जीव-जन्तुओं की अनोखी दुनिया

Author:योगेश कुमार गोयल
Source:दैनिक ट्रिब्यून, अक्टूबर 2010

शिकार को पीट-पीटकर मार डालता है ‘स्माल ब्लू किंगफिशर’


‘किलकिला’, ‘शरीफन’, ‘केसर मछरंगा’ इत्यादि नामों से जाना जाने वाला करीब 18 सेंटीमीटर लंबा यह पक्षी प्राय: किसी तालाब, नदी, झरने या पानी भरे गड्ढे के किनारे झुकी हुई डाल पर अकेला बैठा नजर आ जाता है। गोरैया से थोड़ा सा बड़ा यह पक्षी एक अत्यंत सुंदर एवं आकर्षक पक्षी है, जो डाल पर बैठा बड़े ध्यान से पानी की ओर देखता रहता है और जैसे ही इसे कोई मछली या मेंढ़क नजर आता है, यह अपनी चोंच आगे किए झट से उस पर टूट पड़ता है और पीट-पीटकर उसे मार डालता है, फिर उसे निगल जाता है। स्माल ब्लू किंगफिशर नीले रंग की होती है, जो लंबी, सीधी और नोकदार होती है। इसके पैर लाल तथा कनपटी और गले के नीचे का रंग केसरिया एवं चोंच के नीचे गले तक सफेद रंग होता है। आंखों के पास केसरिया रंग पर पीछे की ओर सफेद रंग होता है जबकि इसकी ऊपरी शारीरिक त्वचा का रंग हल्की फिरोजी आभा के साथ चटख नीला होता है। नर और मादा एक जैसे ही दिखाई देते हैं।वैसे तो स्माल ब्लू किंगफिशर किसी डाल पर बैठकर पानी में हर हरकत पर पैनी नजर रखता है पर कभी-कभी यह पानी के ऊपर चीं-चीं की आवाज करता हुआ भी मंडराता रहता है और बड़े विचित्र तरीके से शिकार के पीछे गोता लगाता है। यह पानी की सतह के ऊपर बहुत तेज गति से उड़ता है। मछली और मेंढक के अलावा यह गुबरैलों और पानी के कीड़ों को भी चाव से खाता है। भारत में लगभग हर जगह पर पाया जाने वाला यह पक्षी घनी बस्ती से थोड़ा हटकर तालाब अथवा झरने के किनारे या ऐसी जगहों पर दिखाई देता है, जहां पानी जमा होता है। इसकी मछली का शिकार करने की शैली भी बड़ी गजब की है। बताया जाता है कि अगर स्माल ब्लू किंगफिशर मछली को पकड़कर उसका मुंह अपनी ओर किए होता है तो इसका अर्थ है कि यह मछली उसने स्वयं के लिए पकड़ी है लेकिन अगर पकड़ी गई मछली का मुंह चोंच से बाहर की ओर है तो इसका अर्थ है कि मछली उसने अपने जीवनसाथी के लिए पकड़ी है और अगर पकड़ी गई मछली बहुत छोटी है तो इसे उसने अपने बच्चों के लिए पकड़ा है। स्माल ब्लू किंगफिशर नदी के किनारे की मेड़ अथवा गड्ढे या तालाब की मेड़ पर 50 से 100 सेंटीमीटर लंबी सुरंग बनाता है, जिसका भीतरी किनारा अधिक फैलाव लिए होता है, जिसमें मादा अण्डे देती है। इनका प्रजनन काल सामान्यत: मार्च से जून के बीच होता है। मादा एक बार में 5-7 अण्डे देती है, जो काफी चमकदार और गोलाई लिए होते हैं। अण्डों को सेने का काम नर तथा मादा दोनों मिलकर करते हैं।देशी मैना नहीं है ‘दरिया मैना’‘गंगा मैना’, ‘चही’, ‘किलनहियां’ इत्यादि नामों से जानी जाने वाली दरिया मैना हालांकि देखने में ‘देशी मैना’, जिसे ‘किलहरा मैना’ के नाम से जाना जाता है, जैसी ही लगती है किन्तु वास्तव में यह आकार में देशी मैना से छोटी होती है, जो प्राय: नदियों के कगार पर ही घोंसला बनाकर रहती है। यही वजह है कि इसे दरिया मैना के नाम से जाना जाता है। इसकी चोंच का रंग नारंगी होता है। देशी मैना (किलहरा) की शारीरिक लंबाई करीब 11 इंच होती है, जो मकान की छतों पर अथवा घरों, वृक्षों तथा कुओं के सुराखों में घोंसला बनाकर रहती है और हमारे घरों के आसपास अक्सर दाना चुगती नजर आ जाती है। देशी मैना का सिर, गर्दन, दुम तथा सीना काला होता है जबकि पेट और डैनों के कुछ भाग तथा पूंछ का सिरा और निचला भाग सफेद होता है। इसकी आंखों की पुतलियों का रंग लालपन लिए भूरा होता है। देशी मैना को लोग शौक से घरों में पालते हैं। इसका प्रजनन काल जून से अगस्त तक होता है और यह एक बार में 4-5 अण्डे देती है।

Latest

सीतापुर और हरदोई के 36 गांव मिलाकर हो रहा है ‘नैमिषारण्य तीर्थ विकास परिषद’ गठन  

कुकरेल नदी संरक्षण अभियान : नाले को फिर नदी बनाने की जिद

खारा पानी पीने को मजबूर ग्रामीण

कैसे प्रदूषण से किसी देश की अर्थव्यवस्था हो सकती है तबाह

भारत में क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस

वायु प्रदूषण कम करने के लिए बिहार बना रहा है नई कार्ययोजना

3.6 अरब लोगों पर पानी का संकट,भारत भी प्रभावित: विश्व मौसम विज्ञान संगठन

अब गंगा में प्रदूषण फैलाना पड़ेगा महंगा!

बीएमसी ने पानी कटौती की घोषणा की; प्रभावित क्षेत्रों की पूरी सूची देखें

देहरादून और हरिद्वार में पानी की सर्वाधिक आवश्यकता:नितेश कुमार झा