जब 1984 को पूर्वी कोसी तटबंध टूटा...

Author:ओमप्रकाश भारती
Source:कोसी मित्र

(5 सितम्बर, 1984 को पूर्वी कोसी तटबंध टूटने पर)

पूर्वी कोसी तटबंध के 72-78 कि. मी. के बीच कोसी का जलस्तर ख़तरे के निशान को पार कर चुका है। बाँध कभी भी टूट सकता है। नागरिकों को चेताया जाता है कि वे अपने घरों को ख़ाली कर सुरक्षित स्थानों पर चले जाएँ... सुनिए...!

तीन दिनों से जिला प्रशासन की गाड़ी गाँव की गलियों में दौड़ लगा रही है। दिन भर लोग घरेलू कार्यो में व्यस्त रहते, शाम होते ही भयभीत! कई रातों से पूर्वी तटबंध के बाहर के गाँवों में रतजगा चल रहा था।कोसी के गीतों का स्वर हर “टोले' से सुनाई देता था। कई बार भगदड़ मची। कहीं से आवाज़ आती- “भागोबाँध टूट चुका है।”” और सभी लोग घरबार छोड़ भाग खड़े होते थे। फिर थोड़ी देर के बाद पता चलता था कि झूट्ठो का हल्ला हुआ है तो कई लोगों की व्यंगपरक टिप्पणी सुनाई देती “हम कह रहे हैं कि बान्ह नैय टूटेगा, झूठ का हल्ला कर दिया कि घर सब ख़ाली कर दो... इधर सब भागों उधर घरों में लूटपाट शुरू; खूब समझते हैं इन चोर-डकैतों की चाल को।”'

इन्हीं गाँवों में से एक था मेरा ननिहाल 'परसबन्ना', जो कई बार कोसी की “कटनियाँ, में कट चुका था। तंग आकर लोगों ने तटबंध के बाहर घर बसाया था। लेकिन इस अभागे गाँव के लोगों को चैन कहाँ मिलना था। यहाँ भी कोसी उसे एक बार फिर से सताने की योजना बना चुकी थी। कोसी की तबाहियों से निपटने का साहस परसबन्ना के लोग जुटा रहे थे। घरों को ख़ाली कर सुरक्षित स्थानों पर सामानों को रखा जा रहा था। नाना जी बार-बार मामा जी को हिदायत दे रहे थे कि हम लोगों को अपने पैतृक गाँव पहुँचा दिया जाए। लेकिन हम जाने को तैयार नहीं थे। बार-बार बहाना बना कर टाल देते थे। कौन-सा बाँध अभी टूटने जा रहा है। जो होगा, देखा जाएगा। दस दिनों से लोग रतजगा कर थक चुके थे। कई लोग बाहर किए गए सामानों को पुनः घर ले आए। सब कुछ धीरे-धीरे सामान्य हो रहा था। हमलोग रात्रि भोजन के बाद सोने चले गए। लेकिन 'झबरा' अपने मित्रों के साथ लोगों को जगाने में जुटा था। वह आकाश की ओर ताकते हुए “भों..भोंऊँ...'” की आवाजें लगा रहा था। मुझे नींद नहीं आ रही थी। 'झबरे' की आवाज किसी अभिशप्त मानव का शोकगान लग रहा था। किसी ने खाँसते हुए कहा- “कुत्तों का रोना अच्छा नहीं माना जाता है, साइत अच्छा नहीं है।”” बैगना (गाँव काचौकीदार) ने लाठी पटकते हुए आवाज़ लगाई “जाग जाग जाग हो...।”” अचानक शाहपुर की ओर सेवाज्ञ आई- “दोहाई कोसी माई की! कोसी मइया की जै हो... रन्‍नू सरदार की जै हो!! घुटरा रो टुटलौ बाँध...!!! त्राहिमाम!!! भगदड़! “हो जोगिंदर गाय-भैंस खोलि दहक हौ... भागि जैते बान्ह पर।”” या खुदा! आमीन... कहर, बख़स दो; रे सुलेमान! अमीना रह गेलो घरे में रे!”-शेख़टोली से आवाजें आई। “मिसरोलिया' में कुछ महिलाएँ गीत गा रही थी, उनका स्वर और भी तेज हो गया- कथी ले रोपलियै हे कोसी माय/ आम जामुन गछिया हे  कथी ले बान्हिलिये घर हे...।

किसी ने डाँटते हुए कहा- “पोधनी पसारने छै, बान्ह टूटि गेलै भाग नै।” प्रलय! सभी लोग गिरते-पड़ते रात के आँधेरे में सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे। कई लोग घर की छप्पड़ पर चढ़ गए। चारों दिशाओं से चीख़-पुकार सुनाई देने लगी।आखिरकार 4 सितम्बर 1984 की आधी रात को सरकारी हल्लागाड़ी से आवाजें आने लगीं- “बाँध टूट चुका है...!”!

