जेनेरिक औषधियां: जीवन का पोषण

Author: शिला कौर
Source: सप्रेस/थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क फीचर्स, जुलाई 2013
गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन विश्वभर में नियामकों के साथ मिलकर कार्य करता है। इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोगों को बेहतर गुणवत्ता वाली औषधियां उपलब्ध हो पाई हैं। उदाहरण के लिए सन् 2012 में दुनियाभर में करीब 80 लाख लोगों को रीट्रोवायरल उपचार मिला इसमें करीब 65 लाख महिलाएं शामिल हैं, जिन्हें पहले से तयशुदा दवाइयां प्राप्त हुईं।संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसियों ने विकासशील देशों में वहन कर पाने योग्य औषधियों के मामले में जेनेरिक दवाइयों की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आवश्यक औषधियां एवं स्वास्थ्य उत्पाद विभाग एवं यूनिटेड’’ ने 66वीं विश्व स्वास्थ्य असेंबली के दौरान एक बैठक आयोजित की थी। इसका शीर्षक था, “वर्तमान एवं भविष्य में उपचार तक बढ़ती पहुंच बढ़ाने में जेनेरिक औषधियों की भूमिका’’ इसमें भाग लेने वालों का स्वागत करते हुए समन्वयक डॉ. लेंबिट रागो ने कहा कि जेनेरिक औषधियों की भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका है। यूरोपीय देशों में लागू बचत संबंधी कार्यवाही के चलते लागत में कमी की वजह से जेनेरिक पर निर्भरता और उनका उपयोग भी बढ़ेगा। उनका यह भी कहना था कि आने वाले समय में जेनेरिक औषधियां बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती रहेंगी।

अपनी शुरुआती टिप्पणी में यूनिटेड के उप कार्यकारी निदेशक डॉ. फिलिप्पी ड्युनेटोन ने बताया कि किस प्रकार यूनिटेड का व्यापार मॉडल जेनेरिक औषधि निर्माताओं पर स्वयं को केंद्रित कर कम कीमत के माध्यम से जेनेरिक औषधियों तक पहुंच को आसान बनाकर उपचार तक अधिक लोगों को पहुंचाता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन कार्यक्रमों के बिना लोगों की क्षमता भी सीमित हो जाएगी। ये कार्यक्रम बहुत ही सहकार की भावना लिए हुए हैं। हमारे सामने आगे बहुत सी चुनौतियां हैं। उदाहरण के लिए जेनेरिक फार्मूलों का निर्माण भी एक चुनौती है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा आज हमारे पास अच्छा अवसर है कि हम भविष्य के कार्यक्रमों की रूपरेखा बना लें।

इसके बाद अनेक वक्ताओं ने सभी के लिए स्वास्थ्य एवं गैर संक्रामक रोगों के संबंध में कार्ययोजना प्रस्तुत की। सभी का मत था कि इन दोनों ही परिस्थितियों से निपटने में अच्छी गुणवत्ता वाली अनिवार्य औषधियों की उपलब्धता और उन तक पहुंच होना जरूरी है। डॉ. रागो का कहना था कि औषधियों की गुणवत्ता आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। इस दौरान खराब गुणवत्ता की वजह से होने वाली असमय मौतों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन विश्वभर में नियामकों के साथ मिलकर कार्य करता है। इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोगों को बेहतर गुणवत्ता वाली औषधियां उपलब्ध हो पाई हैं। उदाहरण के लिए सन् 2012 में दुनियाभर में करीब 80 लाख लोगों को रीट्रोवायरल उपचार मिला इसमें करीब 65 लाख महिलाएं शामिल हैं, जिन्हें पहले से तयशुदा (प्रीक्वालिफाइड) दवाइयां प्राप्त हुईं।

अपनी अंतिम टिप्पणी में डॉ. लेंबिट ने कहा कि “पहले से तयशुदा दवाइयां जीवन की रक्षा करती हैं, लेकिन यह किसी प्रकार के राष्ट्रीय नियमन का हिस्सा न होकर गुणवत्ता वाली औषधियों तक पहुंच की प्रक्रिया हो सकती है। गरीब लोगों को खराब गुणवत्ता वाली औषधियों से निजात मिलना ही चाहिए। गरीब लोगों का भी अच्छी औषधियों पर अधिकार है। प्रीक्वालिफिकेशन एवं टीबी परियोजना के प्रबंधक रॉबर्ट माटिस ने एक स्वस्थ बाजार की स्थापना में इनके योगदान पर भी चर्चा की। वहीं पेटेंट के बढ़ते खतरे एवं एड्स की जेनेरिक औषधियों की गुणवत्ता वृद्धि पर भी विस्तार से चर्चा हुई। तंजानिया के खाद्य एवं औषधि निदेशक हैति बी. सिल्लोने तंजानिया में औषधियों के नियमन की गंभीरता पर जोर दिया। इसमें नियमन की आवश्यकता, प्रबंधन का ढांचा, मानव संसाधन क्षमता एवं संसाधन के साथ ही इस क्षेत्र के देशों के मध्य दवाइयों के आयात-निर्यात और बाजार के नियंत्रण जैसे विषयों को शामिल किया गया था।

ईएमपी के औषधि कार्यक्रम के स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. रिचर्ड लाइंग ने इस तथ्य की ओर इशारा किया कि प्रत्येक देश का जेनेरिक औषधियों का अपना एक बाजार है और कोई भी दो देश एक से नहीं हैं। पेटेंट की अवधि बीत जाने के बावजूद कुछ देशों में बड़ी मात्रा में ब्रांडेड दवाइयां बिकती रहती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि औषधियां भले ही जेनरिक हों या ब्रांडेड उन्हें एक सी गुणवत्ता वाली होना चाहिए। जेनेरिक दवाइयों को अपनाने की हर देश की अपनी क्षमता है। उदाहरण के लिए अमेरिका में जेनेरिक औषधियां 6 महीने के भीतर ब्रांडेड दवाइयों की 80 प्रतिशत हिस्सेदारी अपनी तरफ कर लेती हैं।

(जर्मनी में ब्रांड इतनी जल्दी नष्ट नहीं होते, वहां 4-5 वर्षों की अवधि में इनमें 15-16 प्रतिशत के मध्य कमी एवं अनुमान है कि ऑस्ट्रिया में यह गिरावट 4-5 वर्षों में करीब 4-5 प्रतिशत ही होती है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि उच्च आय वाले देशों के अलावा औषधियों के मूल्य का भुगतान व्यक्ति को अपनी जेब से ही करना पड़ता है। ऐसे देश जहां स्वास्थ्य बीमा के अंतर्गत औषधियों को लाना संभव नहीं हो पाया है वहां जेनेरिक औषधि नीतियां महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी!

लाइंग का कहना है, “जहां लोगों को अपनी जेब से भुगतान करना है वहां जेनेरिक औषधियां किसी व्यक्तिगत मरीज द्वारा औषधियों पर किए जाने वाले खर्च में 60 प्रतिशत तक की कमी ला सकती हैं और यही मृत्यु या गरीबी या जीवन के बीच अंतर भी ला सकता है।

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