हिमाचल प्रदेश के पारम्परिक पेयजल स्रोत

Author:कुलभूषण उपमन्यु

परम्परागत पेयजल पद्धतिपरम्परागत पेयजल पद्धतिहिमाचल प्रदेश में पेयजल स्रोतों को बड़ी मेहनत से बनाने की परम्परा रही है। पहाड़ों से नदियाँ भले ही निकलती हों, किन्तु उनका पानी तो दूर घाटी में बहता है। पहाड़ पर बसी बस्तियाँ-गाँव तो आस-पास उपलब्ध पहाड़ से निकलने वाले जलस्रोतों पर ही निर्भर रहे हैं।

उत्तराखण्ड में तो कहावत ही है कि ‘गंगा के मायके में पानी का अकाल’। यही कारण है कि पुराने गाँव प्राकृतिक जलस्रोतों के आस-पास ही बसे हैं, अब तो नलकों की सुविधा के चलते लोग हर कहीं बसने लग पड़े हैं। इसके चलते पारम्परिक जलस्रोतों की सम्भाल और इज्जत भी कम होती जा रही है।

विवाह-शादियों में आज भी ब्रह्म मुहूर्त में जाकर जलस्रोत की पूजा करने और जल देवता को निमंत्रण देने की परम्परा है। प्रकृति के जीवनदायी तत्वों और पदार्थों को समय-समय पर श्रद्धा अर्पण करने की संस्कृति उनके संरक्षण के प्रति जागरूक करने का एक तरीका रहा है। आधुनिकता जनित निरर्थक अहंकार ने इन सांस्कृतिक - मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के प्रति समाज को लापरवाह बनाकर प्रकृति संरक्षण और स्वच्छता के पारम्परिक तरीकों को धीरे-धीरे नष्ट या विकृत कर दिया है।

हिमाचल प्रदेश में भी अन्य पहाड़ी प्रदेशों की तरह कई तरह के प्राकृतिक जलस्रोत उपलब्ध हैं। पहाड़ से फूटते हुए जलस्रोत के आगे बाँस, लकड़ी, या पत्थर की नाली लगा दी जाती है जिससे होकर पानी की धारा नीचे गिरती है। इसे चम्बा में नाडू, पणिहार, और कांगड़ा में छरुहड़ू कहा जाता है। उत्तराखण्ड गढ़वाल में इसे धारा या नौला कहा जाता है।

हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले के कुछ क्षेत्रों में ऐसे पनिहारों का ऐतिहासिक महत्त्व रहा है और इन्हें बहुत मेहनत से बनाने की परम्परा रही है, जिसका प्रमाण निर्माण के समय लगाई गई पणिहार-शिलाओं से मिलता है। इन शिलाओं पर निर्माण का संवत आदि लिखे रहने के साथ उस समय के चम्बा के राजा का भी उल्लेख मिलता है।

पाडर सीमा के साथ लुज गाँव में पणिहार-शिला 1105 ई. में, चुराह तहसील की सल्ही पणिहार-शिला 1170 ई० और चुराह की ही सेई पणिहार शिला 1168-69 ई. में स्थापित की गईं हैं, यानि उन पनिहारों का निर्माण काल दर्शाया गया है। साथ ही उस समय के राजा का भी नाम लिखा गया है। ये पणिहार-शिलाएँ 2-3 फुट लम्बाई, चौड़ाई से 5-7 फुट लम्बाई, चौड़ाई तक उपलब्ध हैं। इनकी मोटाई 5-6 इंच तक है।

इन शिलाओं को जल स्रोत के आगे दीवार बनाकर जलस्रोत के सामने इस तरह लगाया जाता है कि शिला के बीच में किया गया चौकोर 5-7 इंच चौड़ छेद स्रोत की सीध में आये। उस छेद में से पत्थर की चौकोर नाली बनाकर गुजारी जाती है जिसे जलस्रोत से सटा दिया जाता है, इस नाली नुमा पाइप से जल आता है और धारा के रूप में नीचे गिरता है।

