुमार सिंह
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