ग्रीन हाउस खेती की संभावनाएं

Author:दिलीप अग्निहोत्री
Source:जनसत्ता, 22 दिसंबर 2013
इसमें संदेह नहीं की ग्रीन हाउस खेती से फसलों, सब्जियों वगैरह का उत्पादन बहुत बढ़ाया जा सकता है। कई प्रदेशों की सरकार इसके लिए बड़ा अनुदान भी देती है। इसके बावजूद यह तकनीक बहुत महंगी होती है। इसके निर्माण का साहस देश के सामान्य किसान अक्सर नहीं दिखाते। जाहिर है कि इन सभी समस्याओं का समाधान तलाशना होगा। तभी ग्रीन हाउस खेती लोकप्रिय हो सकती है।भारत कृषि प्रधान देश है। साठ प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है। लेकिन किसान की परेशानियां कम नहीं है। सूखे और बाढ़ की समस्या बड़े क्षेत्र की फसलों को तबाह करती है। सामान्य मौसम में भी अपेक्षित उत्पादन में अनेक बाधाएं रहती हैं।उन्नत बीज, खाद, सिंचाई की समस्याएं रहती हैं। हरित क्रांति से उत्पादन बढ़ा, लेकिन रासायनिक खाद के अत्यधिक प्रयोग से अब खेतों की उपजाऊ क्षमता लगातार कम हो रही है। इसके अलावा कई उन्नत तकनीक की जानकारी किसानों को नहीं है। खासतौर पर सब्जी, फल-फूलों वगैरह का उत्पादन नई-नई तकनीक से बढ़ाया जा सकता है। परंपरागत खेती के मुकाबले ग्रीन हाउस संरक्षित खेती से उत्पादन में पांच से दस प्रतिशत तक उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। खुली खेती में फसलों को बहुत नुकसान पहुंचता है। विभिन्न प्रकार के रोग, कीटजनित और वायुजनित कवक, जीवाणु वगैरह सब्जी, फल, फूलों की फसलों की बहुत तेजी से नुकसान पहुंचाते हैं। आवश्यकता से अधिक या कम तापमान भी नुकसानदेह होता है।

प्रकाश की कमी से पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया नहीं हो पाती। इसका सीधा असर उपज के साथ-साथ गुणवत्ता पर पड़ता है। विश्व के करीब पचास से अधिक देशों में ग्रीन हाउस संरक्षित खेती की जा रही है। इसके माध्यम से औद्योगिक फसलों का व्यावसायिक उत्पादन किया जा रहा है। सब्जी, फूलों के उत्पादन के लिए ग्रीन हाउस की आवश्यकता संबंधित क्षेत्र की जलवायु पर निर्भर रहती है। इसके अलावा किसानों की आर्थिक स्थिति, सड़क, यातायात, बिजली की उपलब्धता और बाजार की स्थिति का भी महत्व होता है। ये सभी किसी न किसी रूप में ग्रीन हाउस खेती को प्रभावित करते हैं। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि ग्रीन हाउस पौधों के विकास के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है। उपज के साथ गुणवत्ता में भी वृद्धि होती है। नमी का संरक्षण होता है, इसलिए सिंचाई कम करनी पड़ती है। पानी की बचत होती है। कीटों, बीमारियों से बचाव होता है। टिशू कल्चर द्वारा पौध तैयार करने में सहायता मिलती है। इसके अलावा रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।

जाहिर है कि ग्रीन हाउस तकनीक उपोयगी है। यह मजबूत ढांचे से तैयार किया जाता है। इसके लिए यूवी स्टेबलाइज्ड प्लास्टिक फिल्म का उपयोग किया जाता है। यह प्लास्टिक फिल्म प्रकाश किरणों को छानने का काम करती है। ग्रीन हाउस में पहुंचकर ऊष्मा को बाहर नहीं जाने देता। इससे कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है। यह पौधों के चारों तरफ उपयोगी जलवायु का निर्माण करती है। फसलों और मौसम के अनुसार विभिन्न प्रकार के ग्रीन हाउस का निर्माण किया जाता है। जरूरत के हिसाब से इसे बगल से खोला या बंद किया जा सकता है। ग्रीन हाउस के निर्माण में करीब आठ सौ रुपए प्रति वर्गमीटर खर्च आता है। इसमें टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च, हरी धनिया वगैरह की अच्छी फसलें भलीभांति उगाई जा सकती है।

ग्रीन हाउस खेतीफैन एंड पैड ग्रीन हाउस में पौध की तरफ कूलिंग पैड का प्रयोग किया जाता है। कुछ एकजास्ट फैन लगाए जाते हैं। इनमें तापमान नियंत्रित रखा जाता है। उच्च तकनीक ग्रीन हाउस के निर्माण की लागत इनकी तुलना में करीब छह गुना अधिक होती है। हाइटेक ग्रीनहाउस में तापमान नियंत्रण के लिए ठंडा करने और गरम करने की व्यवस्था होती है। इसमें उच्च गुणवत्तायुक्त सब्जियां पैदा की जाती हैं।

इसमें संदेह नहीं की ग्रीन हाउस खेती से फसलों, सब्जियों वगैरह का उत्पादन बहुत बढ़ाया जा सकता है। कई प्रदेशों की सरकार इसके लिए बड़ा अनुदान भी देती है। इसके बावजूद यह तकनीक बहुत महंगी होती है। इसके निर्माण का साहस देश के सामान्य किसान अक्सर नहीं दिखाते। सामान्य किसानों के सामने फसलों को बाजार तक पहुंचाने की भी समस्या रहती है। बिजली की पर्याप्त उपलब्धता भी अनेक स्थान पर नहीं रहती। जाहिर है कि इन सभी समस्याओं का समाधान तलाशना होगा। तभी ग्रीन हाउस खेती लोकप्रिय हो सकती है।