 देखते ही देखते हेमपुर, बलवा, नौहट्टा, शाहपुर, परसबन्ना, मुरादपुर चन्द्रायण, जोड़ी आदि कई गाँव जल विलीन हो गए। चीख़, क्रंदन की जगह पानी की कल-कल सुनाई देने लगा। कुछ लोग घर के छतों पर चढ़ गए बाकी प्राणियों ने भागकर तटबंध पर आश्रय लिया। अब वे दो समंदर के बीच फँसे थे। तीस फुट चौड़ा तटबंध की दोनों तरफ अथाह जल था। इस पर आश्रय लिए प्राणियों का सम्पर्क दुनियां के सभी भागों से कट चुका था। भागते हुए लोग चावल, गेहूँ और खाने की कुछ अन्य सामग्री तो बचा पाए थे, लेकिन इंधन बचाने का समय नहीं देना कोसी ने तय कर रखा था। जिसपर प्रकृति की निर्ममता बढ़ती ही जा रही थी। आसमान फूट पड़ा। तेज आँधी के साथ बौछारें। सूँ... सूँ... साएँ... फड़फड़  चलती तेज दानवी हवा के बीच लोगों का साहस जबाव देने लगा। सामूहिक गीतों के थरथराते स्वर फूटने लगे- “गोर तोरा लागै छिअ हो बाबा डिहवार,गरुबेरा कोसी माय के दियो नै मनाय...! नवजात शिशुओं को माँ ने छाती से चिपका लिया! अभागे नवजात को रात भर ठंढे और गरम पानी के बीच रात काटनी पड़ी। जो संघर्ष कर जीत गए, वे जीवित बचे। बाकी निमोनिया में 'टें” बोल गए। न डॉक्टर, न दवाई। सिर्फ सांत्वना- चाचा, नाना, दादी की। विपत्तियों में फँसे प्राणियों का आश्चर्यजनक साहचर्य! हुड्हा बैल ने किसी को 'हुड़ा' नहीं, खूनी साँढ़ ने अपने सींग कटवा लिए, कुचले जाने पर भी विषधर ने किसी को डँसा नहीं।

लोगों को अपनी जान बचाना मुश्किल हो रहा था, पशुओं का क्‍या करें। पशु भी अपने मालिक पर आये विपदा को समझ रहे थे। दो-तीन दिनों से भूखे, खामोश दुबके तीन-चार फीट पानी में खड़े थे। लोगों से उनकी हालत देखी नहीं जा रही थी। खुद खड़े होने की जगह नहीं... उसे कहाँ आश्रय दें। धैर्य जवाब दे गया, लोग गाय, भैंस, बैल को दूब-धान देकर कोसी को अर्पित कर रहे थे- “हमें खुद बचने की आशा नहीं है, तुम्हें कहाँ से बचाएंगे! जाओ, कोसी माय ही तुम्हें बचाएंगी।''- लेकिन वे टस-मस नहीं हुए। वहीं खड़े रहे, जब तक की तेज धार उसे बहा नहीं ले गई।

सुबह होने को आया। मुर्गे बांग देने की बजाय दुबके रहे। होंए...होंए. डकारती कोसी की भँवरों की चपेट में समूचा पश्चिमी सहरसा जिला आ चुका था। जिन खेत, ख़लिहानों और उपवनों को बीते कल सूर्य की किरणों ने अंतिम चुम्बन दान दिया था, वहाँ आज कोसी प्रलय का तांडव कर रही थी। तीसरे दिन तक पानी सलखुआ पहुँच गया था। हजारों गाँव भयंकर बाढ़ और भुखमरी की चपेट में आ गए। मुरादपुर में छत पर आश्रय लिए साठ लोग पानी में बह गए। बनगाँव में सड़क पार करते युवक को भँवरें निगल गई। कई स्वयंसेवी संस्थाओं ने राहत कार्य आरंभ किया। सहरसा के पटेल मैदान में बाढ़ में फँसे लोगों का एकत्र किया गया।

