गांधी का प्रकृति चिन्तन

Author:कृष्ण गोपाल 'व्यास’

महात्मा गांधी के प्रकृति चिन्तन से सम्बन्धित संदेश आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि उनके लेखों तथा विचारों में पर्यावरण सम्बन्धी दृष्टिबोध तथा पर्यावरण पर काम करने वालों के लिए कालजयी मार्गदर्शन मौजूद है इसलिये उपभोक्तावाद से त्रस्त अनेक लोग, गांधी दर्शन में मुक्ति तथा विकास का मार्ग खोज रहे हैं। आज से एक शताब्दी पूर्व 1909 में गांधीजी ने पश्चिमी समाज के आनन्द तथा समृद्धि की अंतहीन दौड़ को, समूची धरती तथा उसके संसाधनों के लिए गंभीर खतरा माना था। उनके लेखों को हिन्द स्वराज में संकलित किया गया है। इस पुस्तक में उन्होंने पश्चिमी समाज को, उनकी जीवनशैली के दुःप्रभावों के प्रति सचेत किया है। इसके साथ ही उन्होंने भारतवासियों से अनुरोध किया है कि वे भौतिक लाभों के लालच में न उलझें।

 

  • महात्मा गांधी जी के पर्यावरण से जुडें कुछ प्रसिद्ध उद्धरण निम्नानुसार हैं-
  • पृथ्वी, सभी व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त है किन्तु उनके लालच की पूर्ति के लिये नही।
  • पृथ्वी, वायु, भूमि तथा जल हमारे पूर्वजों से प्राप्त सम्पत्तियाँ नहीं हैं। वे हमारे बच्चों की धरोहरें हैं। वे जैसी हमें मिली हैं वैसी ही उन्हें भावी पीढ़ियों को सौंपना होगा।
  • विश्व में एक नियमितता है। जो भी अस्तित्व में होता है उसके नियमन के लिए अपरिवर्तनशील नियम है। अन्धा नियम, किसी भी मनुष्य के व्यवहार को नियमित नहीं कर सकता।
  • हम, विश्व में वनों के प्रति जो कुछ कर रहे हैं वह केवल उसका प्रतिबिम्ब है, जो हम अपने तथा एक दूसरे के साथ करते हैं।
  • जब तक मानव-संस्कृति के भौतिक नियमों के केन्द्र में अहिंसा नहीं होगी, हम प्रकृति के विरुद्ध हिंसा को रोकने के लिए, पर्यावरण सम्बन्धी गतिविधियाँ नहीं चला सकते।
  • वन्य जीवन, वनों में कम हो रहा है किन्तु वह शहरों में बढ़ रहा है।
  • विकास का त्रुटिपूर्ण ढांचा, गांवों से शहरों की ओर पलायन को प्रोत्साहित करता है।
  • गांधीजी का दृष्टिकोण, पर्यावरण के प्रति व्यापक था। उन्होने देशवासियों से, तकनीकों के अन्धानुकरण के विरुद्ध, जागरूक होने का आवाहन किया था। उनका मानना था कि पश्चिम के जीवन स्तर की नकल करने से, पर्यावरण का संकट पनप सकता है। उनका मानना था कि यदि विश्व के अन्य देश भी आधुनिक तकनीकों के मौजूदा स्वरूप को स्वीकार करेंगे तो पृथ्वी के संसाधन नष्ट हो जायेंगे।

