जिन्होंने सूखे को मात दे दी

Author:पंकज चतुर्वेदी

टीकमगढ़ जिले में पारम्परिक ज्ञान पर आधारित बराना गाँव के चन्देलकालीन तालाब को जामनी नदी से जोड़ने की योजना बेहद सफल रही है। इससे 18 गाँव लाभान्वित हो रहे हैं। ऐसे कई-कई उदाहरण पानी के लिये बेहाल बस्तर से लेकर झारखण्ड तक में हैं जहाँ समाज ने ही अपनी समस्या का निदान पारम्परिक ज्ञान के सहारे खोज लिया। कर्नाटक में तो समाज ने अपने व्यय व श्रम से खूब तालाब बना डाले और सूखे को ठेंगा दिखा दिया। जान लें कि देश की जल समस्या का निदान भारी-भरकम तकनीक के साथ अरबों रुपए व्यय के बाद दशकों तक अधूरी रहने वाली योजनाओं से मिलने से रहा। जब बात हाथ से निकल गई, जब सुखाड़ के दुष्प्रभाव अपने चरम पर आ गए, तब दिल्ली के मीडिया को खयाल आया कि उनसे महज पाँच सौ किलोमीटर दूर बुन्देलखण्ड की आधी आबादी पानी की कमी के कारण पलयान कर चुकी है। सूखे कुएँ , बन्द घरों और तड़क चुकी जमीन के फोटो के साथ आये रोज खबरें तैर रही हैं। यह भी इतना नपा-तुला गणित हो चुका है, दिल्ली से पत्रकार जाता है, वहाँ वह कतिपय एनजीओबाज के पास होता है और वह अपने नजरिए से हालात दिखा देता है। आकर रपट फाइल हो जाती है। ऐसे में वे लोग तो गुमनाम ही रहते हैं जिनके कार्य असल में पूरे समाज व सरकार के लिये अनुकरणीय बन सकते हैं।

लगातार तीसरे साल अल्प वर्षा की मार से कराहते, बेहाल बुन्देलखण्ड से गाँव और अपने जीवन तक से पलायन, प्यास से परेशानी और पेट पालने की जटिलताओं की कहानियाँ बढ़ती गर्मी के साथ तेजी से फैल रही है। जब हालात पूरी तरह हाथ से निकल गए, तब मीडिया, प्रशासन और समाज की दीर्घ तंद्रा टूटी और सरकारी शेर कागजों पर दहाड़ने लगे।

इस दौड़-भाग से उपजी मृग मरिचिका प्यासे बुन्देलखण्डियों में भ्रम ही फैला रही है। ऐसी निराशा के बीच समाज के वे लोग चर्चा में हैं ही नहीं जिन्होंने इस सूखे व जल-संकट के समक्ष अपने हथियार नहीं डाले। विकट हालातों में भी स्थानीयता के पारम्परिक ज्ञान को याद किया और 45 डिग्री से अधिक गर्मी वाले इलाकों में भी सुखाड़ उन पर बेअसर है।

एक दशक के दौरान कम-से-कम तीन बार उम्मीद से कम मेघ बरसना बुन्देलखण्ड की सदियों की परम्परा रही है। यहाँ के पारम्परिक कुएँ, तालाब और पहाड़ कभी भी समाज को इंद्र की बेरुखी के सामने झुकने नहीं देते थे। जिन लोगों ने तालाब बचाए वे प्यास व पलायन से निरापद रहे। ब्रितानी हुकुमत के दौर में ‘पॉलिटिकल एजेंट’ का मुख्यालय रहे नौगाँव जनपद के करारा गाँव की जल-कुंडली आज शेष बुन्देलखण्ड से बिल्कुल विपरीत हो गई है।

पहले यहाँ के लोग भी पानी के लिये पदों से तीन किलोमीटर दूर जाया करते थे। यह सवाल जनवरी में जब ग्रामीणों को समझ में आ गया कि सावन बहुत संकट के साथ आएगा तो उन लोगों ने गाँव के ही एक कुएँ के भीतर बोरिंग करवा दी, जिसमें खूब पानी मिला। फरवरी आते-आते पूरे गाँव ने जुटकर अपने पुराने ‘बड़े तालाब’ की सफाई, मरम्मत व गहरीकरण कर दिया।

लगभग सौ फुट लम्बा एक पाइप कुएँ से तालाब तक डाला गया। फिर दो महीने जब बिजली आती, मोटर चलाकर तालाब भरा जाता। आज यहाँ पानी से घर के काम, मवेशियों के लिये पानी तो र्प्याप्त मिल ही रहा है, पूरे गाँव के अन्य कुओं व हैण्डपम्प का जलस्तर भी शानदार हो गया है। सब एकमत है कि इस बार बारिश से तालाब को भरेंगे।

पानी बचाने के लिये पहाड़ों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को महसूस किया घुवारा ब्लॉक के बमनौराकलां गाँव के समाज ने। दस हजार से अधिक आबादी और ढाई हजार मवेशियों वाला यह गाँव बुन्देलखण्ड की अन्य बसावटों की ही तरह चारों तरफ पहाड़ों से घिरा है। पिछली बारिश शुरू होने से पहले समाज ने पहाड़ों पर ऊपर से नीचे की तरफ लगभग डेढ़ किलोमीटर लम्बाई की एक फुट तक गहरी नालियाँ बना दीं। जब पानी बरसा तो इन नालियों के दस सिरों के माध्यम से बरसात की हर बूँद गाँव के विशाल ‘चंदिया तालाब’ में जमा हो गई।

