हिमालय का क्या होगा?

Author:सुधीन्द्र भदौरिया
Source:सैडेड
6 दिसम्बर 2011 को दुनिया में हो रही वैश्विक गर्मी और उसके परिणामों पर चिंता करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की एक समिति के आह्वान पर लोग एकत्रित हुए। भारत सरकार की ओर से पर्यावरणमंत्री जयंती नटराजन ने हिस्सा लिया। डरबन की इस मीटिंग में भारत पर हरित-विकास और उसके सकारात्मक परिणामों पर विशेष ध्यान देने पर जोर था। सम्मेलन में एक ऐसे दिशा मार्ग को अपनाने पर जोर था, जिसमें ग्रीन-हाउस गैस उत्सर्जन को विकासशील और विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर बराबरी की जिम्मेदारी होगी। इसलिए अब सम्पन्न देशों को, जहां उद्योगीकरण अपनी चरम अवस्था में है, के साथ ही गरीब देशों को भी, ऐसे ठोस कदम उठाने पर मजबूर होना होगा जो हरित-विकास की ओर जाता हो।

आज हिमानी पिघलाव के कारण नेपाल के ही पहाड़ों में 1600 छुट-मुट ताल बन चुके हैं जिनमें कुछ खतरनाक होने की संज्ञा में आते हैं। हिमानी पिघलाव और उनके खिसकाव की वजह से एशिया की नदियों के जीवन को भी खतरा पैदा हो रहा है। भारत को अपने बढ़ते कार्बन गैस-उत्सर्जन की समस्या को सुलझाने की आवश्यकता तो है, पर इसके लिए वैकल्पिक विकास मॉडल पर कोई ठोस बहस से बचा जा रहा है। इसलिए 194 राष्ट्रों के सम्मेलन में क्योटो प्रोटोकॉल के संकल्पों को टालने और स्थगित करने का भारत और विकासशील देशों के सुझाव को कुछ समय के लिए और स्वीकार कर लिया गया है। क्योटो प्रोटोकॉल जहां 37 विकसित राष्ट्रों, जिसमें यूरोप शामिल है, अमेरिका जैसे विकास की दौड़ में सबसे ‘सम्पन्न और आगे’ राष्ट्र ने भी हस्ताक्षर नहीं किये।

इस मार्ग को अपनाने के लिये, खासकर ऊर्जा की आवश्यकताओं के लिये जो शोधकार्य अपनाने और विकसित करने हैं, उसके लिये पर्याप्त धन देने के लिये विकसित राष्ट्र क्या तैयार हैं? यह एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न पूरी मानवता और सभी राष्ट्रों के लिये चुनौती बनकर सामने खड़ा है। इन चुनौतियों पर बहस ज़रूर हुई, पर इसके उपाय और निष्कर्षों की रूपरेखा के बारे में जो बातें हुईं, उससे पर्यावरण-कार्यकर्ता संतुष्ट नहीं हैं। हालांकि दक्षिण एशिया की सरकारों और वहांं चिंतित नागरिक समाज के लोगों ने भी हिस्सा लिया। पर क्या कोई ठोस बहस और कार्यक्रम हिमालय को बचाने के लिए बनाया जा सका? हिमालयी पर्वत श्रृंखला और उससे उत्पन्न पर्यावरणीय संकट से पूरी दक्षिण एशिया के जनजीवन और सभ्यता को गंभीर संकट की ओर अग्रसर किया है।

इसी हिमालय की छत्रछाया से विश्व की महान सम्यताओं का जन्म और विकास हुआ। वैज्ञानिक कह रहे हैं और जो हमें भी दिखाई दे रहा है कि अफगानिस्तान से लेकर भारत के पूर्वी छोर तक फैली हुयी यह पर्वतमाला घोर संकट में है। इसी पर्वतमाला की छांव में सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर मोहनजोदड़ो की सभ्यताओं का जन्म हुआ। इसके बर्फीली चट्टानों ने पूरे दक्षिण एशिया के लोगों की, साइबेरियाई बर्फीले थपेड़ों से अपितु रक्षा ही नहीं की, बल्कि हिमालय-वासियों और कृषकों तथा समाज के सभी समूहों को फलने-फूलने का भी अवसर प्रदान किया। यहां बुद्ध धर्म का जन्म हुआ, जो बामियान से लेकर कम्पूचिया तक को अपने प्रभाव में समेटा। यहीं काशी के गंगा तट पर संत कबीर ने ज्ञान दर्शन और साहित्य को नयी वाणी और शब्दकोश दिया। यहीं हिमालय की तलहटी के चम्पारण में महात्मा गांधी ने पूरी सभ्यता को नया जीवन दर्शन, शांति तथा विकास की नई अवधारणाओं से परिचित कराया। पर जिस भूमंडल पर यह सब सम्भव हो पाया था, आज वो खुद संकटग्रस्त है।

