गंगा प्राधिकरण की तीसरी बैठक संकेत बुरे, बैठक बेनतीजा

Author:अरुण तिवारी

गंगा प्राधिकरण की बैठक का विफल होना यह संकेत है कि अध्ययन व कार्ययोजना उसे अनुकूल मानते हों या न मानते हों, मास्टर प्लान जब आयेगा, तब आयेगा तय किए गये काम चलते रहेंगे। कर्ज का पैसा मल के साथ और बहेगा। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कह ही दिया है कि उत्तराखंड की जलविद्युत परियोजनायें रोकी नहीं जायेंगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कह ही रहे हैं कि परियोजनाओं की मंजूरी को लेकर पहले से चले विभागों/मंत्रालयों के अतिरिक्त अन्य कोई नया स्तर मंजूर नहीं है। प्राधिकरण का एजेंडा भी यही कह रहा है।

17 अप्रैल की बहुप्रतीक्षित तिथि आई भी और चली भी गई। गंगा प्राधिकरण की बैठक शुरू भी हुई और बेनतीजा खत्म भी हो गई। नतीजा सिफर हो और संकेत बुरे, तो इसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। संतोष करने के लिए इस बैठक में सिर्फ इतना ही था कि प्रधानमंत्री ने यह कहकर गंगा सेवा अभियानम् का मान रखा कि स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को सुने बगैर प्राधिकरण उसके एजेंडे पर कोई निर्णय नहीं ले सकता। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की यह तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बैठक मानी जा रही थी। यह वह बैठक थी, जिसकी बिना पर तपस्या पर बैठे स्वामी सानंद के नये नामकरण वाले प्रो. जीडी अग्रवाल ने गत 23 मार्च को पुनः जलग्रहण किया था। उन्हें कहा था कि वह इसलिए जलग्रहण कर रहे हैं ताकि प्राधिकरण बैठक के लिए तैयारी कर सकें। यह बैठक इस मायने में भी खास मानी जा रही थी कि नवंबर, 2011 में प्राधिकरण के विशेषज्ञ सदस्यों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस बैठक की मांग की थी। अपेक्षित आपात बैठक के न बुलाये जाने पर राजेन्द्र सिंह, प्रो. सिद्दिकी और रवि चोपड़ा ने प्राधिकरण की विशेषज्ञ सदस्यता से इस्तीफा भी दे दिया था। यह बात और है कि प्रधानमंत्री ने इस बैठक में एक बार पुनः दोहराया कि वह इस्तीफे मंजूर नहीं करेंगे। उन्होंने सभी को साथ मिलकर काम करने की अपील एक बार फिर दोहराई है।

उम्मीद थी कि गंगा सेवा अभियानम् द्वारा आहूत तीन माह पुरानी तपस्या कुछ रंग लायेगी। उम्मीद यह भी थी कि गंगा सेवा अभियानम् के प्रतिनिधि व विशेषज्ञ सदस्य इस बैठक में अपनी बात खुलकर कहेंगे। प्रधानमंत्री समेत प्राधिकरण के अन्य निर्णायक सदस्यों को बतायेंगे कि यदि प्राधिकरण अभी भी विशेषज्ञ सदस्यों को सिर्फ नाम का सदस्य बनाये रखना चाहता है। यदि शासन-प्रशासन गंगा की मलीनता और जलप्रवाह में आई कमजोरी का इलाज करने की बजाय सिर्फ स्वामी सानंद का इलाज कराने में दिलचस्पी रखता है, तो यह अब नहीं चलने वाला। हालांकि गंगा सेवा अभियानम् से वार्ता करने के लिए भारत सरकार की ओर से अधिकृत मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और वी. नारायण सामी द्वारा गंगा सेवा अभियानम् को दिए गये मौखिक आश्वासन पूरे नहीं हुए। इस बिना पर स्वामी सानंद ने कई दिन पूर्व ही बैठक के बहिष्कार की घोषणा कर दी थी। विरोध में पुनः जलत्याग के कारण यूं भी उनकी सेहत व डॉक्टर दोनों ने भी उन्हें बैठक में जाने की मंजूरी नहीं दी। उनकी अनुपस्थिति मात्र ने इस बैठक को बेनतीजा बना दिया।