महात्मा गांधी का प्रकृति चिन्तन

महात्मा गांधी ने अपने प्रकृति चिन्तन में निम्न बिन्दुओं को महत्व दिया था-

1. ग्रामों की आत्मनिर्भरता - ग्राम स्वराज

2. कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन

3. आयातित उपभोक्ता वस्तुओं पर नियंत्रण

4. कृषि में सुधार,

5. अक्षय समाज,

6. आर्थिक समानता,

7. अंहिसा तथा जीवों के प्रति संवेदना तथा

8. स्वच्छता।

इक्कीसवी सदी का मनुष्य, महात्मा गांधी के प्रकृति चिन्तन के विपरीत, अपनी नियति खुद गढ़ रहा है। वह अंतरिक्ष में कालोनी, रोबो द्वारा चलित मशीनें, कम्प्यूटर जैसी बुद्धि का विकास करने के लिये लगातार प्रयासरत है। उपरोक्त नियति निर्धारण के कारण, विश्व में उपभोग की प्रवत्ति तथा विविध उत्पादनों में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है जिसके कारण, वैष्विक पर्यावरण तथा स्थानीय मौसम पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। इसके उदाहरण हैं - वैश्विक ऊष्मता, ओजोन परत का हृास, अम्लीय वर्षा, समुद्र स्तर में वृद्धि, वायु, जल तथा भूमि संक्रमण और मरुस्थलों के क्षेत्रफल में हो रही वृद्धि। यह वही नियति है जिससे बचने की बात महात्मा गांधी ने अपने प्रकृति चिन्तन में कही है। गांधीजी की सोच, पर्यावरण के प्रति मैत्री पूर्ण थी। उस सोच में समाज के अंतिम व्यक्ति के हितों का ध्यान रखा गया है। उनका विश्‍वास था कि गरीबी और प्रदूषण एक दूसरे के पोषक हैं। गांधी जी का सरल जीवन का नुस्खा, प्राकृतिक साधनों के असीमित उपभोग तथा अंतहीन शोषण पर रोक लगाता है। यह उनके पर्यावरण सम्बन्धी सोच का सबसे बडा उदाहरण है। महात्मा गांधी की उपरोक्त सोच उस कालखंड में विकसित हुई जब वैज्ञानिक जगत भी पर्यावरण के कुप्रभावों से लगभग अपरिचित था। महात्मा गांधी के अनुसार गरीबों का शोषण रोकने के लिये बड़े-बड़े उद्योग-धन्धों और ग्रामोद्योगों को साथ साथ संचालित करना चाहिये।

ग्राम उद्योग को प्रोत्साहन

गांधी जी का कहना था कि जहाँ मानव श्रम द्वारा काम संभव नही हों तभी जन उपयोगी भारी भरकम कामों को मशीनों से कराया जावे। कार्य, राज्य की अधिकारिता में हों तथा जन-कल्याण उसका उद्देष्य हो। केन्द्रीकृत तथा विकेन्द्रीकृत तरीकों से उत्पादन किया जाए। आय तथा धन का वितरण समान हो तथा जन साधारण के हित साधे जा सकें। गांधी जी के अनुसार, मशीनीकरण तभी उपयोगी है जब काम करने वाले व्यक्तियों की संख्या कम तथा जल्दी कार्य पूरा करने की अनिवार्यता हो। भारत में मजदूरों की संख्या बहुत अधिक है इसलिए मशीनों का उपयोग हानिकारक है। इस सोच के कारण, वे, मशीनों के प्रति अत्याधिक रूचि के खिलाफ थे। वे, ऐसे उपकरणों के पक्षधर थे जो अनावश्यक मानव - श्रम को कम करते हैं। वे, विशाल उत्पादन नही, अपितु बहु-श्रमिक उत्पादन चाहते थे।

भारत में गरीबी, बेरोजगारी, आय की असमानता, भेद-भाव इत्यादि को देखते हुए गांधी जी ने चरखे के उपयोग को, प्रतीक के रुप में, प्रोत्साहित किया था। उनका उद्देष्य, खादी तथा ग्राम आधारित उद्योगों को प्रोत्साहित कर बेरोजगारी तथा गरीबी को कम करना था। गांधी जी का पूरा जीवन तथा उनके समस्त कार्य, मानवता के लिए पर्यावरण सम्बन्धी विरासत हैं। उन्होंने जीवन पर्यन्त, व्यक्तिगत जीवन शैली द्वारा, समग्र विकास की अवधारणा को प्रतिपादित किया। यद्यपि उनका लगभग सम्पूर्ण जीवन ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध संर्घष में बीता, किन्तु वे हमेषा प्रकृति तथा शान्ति से जुड़े रहे। उनकी ताकत, उनका आत्मबल था। उनका संदेश पर्यावरण संरक्षण तथा समग्र विकास आधारित था। उनके सन्देष, भारत ही नही अपित सम्पूर्ण विश्व के लिए आज भी उपयोगी हैं।