इसका एहसास तो है, पर इस संकट से उबरने के लिये क्या प्रयास हो रहा है, उसका कोई असरदार अभियान दिखाई नहीं पड़ता। एक समय में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने ‘हिमालय बचाओ’ और देश की नदियों को बचाने के मुद्दे पर देश के लोगों में चेतना को विकसित करने का कार्य किया। पर उनके निधन के बाद इस पर राजनैतिक दलों और सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे लोगों ने सोचना और बोलना बंद कर दिया। यहां के सांसदों को भी इस विषय पर कम रूचि दिखाई देती है। समाज के कुछ संगठन जरूर बोलते और लिखते हैं, पर उनका देश में कितना असर और प्रभाव है यह एक बहस का विषय है।

आज इसकी गम्भीरता इस बात से समझी जा सकती हैं कि हिमालय की सभी हिमानी (ग्लेशियर) पिघलने के कारण लोप होने की दशा में बढ़ रही हैं। हालांकि इस पर विवाद है, पर यह हिमानी संकट में है, यह निर्विवाद बात मानी जाने लगी है।

हिमानी लगभग एक मीटर प्रतिवर्ष घट रहे हैं। नागोया विश्वविद्यालय के कोजी फूजिता द्वारा खींचे गये तस्वीरों से पता चलता है। यह कार्य उन्होंने लगातार बीस वर्षों तक 1970 से लेकर 1990 तक कर अपनी बात को प्रमाणित करने के लिये किया।

जब एडमंड और तेनजिंग सागरमाथा पर विजय पाने को बढ़े तो उस समय एकरंगी नजारा था। चारों ओर सफेद रंग ओढ़े हुई बर्फीली चादर के पहाड़ थे। पर आज वो लोग जो वहां के बेस-कैम्प में काम करते हैं, उनका कहना है वहां काफी परिवर्तन आया है। आज कैम्प के पास मटमैले ग्लेशियर हैं।

जहां पहले माॅउंट एवरेस्ट का पहला-कैम्प एक सपाट बर्फ की बिछी हुई चादर जैसा हुआ करता था, देखते-देखते कुछ दशकों में बदल गया है। अब यहां नालानुमा, बदसूरत बर्फ दिखाई देती है।

पहले खूम्बू बर्फीला झरना जो कि नेपाल का सबसे बड़ा बर्फीला झरना भी कहा जा सकता है और 16 किलोमीटर लम्बी हिमानी का यह विशेष दृश्य हुआ करता था। इसके ऊपरी सतह पर पहले बर्फ ही बर्फ दिखाई देती थी, पर वहां भी पत्थर दिखाई देते हैं।

आज हिमानी पिघलाव के कारण नेपाल के ही पहाड़ों में ही 1600 छुट-मुट ताल बन चुके हैं जिनमें कुछ खतरनाक होने की संज्ञा में आते हैं। हिमानी पिघलाव और उनके खिसकाव की वजह से एशिया की नदियों के जीवन को भी खतरा पैदा हो रहा है। उद्गम पर गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र हिमानी पिघलाव पर अपने 60 प्रतिशत से 80 प्रतिशत पानी के लिये निर्भर रहती हैं।

इन नदियों के शुरूआती पहाड़ी स्रोतों पर रहने वाले लोगों को किसी वैज्ञानिक को बताने की आवश्यकता नहीं कि भूमंडल का पर्यावरण बिगड़ रहा है। वे इसे देख सकते हैं, महसूस करते हैं और उससे प्रभावित होते हैं। पहले जहां-जहां बर्फ हुआ करती थी अब वनस्पति दिखाई देती हैं, सबके लिए चिंता की घड़ी है। अब यहां बेमौसमी बरसात और बर्फ का गिरना नए तरह की समस्याएं पैदा कर रही है, क्योंकि जहां तापमान फरवरी के महीने में पहले -23 से -24 सेल्सियस होता था अब इसी महीने में -17 से -18 सेल्सियस रहता है।

अफगानिस्तान के हिंदुकुश से लेकर कैलाश मानसरोवर होते हुए नेफा के भारतीय अन्तिम छोर तक लगभग 15000 हिमानी हैं और फैली हुई हैं। पर भूमंडली गर्मी के कारण हिमानी पिघल रही हैं। पूरे साउथ एशिया के लोगों के लिये यह बहुत चिंंता की बात है। अभी हाल में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, सिक्किम, भूटान, होते हुए बर्मा तक बाढ़ और भूकम्प, इंसानी बिरादरी में घबराहट पैदा करने के लिये काफी होनी चाहिए।

