जालौन में तालाबों पर अतिक्रमण, उच्च न्यायालय में पीआईएल नतीजा शिफ़र

Author:अनिल सिंदूर


1. नगर में 36 तालाब, अतिक्रमण से कोई अछूता नहीं
2. 2008 में दाखिल हुई पीआईएल


.जल ही जीवन है जब जल ही ख़त्म हो जाएगा तो व्यक्ति का जीवन कैसे रहेगा को मूल मंत्र मानते हुए उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट आदेश हैं कि तालाबों पर किसी भी व्यक्ति का अतिक्रमण हो, तत्काल प्रभाव से हटा दिया जाये। यह अतिक्रमण कितना भी पुराना क्यों न हो। उच्चतम न्यायालय के आदेशों के बावजूद जालौन नगर के 36 तालाबों पर अतिक्रमण है।

जनपद जालौन के ऐतिहासिक जालौन नगर में 36 तालाब अभिलेखों में दर्ज हैं इन सभी तालाबों पर 10 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक अतिक्रमण है लेकिन प्रशासन ने सिर्फ 7 तालाबों पर अतिक्रमण माना है जिसमें से दो तालाबों को उसने अतिक्रमणकारियों से मुक्त होना दिखाया है जबकि 5 तालाबों पर अतिक्रमण करने वाले 70 व्यक्तियों को पीपीएक्ट के तहत उपजिला मजिस्ट्रेट की अदालत में बेदखली का मुकदमा दायर किया है।

शासन और प्रशासन की अनदेखी के चलते जलस्रोतों को बर्बाद होते देख वर्ष 2001 में एक पीआईएल 4787/2001 उच्चतम न्यायालय में दाखिल की गई। दाखिल पीआईएल की गम्भीरता को देखते हुए 25 जुलाई 2001 को सैयद शाह क़ादरी एवं एसएन फूकन न्यायाधीशों ने संयुक्त रूप से आदेश दिया कि तालाबों, पोखरों, बावड़ियों, तथा कुओं का न तो स्वरूप बदला जा सकता है और न ही किसी तरह का अतिक्रमण किया जा सकता है।

तालाबों, पोखरों, बावड़ियों तथा कुओं पर जो भी अतिक्रमण हो उसे तत्काल प्रभाव से हटा दिया जाये। लेकिन शासन-प्रशासन ने उच्चतम न्यायालय के आदेशों को दरकिनार करते हुए जलस्रोतों पर कोई भी ध्यान नहीं दिया।

प्रदेश के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में अनेकों स्थानों पर भूजल की उपलब्धता में कमी आने के साथ ही भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आई और भूगर्भशास्त्रियों ने आशंका जाहिर की, कि यदि हालात रहे तो आगामी वर्षों में पानी का भयंकर संकट खड़ा हो जाएगा तब 18 फरवरी 2013 को प्रदेश में ‘उत्तर प्रदेश भूजल प्रबन्धन, वर्षाजल संचयन एवं भूजल रिचार्ज हेतु समग्र नीति’ लागू की गई। इस समग्र नीति को क्रियान्वयन को कई विभागों को सौंपा गया।

प्रदूषित जालौन का तालाब मालूम हो कि वर्ष 2000 में 22 विकासखण्डों को अतिदोहित/क्रिटिकल श्रेणी में चिन्हित किया गया था उनकी संख्या वर्ष 2011 बढ़कर 179 पहुँच गई। भूजल की स्थिति को देखते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्राकृतिक जलस्रोतों तालाबों, पोखरों तथा कुओं को संरक्षित करने के लिये 1 अप्रैल 2015 को ‘मुख्यमंत्री जल बचाओ अभियान योजना’ को लागू किया है।

उच्चतम न्यायालय के आदेशों, उ. प्र. सरकार की तमाम महत्त्वपूर्ण योजनाओं तथा भूगर्भशास्त्रियों की चेतावनी के बाद भी जब तालाबों पर अतिक्रमण जारी रहा तब वर्ष 2008 में जालौन निवासी समाजसेवी रवीन्द्र पाटकार ने एक पीआईएल 63853/2008 उच्चन्यायालय इलाहाबाद में दाखिल की जिसका आज तक कोई परिणाम नहीं आया है।

पीआईएल दाखिल होने के बाद प्रशासन ने ये माना है कि 36 तालाबों के सापेक्ष केवल 7 तालाबों पर अतिक्रमण है जिसमें दो को मुक्त करा लिया गया है और 5 तालाबों पर 70 लोगों का अतिक्रमण है। प्रशासन ने 06 अप्रैल 2010 को पीपीएक्ट के तहत बेदखली का मुकदमा दायर कर लिया है। प्रशासन ने जब माना है कि अतिक्रमणकारियों ने तालाबों पर अतिक्रमण किया है और उच्चतम न्यायालय का आदेश भी है फिर तालाबों को अतिक्रमण से मुक्त क्यों नहीं करवाया गया।

सूचना के अधिकार के तहत जहाँ प्रदेश सरकार ने नवम्बर 2013 में सूचना दी है कि जनपद जालौन में एक भी तालाब, पोखर, झीलों, तथा कुओं पर कोई अतिक्रमण नहीं हैं वहीं जालौन तहसील के अभिलेखों के अनुसार जालौन नगर के 5 तालाबों पर 70 व्यक्तियों का अतिक्रमण है। इन सभी अतिक्रमणकारियों पर पीपीएक्ट के तहत मुकदमा भी दायर किया है।

प्रदूषित जालौन का तालाब