हिमस्तूप ने किया जल संकट का समाधान

Author:वाणी मनोचा
Source:डाउन टू अर्थ, जनवरी 2017

हिमस्तूपसोनम वांगचुक का मानना है कि विज्ञान तभी फायदेमन्द है, जब इसे रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान के लिये इस्तेमाल किया जा सके। सोनम ने वर्ष 2014 में हिमपुरुष चेवांग नोरफेल द्वारा बनाई गई एक जल संचय प्रणाली के डिजाइन में सुधार करने की ठानी, ताकि इस खोज का फायदा और अधिक लोगों तक पहुँचाया जा सके। नोरफेल, जो एक ग्रामीण विकास अभियन्ता हैं, ने वर्ष 1987 में फुकचे गाँव में लम्बे समय से पानी की कमी से जूझ रहे लोगों की मदद से पहले कृत्रिम ग्लेशियर का निर्माण किया। कई लोगों का कहना है कि लद्दाख शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक अभियान के संस्थापकों में से एक, वांगचुक, से प्रेरित होकर बॉलीवुड की एक लोकप्रिय फिल्म थ्री इडियट्स में फुंसुक वांगड़ू या रैंचो का किरदार गढ़ा गया था।

वांगचुक ने अपने स्कूल के छात्रों के एक समूह के साथ मिलकर लेह शहर से करीब 10 किमी दूर फ्यांग शहर में एक प्रारूप के तौर पर बर्फ के एक विशाल शंकु का निर्माण किया। यह परम्परागत बौद्ध स्मारकों जैसा दिखता है, इसलिये इसे आइस स्तूप नाम दिया गया। इसका निर्माण 3,200 मीटर की ऊँचाई पर किया गया है और यह करीब चार महीने तक टिका रहा। उन्होंने बताया, “मैंने एक बार अपने स्कूल के पास 3,000 मीटर की ऊँचाई पर बर्फ देखी थी। उसी समय मेरे मन में पहली बार यह विचार आया कि कम ऊँचाई पर भी ग्लेशियर का निर्माण किया जा सकता है।” इस शंकु की सफलता के बाद, स्थानीय समुदायों की मदद से एक पायलट परियोजना की शुरुआत 2014 की सर्दियों में की गई थी। ऐसा करने के लिये, वांगचुक ने ऑनलाइन क्राउड फंडिंग के जरिए लगभग 1.2 लाख डॉलर जुटाए। बाद में फ्यांग मठ के प्रमुख ने इस परियोजना में सहयोग किया।

इन ग्लेशियरों के निर्माण के लिये नदी के पानी को जमीन के 1.8 मीटर नीचे बिछाए गए भूमिगत पाइप के माध्यम से पहाड़ी ढलान से नीचे लाया जाता है। इन पाइपों की लम्बाई 50-60 मीटर होती है। पाइप के निचले मुँह को मोड़कर नोजल की तरह बनाया जाता है, जो जमीन से बाहर निकला होता है। इस नोजल से पानी का छिड़काव बाहर की तरफ किया जाता है। इन क्षेत्रों में तापमान -30 डिग्री सेल्सियस के आस-पास होने के कारण यह बूँदों को एक लकड़ी के फ्रेम पर जमा देता है, जिससे यह एक शंकु का आकार ले लेती है।

स्तूप 20 मीटर की ऊँचाई तक पहुँचने में कामयाब रहा और इसमें करीब दो लाख लीटर पानी संग्रहित किया गया था। गर्मियों के दौरान, इसके पिघलने से हर दिन 3,000 से 5,000 लीटर पानी बहने लगा। वर्ष 2015 में इस स्तूप से पानी मिलने वाले पानी का इस्तेमाल ग्रामीणों ने 5,000 चिनार और विलो के पौधों के रोपण के लिये किया। इन पेड़ों को एक दिन में 10 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, और इनका आर्थिक मूल्य प्रति वृक्ष 8,000 रुपये होता है।

इस नवाचार से किसानों को फायदा हुआ


1987 में पहली बार कृत्रिम ग्लेशियर का निर्माण करने के बाद चेवांग नोरफेल को भारत के ‘हिमपुरुष’ के नाम से जाना जाने लगा। डाउन टू अर्थ से बातचीत में उन्होंने बताया कि कैसे बढ़ती गर्मी, कम बारिश और पिघलते ग्लेशियर लद्दाख में लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहे हैं और ऐसे में कृत्रिम ग्लेशियर कैसे मददगार हैं।

बंजर पहाड़ों में कृत्रिम ग्लेशियरों के निर्माण का विचार आपके मन में कैसे आया?


लद्दाख ग्लेशियरों का भण्डार है। 30 साल से अधिक समय मैंने किसानों के साथ काम किया है और उनकी समस्याओं को भली-भाँति देख सकता था। उनके लिये पानी के अभाव में फसलों की बुवाई बहुत मुश्किल थी। इसके अलावा, ग्लेशियरों से पिघलने वाला पानी वास्तव में तब उपलब्ध नहीं हो पाता था जब उन्हें इसकी जरूरत हो। लेकिन उनके लिये जलसंग्रहण संरचनाओं के निर्माण की प्रेरणा मुझे उस दिन मिली जब मैंने अपने बगीचे के एक नल को खुला छोड़ दिया ताकि पाइप में पानी जम न पाए। लेकिन पाइप से बाहर आने वाला पानी तुरन्त जम गया। इससे मेरे मन में विचार आया कि हम इसे जमाकर और नीचे की ओर प्रवाहित होने से रोककर जल संचयन प्रणाली का निर्माण कर सकते हैं।

क्या कृत्रिम ग्लेशियरों में सुधार से इनका फायदा अधिक लोगों तक पहुँच सकता है?


जब मैंने इन ग्लेशियरों के निर्माण के बारे में सोचा, लोग मुझ पर हँस रहे थे। लेकिन मुझे इस बात का गर्व है कि इस नवाचार ने कई किसानों की मदद की है। हालाँकि कुछ लोग अब मेरे आविष्कार को आधार बनाकर कृत्रिम ग्लेशियर के निर्माण में लगे हैं। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमें अपनी खोज के लिये भी जरूरत के मुताबिक वित्तीय सहायता नहीं मिल पा रही है। इन नवाचारों में सुधार के लिये तकनीक के अधिक उपयोग की जरूरत है जिसके लिये बहुत ज्यादा धन और प्रयासों की आवश्यकता होगी।