यह बैठक इस मायने में भी बेनतीजा रही कि गंगा सेवा अभियानम् के जिस एजेंडे पर बैठक थी, स्वामी सानंद द्वारा तैयार एजेंडा नोट बैठक में प्रस्तुत ही नहीं किया गया। स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद के नेतृत्व में गया गंगा सेवा अभियानम् का सात सदस्यीय भी अपना तार्किक और वैज्ञानिक पक्ष रखने में नाकाम रहा। इस दल में अन्य संतों में मातृसदन-हरिद्वार के संत स्वामी शिवानंद सरस्वती, कल्कि पीठ-संभल के आचार्य प्रमोद कृष्णम, श्वेतांबर जैन आचार्य लोकेश मुनि प्रमुख थे। इस्तीफा दे चुके विशेषज्ञ सदस्यों ने कुछ तेवर दिखाए जरूर, लेकिन प्रधानमंत्री की विनम्रता के सामने तेवर जल्द ही तिरोहित हो गये। उल्लेखनीय है कि इस बैठक में गंगा सेवा अभियानम् द्वारा दिए एजेंडे में गंगा की अविरलता-निर्मलता सुनिश्चित करने के लिए कुछ निर्णायक जमीनी कदम तथा प्राधिकरण को सक्रिय बनाने की मांग शामिल थी। इस एजेंडे में पोर्टल के पूर्व उल्लिखित मांगों के अलावा कुंभ प्रयाग - 2013 की तैयारी के लिए प्राधिकरण द्वारा एक समिति बनाये जाने की मांग अतिरिक्त थी। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा प्रस्तावित पांच अन्य मुद्दे भी बैठक का एजेंडा थे:-

1 प्राधिकरण की दूसरी बैठक में लिए गये निर्णयों पर की गई कार्रवाइयां।
2 अनुमोदित परियोजनाओं की प्रगति समीक्षा।
3 विश्व बैंक द्वारा सहायता प्राप्त परियोजाओं की वस्तुस्थिति समीक्षा।
4 सात आई आई टी संस्थानों के संघ द्वारा तैयार की जा रही गंगा नदी बेसिन प्रबंधन योजना की स्थिति की समीक्षा।
5 इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा गंगा एक्सप्रेसवे परियोजना के संभावित पर्यावरणीय दुष्प्रभावों की जांच विचार के लिए प्राधिकरण को भेजे जाने संबंधी आदेश पर चर्चा।

उल्लेखनीय है कि इन पांच बिंदुओं पर कोई चर्चा या प्रस्तुति की नौबत ही नहीं आई। केंद्र सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री के अलावा कोई अभिभाषण नहीं हुआ। प. बंगाल की मुख्यमंत्री बैठक में उपस्थित नहीं थी। शेष चार मुख्यमंत्रियों ने बैठक में शिरकत भी की और अपनी बात भी कही। बैठक एक तरफ बेनतीजा थी, तो दूसरी तरफ इन अभिभाषणों से मिले संकेत इतने बुरे कि गंगा की हालत और खराब होगी; यह स्पष्ट हो गया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि व्यापक अध्ययन और कार्ययोजना अमल में आने से पहले हमें कुछ ऐसे उपाय अवश्य करने चाहिए, जो कि हर तरह से आवश्यक हैं अथवा जिन्हें बाद में करना मुश्किल होगा। यह संकेत है कि अध्ययन व कार्ययोजना उसे अनुकूल मानते हों या न मानते हों, मास्टर प्लान जब आयेगा, तब आयेगा तय किए गये काम चलते रहेंगे। कर्ज का पैसा मल के साथ और बहेगा।

राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की बैठक बेनतीजाराष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की बैठक बेनतीजाउत्तराखंड मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कह ही दिया है कि उत्तराखंड की जलविद्युत परियोजनायें रोकी नहीं जायेंगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कह ही रहे हैं कि परियोजनाओं की मंजूरी को लेकर पहले से चले विभागों/मंत्रालयों के अतिरिक्त अन्य कोई नया स्तर मंजूर नहीं है। प्राधिकरण का एजेंडा भी यही कह रहा है। मतलब यह है कि पहले से रुकी गंगा एक्सप्रेसवे जैसी कई परियोजनायें न सिर्फ खुलेंगी, बल्कि बतौर प्रधानमंत्री परिचालन और रखरखाव कार्यों के लिए वित्तपोषण मानदंडों को और आसान बनाया जायेगा। इस बैठक से मिला संकेत यह भी है कि गंगा सेवा अभियानम् तथा प्राधिकरण के विशेषज्ञ सदस्य विरोध और सहयोग दोनों साथ-साथ चलाना चाहते हैं। गंगा के पानी के दोहन और जमीन पर कब्जे की कोशिश में हुए निवेश, निवेशक के पक्षकार की भूमिका में मुस्तैद राज्य व केंद्र की सरकारों के बीच बनी गजब की सहमति। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और केंद्र के ऊर्जा मंत्री की हठधर्मिता पर यदि एक निगाह डालें, तो क्या यह व्यावहारिक दिखता है?

