हिमालय के लिये अलग नीति चाहिए

Author:सुरेश भाई

जलवायु परिवर्तन के दौर में मानव जनित विकास की छेड़छाड़ का परिणाम माना जा रहा है। सन् 2013 में उत्तराखण्ड की आपदा के बाद गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर गौर किया जाय तो हिमालयी नदियों के सिरहानों पर स्थित संवेदनशील पर्वतों को चीरकर सुरंग आधारित जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण, सड़कों का चौड़ीकरण, अनियन्त्रित पर्यटकों की आवाजाही, हरित और कृषि क्षेत्र की लगातार उपेक्षा के कारण आपदाओं की घटनाएँ लगातार बढ़ रही है।

हिमालयी क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों पर आक्रामक स्वरूप विकास नीतियों का प्रभाव मैदानी क्षेत्रों में भी हम सबके सामने दिखाई दे रहा है। यद्यपि पश्चिम, मध्य एवं उत्तर पूर्व हिमालयी क्षेत्रों में अलग-अलग राज्यों की अपनी-अपनी सरकारें भी हैं, लेकिन विस्थापन जनित विकास पर नियन्त्रण करना इनके बलबूते से बाहर है।

बार-बार केन्द्र पर निर्भर यहाँ का तन्त्र हिमालय की गम्भीरता और हिमालय से चल सकने वाली स्थाई जीवनशैली एवं जीविका को भी भुलाते जा रहे हैं। स्थिति यहाँं तक पहुँच चुकी है कि इस क्षेत्र के वन निवासियों के पारम्परिक अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्धन के तरीकों की अनदेखी करते हुए, हिमालय में अतिक्रमण, शोषण व प्रदूषण बढ़ा दिया है।

भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 16.3 प्रतिशत क्षेत्र में फैले हिमालयी क्षेत्र को समृद्ध जल टैंक के रूप में माना जाता है। इसमें 45.2 प्रतिशत भू-भाग में घने जंगल हैं। यहाँ नदियों, पर्वतों के बीच में निवास करने वाली जनसंख्या के पास हिमालयी संस्कृति एवं सभ्यता को अक्षुण बनाए रखने का लोक विज्ञान मौजूद है। इस सम्बन्ध में कई बार घुमक्कड़ों, पर्यावरण प्रेमियों, लेखकों ने विभिन्न साहित्यों, शोध पत्रों के साथ कई हिमालयी घोषणा पत्रों के द्वारा सचेत भी किया है।

हिमालयी क्षेत्र में हो रहे जन अभियानों और समुदायों के रचनात्मक कामों ने भी, सरकार का ध्यान कई बार आकर्षित किया है। भारतीय हिमालय राज्यों में आमतौर पर 11 छोटे राज्य हैं, जहाँ से सांसदों की कुल संख्या 36 है, लेकिन अकेले बिहार में 39, मध्य प्रदेश में 29, राजस्थान में 25 तथा गुजरात में 26 सांसद हैं।

इस सन्दर्भ का अर्थ यह है कि देश का मुकुट कहे जाने वाले हिमालयी भू-भाग की सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं पर्यावरणीय पहुँच पार्लियामेंट में भी कमजोर दिखाई देती है, जबकि सामरिक एवं पर्यावरण की दृष्टि से अति संवेदनशील हिमालयी राज्यों को पूरे देश और दुनिया के सन्दर्भ में देखने की आवश्यकता है।

हमारे देश की सरकार को पाँचवी पंच वर्षीय योजना में हिमालयी क्षेत्रों के विकास की याद आई थी। जो हिल एरिया डेवलपमेंट के नाम से एक योजना चलाई जाती थी, इसी के विस्तार में हिमालयी क्षेत्र को अलग-अलग राज्यों में विभक्त किया गया है, लेकिन विकास के मानक आज भी मैदानी हैं, जिसके फलस्वरूप हिमालय का शोषण बढ़ा हैं।

प्राकृतिक संसाधन लोगों के हाथ से खिसक रहे हैं। नदियों में जलराशि पिछले पचास वर्षों में आधी हो गई है। हिमालयी ग्लेशियर प्रतिवर्ष 18-20 मीटर पीछे हट रहे हैं। दूसरी ओर हिमालय आपदाओं का घर बनता जा रहा है। हाल के वर्षों में उत्तराखण्ड, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तर पूर्व के राज्यों में आई भीषण आपदा ने अपार जन-धन की हानि हुई है।