औद्योगीकरण एक अभिशाप

गांधीजी का सोचना था कि औधोगीकरण मानव जाति के लिए अभिषाप है। इससे लाखों नागरिकों को काम नहीं मिलेगा तथा प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होगी। आधुनिक विकास के कारण हुई पर्यावरणीय हानि की अनेक बार क्षतिपूर्ति संभव नहीं होती। गांधीजी का विष्वास था कि कुटीर उद्योग तथा ग्राम उद्योग हजारों लोगों को सुविधायें तथा संसाधन उपलब्ध कराते हैं। उन्हे बढ़ावा देने से अनेक लोगों को काम मिलता है तथा राष्ट्रीय आय बढ़ती है। गान्धीजी का सोच था कि जीवित मषीनों को मृत मषीनों से मुकाबला नहीं करना चाहिये। गांधीजी का ग्रामीण संसाधनों पर आधारित माडल पर्यावरण को न्यूनतम हानि पहुँचाता है। उसके उपयोग से हुई पर्यावरणीय हानि का नवीनीकरण या सुधार संभव है।

आर्थिक समानता

गांघीजी का आर्थिक समानता तथा सम्पत्ति के समान वितरण का सिद्धान्त इस अवधारणा पर आधारित था कि प्रत्येक व्यक्ति के पास उसकी प्राकृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन होंगे। उन्होंने सम्पत्ति के समान वितरण का व्यावहारिक तरीका बताया था। इस तरीके के अनुसार हर व्यक्ति को अपनी आवश्यकतायें न्यूनतम रखनी होंगी। दूसरों की गरीबी का ध्यान रखना होगा।

अहिंसा तथा जीवों के प्रति सम्वेदना

गांधीजी अनुभव करते थे कि हम प्रकृति के वरदानों का उपयोग तो कर सकते हैं किन्तु हमें उनको मारने का अधिकार नही है। गांधीजी यह भी मानते थे कि अहिंसा तथा सम्वेदना न केवल जीवों के प्रति बल्कि अजीवित या मृत पदार्थों के प्रति भी होना चाहिये। अजीवित पदार्थों का अतिदोहन जो लालच तथा ज्यादा लाभ के लिये किया जाता है वह जैवमण्डल को नुकसान पहुँचाता है। वह हिंसा है। इससे अन्य लोगों को जो उसका उपयोग करना चाहते हैं हानि होती है।

स्वच्छता

गांधीजी ने कहा था कि जीवन में स्वच्छता का स्थान सर्वोच्च है इसलिये गरीबी के कारण या उसकी आड़ में कोई भी शहर स्वच्छता की व्यवस्था से मुक्ति नहीं पा सकता। जो भी मनुष्य थूक कर वायु तथा जमीन को दूषित करता है या जमीन पर कचरा फेंकता है वह प्रकृति के विरुद्ध पाप करता है। हम स्नान करने में आनन्द महसूस करते हैं किन्तु कुआ जलाशय अथवा नदी को मल त्याग द्वारा गंदा करते हंै। हमें इन आदतों को पापाचार मानना चाहिये। हमारी उपरोक्त आदतों के कारण हमारे गांव तथा नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं। ऐसी अस्वच्छता बीमारियों का प्रसार करती हैं।

गांधीजी का पर्यावरणवाद नैतिक सिद्धान्तों पर आधारित था। गांधीजी का अपनी देह तथा दिमाग पर पूर्ण नियंत्रण था। इसलिए उन्होंने कभी भी ऐसा कोई उपदेश नही दिया जिसका वे अपने व्यक्तिगत जीवन में स्वयं पालन नहीं करते हों। यही उनका प्रकृति चिन्तन है।