हो सकता है कि मौखिक आश्वासन की पूर्ति न होने पर बैठक के बहिष्कार का कुछ दिन पूर्व लिया गया स्वामी सानंद के निर्णय को कोई अतिवादी कहे। किंतु इस बैठक से नदी कार्यकर्ताओं के मन में उठ रहा सवाल यह भी है कि जब स्वामी सानंद ने बैठक का बहिष्कार कर ही दिया था, तो फिर एजेंडा नोट भेजने का क्या औचित्य था? उनके बहिष्कार के बाद गंगा सेवा अभियानम् के प्रतिनिधिमंडल के बैठक में जाने का औचित्य भी समझ से परे है। यदि विरोध और सहयोग दोनों दिखाने या निर्णय बदलकर स्वामी सानंद के बतौर प्रतिनिधि गया भी, तो वहां एजेंडे को प्रस्तुत करने की बजाय सिर्फ नाममात्र की उपस्थिति दर्ज कराकर क्यों रह गया?

उठा सवाल यह भी है कि जिस बिना पर प्राधिकरण के तीन विशेषज्ञ सदस्यों ने इस्तीफा दिया था; वे बैठक में किस हैसियत से शामिल हुए? क्या उनकी मांगें पूरी हो गईं हैं? यह सच है कि प्रधानमंत्री ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया, तो क्या इसे यह माना जा सकता है कि सदस्यों ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया है? क्या यह दोनों बातें एक ही हैं? यदि नहीं! तो क्या यह माना जाये कि गंगा के पक्षधर संत, विशेषज्ञ और सरकार के बीच चल रही यह उठापटक चूहे-बिल्ली के खेल से ज्यादा कुछ नहीं? या यह माना जाये कि जब तक समाज सोया रहेगा, संत और सामाजिक कार्यकर्ता इसी तरह बेबस रहेंगे, सरकारें इसी तरह पुचकारती और लताड़ती रहेंगी, पैसा इसी तरह पर्यावरण लूटता रहेगा, गंगा इसी तरह मरती रहेगी और हम इसी तरह गंगा का अमर गान गाते रहेंगे। हर हर गंगे! जय जय गंगे!!

क्या हम एक शताब्दी पूरी कर चुके गंगा संघर्ष के सिर्फ मूक दर्शक बने रहकर गंगा जिंदा रख सकते थे? क्या हम गंगा के लिए कुर्बान हुए स्वामी निगमानंद और उस रास्ते पर प्राण की बाजी लगाने को तैयार बैठे स्वामी सानंद को सारी जिम्मेदारी सौंपकर मुक्त हो गये हैं? क्या गंगा को बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ स्वामी सानंद की है? क्या यह सच नहीं है कि जब तक गंगा को बचाने के काम की अगुवाई संस्थाओं के हाथ से निकालकर गंगा का समाज अपने हाथों में नहीं ले लेता, तब तक न सरकारें चेतेंगी और न गंगा। गंगा के मछुआरे, मल्लाह, पंडा, शवदाह कराने वाले तीर्थपुरोहित, डोम, किसान समाज के ऐसा हिस्सा है, गंगा का जीवन-मरण, जिनकी जिंदगी के जीवन-मरण का प्रश्न है। जिनके साथ गंगा का रिश्ता किसी भी अन्य से ज्यादा गहरा है। शेष के लिए तो लगता है, जैसे गंगा एक खिलौना है और वे खिलाड़ी। इन मरी हुई संवेदनाओं के बीच अब उम्मीद की आखिरी लौ समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े तारनहार से ही है। वही उतारे, तभी पार।