यह जलवायु परिवर्तन के दौर में मानव जनित विकास की छेड़छाड़ का परिणाम माना जा रहा है। सन् 2013 में उत्तराखण्ड की आपदा के बाद गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर गौर किया जाय तो हिमालयी नदियों के सिरहानों पर स्थित संवेदनशील पर्वतों को चीरकर सुरंग आधारित जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण, सड़कों का चौड़ीकरण, अनियन्त्रित पर्यटकों की आवाजाही, हरित और कृषि क्षेत्र की लगातार उपेक्षा के कारण आपदाओं की घटनाएँ लगातार बढ़ रही है।

बाढ़-भूस्खलन जैसी आपदाओं के साथ-साथ भूकम्प की त्रासदी भी कम नहीं हो रही है। ऐसी विषम परिस्थितियों में केवल हिमालय में ही नुकसान नहीं हो रहा है, बल्कि गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कोसी आदि नदियों के जल ग्रहण क्षेत्रों में अथाह जल प्रलय से भारी नुकसान हो रहा है। हिमालय की चारधाम यात्रा में पहुँचने वाले पर्यटकों की सुखद यात्रा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

यह अच्छा है कि केन्द्र सरकार गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिये काफी उत्साहित है। लेकिन मैदानी क्षेत्रों को मिट्टी, पानी, हवा प्रदान करने वाले हिमालय के बिना गंगा का अस्तित्व सम्भव नहीं है। ग्लेशियरों, पर्वतों, नदियों, जैैविक विविधताओं की दृष्टि से सम्पन्न हिमालयी संस्कृति और प्रकृति का ध्यान योजनाकारों को विशेष रूप से करना चाहिए था।

सभी कहते हैं कि हिमालय नहीं रहेगा तो, देश नहीं रहेगा, इस प्रकार हिमालय बचाओ! देश बचाओ! केवल नारा नहीं है, यह भावी विकास नीतियों को दिशाहीन होने से बचाने का भी एक रास्ता है। इसी तरह चिपको आन्दोलन में पहाड़ की महिलाओं ने कहा कि ‘‘मिट्टी, पानी और बयार! जिन्दा रहने के आधार!’’ और आगे चलकर रक्षासूत्र आन्दोलन का नारा है कि ‘‘ऊँचाई पर पेड़ रहेंगे! नदी ग्लेशियर टिके रहेंगे!’’ ये तमाम निर्देशन पहाड़ के लोगों ने देशवासियों को दिए हैं। ‘‘धार ऐंच पाणी, ढाल पर डाला, बिजली बणावा खाला-खाला!’’ इसका अर्थ यह है कि चोटी पर पानी पहुँचना चाहिए, ढालदार पहाड़ियों पर चौड़ी पत्ती के वृक्ष लगे और इन पहाड़ियों के बीच से आ रहे नदी, नालों के पानी से घराट और नहरें बनाकर बिजली एवं सिंचाई की व्यवस्था की जाए!

इस अर्थ का अनर्थ करते हुए आधुनिक विज्ञान ने सुरंग बाँधों के भीभत्स रूप को सामने लाकर हिमालय को मटियामेट करने का बीड़ा उठाया है। इसको ध्यान में रखकर हिमालयी क्षेत्रों में रह रहे लोगों, सामाजिक अभियानों तथा आक्रामक विकास नीति को चुनौती देने वाले कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों ने कई बार समग्र हिमालय नीति के लिए केन्द्र सरकार पर दबाव बनाया है। नदी बचाओ अभियान ने हिमालय नीति के लिए वर्ष 2008 से लगातार पैरवी की है।

