गढ़मुक्तेश्वर के गंगाघाट: जहां पहले पॉलीथिन तैरती थीं, वहां अब डॉलफिन तैरती हैं

Author:लोकसम्मान पत्रिका टीम 
Source:नवम्बर-2022, लोकसम्मान पत्रिका

गढ़मुक्तेश्वर का गंगाघाट बना कर्मक्षेत्र

पूर्ण देश ही नहीं वरन संपूर्ण विश्व में जल को लेकर लगातार चिंता व्यक्त की जाती रही हैं कुछ लोगों ने केवल चिंता करके ही इसका समाधान निकालने का तरीका ढूंढा तो कुछ लोग इस संकट को दूर करने के लिए जी जान से लग गए। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों को सापेक्ष करते हुए कार्य करने की ठान ली। इन्हीं में से एक हैं युवा पर्यावरणविद के रूप में सम्मानित भारत भूषण गर्ग जो सामाजिक संस्था लोक भारती के मेरठ प्रांत के संयोजक भी हैं। इन्होंने किस प्रकार कार्य किया और वह किस दिशा में चल पड़ा आज वह किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इन्होंने किसी पुरस्कार को पाने के लिए अथवा सरकार से फंड प्राप्त कर कार्य करने के लिए इस कार्य को नहीं किया वरन परिवार की परंपरा से मिले हुए संस्कारों के वशीभूत दिल्ली एनसीआर के निकट के जनपद हापुड़ के निकट पुष्पावती पूठ के घाट को स्वर्गीय अनिल माधव दवे जी एवं लोक भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बृजेंद्र पाल जी के मार्गदर्शन में अब से 20 वर्ष पूर्व गोद लेकर कार्य करना प्रारंभ कर दिया।

डॉल्फिन संरक्षण के लिए रामसर साइट 

भारत भूषण बताते हैं कि पुष्पावती पूठ घाट कौरव और पांडवों की शिक्षास्थली के रूप में विख्यात रहा। परंतु कालांतर में यह स्थान अपनी ऐतिहासिकता को विस्मरण करते हुए अव्यवस्थाओं का शिकार हो गया। सन 2002 में जब इस घाट को गोद लिया गया तब यहां श्रद्धालुओं की संख्या भी कम थी लेकिन जो भी लोग आते थे वह गंदगी अपने साथ लेकर आते थे जिससे मन में बड़ी पीड़ा होती थी। उन्हें समझाने में काफी समय लगता था और अधिकांश श्रद्धालु असहमत होते हुए हम से भिड़ने के लिए भी तैयार रहते थे। जब हम इसके मूल में गए तब हमने जाना इसके पीछे उनकी वह श्रद्धा है जो उन्हें उनके पंडित जी ने बताई है कि इस पूजा सामग्री को गंगा जी में प्रवाहित कर देना। हमें यहीं से अपने कार्य करने की दिशा प्राप्त हो गई। हम लोगों ने ब्राह्मण समाज की छोटी-छोटी बैठकें करनी प्रारंभ कर दीं तथा उनसे आग्रह किया कि वे लोग जिनके यहां भी किसी भी प्रकार का कोई संस्कार, यज्ञ आदि करें। तब उन्हें उक्त पूजा सामग्री को गंगा में या अन्य किसी नदी में प्रवाहित करने के लिए ना कहें, अपितु इस सभी सामग्री को खेतों में डालने की बात कहें। हमने देखा कि कुछ ही समय में इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई देने लगा। सन 2005 में बृजघाट से नरोरा तक ऊपरी गंगा नदी को डॉल्फिन संरक्षण के लिए रामसर साइट घोषित किया गया तब हमारा कार्य क्षेत्र बृजघाट से लेकर नरोरा तक लगभग 120 किलोमीटर लंबाई में फैल गया। तब हमने और अधिक गति से कार्य करना प्रारंभ कर दिया। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के साथ मिलकर हम लोग प्रत्येक वर्ष डॉल्फिन काउंटिंग में जाने लगे तब ध्यान में आया कि गंगा नदी के दोनों किनारे सूने-सूने हैं। वहां से प्रत्येक प्रकार की वनस्पति को समाप्त करने का दुष्चक्र चल रहा है। तब हमने वन विभाग के साथ मिलकर गंगा नदी के तटों पर खस घास लगाने के साथ-साथ वृक्षारोपण के कार्य को अपना ध्येय बना लिया। इस कार्य में लगातार लोग जुड़ते चले गए। 

डॉल्फिन गार्जियन से सम्मानित भारत भूषण

भारत भूषण के इस कार्य को देखते हुए  डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने दिल्ली मुख्यालय के अंदर आयोजित  एक  कार्यक्रम  में  उन्हें  डॉल्फिन गार्जियन घोषित किया। भारत भूषण गर्ग कहते हैं कि डॉल्फिन गार्जियन बनने के बाद उनका कार्य और अधिक बढ़ गया। अब वह स्थान स्थान पर जाकर लोगों के बीच गंगा को साफ-सुथरा रखने के लिए जनसंवाद करने लगे हैं। अनेक लोगों ने उनकी बात को समझ कर स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया। परिणाम यह रहा है कि आज गंगा के दोनों तट हरे-भरे दिखाई देने लगे हैं। जहां पहले यहां शिकार बहुतायत में होता था, अब कहीं शायद एकाध कहीं चोरी छुपे ही होता हो तो अलग बात है। 

टाइगर गार्जियन का सम्मान भी

भारत भूषण के कार्यों को देखते हुए 2018 में वन विभाग के द्वारा उन्हें टाइगर गार्जियन की उपाधि से विभूषित किया गया तथा  करें। तब से इस कार्य को वे लगातार करते चले उनसे अपेक्षा की गई कि वे जनसामान्य के बीच  आ रहे हैं। आज पुष्पावती पूठ का घाट नमामि वन विभाग की टीम के साथ जाकर जंगली  गंगे मिशन के अंतर्गत निर्मित होकर श्रद्धालुओं जीव-जंतुओं से सुरक्षा के संबंध में जनसंवाद  की श्रद्धा का केंद्र बन गया है। यहां भारत भूषण गर्ग के प्रयासों से पॉलिथीन मुक्ति का जो अभियान चलाया गया था वह पूर्णरूपेण सफल  है। आज गंगा के अंदर उसकी सुरक्षा एवं सफाई के लिए उपयोगी कछुए घड़ियाल ऊदबिलाव आदि जलचर दिखाई देने लगे हैं। इस घाट पर 40 से 60 के बीच डॉल्फिन भी उछलकूद करती हुई दिखाई देती हैं। यदि आज संपूर्ण देश में हम गणना करें तो बिना किसी सरकारी सहायता लिए हुए इस प्रकार का पुण्य कार्य करने वाले बिरले ही होंगे। भारत भूषण का यह कार्य निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ियों के लिए यशस्वी होगा। अपने सद्प्रयासों से लगभग 3 लाख पौधे लगाकर उन्हें वृक्ष के रूप में साकार करने का पुनीत कार्य किया है उन कुछ चुनिंदा  लोगों में से भारत भूषण गर्ग एक प्रमुख नाम है।

जिन्होंने आज तक किसी भी सरकारी या गैर सरकारी पुरस्कार के लिए अपना आवेदन नहीं किया है वे कहते हैं कि उन्होंने यह कार्य कभी भी किसी पुरस्कार की होड़ के लिए नहीं किया।

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