नेपाल के दक्षिण बिहार का कोसी का इलाक़ा हर वर्ष दर्द और बर्बादी का नया इतिहास लिखता है। इससे हजारों गांव और कई जिले डूबते हैं और सारे राहत कार्य ऊंट के मूंह में जीरे के बराबर ही समझे जा सकते हैं। दो वर्ष पहले जब कोसी का बांध टूटा तो बिहार में हाहाकार की स्थति पैदा कर दी थी। इसका वहां की खेती-बाड़ी पर खासा असर पड़ा। बाढ़ की बारम्बारता से एक फसल तो नष्ट होती ही है तो दूसरी फसल बोई नहीं जा सकती। बाग-बगीचे भी बरबाद हो जाते हैं। आम आदमी हमेशा के लिये राहत के उपाय और उस पर आश्रित होने के लिये मजबूर हो जाता है। दूसरी तरफ नये-नये किस्म की महामारी भी इसके साथ आती है। हैजा, मलेरिया, दिमागी ज्वर और तरह-तरह की बीमारियां लोगों को लीलने के लिए तैयार रहती हैं और स्वच्छ पानी मिलना भी दूभर हो जाता है।

कुछ समय उत्तरी बिहार बाढ़ की चपेट में रहता है और बाकी समय में यह इलाक़ा सूखे के चपेट में रहता है। तो अगर यह कहा जाये कि बिहार के लोग बाढ़ और सूखे के बीच झूलते रहते हैं।

बिहार के मैदानी इलाके से बढ़कर जब हम बंगाल और बंग्लादेश की ओर बढ़ते हैं तो समुद्र अलग किस्म की मार मारता है। बंगाल और उड़ीसा के तट चक्रवात और बंग्लादेश के तटीय इलाके महाचक्रवात से प्रभावित हैं। सुंदरवन के सागरद्वीप डूबते जा रहे हैं।

बंग्लादेश की 20 प्रतिशत भूमि कुछ दशकों में डूब सकती है। ऐसा कुछ समुद्री वैज्ञानिक मानते हैं। इसकी वजह से बंग्लादेश से वहां के प्रभावित बेसहारा लोग भारत में शरणार्थी के जीवन की तलाश में आते हैं और साधन-युक्त दूसरे इलाकों में बसने निकल जाते हैं।

पाकिस्तान में आई बाढ़ और भूकम्प की बर्बादी बंग्लादेशी चक्रवात से भी भयानक है। पिछले वर्ष पाकिस्तान में आई बाढ़ से 1600 से ज्यादा लोगों की मृत्यु हुई थी। इन तवाहियों से परेशान लोग सरकारी दफ्तरों पर हमला और लूटपाट करने को मजबूर है, क्योंकि राहतकार्य सही लोगों तक नहीं पहुंचते। स्वात घाटी के 6 लाख से अधिक लोग फौज और तालिबानी युद्ध के कारण दयनीय स्थिति में है।

दूसरी और हमने देखा कि जापान के सुनामी के कारण वहां के आंणविक बिजली उत्पादन केन्द्र बर्बाद हुए और इससे उन इलाकों को घेरे में लेना पड़ा ताकि इसका असर आगे न बढ़े। कुछ वर्ष पहले छपी रपट में चीन ने स्वीकार किया वे अपने आंणविक कुड़े को तिब्बत में दफनाते हैं। इससे वहां के पंक्षी और बाकी जीव-जन्तु भी प्रभावित हो रहे हैं। अगर कोई पर्यावरण की विपदा पैदा हुई, तो इसके भयानक परिणाम हो सकते हैं।

इन सब हालातों पर दुनियाभर में सम्मेलन और विकल्पों की तलाश और सरकारी पहल और योजनाओं पर बहस होती है। पिछले एक दशक में रियो, कोपेनहेगेन और डरबन में सम्मेलन हुए ताकि मानवता को कैसे बचाया जाए। इस सभी बहसों में दक्षिण एशिया के अंदर आने वाले राष्ट्रों के सरकारी प्रतिनिधि हिस्सा लेते हैं और यूरोप के हरित-पहल कार्यकर्ता और भारत तथा पड़ोसी देशों के पर्यावरणकर्मी भी हस्तक्षेप करते रहे हैं। पर …..

डरबन सम्मेलन में भारत और चीन की ओर सारे राष्ट्र आशा भरी उम्मीदों से देखते रहे, पर गतिरोध ही सामने आया। हालांकि डरबन में हिमालय क्षेत्र के भविष्य के बारे में काफी गहन चिंताएं उभर कर सामने आईं। इसके सम्पूर्ण अध्ययन और क्षेत्र के लिये ‘सिमोड’ नाम की संस्था को जिम्मेदारी भी दी। पर जितनी बड़ी यह समस्या है उसके अनुपात में न तो पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं और न ही कोई वैकल्पिक नीति।

‘हिमालय बचाओ’ का नारा भारत में पहली बार राममनोहर लोहिया पचास के दशक के अंत में दिया था। उनके बाद इस पर पूरे दक्षिण एशिया में जिस तरह बहस और पहल होनी चाहिए थी, नहीं हुई। हालांकि चिपको आंदोलन से इसके वैकल्पिक सोच के कुछ सूत्र जरूर मिल सकते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि एक दिन ‘हिमालय बचाओ’ जन अभियान बनेगा।

हिमालय बचे ताकि दुनिया की बरबादी का सबब न बन जाए।