9 सितम्बर, 2010 को पहली बार हिमालय दिवस मनाने की नींव रखी गई है। इसके साथ ही पिछले 5-6 वर्षों से लगातार हिमालय की पवित्र नदियाँ, जलवायु परिवर्तन, लगातार आपदाओं के कारण मैदानी क्षेत्रों पर पड़ रहे प्रभाव को ध्यान में रखते हुए हिमालय लोक नीति का दस्तावेज तैयार हुआ है। जिसके द्वारा हिमालय के लिये अलग विकास के माॅडल पर चर्चा हो रही है। जिसके आधार पर गंगा की अविरलता और निर्मलता बनी रहेगी। यह गंगा के क्षेत्र में रहने वाले समाज, पर्यावरण व स्थायी विकास के लिये जरूरी है। इसलिये गंगोत्री से गंगा सागर तक हिमालय नीति अभियान है।

अगर गंगा को बचाना है, हिमालय नीति बनाना है।
हिमालय गंगा का दाता है, गंगा को अविरल, निर्मल बनाता है।


11 अक्टूबर 2014 को जय प्रकाश नारायण की जयन्ती के अवसर पर हिमालय नीति अभियान का प्रारम्भ गंगोत्री से किया गया है। इस अभियान का प्रथम चरण 30 अक्टूबर को हरिद्वार में पूरा हुआ है। इसका दूसरा चरण 2 फरवरी 2015 को हरिद्वार से प्रारम्भ हो रहा है। प्रथम चरण के अभियान में गंगोत्री, उत्तरकाशी, चिन्यालीसौड़, कण्डीसौड़, कमान्द, काण्डीखाल, चम्बा, नई टिहरी, गडोलिया, पौखाल, कीर्तिनगर, श्रीनगर, देवप्रयाग, ऋषिकेश, में बैठकें आयोजित की गई हैं।

दूसरे चरण का अभियान हरिद्वार से मेरठ, बरेली, हरदोई, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी, बक्सर, आरा, पटना, मुंगेर, भागलपुर, नौगछिया, कुष्णानगर, कोलकाता, डायमण्ड हर्बर और गंगा सागर तक पूरा होगा। हिमालय नीति अभियान ऐसे समय पर चल रहा है, जब केन्द्र की सरकार गंगा को निर्मल एवं अविरल रखने की महत्वाकांक्षी योजना चला रही है। ऐसे समय में गंगा का मायका हिमालय की संवेदनशीलता के बारे में समझना और समझाना एक लक्ष्य है।

16वीं लोकसभा चुनाव में भी सभी राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में हिमालय नीति का विषय शामिल करवाया गया था। इसमें मुख्य रूप से भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में हिमालय के विषय को शामिल किया है। केन्द्र में जब भाजपा की सरकार बनी तो उन्होंने हिमालय अध्ययन केन्द्र के लिये सौ करोड़ का बजट भी प्रस्तावित किया है।

इसके साथ ही हरिद्वार के सांसद एवं उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमन्त्री डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक ने हिमालय के लिये अलग मन्त्रालय बनाने पर पार्लियामेंट में बहस करवाई है। इसके साथ ही गंगा अभियान मन्त्रालय बनाया गया है। लेकिन वर्तमान में हिमालय के विकास का ऐसा कोई माॅडल नहीं है कि जिससे बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।

हिमालय का पानी और जवानी हिमालय वासियों के काम भी आ सके। यहाँ तक कि हिमालय से गंगा की अविरलता और निर्मलता के राष्ट्रीय कार्यक्रम में गंगा के क्षेत्र में रहने वाले 50 करोड़ लोगों की सीधी भागीदारी बढ़े, और हिमालय को अनियन्त्रित छेड़छाड़ से बचाना प्राथमिकता हो।

हिमालय की संवेदनशील व कमजोर पर्वतीय इलाकों की सुरक्षा रहेगी तो गंगा की अविरलता भी बनी रहेगी और मैदानी क्षेत्र भी बच पाएँगे और सीमान्त इलाकों में लोग रह सकेंगे। इस तरह के उपाय हिमालय लोकनीति के दस्तावेज में दिए गए हैं। केन्द्र सरकार ने हिमालय के बारे में अलग से प्रस्तावित हिमालय अध्ययन केन्द्र बनाने की बात कही है, लेकिन हिमालय के बारे में ऐसा कौन सा अध्ययन है जो न हुआ हो?

