हिमालयी देश साथ मिलकर लड़ें हिमालय की लड़ाई

Author:अर्जुन थापा अध्यक्ष (गांधी पीस संस्थान नेपाल)
Source:9 सितंबर 2011, साउथ एशियन डॉयलॉगस् ऑन इकोलॉजिकल डेमोक्रेसी (सैडेड)
सितंबर 2011 को हिमालय दिवस के अवसर पर सैडेड द्वारा ‘हिमालय बचाओ’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में ‘गांधी पीस संस्थान, नेपाल’ के अध्यक्ष अर्जुन थापा ने अपने विचार रखे उनके वक्तव्य का लिखित पाठ यहां प्रस्तुत है।

भारत, नेपाल और भूटान में छोटे-छोटे ताल होते हैं। वो ताल पानी को संरक्षित करता है। अब स्थिति यह है की वे ताल भी विनाश लाएगा यूपी और बिहार में क्योंकि इसके साथ भी छेड़-छाड़ हो रही है। चुनौती हमारे सामने है और हम समझते हैं कि हमको हिमालय बचाना है

जब मैं स्कूल में पढ़ा करता था तो पिता जी मुझे दीनमान और आनंद प्रकाशन की पुस्तकें पढ़ने को दिया करते थे तभी मैं चिपको आंदोलन और सुन्दर लाल बहुगुणा जी से परिचित हुआ। नेपाल में कहा जाता था ‘हरियो धन नेपालो वन’। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते गए वन गायब होते गए। अब हमारे नेपाल में 15 प्रतिशत वन भी नहीं है जबकि 40 साल पहले यही वन नेपाल का धन था। जहां तक हिमालय बचाओ की बात है तो नेपाल में बड़े-बड़े पर्वतारोही आते हैं। कुड़ा-कड़कट रास्ते में फेंकते हुए जाते हैं। अब यह कहा जाता है कि एवरेस्ट वाली रूटमें गंदगी फैल चुकी है। वहां ठंड और बर्फ के कारण कूड़ा नहीं गलता और कुड़ा जमा होते रहता है। कभी-कभार नेपाल सरकार अभियान चलाती है कि कूड़ा-कड़कट उस रूट से संकलित करके नीचे लाया जाता है।

आप लोगों ने टिहरी डैम की बात कही। हमारे यहां भी बात हो रही है कि कोसी नदी में हाई डैम बनाया जाए। डैम से नेपाल के 20 जिले के 10 लाख लोग विस्थापित हो जाएंगे। यह सबको मालूम है की कोसी नदी बाढ़ लाता है मंसूर और बिहार में। हम लोगों ने कोसी के प्राकृतिक गति को रोक दिया और आप लोगों ने देखा होगा कि दो साल पहले नेपाल और बिहार के लाखों लोग कोसी के प्रकोप से प्रभावित हुए। कोसी से कभी भी महा प्रलय हो सकता है ऊपर से भारत और नेपाल की सरकार वहां पर हाईडैम बनाने की बात कर रही है।

भारत और नेपाल दोनों देशों के पर्यावरणविद इसका विरोध कर रहे हैं। हमारे हिमांशु भाई ने कहा कि हमारी सरकारें आर्मी और पुलिस लगाकर हमारे संसाधनों का दोहन करेगी। अभी हाल ही के दिनों की बात है आपके देश की कम्पनी सतलज और जीएमआर कम्पनी हाईड्रो में गई है। सेती नदी में जीएमआर का पांच-सात सौ मेगावाट का बिलजी बनाकर नेपाल के सबसे पिछड़े पश्चिम के पहाड़ों में जीएमआर नाम से एक आॅफिस खोला। स्थानीय लोगों ने उस आॅफिस को तोड़ दिया। उनका कहना था कि हमें कोई मुआवजा नहीं मिल रहा है। ऐसी स्थिति में भारत सरकार ने नेपाल सरकार को कहा कि हमारी मल्टीनेशनल कम्पनी आप के वहां जाती है, हाईड्रो से बिजली बनाने के लिए पर आपके लोग विरोध करते हैं। तब नेपाल सरकार जो खनाल जी की सरकार थी ने एक स्टेटमेंट दिया कि पहाड़ों में जितने भी हाइड्रोपावर लगाए जाएंगे यानी उन संसाधनोंं का दोहन करेंगे, नेपाल की पुलिस और आर्मी उस कम्पनी को प्रोटेक्शन देकर उस कम्पनी को काम करने देगें।

अब इस तरह की पाॅलिसी नेपाल सरकार ला रही है। यहां जो बात हिमांशु भाई ने कही वो बात हमारे यहां लागू हो गई है। नेपाल में सड़क और बिजली की कमी थी इसलिए संसाधनों को लूटा नहीं जा रहा था। आज हिमाचल प्रदेश का पानी फाइव स्टार होटल और एरोप्लेन में देखने को मिलता हैं। हिमालय वाटर नाम से वहां का पानी बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियों के हाथ में है। अब हिमाचल का पानी कम्पनियों के कब्जे में है। मुझे लगता है दस साल के अंदर नेपाल के हिमालय का पानी का मल्टीनेशनल कम्पनियों के कब्जे में होगा और वहां के लोग को ही अपना पानी खरीदना पड़ेगा। इस तरह की परिस्थितियां नेपाल में अब उत्पन्न हो रही है। हिमालय में पहले जिस तरह बर्फ गिरा करती थी अब वह स्थिति भी नहीं रही। अब बहुत कमी आ गई है। अब लैंसलाइड जैसी आपदाएं ज्यादा होने लगी हैं।

भारत, नेपाल और भूटान में छोटे-छोटे ताल होते हैं। वो ताल पानी को संरक्षित करता है। अब स्थिति यह है की वे ताल भी विनाश लाएगा यूपी और बिहार में क्योंकि इसके साथ भी छेड़-छाड़ हो रही है। चुनौती हमारे सामने है और हम समझते हैं कि हमको हिमालय बचाना है तो भूटान, नेपाल और भारत जैसे देश तो हिमालय का देश है तो सबको एक साथ हिमालय को बचाने के लिए लड़ना पड़ेगा तभी हम कुछ बचा पाएंगे नहीं तो हमारे हाथ से सब कुछ निकल जाएगा।

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