कई जगह इन पत्थर की नालियों का मुँह शेर का बनाया गया है। पणिहार शिलाओं पर आमतौर पर जल देवता वरुण को उत्कीर्ण किया जाता है। किन्तु कई जगह शेषशायी-विष्णु और नव ग्रहों को भी उत्कीर्ण किया गया है। सल्ही पणिहार शिला पर शिव, गणेश, शन्मुख कार्तिकेय, इन्द्र, विष्णु और उत्तर की प्रमुख नदियों को देवी रूप में उत्कीर्णित किया गया है। इनमें गंगा, यमुना, सिन्धु, वितस्ता (झेलम), व्यास और शुतुद्री (सतलुज) शामिल हैं।

हिमाचल प्रदेश में भी अन्य पहाड़ी प्रदेशों की तरह कई तरह के प्राकृतिक जलस्रोत उपलब्ध हैं। पहाड़ से फूटते हुए जलस्रोत के आगे बाँस, लकड़ी, या पत्थर की नाली लगा दी जाती है जिससे होकर पानी की धारा नीचे गिरती है। इसे चम्बा में नाडू, पणिहार, और कांगड़ा में छरुहड़ू कहा जाता है। उत्तराखण्ड गढ़वाल में इसे धारा या नौला कहा जाता है। चम्बा जिले के कुछ क्षेत्रों में ऐसे पनिहारों का ऐतिहासिक महत्त्व रहा है और इन्हें बहुत मेहनत से बनाने की परम्परा रही है। इनके नाम भी उत्कीर्णित किये गए हैं। इस तरह के नाडू, पणिहार और छरुहड़ू हिमाचल में सब जगह मिलते हैं।

इसके अलावा बावड़ियाँ भी मिलती हैं। ये चौकोर 5-6 फुट गहरे गढ़े कहे जा सकते हैं जिनकी चौड़ाई ऊपर से नीचे की ओर कम होती जाती है। यानि उपर 5-6 फुट चौकोर हो तो नीचे तक सीढ़ीदार चिनाई में यह घटते घटते 1 फुट रह जाएगी। पुरानी बावड़ियाँ चूने पत्थर से बनाई गई हैं।

बावड़ी में रिसाव से पानी भरता रहे इसलिये चिनाई में खास तकनीक से छेद रखे जाते हैं। इसी तरह के बड़े आकार की बावड़ियों को नौण कहा जाता है।

हमीरपुर जिला में खातरियों में पानी का भण्डारण होता है। इस जिला में जलस्रोतों का अभाव है, यहाँ के खडें- नाले भी मौसमी हैं। यहाँ की चट्टानें क्र्स्यालू ( सैंड-स्टोन) की बनी हैं। इनमें पानी चूसने की अच्छी क्षमता होती है। यह पानी धीरे-धीरे साल भर चट्टानों से रिसता रहता है। इस रिसाव को खातरियों में सहेज लिया जाता है।

खातरियाँ चट्टानों में छेनी से काट कर बनाई गई गुफाएँ हैं जिनके तल में भी छेनी से भण्डारण टैंक बनाया जाता है, पानी तक उतरने के लिये सीढ़ियाँ भी चट्टान काटकर ही बनाई जाती हैं। गुफा की दीवारों से रिसता हुआ पानी अन्दर टैंक में जमा होता रहता है। गुफा के मुहाने पर दरवाजा लगाकर ताला लगा दिया जाता है। क्योंकि पानी दुर्लभ है और अधिकांश खातरियाँ निजी है।

सार्वजनिक खातरियों में ताला नहीं लगाया जाता। शायद यह अपनी तरह की इकलौती व्यवस्था होगी।

आने वाले समय में पानी की माँग बढ़ती जाएगी और पानी की मात्रा घटती जाएगी। ऐसे में नलका संस्कृति के चलते उपजी लापरवाही से बचना होगा और इन पारम्परिक व्यवस्थाओं को सम्भालना होगा।