यहाँ पर स्थित गढ़वाल विश्वविद्यालय, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, वाडिया भूगर्भ विज्ञान संस्थान, गोविन्द वल्लभ पन्त हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान, आईआईटी रुड़की की उन रिर्पोटों को देख लेना चाहिए, जिसमें हिमालय को कमजोर करने वाले कारकों को जिम्मेदारी पूर्वक वैज्ञानिकों ने प्रकाश में लाया है।

हिमालय नीति अभियान का प्रथम चरण पूरा होने के बाद 11 नवम्बर 2014 को उत्तरकाशी, टिहरी, पौड़ी गढ़वाल, देहरादून, उधमसिंह नगर, नैनीताल के जिलाधिकारियों के माध्यम से हिमालय लोकनीति का दस्तावेज प्रधानमन्त्री जी को भिजवाया गया है। 200 से अधिक पोष्टकार्ड भी पीएमओ कार्यालय में भेजे गए हैं। इसके साथ-साथ स्कूल काॅलेजों एवं आम जन ने mygov.com पर भी हिमालय नीति की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया है।

इस अभियान में प्रसिद्ध समाज सेविका राधा बहन, सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष महादेव विद्रोही, जम्मू कश्मीर से के. एल. बंगोत्रा, हिमाचल प्रदेश से रतन चन्द्र रोजे, पत्रकार प्रवीन भट्ट, प्रेम पंचोली और हिमालय नीति अभियान के संयोजक सुरेश भाई शामिल है। इसका कार्यक्रम हरिद्वार से गंगा सागर तक प्रस्तुत है।

राष्ट्रीय हिमालय नीति अभियान


कार्यक्रम-2014-2015

प्रथम चरण- 2014

उत्तराखण्ड

दिनांक

स्थान

दूरी किमी

कार्यक्रम स्थान

रात्रि विश्राम

11 अक्टूबर

गंगोत्री

100

गंगोत्री

उत्तरकाशी

12-18 अक्टूबर

उत्तरकाशी

100

उत्तरकाशी मातली, बौन, जुगुल्डी, अठाली, डुण्डा

मातली

19 अक्टूबर

चिन्याली सौड़ चम्बा, नई टिहरी

220

नई टिहरी

श्रीनगर

20 अक्टूबर

श्रीनगर

10

श्रीनगर

श्रीनगर

28 अक्टूबर

लक्ष्मोली, देवप्रयाग

100

ऋषिकेश

ऋषिकेश

30 अक्टूबर

हरिद्वार

50

हरिद्वार

 

द्वितीय चरण-2015

उत्तर प्रदेश

दिनांक

स्थान

दूरी किमी

कार्यक्रम स्थान

रात्रि विश्राम

2 फरवरी

हरिद्वार

50

प्रारम्भ 12 बजे हरिद्वार

मेरठ

3 फरवरी

गढ़ मुक्तेश्वर मेरठ

170

मेरठ

बरेली

4 फरवरी

बरेली

120

बरेली

हरदोई

5 फरवरी

बदायूँ, हरदोई

45

हरदोई

कानपुर

6 फरवरी

कानपुर

90

कानपुर

लखनऊ

7 फरवरी

लखनऊ

30

लखनऊ

लखनऊ

8 फरवरी

इलाहाबाद

200

इलाहाबाद

इलाहाबाद

9 फरवरी

वाराणसी

120

वाराणसी

वाराणसी

बिहार

दिनांक

स्थान

दूरी किमी

कार्यक्रम स्थान

रात्रि विश्राम

10 फरवरी

गाजीपुर

170

बक्सर, गाजीपुर

बक्सर

11 फरवरी

पटना, आरा, दानापुर

60

पटना, आरा, खगोल

पटना

12 फरवरी

मुकामा, क्यूल, (लक्खीसराय)

150

लक्खीसराय, मुंगेर

मुंगेर

13 फरवरी

सुल्तानगंज भागलपुर

60

भागलपुर

भागलपुर

14 फरवरी

नौगछिया कोसी क्षेत्र

40

नौगछिया

भागलपुर

पश्चिम बंगाल

15 फरवरी

मालदा, कृष्णनगर (नादिया)

100

कृष्णनगर

कृष्णनगर

16 फरवरी

कलकत्ता

110

कलकत्ता

कलकत्ता

17 फरवरी

24 परगना जिला साउथ

50

(डायमण्ड हर्बर)

डायमण्ड हर्बर

18 फरवरी

गंगा सागर

110

गंगा सागर

गंगा सागर