उधर कोसी बाँध पर फँसे लोगों का चूल्हा तीसरे दिन भी ठंडा रहा। सहरसा से बाँध पर सम्पर्क साधना व्यक्तिगत साधन से संभव नहीं हो पा रहा था। वर्षा के कारण पहले ही गेहूँ, चावल भींग चुके थे। भूख की वहशी बुलंदी ने उसे ही खाने पर मजबूर किया। कुछ लोग जो जलावन बचा पाए थे, वे सोने-चाँदी की कीमत में उसे बेच रहे थे।

जिसके पास कुछ नहीं बचा था। वे अपने बच्चों के साथ आकाश की ओर टकटकी लगाए थे... शायद भगवान ही कुछ दे दें। भगवान ने उनकी सुन ली... हुँ..हुँ  करते हुए हेलीकाप्टर आकाश में घुमरने लगे। बाट जोहती आँखें ने आवाजें लगाई ““इनरा गान्ही की जै हो... इनरा गान्ही अमर रहे!” लोगों को लगा कि इन्दिरा गाँधी भारत की तत्तकालीन प्रधानमंत्री) उसे देखने आई हैं। इतने में आकाश से कुछ टपकने लगे। लोग डरकर इधर-उधर भागने लगे। गाँव के मुखिया ने सबको रोकते हुए कहा ““रिलीफ, रिलीफ ! घबराइये नहीं, सरकार की ओर से रिलीफ बाँट जा रहा है। उसके बाद का दृश्य और भी बीभत्स हो गया। लोगों की भीड़, गिराए गए रोटी, चूड़ा के थैलियों पर टूट पड़े। कई लोग के हाथ सिर्फ थेले का आधा भाग लगा, रोटी को टुकड़ों में कई लोगों ने झपट लिया। आधी से अधिक रशद छीना-झपटी से मिट्टी में सन गई। कुछ लोगों के हाथ-पैर छिल गए। जिनके हाथ कुछ लगा, वे जल्दी-जल्दी निगलने लगे। जिन्होंने आवश्यकता से अधिक बटोर लिया था, वे बेचने भी लगे। सिर्फ लाचार थे 'बौनी मड़्र', जो जन्म से ही बौने थे। उनके आगे-पीछे कोई नहीं था। दो चार पद भगैत गाकर और फकड़ा सुनाकर लोगों का मन बहलाया करते थे। लोगों को रुचा तो रोटी का एकाध टुकड़ा उन्हें मिल जाया करता था। लेकिन आज किसे अवकाश है 'भगैत” और “फकड़ा' सुनने का। बौने होने के कारण “बौनी मड्र' रोटी भी नहीं लूट सकते थे। तो क्या हुआ? अँधेरा होते ही 'बौनी मडर' कीचड़ में बिखरे रोटी के टुकड़े चुन रहे थे... आँखें इधर-उधर भी देख रही थी। कोई उसे देख तो नहीं रहा है...? उसे भिखमंगा कहेगा!

 

मैं रात भर उनीद्रा में 'बौनी मड्र' के बारे में सोचता रहा। नाना जी भिनुसरा ही जगते हैं। हमें भी सुबह की पहली खेप की नाव से गाँव जाना था। हम भी जग चुके थे। पूरब दिशा में क्षीतिज पर लाली फैलने लगी थी. बौनी मड़र ऊँची आवाज़ में कोसी का गीत अलाप रहे थे-

 

                                  गाम-गाम धुपबा दियेलै माय कोसिका/मैया तोरा नहि माया दरेग                                                                              बिछिया करे अनघोल/ डेढ़ी-डेढ़ी नैया गे माय कोसिका घाट-घाट चढेलौं लडुवा/ गे मैया बिछिया करे अनघोल/  धारे-धारे चढ़ेबौ गे कोसिका                                                        खस्सी, पाठी मिठइया/ गे मैया बिछिया करे अनघोल।

हे माय कोसिके! गाँव के गाँव तुमने मृत्यु के आगोश में डाल दिया। मैया! तुम्हें ममत्व और दया नहीं है? बिछिया आर्त्तनाद कर रही है (अपने सुहाग के उजड़ने से स्त्रियाँ आर्त्तनाद कर रही है)। तुम्हारी बाढ़ के कारण डेढ़ी-डेढ़ी पर नाव लगी है। घाट-घाट पर हमने लड्डू चढ़ाया। हे मैया, तब भी बिछिया आर्त्तनाद क्‍यों कर रही है? इसे रोको, दया करो हम पर, घाट-घाट पर खस्सी -पाठी की बलि दूँगी, मिठाई चढ़ाऊँगी... हे मैया, बिछिया आर्त्तनाद कर रही है!