आज पूरे गाँव में कोई बोरवेल सूखा नहीं है, घरों में 210 नलों के जरिए पर्याप्त जल पहुँच रहा है। अब ग्रामीणों ने नालियों को और गहरा करने व पहाड़ पर हरियाली का संकल्प लिया है। सनद रहे बुन्देलखण्ड के सभी गाँव, कस्बे, शहर की बसाहट का एक ही पैटर्न है- चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैया और उनके किनारों पर बस्ती।

पहाड़ के पार घने जंगल व उसके बीच से बहती बरसाती या छोटी नदियाँ। आजादी के बाद यहाँ के पहाड़ बेहिसाब काटे गए, जंगलों का सफाया हुआ व पारम्परिक तालाबों को पाटने में किसी ने संकोच नहीं किया। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुन्देलखण्ड के हर गाँव-कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। जिन्होंने पहाड़ बचाए वे प्यास से नहीं हारे।

दमोह शहर की जनता भले ही एक-एक बूँद पानी के लिये त्राहि-त्राहि कर रही हो, लेकिन जिला मुख्यालय के करीबी गाँव इमलाई में पानी का किसी तरह का संकट नहीं है। यहाँ की ‘तेंदू तलैया’ का गहरीकरण व सफाई खुद गाँव वालों ने कर ली थी। जब थोड़ी सी बारिश की हर बूँद इस कुदरती बचत खाते में जमा हुई तो उसके ब्याज से ही गाँव वालों का कंठ तर हो गया। इसी जिले के तेंदूखेड़ा के पाठादो व उससे सटे तीन गाँवों को पानीदार बनाने के लिये ग्रामीणों ने एक उपेक्षित पड़ी झिरिया का सहारा लिया।

झिरिया यानि छोटा सा झरना जहाँ से पानी का सोता फूटता है। यह झिरिया बरसात में खूब पानी देती है, गर्मी में इसकी रफ्तार कम हो जाती है। गाँव वालों ने इस झिरिया से निकल कर बहने वाले पानी के रास्ते में एक तलैया बना दी, एक कुआँ भी खोद दिया, नतीजा, बगैर किसी बड़े व्यय के पूरे इलाके की नमी बरकरार है। गाँव के बुजूर्ग पूरे दिन इसी झिरिया के किनारे रहते हैं व लेागों को किफायत से पानी खर्चने की सीख देते हैं।

टीकमगढ़ जिले में पारम्परिक ज्ञान पर आधारित बराना गाँव के चन्देलकालीन तालाब को जामनी नदी से जोड़ने की योजना बेहद सफल रही है। इससे 18 गाँव लाभान्वित हो रहे हैं। ऐसे कई-कई उदाहरण पानी के लिये बेहाल बस्तर से लेकर झारखण्ड तक में हैं जहाँ समाज ने ही अपनी समस्या का निदान पारम्परिक ज्ञान के सहारे खोज लिया।

कर्नाटक में तो समाज ने अपने व्यय व श्रम से खूब तालाब बना डाले और सूखे को ठेंगा दिखा दिया। जान लें कि देश की जल समस्या का निदान भारी-भरकम तकनीक के साथ अरबों रुपए व्यय के बाद दशकों तक अधूरी रहने वाली योजनाओं से मिलने से रहा। झारखण्ड के गुमला जिले के भरनो प्रखण्ड के खरतंगा पहाड़ टोला के लोगों का संकल्प तारीफ के काबिल है। उन लोगों ने आपस में मिलकर 250 फुट लम्बा, 200 फुट चौड़ा और दस फुट गहरा तालाब खोद लिया। यदि यह ताल भर जाता है तो पूरे इलाके में कभी जल संकट होगा ही नहीं।

यह जान लें कि यहाँ पानी तो इतना ही बरसेगा, यह भी जान लें कि आधुनिक इंजीनियरिंग व तकनीक यहाँ कारगर नहीं है। बुन्देलखण्ड , झाारखण्ड या बस्तर या फिर मालवा को बचाने का एकमात्र तरीका है- अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। समाज जानता है कि तालाब महज पानी जमा नहीं करते, वे बेकार हो जाने वाले बारिश के पानी को साधते भी हैं।

तालाबों की अधिकता से नदी-दरिया में बहकर जाने वाला बरसात का पानी गन्दला नहीं होता, क्यों तालाब पानी की मिट्टी को अपने में जज्ब कर लेते हैं। यहाँ से उछल कर गया पानी ही नदी में जाता है। यानि पहाड़ या जमीन से जो मिट्टी तालाब की तलहटी में आई, उससे खेत को भी सम्पन्नता मिलती है। ऐसे लोक ज्ञान को महज याद करने, उसमें समय के साथ मामूली सुधार करने और उनका क्रियान्वयन स्थानीय स्तर पर ही करने से हर इंसान को जरूरत मुताबिक पानी मिल सकता है। आवश्यकता है ऐसे ही सफल प्रयोगों को सहेजने, सराहने और सँवारने की।